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Friday, May 31, 2019

हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना

लगा सब धर्मों का मेला
भीड़ का है रेलम पेला

अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें 
कतारें,  लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !

प्यार की, कष्टों में दरकार
मिले स्पर्श नेह इक साथ 
मुसीबत में शबरी का संग 
लगे परमेश्वर का  दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे 
हर भवन में , ईश्वर न्यारे !
पीठ पर है निर्भय अहसास 
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !
सूफियों का विरक्त संसार 
हमारी दुनिया न्यारी रे !!

मिले शर्तों के बदले राह
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
यहाँ  सारे व्यापारी रे !!

शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पियेंगे सागर तट से ही 
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आये देने विश्वास 
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को 
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे 
पागलों में ही, यारी रे !!

Tuesday, May 7, 2019

क्या जानों सरकार हमारे बारे में -सतीश सक्सेना

कितने  शिष्टाचार , हमारे बारे में !
क्या समझे हो यार हमारे बारे में !

इसीलिये अब, तुमसे दूरी रखते हैं 
दिल न दुखे सरकार,हमारे बारे में !

हमको रोज परिंदे ही बतला जाते 
कितने हाहाकार  , हमारे बारे में !

जो वे चाहें करें फैसला,किस्मत का  
है उनका अधिकार, हमारे बारे में !

मरते दम तक तुम्हें नहीं समझायेंगे 
कितने गलत विचार हमारे बारे में !

Wednesday, June 15, 2016

तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं -सतीश सक्सेना

हम भी यूँ तो गिरेंगे, जमीं पर नहीं !

जीते जी तो झुकेंगे, कहीं पर नहीं !
हर गली से, गुज़रते हैं , हँसते हुए
वे मेहरबां सभी पर, हमीं पर नहीं !

हंसने का भी समय, हो मुक़र्रर यहाँ 
खूब खुल के हंसें पर गमीं पर नहीं ! 

वैसे हंसकर कहूँ , यदि बुरा न लगे 
तुम निछावर हुये हो, हमीं पर नहीं ! 

पर भरोसा सा है, आओगे एक दिन 
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं !

Monday, June 6, 2016

रूद्र अब की बाढ़ में इस देश का कूड़ा गहें - सतीश सक्सेना

रूद्र अब की बाढ़ में इस देश का कूड़ा गहें !  
धवल खद्दर वस्त्र पहने,कुछ मदारी तो बहें !

हे प्रभु भूकम्प का कुछ हो असर मेरे देश में !
नफरतों की,रंजिशों की,कुछ दिवारें तो ढहें !

धूर्त  गुरु, मक्कार चेले , हैं इसी उम्मीद में !
धुर गंवारों की गली में भाग्य इनके भी जगें !

मान्यवर की बेहयाई,है शिखर पर आजकल  
मन वचन कर्मों से डाकू,शक्ल से साधू लगें !

धर्म रक्षक भी परेशां, ताकत ए साईं की देख
कैसे इस दमदार शिरडी को भी,गेरू से रंगें ! 

Friday, April 22, 2016

! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना

आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है  ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !

जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!

है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !

निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि 
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !

नमस्तुभ्यं  मां शारदे,  वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !

आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !

हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !

गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !

Tuesday, March 8, 2016

किसी की वेदना के साथ,मन में वेदना तो हो - सतीश सक्सेना

युवा आचार्य  विवेक जी  की कही दो पंक्तियाँ दिल में उतर गयीं , और एक काव्य अभिव्यक्ति ने जन्म ले लिया , आभार संत विवेक जी का , प्रणाम करते हुए यह रचना उन्हीं के सद्प्रयासों को समर्पित करता हूँ !

न हो यदि आस्था, श्रद्धा, मगर संवेदना तो हो !
किसी की वेदना के साथ, मन में वेदना तो हो !

भले विश्वास ईश्वर पर न हो, पर भावना तो हो !
वहां पर सर झुके या न झुके पर चेतना तो हो !

