Showing posts with label vivah geet. Show all posts
Showing posts with label vivah geet. Show all posts

Wednesday, November 20, 2013

कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार, सजना - सतीश सक्सेना

विवाह पर गीत गाने की परम्परा, हमारे समाज में शुरू से ही है , सजधज कर मांगलिक अवसर पर महिलाओं द्वारा, ढोलक की थाप पर, यह गीत गुनगुनाइए एक बार …दूसरी बार रचना की है किसी विवाह गीत की  अगर आप पसंद करें तो सफल मानूं !
  

कैसे आये हो गली में लेके प्यार सजना ?
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार सजना ?

सजके आये हो हमारे द्वार,खूब सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से , ले उधार सजना ! 

फेरे डाले हैं यहाँ पे तुमने सात, सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके हार सजना !

कसमें खायीं हैं,हमारे घर सात सजना   
कैसे दोगे तुम प्यार का, उधार सजना !

गांठें  बाँधी हैं , ननद ने , हमारी सजना !  
कैसे जाआगे छुटाके,पल्लू यार सजना !

खाना मामा ने खिलाया हमें साथ सजना !
कैसे खाओगे अकेले, अबकी बार सजना !

सारे नाचे हो गली में आके,आज सजना ! 
कैसे जाओगे गली से, ऐसे यार सजना !

यह आनंद दायक गीत अर्चना चाओजी की मधुर आवाज में सुने …  

Thursday, September 16, 2010

विवाह गीत - सतीश सक्सेना

हरियाली बन्ने ! दुल्हन करे है इंतजार
चटक मटकती फिरें भाभियाँ
हुलस हुलस बारी जायें !
हरियाले बन्ने ....


बुआ तुम्हारी लेयं बलाएँ 
फिरें नाचती द्वार द्वार में

घुंघरू करें झंकार ! 
हरियाले बन्ने ....


बहना तुम्हारी हुई बाबरी 
घर घर में वो फिरे हुलसती

बार बार बलिहार ! 
हरियाले बन्ने ....


मां के दिल से पूछे कोई
बारम्बार बलाएँ लेती

नज़र नहीं लग जाए !
हरियाले बन्ने ....

मौसी तुम्हारी रानी जैसी
घर में खुशियाँ लेकर आयी

करे प्रेम - बौछार ! 
हरियाले बन्ने ....


मामी तुम्हारी फिरें मटकती
सब लोगों को नाच नचाती

करती नयना - चार ! 
madhurima,bhasker-2-12-15
हरियाले बन्ने ....


चाची तुम्हारी खुशियाँ बांटे
रंग - बिरंगी बनी घूमती

गाएं गीत मल्हार ! 
हरियाले बन्ने ....


दादी तुम्हारी घूमें घर में
पैर जमीं पर नहीं पड़ रहे


खुशी कही ना जाए ! 
हरियाले बन्ने ....


बाबा तुम्हारे , घर के मुखिया
चार पीढियां देख के हरसें 

शान कही ना जाय ! 
हरियाले बन्ने ....


पिता तुम्हारे फिरें घूमते
घर में सबका हाल पूंछते 

खुशी छिपे न छिपाय ! 
हरियाले बन्ने ....


भइया तुम्हारे फिरें महकते
मेहमानों की खातिर करते 

इत्र फुलेल लगाय ! 
हरियाले बन्ने ....


चाचा तुम्हारे आए दूर से

नए नवेले कपड़े पहने 
मस्त फिरे बतियायं ! 
हरियाले बन्ने ....


जीजा तुम्हारे हुए बावरे

फिरें घूमते बन्ना लिखते
हाल कहा ना जाए !
हरियाले बन्ने ....

http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/02122015/mpcg/1/

एक अन्य खूबसूरत विवाह गीत के लिए यहाँ जाइये  - कैसे जाओगे यहाँ से लेके  प्यार सजना !

Wednesday, August 4, 2010

काऊ दिन उठ गयो मेरो हाथ, बलम तोय ऐसो मारूंगी -सतीश सक्सेना

आज जब भी भारतीय पारिवारिक संस्कृतिक उत्सव और शादी समारोहों में डी जे स्टेज देखता हूँ, मुझे वे मधुर कर्णप्रिय गीत याद आते हैं जो अपनी मधुरता के साथ, साथ प्यार का एक सन्देश भी देते थे ! उस मधुरता पर आज भी सैकड़ों डी जे गाने न्योछावर करने का दिल करता है !   


शादी की तैयारियों के साथ साथ नवविवाहिता का श्रंगार और उसको वर्णन करता यह गीत दिल में झंकार पैदा कर देता है !  बन्नों तेरी अंखिया सुरमे दानी    , इस तरह बन्नों की भाभियाँ और बहिने ,उसके वस्त्रों गहनों और रूप की तारीफ़ कर, उसको हंसाने और अपना घर छोड़ने की तकलीफ भुलाने में कामयाब रहती थीं ! 


लोकगीतों में प्यार की अभिव्यक्ति को याद करें तो हाल का ही यह मशहूर मधुर गीत जिसमें अपने सैयां के प्यार में डूबी नवविवाहिता, अपनी ससुराल की सारी परेशानियों को कैसे हँसते हँसते स्वीकारती है ,  सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल  !


३५ -४० साल पहले सुना, ब्रज भाषा के एक लोकगीत का मुखड़ा और उसकी धुन आज तक याद है ,शादी व्याह के अवसर पर महिलाएं अपने पति के प्रति पर अपने प्यार का इज़हार, गुस्से के प्रदर्शन के साथ , कुछ ऐसे करती थीं ...


   "काहू दिन उठ गयो मेरो  हाथ, बलम तोहे  ऐसो मारूँगी  !
   ऐसो मारूंगी ...बलम तोहे ऐसो मारूंगी ..काहू दिन उठ गयो ...   


कितना प्यार छिपा है, इस मारने की धमकी में , मगर लोक चरित्र को पहचानने वाले अब कितने हैं जो इन लाइनों में छिपे प्यार को पहचानते हैं !


और अंत में  " दल्ली सहर में म्हारो घाघरो जो घूम्यों ..." लोकगीतों को आधुनिक समय में लोकप्रिय बनाने के प्रयत्नों में, इला अरुण का नाम नहीं भुलाया जा सकता ! गज़ब की आवाज़ और अंदाज़  के साथ उनको सुनते हुए, लगता है गाँव के मेले में बैठे हों  !  
( चित्र गूगल से साभार )
Related Posts Plugin for Blogger,