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Saturday, September 25, 2021

पता नहीं क्यों खाते पीते, ज्ञान की बातें, होती हैं -सतीश सक्सेना

डी पी एस ग्रेटर नॉएडा के, एक क्षात्र, रानू , जो कि, पढने लिखने में बहुत अच्छे होने के साथ साथ, खाने पीने में, भी मस्त हैं, के मन की बातें यहाँ दे रहा हूँ ! जब भी हम सब साथ साथ , खाने पर एक साथ बैठते तो बच्चों से उनके भविष्य की चर्चा तथा क्लास में उनकी पोजीशन की चर्चा जरूर होती ! स्वादिष्ट खाने के समय , पढाई की चर्चा , उनके मुहं का टेस्ट बदलने के लिए काफ़ी होती है ! 

मन को काबू कर अंग्रेजी 
ग्रामर लेकर , बैठा हूँ  !
जैसे तैसे रसगुल्लों से , 
ध्यान हटाए , बैठा हूँ !
मगर ध्यान में बार बार, 
ही आतिशबाजी होती है !
अलजब्रा के ही खिलाफ  
क्यों नारे बाजी होती है !
नाना,पापा की बातें सुन ,
नींद सी आने लगती है !
इतने बढ़िया मौसम में,एक्जाम की बातें,होती हैं !


समझ नहीं आते बच्चों के 
कष्ट , समस्याएं भारी !
पढ़ते, अक्षर नजर न आएं 
दिखे किचन की अलमारी ! 
टीवी पर कार्टून, यहाँ 
भूगोल की बाते होती हैं 
खाने पीने के मौसम मे, 
दुःख की बातें, होती हैं !
ग्रेट खली,इंग्लिश ग्रामर, 
में हर दम कुश्ती होती है !
जाने क्यों घर में हर मौके,क्लास की बातें होती हैं ?

फीस बढ़ा ले भले प्रिंसिपल 
पर बच्चों की क्लासों में !
चॉकलेट लडडू फ्री होंगे 
आने वाले , सालों में !
कठिन गणित का प्रश्न क्लास
में, मैडम जब समझाती हैं !
उसी समय क्यों याद हमारे,
मीठी बातें , आती हैं  !
बिना जलेबी और समोसा 
कैसे मन भी पढ़ पाए
सारे अक्षर गड्मड होते , खाली आंतें रोती  हैं !

हाथ में बल्ला लेकर जब मैं
याद सचिन को करता हूँ,
ध्यान लगा के उस हीरो का 
सीधा छक्का जड़ता हूँ !
मगर हमेशा अगले पल
ये खुशियां भी खो जाती हैं !
पता नहीं ,  जब  ध्यान 
हमारे कृष्णा मैडम आतीं हैं !
ऐसे मस्ती के मौके, क्यों  
याद सजा की आती है !
अक्सर घर में खाते पीते, ज्ञान  की बातें, होती हैं !

Sunday, November 11, 2018

मरना है तो,मरो सड़क पर मगर आज हों, ब्रेक बैरियर ! -सतीश सक्सेना

कई दिन बाद,आज सुबह, लम्बा दौड़ने का फैसला कर दौड़ते हुए 13.20 Km का फासला बिना रुके , बिना पानी के तय किया ! यह दूरी 1घंटा 36 मिनट में तय की गयी ! रनिंग के तुरंत बाद, बॉडी कूल डाउन के लिए लगभग 6 km तेज वाक किया ! अब लग रहा है कि जैसे काफी दिन बाद शरीर तरो ताजा और आत्मविश्वास से लबालब हुआ !


लोग सोंचते होंगे कि यह किस्मत वाले वाले हैं कि इन्हें 64 वर्ष की उम्र में भी कोई बीमारी नहीं है , मगर यह सच नहीं है , सत्य है कि मुझे भी बीमारियाँ हैं और परेशान करने वाली बीमारियों हैं मगर मैं उन्हें याद ही नहीं रखता और न दवा खाता अन्यथा बचा जीवन कब का मेडिकल व्यापारियों की भेंट चढ़ गया होता !
मेरा मानना है कि ६४ वर्ष की उम्र में कम से कम 64 प्रतिशत शरीर का क्षरण अवश्य हुआ है और मेरे शरीर का हर अंग की क्षमता भी उसी हिसाब से कम हुई होगी वह और बात है कि मैं अपनी मशीनरी को अधिकतर एक्टिव रखने में कामयाब हूँ सो मेरे शरीर की चुस्ती और स्टेमिना, उम्र के हिसाब से कहीं अधिक है , यकीनन मैं बाद में बिस्तर पर लेटकर बीमारियाँ भोगने से काफी हद तक बचा रहूंगा !

बूढों को देखते ही,संभावित बीमारियों का टेस्ट कराने के लिए , अक्सर परिवारजन सलाह देते देखे जाते हैं , मुझे मेडिकल व्यवसाय से अधिक प्रभावी विज्ञापन आजतक देखने को नहीं मिले जहाँ बीमार होते ही पूंछा जाए कि दवा ले आये ? मतलब शरीर में जो बीमारी बरसों में पैदा हुई है वह गोली खाते ही ठीक हो जायेगी इसीलिए मेडिकल पढ़ाई की फ़ीस करोड़ों तक पंहुचती है क्योंकि उस धंधे में पैसों की कोई कमी नहीं , साठ से ऊपर का हर आदमी अपने जीवन भर की कमाई बचाए बैठा रहता है कि उसे देकर इलाज हो जाएगा उसे उससे आगे की सोंचना ही नहीं कि बाद में बचोगे कितने साल ?

