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Wednesday, April 13, 2022

विवाह गीत -सतीश सक्सेना

जिससे रिश्ता जुड़ा था 
जनम जन्म से  
द्वार पर आ गए , 
आज  बारात ले !
उनके आने से, सब 
खुश नुमा हो गया !
नाच गानों से , घर भी चहक सा गया !

पर यह आँखें मेरी, 
संग नहीं दे रहीं 
हँसते हँसते न जाने 
छलक क्यों रहीं  ?
आज बेटी   चलीं, 
अपना दर छोड़कर
घर नया चुन लिया अपना घर छोड़कर !

आज माता पिता 
भाई बहना सभी 
कर रहे स्वागतें 
इक नयी आस में !
जाओ बहना सजाओ 
नया आशियाँ !
हम सभी की शुभाशीष है साथ में !

रचनी होगी तुम्हें , 
विश्व सर्वोत्तमा 
एक हंसती कलाकृति
 हमारे लिए !
हाथ फैलाये हंसती 
कृति विश्व की 
ऎसी  सौगात देना , हमारे लिए  !


Friday, May 15, 2020

सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है -सतीश सक्सेना

अनुत्तरित हैं प्रश्न तुम्हारे
कैसे तुमसे नजर मिलाऊं
असहज कष्ट उठाए तुमने

कैसे हंसकर उन्हें भुलाऊं
युगों युगों की पीड़ा लेेेकर
पूछ रही है नजर तुम्हारी
मैं तो अबला रही शुरू से
तुम सबने, चूड़ी पहनाईं !
हर दरवाजा जीतने वाला , इस दरवाजे हारा क्यों है।

बचपन तेरी गोद में बीता
कितनी जल्दी विदा हो गई !
मेरा घर क्यों बना मायका,
कैसे घर से जुदा हो गई !
अम्मा बाबा खुश क्यों हैं ?
ये आंसू भर के नजरें पूछें !
आज विदाई है, आँचल से
कैसे दुनियाँ को समझाए !
हिचकी ले ले रोये लाड़ली, उसको ये घर प्यारा क्यों है ?

जिस हक़ से अपने घर रहती
जिस हक़ से लड़ती थी सबसे
जिस दिन से इस घर में आयी
उस हक़ से, वंचित हूँ तब से
भाई बहिन बुआ और रिश्ते 
माँ और पिता यहाँ भी हैं पर
नेह, दुलार, प्यार इस घर में
मृग मरीचिका सा बन जाये !
सदियों बादल थके बरसते ,सागर का जल खारा क्यों है !


जबसे आयी हूँ इस घर में
प्रश्न चिन्ह ही पाए सबसे !
मधुर भाव,विश्वास,आसरा
रोज सवेरे, बिखरे पाए !
कबतक धैर्य सहारा देता
जलते सपनों के जंगल में
किसे मिला,अधिकार जो
मेरे आंसू को नीलाम कराए
अपनापन बह गया फूट, अब उनका चेहरा काला क्यों है !

Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं,
गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है, पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कब से वर्णन करता, 
आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती , पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा, व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
26 अक्टूबर जनवाणी

कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,
अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी , इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, 
इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ, मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , 
इतना दर्द लिखाई में !
कैसी व्यथा लिखा के लायी ,अपनी मांगभराई में !

Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जग जननी लगती, कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवा चौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी  !

छोटी उम्र से क्या बस्ती में सीखा है,  
किसे सुनाये , बातें मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का , तोड़ रही ,
कमर है मालिन जैसी चोट लुहारी सी !

छप्पर डाल के सोने वाले, भूल गए 
नारी के मन सुलग रही , चिंगारी सी !

ग्लानि थकान विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये , नारी हारी सी !

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा , लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे 
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

दुःख में कभी नहीं घबराना,अपने हाथ नहीं फैलाना
अगर याद ईश्वर की आये , माँ के पैर दबाना सीख !


Saturday, March 29, 2014

कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने -सतीश सक्सेना

कैसे प्यार छिना, पापा की 
गुड़िया , का दरवाजे से ,
कैसे जुदा हुई थी लाड़ो    
भारी गाजे बाजे  से  ! 
जब से विदा हुई है घर से ,
क्या कुछ बहा, हवाओं में !
कुछ तो दुनिया ने समझाया , कुछ अम्मा की बांहों ने !

