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Saturday, March 28, 2015

ऐसे भी कहाँ देश में ईमान मिलेंगे - सतीश सक्सेना

हर मोड़ पर खोये हुए ईमान मिलेंगे !  
चेहरा लगाए संत का शैतान मिलेंगे !

शुरुआत में ऐसे बड़े भुगतान मिलेंगे 
धनवानों  के भेजे हुए तूफ़ान मिलेंगे !

नाले में आ गये हो ज़रा देखभाल के
चारो ही ओर, खूंख्वार श्वान मिलेंगे !

बेईमान लालची ही, तुम्हें लोग कहेंगे  
सारे पढ़े लिखों से,यह प्रमाण मिलेंगे !

धनवान,मीडिया दलाल साथ साथ हैं,
चोरों के शहर में बड़े,अपमान मिलेंगे !

Monday, March 16, 2015

निकलो बंद मकानों से जंग लड़ो बेईमानों से - सतीश सक्सेना

निकलो बंद मकानों से, जंग लड़ो बेईमानों से !
सावधान रहना भक्तों के, राष्ट्रभक्ति के गानों से !

बड़ी बड़ी गाडी में घूमें झंडा लगा गुमानों का 
मूर्ख बनी है जनता कबसे खादी के शैतानों से 

चर्बी चढ़ी है गद्दारों को, नोट कमाने निकले हैं 
भारत माँ को खतरा ऐसे, राष्ट्रभक्त हनुमानों से !

राष्ट्रभक्ति से अरबपति, बन बैठे हैं आसानी से
कानों को न सुनाई पड़ता, स्पर्धा धनवानों से ! 

खद्दरधारी दीमक सुर में, देशभक्ति का गान करें, 
देश हमारा शर्मिन्दा है, दसलक्खा परिधानों से !

Wednesday, February 11, 2015

मफलर की आँखें - सतीश सक्सेना

अरविन्द का उदय , इस देश की भोले जनमानस में , ठंडी हवा के संचार का सूचक है ! जिस जनमानस पर अब तक सिर्फ श्वेतवस्त्र धारी राजनैतिक बदबूदार मदारियों का राज था वहां पर एक साधारण व्यक्ति के ईमानदार क़दमों की आहट पर आम जनता का विश्वास होना, एक सुखद सवेरे का आगमन जैसा लगता है !अरविन्द के आश्वासन पर, राजनैतिक लुटेरों और झंडों से बारबार धोखा खाए लोगों का विश्वास जगा है और उन्हें लगा है कि यह व्यक्ति बेईमान नहीं है !

 साधारण अशिक्षित ग्रामीण जनमानस, भारतीय गृहणियां, जो मनोरंजन  तथा ख़बरों के लिए सिर्फ लालची टेलीविजन  मीडिया पर निर्भर हैं तथा अपने कामों के लिए राजनीतिक धूर्तों और मदारियों के ऊपर भरोसा करने को मज़बूर हैं ! देश की ७० प्रतिशत से अधिक जनता शायद ही कभी किसी सरकारी दफ्तर में जाने की हिम्मत कर पायी होगी वे अपने कार्यों के लिए दलालों और इन राजनैतिक छुटभैयों की जान पहचान पर फख्र महसूस करते हैं और यह सोंचते हैं कि हमारे काम भी हो ही जाएंगे ! राशन कार्ड बनाने, बिजली वालों के सामने गिड़गिड़ाते, इन लोगों के
पास पैसे देकर , काम कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है !

जिस देश में अपने एमएलए और एमपी के पास जाने का मतलब ही  "काम " का हो जाना होता है , ९० % इन अनपढ़ों के बच्चों की नौकरियां, राजनीतिज्ञों के दलालों को पैसे देकर ही लगती हैं बशर्ते दलाल सही जगह ( साहब के पास ) पैसे पंहुचा दे !  राज्य सरकार की नगर पालिकाओं, सरकारी स्कूलों , लेखपालों , कंडक्टरों , ड्राइवरों, पुलिस में सिपाहियों और हवलदारों की भर्ती , रेलवे भर्ती बोर्ड  आदि की नौकरियों पर खद्दर धारियों की चेयरमैन शिप का कब्ज़ा है ! सरकारी नौकरियों में  हेराफेरी सबको पता है मगर कहीं कोई विद्रोह की आवाज नहीं सुनायीं पड़ती, सरकारी महकमों में बच्चों की नौकरी लगने की उम्मीद अखबारों के नुमाइंदों का मुंह भी बंद रखने में कामयाब है !