हर शहर में मेडिकल टेस्ट लेब्स की भरमार है और एक एक लैब में रोज सैकड़ों टेस्ट सैंपल लिए जाते हैं कोई ज्ञानी यह समझने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या इस लैब में इतने टेस्ट करने की क्षमता और मशीनें भी हैं ? एक सामान्य टेस्ट करने में ही लगभग आधा घंटा लगता है पूरे दिन में एक तकनीशियन सिर्फ 12 टेस्ट कर पायेगा फिर यह रोज की 100 टेस्ट रिपोर्ट क्या मंगल वासियों द्वारा किये गए हैं ?

खैर ....दोस्तों से निवेदन है कि भारत डायबिटीज और ह्रदय रोगों की राजधानी बन चुका है, रोज जवान और असमय मृत्यु सुनने को मिलती है सो इनसे और मेडिकल व्यवसाइयों से बचने के लिए खुद को दौड़ना सिखाइए और जीवन का आनंद लीजिये !

सस्नेह सादर ..

आज की पंक्तियाँ जो गाते हुए दौड़ा ....

भाड में जाए धड़कन दिल की
कमर दर्द , कमजोर हड्डियां
मरना है तो , मरो सड़क पर
मगर आज हों, ब्रेक बैरियर !

Sunday, July 29, 2018

आसान यूरोप यात्रा -सतीश सक्सेना

इस बार यूरोप यात्रा का संयोग गौरव की जर्मनी पोस्टिंग के कारण हुआ उसकी इच्छा थी कि पापा और माँ मेरे पास लम्बे समय आकर रहें सो पहली बार घर को लगभग ढाई महीने के लिए छोड़ने का फैसला किया पिछली पोस्ट पर मित्रों का अनुरोध था कि इस यात्रा का विवरण लिखूं सो यह पोस्ट आवश्यक हो गयी है !
यूरोपियन ढाबा पर जौ का रस, मशहूर ब्रेड, ब्रीज़ल के साथ !

-विदेश यात्रा को अधिकतर लोग हौआ मानते हैं और उस पर अक्सर बात करने से या जाने की योजना बनाने से झिझकते ही नहीं बल्कि सोंचने में भी कतराते हैं और इसके पीछे धन का अभाव न होकर अक्सर आत्मविश्वास की कमी ही होती है कुछ अन्य कारण निम्न हैं  ....

- पहला कारण विदेशियों से कम्युनिकेशन में आत्मविश्वास का न होना, अधिकतर का मानना है कि उनकी बेहतरीन फर्राटेदार इंग्लिश समझना और बेहतरीन इंग्लिश में बात करना बहुत मुश्किल है जबकि वास्तविकता इसके उलट है लगभग पूरे विश्व में सामान्य विदेशियों की इंग्लिश काफी कमजोर है अधिकतर जगह पर वे टूटी फूटी इंग्लिश में और हावभाव के साथ ही संवाद करते हैं और तो और हमारी मैडम एयरपोर्ट से लेकर शानदार मॉल तक में धड़ल्ले से अपनी हिंगलिश और हिंदी मिलाकर चमत्कृत करने वाली देसी अंग्रेजी में जर्मन लोगों को समझाने में कामयाब रहीं हैं !

-झिझक का दूसरा कारण विदेश यात्रा में अधिक खर्चे का अनुमान होना होता है जबकि यह कई बार देशी यात्रा से भी कम बैठता है ! दिल्ली से पेरिस या म्यूनिख का एक व्यक्ति के आने जाने का खर्चा लगभग 36000/- है और लगभग 5000 रूपये प्रति दिन में अच्छा होटल मिल जाता  है जिसमें एक समय का खाना शामिल होता है ! इस प्रकार एक मध्यम आय वाले पति पत्नी, सवा लाख रूपये में, ५ दिन के लिए रोम जाकर बापस आ सकते हैं !

-विश्व के किसी भी भाग की यात्रा, बिना जानकारी करना पहले असंभव थी जबकि अब इन यात्राओं को गूगल ने बेहद आसान बना दिया है, अगर स्मार्ट फोन आपके पास है तब आप कहीं किसी शहर में खो नहीं सकते, जीपीएस टेक्नोलॉजी के जरिये आपकी लोकेशन हर वक्त आपके पार्टनर के पास होती है इसके लिए आपने अपने परिवार के सदस्यों या मित्रों को अपनी लाइव लोकेशन शेयर करनी भर होती है, आजकल हर व्यक्ति को जीपीएस सिस्टम की जानकारी रखना आवश्यक है !


-आपके शहर से हजारों किलोमीटर दूर अनजान शहर में आपको उस शहर में कदम रखने से पहले, गूगल मैप के जरिये ,अपने बस स्टॉप और बस नंबर तक का पता चल जाता है और कितने स्टॉप बाद उतर कर किस दिशा में, कितने कदम चलना है गूगल मैप की मदद से आप अपने गंतव्य पर आसानी से पंहुच जाते हैं !

-अपना टिकिट अपने मोबाइल पर घर बैठे ऑनलाइन खरीद लीजिये और जहाँ चाहे यात्रा करिये कोई चेक करने नहीं आता न कहीं कोई रेलवे टिकिट कलेक्टर जैसा कोई इंसान दिखता, हर जगह एक भरोसा सा महसूस होता है कि आप भले इंसान हैं और चोरी नहीं कर सकते ! अगर किसी वीरान बसस्टॉप या ट्राम पर खड़े हैं तो टिकिट आपको अपने मोबाइल पर खरीदने की सुविधा है ! 