किसने सीमाएं समझायी 
किसने गुड़िया छीनी थी !
किसने उसकी उम्र बतायी 
किसने तकिया छीनी थी !
कहाँ गए अधिकार पुराने, 
क्या सुन लिया दिशाओं में ! 
कुछ तो बहिनों ने बतलाया, कुछ कह दिया बुआओं ने !

कहाँ गया भाई से लड़ना

अपने उन , सम्मानों को  !
कहाँ गया अम्मा से भिड़ना 
अपने उन अधिकारों को !
कुछ तो डर ने समझाया था 
कुछ पढ़ लिया रिवाजों में  !
कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने !

पापा की जेबें, न जाने 
कब से राह , देखती हैं !
कौन तलाशी लेगा आके
किसकी चाह देखती हैं !
कुछ दूरी पर रहे लाड़ली, 
सुखद गांव की छावों में !
कुछ गुलमोहर ने समझाया, कुछ घर के सन्नाटों ने !

कैसे  बड़ी हो गयी मैना
कैसे उड़ना सीख लिया !
कैसे  ढूंढें, तिनके घर के ,
कैसे  जीना सीख लिया !
खेल, खिलौने खोये अपने, 
इन ससुराल की  राहों में !
कुछ तो आंसू ने समझाया , कुछ बाबुल की बाँहों ने !

Tuesday, October 15, 2013

मुझसे मिलने सकुचाता सा , बच्चा इक प्यारा आया था -सतीश सक्सेना

                 आज मेरे दूसरे बेटे ( दामाद ) इशान का जन्मदिन है, यह और गरिमा दोनों ही एक मशहूर अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं , बेहद हंसमुख इशान,जब से मेरे परिवार में शामिल हुए हैं , घर की रौनक में चार चाँद लग गए हैं !  

मेरे  परिवार के अम्बर में , ईशान सा  तारा कौन हुआ ,
मेरी लाड़ली जिसको प्यार करे,ऐसा बंजारा कौन हुआ ?

जिसके आने से महफ़िल में,चेहरों पर रौनक आ जाए ,
रिमझिम सी,आवाजों वाला,ये नीर फुहारा कौन हुआ ?

जो अपनी चिंता भुला,सभी को खूब हंसाये खुश होकर !
लोगों को हंसना सिखलाये,ईशान से प्यारा कौन हुआ !

मुझसे मिलने,संकोच लिये,बच्चा इक प्यारा आया था !

लगता सदियों से जान रहे, इस तरह हमारा कौन हुआ !

इस मीठे स्वर के जादू ने, तकलीफ मिटाई गलियों से !
जो अपने कष्ट कभी न कहे, इस तरह सहारा कौन हुआ !
 

Wednesday, October 9, 2013

दुरवाणी ही याद रहेगी यूँ आखिर -सतीश सक्सेना

"Excuse me aunty . . ." 
झूठ मूठ नाम रख लिया वाणी , दुर्वाणी हुई जा रही हो "  
यह शब्द हैं वाणी जी की लड़कियों श्रेया और श्रुति के और बोले हैं अपनी माँ से. . . .  

मैंने आज इस नोक झोंक का काफी देर आनंद लिया , और कुछ पंक्तियाँ लिख गयीं माँ और बेटियों पर , वे वाकई खुश किस्मत हैं कि उन्हें दो दो पुत्रियाँ मिलीं और वह भी लड़ाका :)
माँ बेटियों में यह स्नेहिल नोक झोंक चलती रहे , मंगलकामनाएं इस प्यारे परिवार को !

इक दिन ये घर को छोड़ जायेगी ही आखिर !

कितने दिन अम्मा पास रखेगी , यूँ अाखिर !

ये बच्चों सी , शैतानी भी,  खो जायेगी ! 
ये रूठी रूठी कब तक रहेंगी, यूँ आखिर !

इकदिन जब,इसकी डोली, इसको ढूँढेगी
ये लाड़ली अपनी कहाँ रुकेगी, यूँ आखिर !

ये आँखें, इनको यहाँ वहां, जब ढूँढेंगीं !
फिर केवल हिचकी याद करेगी यूँ आखिर !