४५ वर्ष से ऊपर के लोग अधिकतर इस गुलाम विचारधारा को बढ़ाने के दोषी हैं , इन कमज़ोर और संकीर्ण दिमाग व्यक्तियों  का अपने घर में शक्तिशाली होने का अहसास होने के लिए , किसी नेता का पिट्ठू बनना आसान होता है उसके बाद यह चमचे अक्सर अपनी पीठ पर ताउम्र उस राजनैतिक पार्टी का नाम लिखाये फख्र महसूस करते घूमते रहते हैं ! इनका अपना कोई
व्यक्तित्व नहीं , यह सिर्फ अपने गुरुओं की विचारधारा के गुलाम हैं जो देश में नफरत फैलाने के दोषी हैं ! धर्म और आस्था के नाम पर , दूसरों के प्रति नफरत फैलाकर , भेंड़ बकरियों की भीड़ को अपनी पार्टी की तरफ हांकना और उन्हें सुरक्षा देने का वायदा दिलाने के कार्य, इस देश के पढेलिखे नवयुवक पहचानने लगे हैं और इसे रोकने के लिए कटिवद्ध हैं !
इस देश में सामान्य जन का विश्वास बेहद आहत हुआ है , त्रस्त और अशिक्षित जनता अपनी स्थिति में कुछ बदलाव लाने के लिए हर जगह जाने और सीखने के लिए तैयार रहती है , बाबा कामदेव , बापू विश्वासराम , साईं और साध्वियों  के समागमों के नाम पर लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी , आशान्वित आँखों से ताकते यह श्रद्धालु अपने बनाये हर गुरू द्वारा बुरी तरह लुटे और ठगे गए , इनके चढ़ावों से और आस्था स्वरुप हर गुरु ने हज़ारों लाखों करोड़ कमाए और देश की जनता को कालाधन बापस लाने का वायदा और राष्ट्रभक्त बनाने की ओजस्वी प्ररेणा दी  !

    
शुक्र है पढ़े लिखे नवजवानों की नयी पीढ़ी का कि वे लालची नहीं है वे मेहनत कर धन कमाने पर विश्वास रखते हैं, धर्म, कर्म, पाप, पुण्य , पाखण्ड दिखावे से बहुत दूर यह बच्चे एक सुखद संकेत हैं एवं अपने बड़ों की मानसिकता में परिवर्तन लाने को कटिवद्ध हैं !  
लगता है आने वाले समय में और इन लड़के लड़कियों में से बहुत सारे अरविन्द जन्म लेंगे, यह सुखद संकेत ,देश में नया बदलाव लाने में समर्थ होगा ! अब मफलर, दसलखा सूटों को पहचान चुका है इसीलिए बाकी काम अधिक आसान हो जाएगा ! निस्संदेह आने वाला समय,  इस देश की भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के लिए बेहद बुरा काल होगा, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा मगर नवनेताओं को इन गिरगिटों से सावधान रहना होगा !


ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे ! - सतीश सक्सेना 

Sunday, November 2, 2014

ये नेता रहे तो , वतन बेंच देंगे - सतीश सक्सेना

ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गए
हमारे मसीहा , अमन बेंच देंगे !

कुबेरों के कर्ज़े लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे !

Monday, December 23, 2013

गिरगिट जैसी चमड़ी वाले , रंग बदलते गंदे लोग -सतीश सक्सेना

नेता बनकर बाहर निकले, देश लुटाते गंदे लोग !
जनमानस में आग लगाने, घर से जाते गंदे लोग !

राजनीति में चोर बताया जाए, अच्छे लोगों को !
अपना माल छिपा,गंदे आरोप लगाते,गंदे लोग !


सभी जानते भले लोग,जनमानस के दिल में बैठे
स्वच्छ छवि को मैला करने भ्रम फैलाते गंदे लोग !


जेल दूसरा घर होता है, चोर उचक्के लोगों का
नेता बनकर, घोटाले कर, जेल न जाते गंदे लोग !

चोर डकैती में तो ख़तरा, बड़ा झेलना पड़ता है !
राजनीति में आसानी से, माल कमाते गंदे लोग !




Tuesday, December 3, 2013

केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से - सतीश सक्सेना

मूरख जनता खूब लुटी है, पाखंडी सरदारों से !
देश को बदला लेना होगा,इन देसी गद्दारों से !

पूंछ हिलाकर चलने वाले,सबसे पहले भागेंगे !
सावधान ही रहना होगा, इन झंडे बरदारों से !


चौकीदारी करते कैसे निरे झूठ को सत्य बताएं 
आँख खोल के सोना होगा, ऐसे  पहरेदारों से !

जीवन भर ही वोट डालते रहे,तुम्हारे कहने पर !
अब कैसे बच पाये इज्जत,इन डाकू सरदारों से !

राजनीति के मुहरों के रंग,देख लिए हैं,जनता ने !
केवल बच कर रहना होगा, इतने बदबूदारों से !


Saturday, October 19, 2013

कितने भेद छिपाए बैठा, एक दुपट्टा, औरत का - सतीश सक्सेना

आओ खेलें खेल देश में नफरत और हिफाज़त का 
जो जीतेगा वही करेगा शासन सिर्फ हिकारत का !

भ्रष्टाचार ख़तम कर डालें , हल्ला गुल्ला  हैरत का ! 
जनता साली क्या जानेगी,किला जीतना भारत का !

टेलीविज़न पर नेताओं को, काले धन की चिंता है !
कैसे भी, सत्ता हथियानी, लक्ष्य पुराना हज़रत का !

ऐसा लगता बदन रंगाये,बिल्ला जमीं पर उतरा है !
लगता वही डालडा डब्बा,बजे चुनावी कसरत का !

तरस, दया, हमदर्दी खाकर ,हाथ फेरना बुड्ढों का ! 
यह तो  वही पुराना फंडा,उस्तादों की फितरत का !

पढ़े लिखे क्या समझ सकेंगे,मक्कारों की बस्ती में !
कितने भेद छिपाए बैठा , एक  दुपट्टा, औरत का !



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