-हर सड़क पर पदयात्रियों के फुटपाथ , साइकिल के लिए अलग ट्रेक बना है ! पैदल चलते व्यक्ति को सड़क पार करते देख गाड़ियां जबतक इंतज़ार करती हैं जबतक वह इंसान सड़क पार न कर ले ! मोहल्ले में कोई शोर शराबा नहीं लेट इवनिंग में आप घर में तेज आवाज में टीवी अथवा ड्रिल से दीवार में या लकड़ी में छेद नहीं कर सकते शोर मचाना या जोर जोर से बोलना  असभ्यता की निशानी माना जाता है ! नियम पालन यहाँ का समाज अपनी जिम्मेदारी समझ कर पालन करता है !
यूरोप के विभिन्न देशों के बीच सीमा नहीं है हर व्यक्ति बिना किसी परमिट के किसी भी देश में जाने को स्वतंत्र है !

-पूरा वातावरण बेहद स्वच्छ है धूल उड़ते कहीं नहीं दिखती , इस बार मैं एक सफ़ेद शर्ट कई दिन से पहने हूँ कॉलर गंदा ही नहीं होता ! ठन्डे और साफ़ वातावरण में सुबह सुबह इसार नदी के किनारे दौड़ने का आनंद ही कुछ और है काश विश्व के देशों की सीमाएं समाप्त हो जाएँ और हम सब एक साथ मिलकर हंसना रहना सीख सकें !

कितना सुंदर सपना होता 
पूरा विश्व  हमारा  होता । 
मंदिर मस्जिद प्यारे होते 
सारे  धर्म , हमारे  होते ।  
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत । 
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।  

काश हमारे ही जीवन में 
पूरा विश्व , एक हो जाए । 
इक दूजे के साथ  बैठकर,
बिना लड़े,भोजन कर पायें ।
विश्वबन्धु,भावना जगाने, 
घर से निकले मेरे गीत । 
एक दिवस जग अपना होगा,सपना देखें मेरे गीत । 

Wednesday, March 7, 2018

साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा तिरेसठ साल का - सतीश सक्सेना

मैराथन आसान ,भरोसा हो क़दमों की ताल का
साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा तिरेसठ साल का !

करत करत अभ्यास,पहाड़ों को रौंदा इस पाँव ने 
हार न माने किसी उम्र में,साहस मानवकाल का !

इसी हौसले से जीता है, सिंधु और आकाश भी
सारी धरती लोहा माने , इंसानी  इकबाल का !


गिरते क़दमों की हर आहट,साफ़ संदेशा देती है !
हिम्मत,मेहनत,धैर्य,ज़खीरा इंसानों की चाल का !

बहे पसीना कसे बदन से,मस्ती मेहनत की आयी !
रुक ना जाना,उठता गिरता रहे कदम भूचाल सा !

Friday, June 20, 2014

विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना

जीवन की आपाधापी में ३६ साल की नौकरी कब पूरी हो गयी,पता ही नहीं चला ! घर की जिम्मेवारियों और बच्चों के लिए साधन जुटाने में, समय के साथ दौड़ते दौड़ते अपने लिए समय निकालना बहुत मुश्किल रहा ! कई बार लगा कि जवानी में जो समय अपने लिए देना चाहिए शायद वह कभी दे ही नहीं पाए ! अक्सर इसका कारण पूर्व नियोजित लक्ष्य,बच्चों के भविष्य,की आवश्यकता पूरा करते करते धन का अभाव रहा अथवा अपने मनोरंजन के लिए आवश्यक हिम्मत और समय ही नहीं जुटा पाए !
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !

पेरिस रेलवे स्टेशन 
गौरव अपनी कंपनी कार्य से, जब जब देश से बाहर गए हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर घूम कर आइये , विभिन्न देशों की संस्कृति, रहनसहन और खानपान  में  बदलाव आपको अच्छा लगेगा ! हर बार व्यस्तता और छुट्टी न मिलने का बहाना करते हुए मैं, उन्हें असली बात कभी नहीं बता पाता था !

मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
वेनिस की पानी से लबालब गलियां 
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा  टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! 
उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने  लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य  वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
मगर जब पहली बार, विदेश पंहुच गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि मित्रों में अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
वियना ट्राम 
अधिकतर मेरे मित्र लगभग हर वर्ष देश भ्रमण पर खासा पैसा खर्च करते हैं मगर विदेश जाने के बारे में प्लानिंग की छोड़िये, अपने घर में इस विषय पर चर्चा भी नहीं करते हैं और यह सब आत्मविश्वास और जानकारी के अभाव के कारण ही होता है !  

स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया 
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि विदेश जाएँ या न जाएँ मगर हर परिवार के पास पासपोर्ट होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश करने  की परमीशन(वीसा) के लिए, इसका होना आवश्यक है ! यह कीमती डॉक्यूमेंट आपके घर के पते और जन्मतिथि के साथ आपके परिचय पत्र की तरह भी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है !

इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड
यह जानना आवश्यक है कि विदेश यात्रा हेतु , अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३५ हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है !
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५००००-६०००० रुपया

में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !

जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! 
यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा
अक्सर हम मरते दम तक अपनी सिक्योरिटी के लिए धन जोड़ते रहते हैं ,और बुढापे में , महसूस होता है कि जीवन में , और भी बहुत कुछ देख सकते थे जो  कर ही नहीं पाये और इतनी जल्दी जीवन की रात हो गयी ! मेरा अपना सिद्धांत है कि बेहद उतार चढ़ाव युक्त जीवन को, जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि
  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
        
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!

Tuesday, May 6, 2014

दुम को हिलाते रहिये -सतीश सक्सेना

अपने अरमानों के ये दीप , जलाते रहिये !
हर सड़े फूल को , फ़िरदौस बताते रहिये !

हाथ जोड़े , नज़र  मुस्तैद , दिखाये  रहिये ! 
आँख नीची रखें और दुम को हिलाते रहिये 

कौन जाने वे आज ,घर से लड़ के आएं हो 
उनके हमदर्द बन ,आँखों को भिगाते रहिये 

जब कभी आग लगी पाओ तो सब लोगों को 
आँख भर ख़ुद की ही तकलीफ़ दिखाते रहिए !

क्या पता कौन दिन, उम्मीद नज़र आ जाये 
हर इक महताब को, आदाब बजाते रहिये !

Wednesday, December 18, 2013

किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की ! -सतीश सक्सेना

कहाँ पे जाके कलम चलाई धत्त तेरे की, 
किसके ऊपर लिखी रुबाई, धत्त तेरे की !

पूरे जीवन जिए शान से, नज़र उठा कर,

और कहाँ पे नज़र झुकाई, धत्त तेरे की !

सबसे पहले किससे हमने आँख मिलाई,
और किसे आवाज लगाई, धत्त तेरे की !


आँख न लगने दी, चौकन्ने थे, ड्यूटी पर 
और कहाँ जाकर झपकाई, धत्त तेरे की !

ताल ठोक कर बड़े भयंकर शेर सुनाये
और कभी ना हुई धुनाई, धत्त तेरे की !


कवि बन के हिन्दी की करते ऎसी तैसी  
पुरस्कार की हाथा पाई , धत्त तेरे की ! 

बने मसखरे उपाध्यक्ष अब अकादमी के !
कैसी समझ आप को आई,धत्त तेरे की !

Saturday, November 2, 2013

बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं -सतीश सक्सेना

करवाचौथ मना के अब, बालाएं बाहर निकली हैं !
कैसे कैसे लल्लू  ले , महिलायें बाहर निकली हैं !

आज खरींदे, सोना चांदी,धन की वारिश होनी है !
धनतेरस पर उल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !


कितने लोग आज भी ऐसे , जो  बंधने को बैठे हैं !
बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं !


जीवन इनका राजनीति में, पूंछ हिलाते बीता है ! 
गोरे रंग का कल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

पूंछ हिलाते देख इन्ही को , कुत्ते बस्ती छोड़ गए !
अपने अपने पिल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

Sunday, September 15, 2013

नमःशिवाय उच्चारण करते, मैं भी धन्य,हो गयी होती - सतीश सक्सेना

एक खतरनाक सा सपना,जो आज रात देखा , ज्यों का त्यों लिपिबद्ध कर दिया  : यह रचना व्यंग्य नहीं है केवल हास्य है , अधिक समझदार लोग, अधिक अर्थ न तलाश करें... 

बरसों  बीते , साथ तुम्हारे ,
खर्राटों में , जगते, जगते !
मोटी तोंद , पसीना टपके ,
भाग्य कोसते, पंखा झलते
पता नहीं ,फूटी किस्मत पर, 
प्रभु तेरी कुछ, दया न होती !
कितनों के पति बहे बाढ़ में, मैं भी तो, खुशकिस्मत होती !

सासू  लेकर, चारधाम  की 

यात्रा तुमको, याद न आई  !
कितने लोग तर गए जाकर
क्यों भोले की, याद न आई !  
काश उत्तराखंड की साजन,
तुमको टिकट मिल गयी होती !
नमःशिवाय उच्चारण करते, मैं भी धन्य, हो गयी होती  !

जिस दिन सूनामी आई थी 
तब तुम बाहर नहीं गए थे 
कितने लोग मरे थे बाहर 
तुम खर्राटों  में, सोये थे  !  
काश सुनामी में ,यह बॉडी, 
लहर में गोते, लेती होती  !
शोक संदेशा आस लगाए, मैं भी खूब, बिलखती  होती !

कब तक करवा चौथ रखूंगी 

सज धज कर, गौरी पूजूँगी ,
सास के पैर, पति की पूजा 
कब तक मैं, इनको झेलूंगी 
कब से जलती, आग ह्रदय में ,
कभी तो छाती ठंडी होती !
सनम जल गए होते उस दिन, काश दिए में, बाती होती !

अब तो जाओ, जान छोड़कर

कब तक भार उठाये, धरती 
फंड, पेंशन, एफडी, लॉकर ,
बाद में लेकर मैं क्या करती 
अगर मर गए, होते अब तक,
साजन रोज आरती होती !
कसम नाथ की, मैं जीवन भर, तुम्हे याद कर रोती होती !

( कृपया इसमें गंभीरता न खोजें न अन्यथा अर्थ लगायें , यह व्यंग्य नहीं है विशुद्ध हास्य है इसे उसी स्वरुप में पढ़ें !  जिन्हें हंसना नहीं आता, वे क्षमा करें  )

Monday, June 17, 2013

अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर शिरोमणि अवार्ड में भाग लें -सतीश सक्सेना


बहुत दिनों से मन बड़ा बेचैन था , सो सोंचा खुशदीप भाई के घर चलते हैं वहां जाकर देखा वे मत्था पकडे बैठे हैं ...