ये प्यार बेटियों का, किसका हो पाया है , 
ये एक जगह फिर,कहाँ मिलेंगीं यूँ आखिर !

माँ की वाणी, तब याद बहुत ही आयेगी !
तब दुर्वाणी भी भली लगेगी यूँ आखिर !

हर बेटी को बस विदा एक दिन होना है,
ये सारा जीवन मस्त जियेगी यूँ आखिर ! 

Tuesday, October 1, 2013

प्यार न कोई बंदिश माने, कितने हैं आजाद कबूतर -सतीश सक्सेना

छत पर मुझे अकेला पाकर, करते कुछ संवाद कबूतर !
अक्सर गुड़िया को तलाशते, करते उसको याद कबूतर !

हमें धर्म की परिभाषाएँ, गुटुर गुटुर कर सिखला जाते !  
मंदिर मस्जिद रोज़ पहुँचते, करते नहीं जिहाद कबूतर !

कुल के मुखिया के कहने पर, आते,खाते,उड़ जाते हैं ! 
सामूहिक परिवार में कैसे ,करते अनहद नाद कबूतर !

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में, बिना डरे ही घुस जाते हैं  !
उलटे सीधे नियम न मानें , कितने हैं आजाद कबूतर !

खुद भी खाते साथ और कुछ बच्चों को ले जाते हैं ! 
परिवारों में, वचनबद्धता की रखते बुनियाद कबूतर !

Monday, September 9, 2013

नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे ! - सतीश सक्सेना !

गुडिया की विदाई के बाद , पहली बार उसका बचपन याद आ गया , फलस्वरूप कुछ पंक्तिया उसके बचपन की याद करते हुए ...
 मेरी गुड़िया अपनी गुड़िया के साथ 

अपने सीने पर, चिपकाकर, इन्हें सुलाया करते थे ! 
इनकी चमकीली आँखों में, हम खो जाया करते थे !

कोई जीव  न भूखा जाये , गुडिया के दरवाजे से !
कुत्ते, बिल्ली, और कबूतर, इन्हें लुभाया करते थे !

गले में झूलें हाथ डालकर, मीठी पुच्ची याद रही !
इनकी मीठी मनुहारों में ,हम खो जाया करते थे !

दफ्तर से आने पर  छिपतीं ,पापा  आकर  ढूंढेंगे !
पूरे घर में इन्हें ढूंढ कर, हम थक जाया करते थे !

पायल,चूड़ी ,लहंगा, टीका,बिंदी, मेंहदी विदा हुईं !
नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे !


Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 
घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए , सब गाएंगे  इसके गीत ! 

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !

Thursday, May 24, 2012

एक गुड़िया मार कहते हो कि, हम इंसान हैं ! -सतीश सक्सेना

अब हंसीं, मुस्कान  भी , 
विश्वास के लायक़ नहीं
क्या कहेंगे, क्या करेंगे
कुछ यकीं, इनका नहीं
नज़र चेहरे पर लगी है, 
ध्यान केवल  जेब पर
और कहते हैं कि  डरते क्यों ?भले इंसान हैं !

काम गंदे सोच घटिया
कृत्य सब शैतान  के ,
क्या बनाया ,सोच के 
इंसान को भगवान ने 
इनके चेहरे पर कभी , 
आती नहीं शर्मिंदगी  !
फिर भी अपने आपको कहते कि वे इंसान हैं !

बाप के चेहरे को देखो
सींग दो दिखते वहाँ !
कौन पुत्री जन्म लेगी
कंस के ,प्रासाद में !
अपनी माँ के पेट में ,
दम तोड़ देतीं बेटियां !
पूतना अब माँ बनी हैं, फिर भी ये इंसान हैं !

खिलखिलाती बच्चियों से
ही, धरा रमणीय रहती !
प्रणय और आसक्ति बिन
सृष्टि कहाँ सम्पन्न होती !
अपने बाबुल हाथ ,
मारी जा रही हैं, बच्चियां !
एक कन्या मार कर, कहते हो हम इंसान हैं !

भ्रूण हत्या से घिनौना ,
पाप क्या कर पाओगे !
नन्ही बच्ची क़त्ल करके ,
क्या ख़ुशी ले पाओगे !
जब हंसोगे, कान में गूंजेंगी 
उसकी सिसकियाँ !
एक गुड़िया मार कहते हो कि, हम इंसान हैं !