हजारों बार गप्पें मारते , शमशान हो  आये,
किसी का पुत्र कंधे पर हो, अंतर्वेदना तो हो !

सभी नज़रें झुका लेते , तेरे  दरबार में आकर ,
किसी गुस्ताख़ का नज़रें मिलाके छेड़ना तो हो !

ये गुस्सा, ये विरक्ति, ये नज़र नीचे हुई कैसे , 
हमीं खो जाएंगे, विश्वास की अवमानना तो हो ! 


Saturday, January 16, 2016

यह आवाज,अजान नहीं है -सतीश सक्सेना

 चंदा तो  मेहमान नहीं है,
लोगों पर अहसान नहीं है !

अपने बच्चों को वर देना
वैसे भी, अनुदान नहीं है !

मंदिर ,मस्जिद, स्पीकर की ,
यह आवाज,अजान नहीं है !

बेबस निर्बल पशु हत्या है
ये कोई बलिदान नहीं है !

सब के मन की पूरा करना ,
इतना भी आसान नहीं है !

तुम्हें मुक्त कर हम सो जाएँ
और कोई अरमान नहीं है !

जितना संग दिया सपनों में
भुला सकें आसान नहीं है !


Monday, January 11, 2016

सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको - सतीश सक्सेना

भरी आँखें रुलायेंगी तेरी,  ताजिन्दगी मुझको ,
तुम्हारी याद के संग आयेगी शर्मिंदगी मुझको !

हमें अरसा हुआ दुनियां के मेलों में नहीं जाते 
सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको !

न मिलने की तमन्ना शेष न दीदार की ख्वाहिश
बहुत तकलीफ ही देगी,तुम्हारी बंदगी मुझको !

जमाने भर से लड़ने में कभी नज़रें न नीची कीं   
कहीं मज़बूर न कर दे, तेरी बेपर्दगी  मुझको !

खुदा के सहज बन्दे को, दिखावे ही नहीं आते, 
न जाने क्यों लगे अच्छी मेरी आवारगी मुझको !

Saturday, December 26, 2015

कौन गुस्ताख़ छेड़ता है हमें - सतीश सक्सेना

कौन छिप छिप के देखता है हमें ,
जैसे जनमों से , जानता है हमें !

जिसने आवाज दी, यहाँ आये 
कौन ग़ुस्ताख़ , छेड़ता है हमें ?

वह बे मिसाल हौसला, लेकर  
गहरी मांदों में खोजता है हमें ! 

नासमझ आशिक़ी सलामत है 
इतनी शिद्दत, से चाहता है हमें !

इश्क़ ने दर्द , बेहिसाब  दिया ,
कौन सपनों में , हंसाता है हमें ! 

Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाओ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
क्या जरूरत जंगली से, प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे, गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया, चाँद सितारों ने
मीठे गीत न गाओ तुम फंस जाओगे !




Monday, March 30, 2015

कभी ऐसे भी मोड़ आते हैं -सतीश सक्सेना

कभी ऐसे भी  मोड़ आते हैं !
लोग मरघट में छोड़ जाते हैं !


जिसके हम दर्द में नहीं सोये 
कैसे वे सर भी फोड़ जाते हैं !

कैसे शमशान  में करें बातें,
जैसे आत्मा निचोड़ जाते हैं !

स्वप्न दुनियां से बचाये रहना
लोग चुप चाप तोड़ जाते हैं !

प्यार में दर्द भी बहुत होता   
श्याम बाहें, मरोड़ जाते हैं !

Thursday, March 26, 2015

व्यास का स्मरण कर ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ - सतीश सक्सेना

सहज निर्मल मुस्कराहट से धरा गुलज़ार लिख दूँ !
भव्य मंगल दायिनी को, ईश का आभार लिख दूँ !

एक दिन उन्मुक्त मन से पास आकर बैठ जाओ
और बोलो नाम तेरे, स्वर्ग का अधिकार लिख दूँ !