कारण पूंछने पर जो उन्होंने बताया वह अब आप उनकी जबान में ही सुनें ..

मक्खन रोज़ छत पर कपड़े धोने के लिए बैठता... लेकिन उसी वक्त झमाझम बारिश शुरू हो जाती...मक्खन बेचारा सोचता, कपड़े धोने के बाद सूखेंगे कैसे....बेचारा मन मार कर अपने कमरे के अंदर चला जाता...एक दिन मक्खन कमरे से बाहर निकला तो देखा...


कड़कती धूप निकली हुई थी...मक्खन ने सोचा...आज मौका बढ़िया है, कपड़े धोने का...मक्खन ने कपड़े धोने का सब ताम-झाम बाहर निकाला...

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लेकिन ये क्या सर्फ तो डिब्बे में था ही नहीं...मक्खन फटाफट गली के बाहर जनरल स्टोर की तरफ़ भागा...मक्खन जनरल स्टोर के अंदर ही था कि अचानक बादल ज़ोर ज़ोर से गरजने लगे...दिन में ही अंधेरा छा गया...मक्खन जनरल स्टोर से बाहर निकला...दोनों हाथ झुलाते हुए आगे पीछे करने लगा और फिर बड़ी मासूमियत से आसमान की तरफ़ देखकर बोला...



होर जी, किंदा....मैं ते एवें ही बस...बिस्किट लैन आया सी...तुसी गलत समझ रेयो जी...

                           उस दिन मुझे खुशदीप भाई ने मक्खन से पहली बार मिलवाया , साथ ही बताया कि मक्खन मेरा सारा काम  भी  देखता है , दिमाग का कुछ अधिक तेज होने के कारण मुझे हर समय इस पर निगाह रखनी पड़ती है ! उन्होंने पब्लिक से इसका परिचय कभी नहीं कराया , और साथ ही मुझसे भी वायदा लिया कि वे इसे किसी को बताएँगे भी नहीं ! हाँ हिंट देते हुए मैं बता दूं कि मक्खन खुद एक ब्लोगर है जो ब्लोगिंग समुदाय में एक मशहूर साहित्यकार के रूप में बेतहाशा ख्याति और पुरस्कार के साथ साथ घने नोट भी कूट रहा है  !

           कृपया उपरोक्त चित्रों में एक सज्जन मक्खन है अगर आप सही पहचान सके तो आपको "अंतरार्ष्ट्रीय  ब्लोगर शिरोमणि " का अवार्ड प्रदान किया जाएगा  इस अवार्ड विजेता का चयन किसी मशहूर ब्लोगर की अध्यक्षता वाली एक कमिटी करेगी जिसके चेयरमैन शिप  के लिए अनूप शुक्ल , समीर लाल  और खुद मक्खन दौड़ में हैं  ! इसके लिए भी ब्लोगरों से वोटिंग कराई जायेगी !


             तो आइये इस मक्खन ढूंढो प्रतियोगिता में हिस्सा लें और  "अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर शिरोमणि" पुरस्कार प्राप्त करें !
              यह पुरस्कार देने की जगह अभी मुक़र्रर नहीं हुई है मगर अगर कनाडा में हुआ तो समीर लाल जी ने ब्लोगरों के आने जाने का टिकट एवं रहने की व्यवस्था मुफ्त देने का वायदा ताऊ से कर दिया है ..
और यही वायदा अनुराग शर्मा उर्फ़ स्मार्ट इन्डियन ने भी किया है बशर्ते प्रतियोगिता पिट्सबर्ग में आयोजित की जाए ! 
              अग्रिम बधाई आप सबको ...

Thursday, June 6, 2013

ठसक से ठगी का पाठ पढ़ाता, यह ब्लोगर कौन है -सतीश सक्सेना

बरसों पहले २००८ में  मानसिक हलचल पर ज्ञानदत्त  पाण्डेय जी ने एक लेख लिखा था , यह ताऊ कौन है ?  
जिसमें ज्ञानदत्त जैसे गंभीर ब्लोगर ने लिखा था कि.."ताऊ की पहचान के लिये जो फसाड है एक चिम्पांजी बन्दर का - मैं उससे चाह कर भी ताऊ को आईडेण्टीफाई नहीं कर पाता। अगर मैं उनसे अनुरोध कर पाता तो यही करता कि मित्र, हमारी तरह अपनी खुद की फोटो ठेल दें - भले ही (जैसे हमारी फोटोजीनिक नहीं है) बहुत फिल्मस्टारीय न भी हो तो।"