Friday, November 25, 2011

बुनियाद.... -सतीश सक्सेना


                  सामाजिक परिवेश में रहते हुए हमारे अपनों को, बहुत कम मौकों पर एक दूसरे की तरफ ,याचना युक्त द्रष्टि से देखा जाता है, हर हालत में इस नज़र का सम्मान किया जाना  चाहिए ! अपने ही घर में, महज अपनी आत्मसंतुष्टि  के लिए, अपनों को निराश करने की प्रवृत्ति , मानवीय प्रवृत्ति नहीं कही  जा सकती निस्संदेह ऐसी प्रवृत्तियों को समाज, समय के साथ ऐसा ही जवाब देगा मगर शायद तब तक समझने में, बहुत देर हो चुकी होगी !
                 किसी से भी आदर पाने के लिए स्नेह और आदर देना आवश्यक होता है ! और यही मजबूत घर की बुनियाद होती है !हमारे  होते , अपनों की आँख से आंसू नहीं गिरने चाहिए ,इन आँखों से गिरता हर आंसू, स्नेहमाला के टूटते हुए मोती हैं ....
               गंभीर और कष्टकारक स्थितियों में, हमें अपने बड़ों का साथ देना चाहिए न कि हम उनका उपहास करें और उनकी कमियां गिनाते हुए उपदेश दें , ऐसे  उदाहरण, मात्र क्रूरता माना जायेंगे ! ममता भरे आंसुओं को न पहचान सकने वाले अभागे हैं , भविष्य और इतिहास ऐसे लोगों को कभी  प्यार नहीं करेगा !
जब समय लिखे इतिहास कभी
जब  मुस्काए, तलवार कभी,
जब शक होगा, निज बाँहों पर ,
जब इंगित करती आँख  कहीं 
जब बिना कहे दुनिया जाने,  कृतियाँ, जीवित कैकेयी   की !
हम बिलख बिलख जब रोये थे, परिहास तुम्हारे चेहरे पर !               
                      निरंतर परिवर्तनशील समाज, किसी को भी, लगातार राज करने की स्वीकृति नहीं देता है ! जो आज ताकतवर है वह कल कमजोर होगा और जो आज कमजोर है वह कल राज करेगा ! वे मूर्ख हैं जो आज कमजोर की याचना का मान नहीं रखते ! गर्व को हमेशा झुकना पड़ा है और जीत विनम्रता की ही होती आई है!
साजिश है आग लगाने की
कोई रंजिश, हमें लड़ाने की
वह रंज लिए, बैठे दिल में
हम प्यार, बांटने निकले हैं!
इक सपना पाले बरसों से,लम्बी यात्रा पर जाने को     
हम आशा भरी नज़र लेकर, उम्मीद लगाए बैठे हैं !


तुम शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए,
हम समझ नही पाए, हमको 
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से 
फिर भी आँखों में अश्रु भरे, देखें तुमको उम्मीदों से !  
हम चोटें लेकर भी दिल पर, अरमान लगाये बैठे हैं !
                  भाई बहिन  के मध्य स्नेह को मैं बहुत महत्व देता हूँ , विवाह उपरान्त बहिन अपने पूरे जीवन, भाई की ओर आशान्वित निगाहों से देखती है जिसमें अपने प्रति भाई के प्यार का भरोसा रहता है ! यही भरोसा उसके जन्मस्थान से उसको जोड़े रहने में सहायक होता है ! जो लोग इस विश्वास स्नेह भरी नज़र को सम्मान नहीं दे पाते वे सच्चे प्यार को शायद ही कभी समझ पायेंगे !

किस घर को अपना बोलूं माँ
किस दर को , अपना मानूं !
भाग्यविधाता ने क्यों मुझको
जन्म दिया है , नारी का,
बड़े दिनों के बाद, आज भैया की याद सताती है
पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है !

अक्सर नारी ही कष्ट क्यों उठाती है ? उसे ही समझने में क्यों भूल की जाती है ? पुरुष प्रधान समाज में  पुरुषों का  अहम् , कोमल और स्नेही स्वभाव, माँ और बहिन को अक्सर रुलाता है !