काव्य अंतर्मन हिला दे, शुष्क मानव भावना में ,
समर्पण संभावना को प्यार का उपहार लिख दूँ !

मुक्त निर्झर सी हंसी पर, गर्व पौरुष का मिटा दूँ ,
तुम कहो तो मानिनी, अतृप्त की मनुहार लिख दूँ !

यदि तुम्हें  विश्वास हो, अनुराग की गहराइयों का !
व्यास का स्मरण कर, ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ !

Monday, March 23, 2015

दीवानों का , परिचय क्या ? - सतीश सक्सेना

लोग पूंछते परिचय मेरा, बेगानों  का ,परिचय क्या ?
कलम अर्चना करते आये दीवानों का,परिचय क्या ?

कितना सुख है कमजोरों की, रक्षा में कुछ लोगों को
मुरझाये अंकुर सहलाती बदली का दूँ, परिचय क्या ?

प्यार,नेह, करुणा और ममता, घर से जाने कहाँ गए !
धर्मध्वजाओं को लहराते विष का दूँ,मैं परिचय क्या ?

जिस समाज में जन्म लिया था रहने लायक बचा नहीं
मानव मांस चबाने वाले, मानव का दूँ ,परिचय क्या ?

जहाँ लड़कियां घर से बाहर निकलें सहमीं, सहमीं सी !
धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का,परिचय क्या ?

Sunday, December 7, 2014

दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित, लेकर आये,  क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट 
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान

गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, 
तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल, तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,
वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, 
प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान, तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, 
प्रभा मंडल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्बाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, 
धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल, तुम मुझे क्या दोगे !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे साथ में,ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हँस हँस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Friday, August 22, 2014

आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना

मुक्त हंसी के कारण चिंतित रहते, यार हमारे से !
अब तो इनके दरवाजे भी, लगते खूब बुहारे से !

कितनी झुकी झुकी ही रहतीं, नज़रें शर्म के मारे से 
कब आएगी रात, पूछती अक्सर साँझ, सकारे से !

बीमारी में सो न सकोगे , इंसानों  की बस्ती में !
लोग जागरण  के चंदे को , फिरते मारे मारे से !

उठो नींद से, होश में रहना बस्ती नज़र आ रही है
गहरे सागर से बच आये , खतरा रहे किनारे से !

दर्द दगा और धोखे ने भी, यारों जैसा संग दिया     
हमने सारा जीवन अपना, काटा इसी सहारे से !

Sunday, August 3, 2014

कभी कभी बेचारा मन -सतीश सक्सेना

माँ का रहा, दुलारा मन !
उन आँखों का तारा मन !

कितनी मायूसी में सोया 
उनके बिन बेचारा मन !

चंदा सूरज से लड़ आया
ऐसे कभी  न हारा मन !

कैसे बेमन होकर माना  
माँ ममता का मारा मन 

जाने किसको ढूंढ रहा है    
गलियो  में बंजारा मन !

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको रातों में ,रुलाता है कोई,
रोज आकर,थपथपाता है,कोई !

करवटें , रोज़  बदलता  पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी दर्द में झपकी न लगे
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँख भर आयी, तभी 
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई 

जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !

एक बच्चे से, न जाने क्या हुआ
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

Saturday, July 19, 2014

दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना

अदब कायदा रखिए भाई,देख कुएं औ खाई को
गिरना है, वो गिर के रहेगा, देगा दोष खुदाई को ! 

सारे फ़र्ज़ निभाए हमने, अब जाने का वक्त हुआ !   
दरवाजे पर कौन खड़ा है, इतनी रात बधाई को !

घर मे कीचड़ से खेले हो, गर्वीले दिन भूल गए,     
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !

लेना देना, रस्म रिवाजों से ही , घर का नाश करें 
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !

प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई, 
बरगद की  झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !
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