                      वे कहते हैं कि हो सकता है ताऊ की शक्ल फिल्म स्टार जैसी न हो तो भी कम से कम अपना एक वास्तविक फोटो जरूर लगाएं ! लगभग सभी ब्लागरों ने एक ही बात कहीं कि बन्दर के चेहरे के बावजूद, ताऊ बेहद विद्वान और गंभीर कलम के धनी हैं , उस पोस्ट (३-१२-२००८ )पर मेरा ताऊ के प्रति कमेन्ट निम्न था ..
              "ताऊ पर लेख लिख कर आप बाजी मार ले गए और मैं सोचता रह गया सो बधाई स्वीकार करें ! पी सी रामपुरिया का व्यक्तित्व, ब्लाग जगत के थकान एवं उबाऊ भरे रास्ते पर एक बगीचे का शीतल अहसास जैसा है ! यह विद्वान एवं धीर गंभीर व्यक्ति ब्लाग जगत के उन शानदार प्रतिभाओं में से एक है जिसके कारण हिन्दी ब्लाग पढ़ते हुए भी, हमारे चेहरों पर मुस्कान सम्भव हो पाती है ! मैं उनके प्रसंशकों में, अपने आपको अग्रिम पंक्ति में पाता हूँ  "
                 मगर इस बन्दर मास्क लगाए चेहरे ने,ब्लॉग जगत को सार्थक लिखना सिखा दिया , हास्य व्यंग्य के इस आचार्य ने, खुद अपने चरित्र का, सरे आम मज़ाक उड़ाया है कि हमारे देश के लोग आज भी कितनी आसानी से बहुरूपियों द्वारा लुटे जा रहे हैं ! आम आदमी की कमजोरियों का फायदा उठाते, यह मदारी, नित नया रूप रखने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं ,धन कमाने, बाल उगाने, गोरा बनाने, बिना मेहनत  डिग्री लेने  के तरीकों पर लिखी पुस्तकें आज भी लाखों की संख्या में बिकतीं हैं !
आइये ज़रा ताऊ सद्साहित्य के प्रकाशक, द्वारा, बैस्ट सैलर किताबों पर गौर फरमाएं ...

इनकी विश्व प्रसिद्ध पुस्तकें : 
-५ वीं फेल डायरेक्ट एम् ऐ करें 
-चिटठा रोगों का शर्तिया इलाज़ 
-टंगड़ी मारने के अचूक नुस्खे 
-महिलाओं को इम्प्रेस करने के १०१ अचूक नुस्खे

                     अन्य मशहूर कंपनियों में  टीवी फोड़ न्यूज़ चैनल, ताऊ शर्तिया दवाखाना  जिसकी एजेंसी और कहीं नहीं है, नशा मुक्ति शिविर, कालोनाइज़र ताऊ , ताऊ प्रोडक्ट  फैक्ट्री  के शर्तिया कामयाब उत्पाद  और अगर आप उनके विज्ञापन पढ़ लें तो आप को रात भर नींद नहीं आएगी कि कब सुबह हो और यह प्रोडक्ट खरीदें  जाएँ  ! काश यह हमें पहले क्यों नहीं मिले ..

                      ब्लॉगजगत के इस रहस्यमय ताऊ  से एक बार मेरी मुलाक़ात हो चुकी है , मैंने निम्न कविता ताऊ को समर्पित की है जिसमें इनके ताऊ रूप का वर्णन है ! रूप वर्णन  सत्य है , ज़रा ध्यान से पढियेगा शायद आप ताऊ छवि का अंदाजा लगा सकें ! 

कंगन, झुमका ,पायल, चूड़ी
पर इस ताऊ का, ध्यान रहे
धन जहाँ दिखे, मिलते हैं यह
केवल  धंधे  का ध्यान रहे !
रुपये  कैसे भी, कमा सके ,
ये वेश बदलते रहते हैं !
संपत्ति भक्त की  अंटी कर, ये भक्त बदलते रहते हैं !

सब चोर उचक्कों के ताऊ ,
सारे ठग, इनके अनुयायी
मंदिर का कलश उतारें ये,
भगवान् के बनके अनुयायी
गुरूद्वारे मंदिर मस्जिद में,
ये अक्सर पाए जाते हैं !
जैसा मौका देखें अक्सर, भगवान् बदलते रहते हैं !

सुंदर सुकमार सुदर्शन हैं
औ दिखते वैभवशाली हैं ,
आकर्षक औ गंभीर बहुत
ये ताऊ गरिमा शाली है !
शारद मां मेहरबान इनपर , 
जिह्वा से फूल बरसते हैं !
परिस्थिति, जगह, मौका पाकर, परिवेश बदलते रहते हैं !

काले चश्में में, छिपी हुई ,
मनमोहक आँखें ताऊ की !
बन्दर की शक्ल का धोखा है
गुणवान शख्शियत ताऊ की
जेवर, धन, अर्पित करवाकर,
ये गुम हो  जाया करते  हैं !
ठग राज , चोर,  इस दर्शन को, आश्रम में, जाया करते हैं !!

Saturday, March 16, 2013

आओ छींटें मारे, रंग के -सतीश सक्सेना


ताऊ रामपुरिया ने , होली के अवसर पर अपने कविसम्मेलन में आने का न्योता दिया ! ताऊ ने इस अवसर पर मुझे बढ़िया सिल्क के कपडे पहनाये थे , जो कि प्रोग्राम ख़त्म होने पर यह कह कर उतरवा लिए कि अगले कवि सम्मेलन में काम आयेंगे ! 
ताऊ जैसे गुरुघंटाल से और क्या उम्मीद करूं ......खैर 

होली के अवसर पर बुद्धिमान, मित्रों से अनुरोध है कि इस रचना में ,गंभीर अर्थ तलाशने के लिए बुद्धि प्रयोग न करें , केवल आनंद लें ! :)

आभार आपके आने का ! 

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !
ताऊ चालीसा को पढ़ते, 
खेलें  ब्लोगर  होली है !  
आओ छींटें मारे, रंग के,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 

चेला शक्कर 
गुरु के अली 
पटाये जाकर  ! 
गुरु भाई से राज पूंछकर, 
गुरु की गैया,दुह ली है !
तीखे तीरंदाज़ ,सह्रदय , रंग मिज़ाज  त्रिवेदी हैं !