इस सम्बन्ध में बेटी से मेरा कहना है ....
सभी सांत्वना, देते आकर 
जहाँ लेखनी , रोती पाए !
आहत मानस, भी घायल
हो सच्चाई पहचान न पाए !
ऎसी ज़ज्बाती ग़ज़लों को , ढूंढें अवसरवादी गीत !
मौकों का फायदा उठाने, दरवाजे पर तत्पर गीत !

                   अन्याय और क्रूरता सहती ये महिलायें, कष्ट इसलिए सह रही हैं कि वे हमें प्यार करती हैं और इसी स्नेही और कोमल स्वभाव की सजा, अक्सर महिलायें भोगती आई हैं !
हम पुरुष कब तक इस स्नेह को बिना पहचाने, आदिकालीन भावनात्मक शोषण जारी रखेंगे   ?
कई बार मुझे लगता है कि विद्रोह का समय आ गया है ...
भविष्य की मजबूत बुनियाद के लिए, इन लड़कियों को मज़बूत होना चाहिए... 
इन्हें समझना होगा कि प्यार की भीख नहीं मांगी जाती !

Tuesday, October 11, 2011

लड़कियों का घर ? - सतीश सक्सेना

गरिमा, पिता के साथ  
पहले इस नंदन कानन में 
एक राजकुमारी  रहती थी 
घर राजमहल सा लगता था 
हर रोज दिवाली होती थी ! 
तेरे जाने के साथ साथ,चिड़ियों ने भी आना छोड़ा ! 

                  मैंने इस गीत द्वारा, घर से बेटी की विदाई के बाद, भाई और पिता की  स्थिति का, एक शब्द चित्र खींचने का प्रयास किया था  ! इस मार्मिक गीत को, लिखने के बाद, छलछलाती आँखों के कारण , मैं आज तक पूरा नहीं पढ़ नहीं पाया ! विवाह योग्य पुत्री की विदाई की कल्पना भी, दारुण दुःख देती है , पता नहीं उसकी विदाई कैसे झेल पाऊंगा !


पूर्वा राय द्विवेदी 
इस रचना को पढ़कर , एक और प्यारी बेटी के पिता दिनेश राय द्विवेदी , के  आँखों में आंसू छलछला उठे ! डबडबाई  आँखों से, उनके द्वारा मेरे लेख पर लिखी गयी एक लाइन की यह टिप्पणी, मुझे भाव विह्वल करने को काफी है ! अपनी पुत्री की विदाई की याद करके ही दिनेश राय द्विवेदी जैसे प्रख्यात एडवोकेट तक रो पड़ते हैं .... 
"बहुत बहुत रुलाते हैं, तेरे ये गीत ! सच में बहुत रुलाते हैं"

उनकी इस टिप्पणी के साथ, इस गीत  को लिखने का उद्देश्य पूरा हुआ ! पुत्री को अपना घर छोड़ना ही होता है  और एक नए माहौल , नए लोगों के साथ मिलकर , नए घोसले का निर्माण करना  होता है ! ऐसे विषद संक्रमण काल में, उसे अक्सर भारी मानसिक तनाव और  कष्ट से गुजरना होता है !इस समय में, अक्सर इस लड़की को,अपने पिता और भाई से, हर समय जुड़े महसूस रहने का अहसास ही , इसकी राह आसान बनाने को, काफी होता हैं !

इस पोस्ट का शीर्षक, दिनेश राय द्विवेदी की मेधावी पुत्री पूर्वा राय द्विवेदी , द्वारा लिखी एक पोस्ट "लड़कियों का घर कहाँ है ? " की देन है, जिसमें पूर्वा के कहे शब्दों ने, मुझे इस पोस्ट को लिखने को प्रेरित किया ! मैथमैटिकल साइंस में एम् एस सी, कुमारी पूर्वा, जनस्वास्थ्य से जुडी एक परियोजना में शोध अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं !



विवाह के बाद लड़की इतना क्यों रोती है ? इस प्रश्न के जवाब में पूर्वा ने कहा था कि शादी के बाद उसका घर छीन लिया जाता है और उसका घर, मायका बन जाता है और नया घर, ससुराल  ! अपने घर को छिन जाने के कारण वह रोती है कि कोई बताये लड़कियों का घर कहाँ होता है ??