चेले बन कर 
नाम कमाते 
गुरुघंटाल पे ,
बुदधि लगाते 
बाते करते,हंसी हंसीं में,
शह और मात सीखली है !   
घोडा बनकर,इस प्यादे ने,गुरु की धोती खोली है !


कबसे लिखते  ,
आस लगाये !
इतना लिखा 
न कोई आये !
नज़र  न आये, कोई भौजी ,
किससे  खेलें  ? होली है  !
कुछ तो आहट दरवाजे पर,कहीं तो पायल छनकी है !


ब्लोगिंग करते 
सब चलता है !
कुछ भी लिखदो 
सब छपता है !
जिनको कहीं न सुनने वाले,
यहाँ पर बजतीं ताली हैं !
यहाँ पन्त जी और  मैथिली , अक्सर भरते पानी  हैं !

चार कोस पे 
पानी बदले ,
आठ कोस  
पर   बानी  !
देसी बानी पढ़ी, न समझी,
अर्थ  अनर्थ  पहेली है  ! 
किसके कपडे साफ़ बचे हैं,किसकी रंगत गोरी है ! 

कचरा लिख दो ,
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो
कवि बैठे हैं, माथा पकडे  ,
कविता  कैसी   होली  है !
एक पंक्ति में,दो शब्दों की, माला  लगती सोणी है !

कापी  कर  ले ,

जुगत  भिडाले !  
ब्लोगर बनकर  
नाम कमा  ले ,
मधुर गीत की बातें अब तो ,
बड़ी पुरानी हो ली हैं  !
ताऊ ने हाइकू लिखमारा,शिकी की गागर फोड़ी है !

अधर्म करते 

धर्म सिखाते  
बड़े रसीले,
शीर्षक लिखते  !
नज़र बचाके ,कैसे उसने,
दूध में गोली, घोली है !
नया मुखौटा लगा के देखो,पीठ में मारे गोली है !

ब्लू लेवल 

की बोतल आई ,
नई कार 
बीबी को भायी
बाबू जी का,टूटा चश्मा,
माँ  की  चप्पल आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू  देखे , यही  तो प्यारे होली है !







Saturday, September 1, 2012

भरी जवानी में , ये बातें , किस गुस्ताख ने छेड़ी हैं - सतीश सक्सेना

जब तक यादें जीवित दिल में ,श्र्द्धा और सबूरी की ! 
तब तक दिल में,बसी रहेगी, गंध उसी कस्तूरी  की !

जब तक, मेरे इंतज़ार में , नज़र लगीं, दरवाजे  पर !
तब तक वे,न जाने देंगीं, दिल से धमक जवानी की !

जब तक कोई कान लगाये, आहट सुनता क़दमों की !
तब तक यह मुस्कान रहेगी , कसमें पद्म भवानी की !

भरी जवानी में , ये  बाते, किस गुस्ताख ने छेड़ी हैं !
हाथ मिलाएं, हमसे आकर, हो पहचान गुमानी की !

जब तक ह्रदय मचलता उनके जूड़े ,कंगन,गजरे पर

लाखों जनम निछावर उन पर, है इच्छा कुर्बानी की !

Tuesday, April 17, 2012

हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

कुछ रंग नहीं, कुछ माल नहीं
कुछ मस्ती वाली बात नही,
कुछ खर्च करो, कुछ ऐश करो
कुछ डांस करें, कुछ हो जाए !
यदि मौज नहीं कोई धूम नहीं,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


क्या कहते हो ? क्या करते हो
है ध्यान कहाँ ?कुछ पता नहीं
ना टाफी है, ना चाकलेट ,
ना रसगुल्ला, ना बर्गर है !
हम मस्त कलंदर धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


रंगीन हैं हम, दमदार हैं हम
मस्ती में नम्बरदार, हैं हम
यह समय बताएगा सबको
पढने में तीरंदाज़ हैं हम ,
हम नौनिहाल इस धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम धूम धाम, तुम टाँय टाँय
हम बम गोले,तुम कांय कांय
हम नयी उमर की नयी फसल
तुम घिसी पिटी भाषण बाजी
हम आसमान के पंछी हैं , हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


ना गुलछर्रे, ना हो हल्ला,
हम धूमधाम,तुम सन्नाटा
हम छक्के हैं तेंदुलकर के ,
तुम वही पुराना नजराना 
हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
हम मक्खन हैं,तुम घासलेट 
हम रंग रुपहले,तुम कालिख 
हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

Monday, February 6, 2012

हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? -सतीश सक्सेना

एक दिन सपने में पत्नी श्री से कुछ ऐसा ही सुना था ,समझ नहीं आया कि यह सपना था कि हकीकत ....हास्य रचना का आनंद
महसूस करें, मुस्कराएं..... ठहाका लगाएं ! 
हो सकें तो सुधर भी जाएँ ... ;-)

जब से ब्याही हूँ साथ तेरे
लगता है मजदूरी कर ली
बर्तन धोये घर साफ़ करें

बुड्ढे बुढिया के पाँव छुएं !
जब से पापा ने शादी की,  

फूटी किस्मत, अरमान लुटे  !
जब देखो तब बटुआ खाली, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

ना नौकर है , न चाकर  है,  
ना ड्राइवर है न वाच मैन !
घर बैठे कन्या दान मिला

ऐसे भिखमंगे चिरकुट को,
कालिज पार्टी,तितली,मस्ती,
बातें लगती सपने जैसी !
चौकीदारी इस घर की कर, हम बात तुम्हारी क्यों मानें

पत्नी , सावित्री  सी  चहिए,  
पतिपरमेश्वर की पूजा को ! 
गंगा स्नान  के मौके  पर  ,
जी करता धक्का  देने को !
 

तुम पैग हाथ लेकर बैठो , 
हम गरम गरम भोजन परसें !
हम आग लगा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

हम लवली हैं ,तुम भूतनाथ
हम जलतरंग, तुम फटे ढोल,
हम जब चलते, धरती झूमें 
तुम हिलते चलते गोल गोल, 
तुम आँखे दिखाओ, लाल हमें, 
हम  हाथ जोड़  ताबेदारी  ?
हम धूल उड़ा दें दुनिया की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?


ये शकल कबूतर सी लेकर
पति परमेश्वर बन जाते हैं !
जब बात खर्च की आए तो
मुंह पर बारह बज जाते हैं !

पैसे निकालते दम निकले , 
महफ़िल में बनते शहजादे ! 
हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?

Tuesday, March 22, 2011

आइये ठहाका लगाएं - सतीश सक्सेना

जनजीवन में हास्य की उपयोगिता, लगता है कम होती जा रही है  ! घर में खुशिया और मुस्कान बिखेरने के लिए, पूर्वजों  द्वारा व्यवस्थित उत्सव आते हैं और चले जाते हैं !  मगर हम लोग ,अपना बनाया गया  अहम्  प्रभामंडल, तोड़ने को तैयार नहीं !

कितने  वर्षों से , शीशे  के ,
सम्मुख आकर मुग्ध हुए हैं 
कितनी बार मस्त होकर के 
अपनी पीठ ,थपथपाई  है  ,
इस होली पर अहम् छोड़ कर, गुरु चरणों में शीश झुकालें !
प्यार और मस्ती  में  डूबें   , आओ  अहंकार   जला दें  !


अक्सर इस मानव जनित अहम् को तोड़ने में , बचपन का प्यार, स्नेह और ममता भी कमजोर पड़ने  लगती  है, कठोर ह्रदय को भी जीत लेने में समर्थ स्नेह और प्यार , इस मानव जनित, जटिल अहम् को कमजोर नहीं कर पाता  और जीत अक्सर अहम् की ही होती है !

ऐसे  ख़राब माहौल में , अपने कालरों को ऊंचा उठाये ब्लोग्स के मध्य, कुछ लोग हास्य बिखेरने का प्रयत्न कर रहे हैं , यह स्वागत योग्य है ..काश लोग हँसना सीखें तो कितने घरों में, मासूमों के चेहरों  पर रौनक  आ जाएगी !

ब्लॉग जगत में इस हास्य रौनक की शुरुआत  वंदना अवस्थी दुबे  ने  "अपनी बेवकूफियां बताइये " के आवाहन के साथ किया था  जो बहुत  कामयाब रहा  ! लोगों ने ऐसी ऐसी बेवकूफ़ियाँ बतायीं कि पाठकों को यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसी भी बेवकूफी की जा सकती है ! मजेदारी यह कि वंदना ने खुद अपनी कोई बेवकूफी नहीं  बताई .... 

वैसे  आम तौर पर लड़कियां कोई बेवकूफी करती भी नहीं  ... ;-) 

धूमधाम और नगाड़ों के मध्य, ब्लॉग जगत के सबसे बड़े चालबाज   ताऊ रामपुरिया ने,  शरीफ और सीधे साधे  चच्चा पिटलिए  को  पिटवाने के लिए ब्लॉग जगत के मशहूर पहलवानों  कनाडा से  समीर लाल जी, पिट्सबर्ग वाले अनुराग शर्मा , हैदराबाद से विजय कुमार सप्पति  एवं  बड़ी मूंछ वाले ललित शर्मा  को बुलवाकर , जर्मनी वाले राज भाटिया  के नेतृत्व  में पिटवाने का प्लान बनाया गया  ! बेचारे चच्चा इन भयंकर  और ताकतवर लोगों के सामने क्या बच पाते,  सो पिटे और बुरी तरह, निर्दयता से पिटे,  और जर्मनी वाली  रजिया भौजी गुलाबी चुन्नी में  मुस्कराती रही  :-)    

इस बार  ब्लॉग जगत के वकील साहब भाई द्विवेदी जी भी पीछे नहीं रहे ...ताऊ रामपुरिया के बारे में उनके विचार पढ़ कर हंसी छुट गयी ! एक बानगी देखिये....
"मारे कवि महोदय पिट-लिए उर्फ श्रीमान सतीश सक्सेना जी ही एक मात्र सीधे-सादे प्राणी निकले जो उधर ताऊ के गरही कवि सम्मेलन में सब के लट्ठ खा कर, वहाँ से किसी तरह जान बचा कर भागे थे। जल्दी में उन की अक्ल की पोटली ताऊ के घर ही छूट गई थी या फिर रास्ते में छोड़ आए थे। (रास्ते में छूटी होगी तो भी ताऊ के किसी बंदे ने ताऊ के पास पहुँचा दी होगी, इसी तरह दूसरों की अक्ल की पोटलियाँ समेट कर आज कल ताऊ अक्ल का जागीरदार बना बैठा है ...."   

परस्पर शिकायते और वैमनस्य  पालते हम लोग अगर इन प्रयासों के फलस्वरूप , भवें चढाने की जगह, मुस्करा सकें तो देखने में साधारण लगता यह कार्य, अपना महत्व बताने में कामयाब हो जायेगा !    

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