                      कहते हैं लड़की ही, घर में सबसे कमजोर होती है और मगर यह समाज, सुरक्षा देने की जगह ,उससे उसका "घर "छीन कर उसे मायका और ससुराल उपहार में दे देते हैं ! और यह काम दोनों ही पक्ष के लोग धूमधाम से करते हैं !
                       पुत्री को हमें  यह अहसास दिलाना होगा कि वह इस परिवार में बेटे की हैसियत रखती है और अपने भाई के समान  अधिकार और सम्मान की हकदार है और  हमेशा रहेगी ! यही बात, वह बहू बनकर नए घर में भी याद रखे कि उस घर की पुत्री का भी घर में समान अधिकार है और हमेशा रहेगा !
                        नए घर के निर्माण में, जो थकान होती है, उसे दूर करने को, अपने परिवार द्वारा बोले स्नेह के दो शब्द काफी हैं ! अपने मज़बूत पिता और भाई की समीपता का अहसास ही, हमारे परिवार वृक्ष की इस खुबसूरत डाली को, हमेशा तरोताजा रखने के लिए काफी होता है !

Friday, December 24, 2010

कैसी रीति समाज की -सतीश सक्सेना

वागर्थ पर डॉ कविता वाचक्नवी की एक रचना पढ़ते हुए , निकट भविष्य में, गुडिया की विदाई का चित्र, आँखों के सामने आ गया ! और भरे मन से क्या लिखा, यह मुझे नहीं पता ....
यह रचना पढ़कर, आँखें क्यों भर आयीं ? इसका वर्णन शब्दों में करना, कम से कम मेरे लिए असंभव है ! ऐसी मार्मिक रचना के लिए उनको हार्दिक बधाई ! 
अपने मन के भाव, जैसे उस दिन लिखे गए , वही आपके सम्मुख रख रहा हूँ ...   


गुडिया द्वारा चावल , मुट्ठी में भरते ही 
आँख छलछला उठीं 
अपनी लाडली का यह  स्वरुप 
कैसे  देख पाऊंगा ..मैं पिता 
कैसी यह घडी, कैसा यह चलन
नहीं समझ सका, कभी यह मन  !
मुझे सबसे अधिक प्यार करने वाली ही , 
इस घर में सबसे कमज़ोर है, मेरे होते हुए भी  
शायद सबसे अधिक, उसे ही मेरी जरूरत है !
और सबसे पहले, उसे ही निकाल रहा, मैं खुद 
कह रहा कि , यह तेरा घर नहीं  !
भाई को सौंपती, अपने पिता को 
कि भैया ! पापा का ख़याल रखना  
कहती, यह मासूम जा रही है 
एक नयी जगह , मेरी बेटी  !
जिसको, भय वश मैंने, कभी नयी जगह, 
अकेला नहीं जाने दिया ....
यह जा रही है , नए लोगों के बीच रहने 
अकेली ! बिना अपने पिता ...
जिसे मैंने कभी नए लोगों से नहीं मिलने  दिया 
क्योंकि यहाँ भेडिये ज्यादा मिलते हैं, इंसान कम 
मेरे कठोर शरीर का , सबसे कोमल टुकड़ा
मुझसे अलग होकर जा रहा है, घने जंगल में 
यह पिता क्या करे  ?? बताओ मेरी कविता  ??
तुम सिर्फ रुला सकती हो .....
मुझे तुम क्या बताओगी ...??

Monday, August 23, 2010

बहिन के प्यार को न भूलें ?? - सतीश सक्सेना

रक्षा बंधन के त्यौहार पर बहिन आपने भाई की रक्षा की कामना करते हुए दीर्घायु के लिए कामना करती है कि मेरा  भाई सुरक्षित रहे जिससे इस दुनिया में मैं अकेली महसूस न करुँ ! परस्पर एक दूसरे की दीर्घायु की कामना करने की याद दिलाता यह पर्व, बहिन भाई के मध्य एक महत्वपूर्ण गाँठ का काम करता रहा है !  
विवाह के बाद अपने भाई से दूर चली गयी बहिन के लिए, यह दिन अपने भाई को याद करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है ! इस रक्षा सूत्र के जरिये बहिन व्रत रख कर ,अपना प्यार व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करती है ,कि मेरा भाई सुरक्षित रहे और मेरा विश्वास है कि हर बहिन अपने दिल की गहराई से यह चाहती है !मगर आज के समय में कितने भाई ऐसे हैं जिन्हें अपनी बहिन के प्यार में लिपटे इस कच्चे धागे का महत्व पता है ! 


शायद हमें यह दिन, बहिन के प्यार की कीमत के रूप में, बहिन को दिए जाने वाले चंद रुपयों के कारण "खर्चे का दिन "के रूप में ही याद रहता है  !  
परस्पर कम होते स्नेह के इन बुरे दिनों में, भाई को इसका महत्व सिर्फ चंद रुपयों के रूप में ही याद न रहे तभी यह पौराणिक समय से चलता आया पर्व सार्थक होगा !      

Thursday, July 22, 2010

पता नहीं मां सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई, मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोर मन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते ! जिस पिता की उंगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमें  बचपन की सब यादें बसी थी.....
इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पता नहीं किस दिन, उसका अपना घर, मायके में बदल जाता है !  
और "अपने घर" में रहते, पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !
राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा , उम्मीद करती है उसको, उसके घर पर याद किया जा रहा होगा !

पकड़ के उंगली  पापा की
जब चलना मैंने सीखा था !
पास लेटकर उनके मैंने
चंदा मामा जाना था !

बड़े दिनों के बाद याद
पापा की गोदी आती है !
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा
मन , रोने को करता है !
न जाने , क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद रात ,
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको
इकला पन मेरे जीवन में ,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठीं ये
आँखें , झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ ,
मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया ,

या इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ
भाई  की , यादें आतीं हैं !
पायल, झुमका, बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,
खुलके हंसना याद आ गया 
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए मुझको 
पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?
छीना सबने , आज मुझे
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग, बिसरे घर की यादें आती है !

Tuesday, October 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम !(अंतिम भाग ) - सतीश सक्सेना

परनिंदा और कटु शब्दों का
बेटी त्याग हमेशा करना !
संयम रख अपनी वाणी पर  
घर में कभी अनर्थ न करना
अगर क्रोध में सौम्य रहीं तो,
बेटी साध्वी बनी रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

ऐसा कोई शब्द ना बोलो
दूजा मन आहत हो जाए
तेरी जिह्वा की लपटों से
अन्य ह्रदय घायल हो जाए
चारों धामों पर जाकर भी,
मन में शान्ति नही पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कभी न भूलो बेटी ! तुमने ,
जन्म लिया है मानव कुल में
कुछ विशेष वरदान हमारे ,
कुल को दिए विधाता ने ,
ज्ञान असीमित लेकर बेटी, 
तुम भविष्य निर्माण करोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

ज्ञान तुम्हारा सार्थक होगा
घर बाहर दोनों जगहों में
आशीषों के ढेर लगेंगे ,
जब परिवार तुम्हारे में !
परहित साधक बनो लाडली,
पूरी तभी साधना होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

वाद विवाद जन्म देता है ,
पति पत्नी के मध्य कलह को
गृह विनाश का बीज उखाड़े 
नही उखड़ता है, जमने पर !
ऋषि मुनियों के दिए मौन से
क्रोधित मन काबू पाओगी ! 
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

मौन अस्त्र से गौतम जीते
अंगुलिमाल झुक गया आगे
मितभाषी गांधी के आगे ,
झुका महा साम्राज्यवाद भी
हर विरोध शर्मिंदा होगा,
अगर मौन को तुम परखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

याद रहे द्रोपदी सरीखी !
वाचालता कभी न आए
उतना बोलो , जितना
आवश्यक मंतव्य बताने को
तेज बोलने वाली नारी ,
आदर कभी नही पायेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

इतना प्यारा जीवन साथी 
पुत्री धन्य हुईं तुम पाकर 
शायद तेरे निर्मल मन ने 
जीता ह्रदय विधाता का ,
निश्छल मन और गहन समर्पण,
बेटी जीत तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , राज कुमारी तुम्हीं  लगोगी  !

Saturday, September 6, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! (पांचवां भाग)

कर्कश भाषा ह्रदय को चुभने वाली, कई वार बेहद गहरे घाव देने वाली होती है ! और अगर यही तीर जैसे शब्द अगर नारी के मुख से निकलें तो उसके स्वभावगत गुणों, स्नेहशीलता, ममता, कोमलता का स्वाभाविक अपमान होगा ! और यह बात ख़ास तौर पर, भारतीय परिवेश में, घर के बड़ों के सामने चाहे मायका हो.या ससुराल, जरूर याद रखना चाहिए ! अपने से बड़ों को दुःख देकर, सुख की इच्छा करना व्यर्थ और बेमानी है !

नारी की पहचान कराये
भाषा उसके मुखमंडल की
अशुभ सदा ही कहलाई है
सुन्दरता कर्कश नारी की !
ऋषि मुनियों की भाषा लेकर,

तपस्विनी सी तुम निखरोगी
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी,  तुम्हीं  रहोगी !


कटुता , मृदुता नामक बेटी
दो देवी हैं, इस जिह्वा पर !
कटुता जिस जिह्वा पर रहती
घर विनाश की हो तैयारी !
कष्टों को आमंत्रित करती, 

गृह पिशाचिनी सदा हँसेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी 
तुम्हीं रहोगी !

उस घर घोर अमंगल रहता
दुष्ट शक्तियां ! घेरे रहतीं !
जिस घर बोले जायें कटु वचन
कष्ट व्याधियां कम न होतीं !
मधुरभाषिणी बनो लाड़िली,

चहुँदिशि विजय तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी, तुम्हीं  रहोगी  !

घर में मंगल गान गूंजता,
यदि 
जिह्वा पर मृदुता होती
दो मीठे बोलों से बेटी  ,
घर भर में दीवाली होती !

उस घर खुशियाँ रास रचाएं 
कष्ट निवारक तुम्हीं लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

अधिक बोलने वाली नारी
कहीं नही सम्मानित होती
अन्यों को अपमानित करके
वह गर्वीली खुश होती है,
सारी नारी जाति कलंकित, 

इनकी उपमा नहीं मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

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Monday, August 11, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम( चौथा भाग )


यहाँ एक दुखी पिता अपनी लाडली को विवाह की आवश्यकता बताने, समझाने का प्रयत्न कर रहा है ! भारतीय समाज की सबसे मजबूत गांठ, आज पाश्चात्य सभ्यता समर्थन के कारण खतरे में है ! नारी अपने बिभिन्न रूपों को भूल कर अपने एक ही रूप को याद करने का प्रयत्न कर, तथाकथित जद्दोजहद कर रही है ! एवं आधुनिकीकरण की तरफ़ भागता समाज, हमारी शानदार व्यवस्था भूल कर चमक दमक में खो रहा है ! ऐसे समय में ,यह कविता बहुतों के माथे पर बल डालेगी, मगर यह एक भारतीय पिता की भेंट है अपनी बेटी को !

बचपन यहाँ बिताकर अब तुम
अपने नए निवास चली हो !
आज पिता की गोद छोड़ कर
करने नव निर्माण चली हो !
केशव का उपदेश याद कर, 

कर्म भूमि में तुम उतरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

इतने दिन तुम रहीं पिता की
गोद , 
मातृ  का मान बढ़ाया ,
अब जातीं घर त्याग अकेली
एक नया संसार बसाया ,
जब भी याद पिता की आये ,

अपने पास खड़े पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी 
तुम्हीं रहोगी !

कोई नन्हा जीवन तेरा ,
खड़ा हुआ बाहें फैलाए !
इस आशा के साथ, उठाओगी
तुम , अपनी बांह पसारे !
ले नन्हा प्रतिरूप गोद में , 

ममतामयी तुम्हीं  दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं लगोगी !

सृष्टि नयी की रचना करने,
विधि है, इंतज़ार में तेरे !
सुन्दरता की नन्ही उपमा
खड़ी, तुम्हारी आस निहारे
तृप्ति मिलेगी रचना करके

मां की गरिमा तुम्हें मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नर नारी के शुभ विवाह पर
गांठ विधाता स्वयं बांधते,
शायद देना श्रेय 
 तुम्हीं को
जग के रचनाकार चाहते !
जग की सबसे सुंदर रचना 

की निर्मात्री तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

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