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Tuesday, September 3, 2013

एक चिरैया को, फंदे में पकड़ न पाए, शाम हो गयी -सतीश सक्सेना

जीवन की, अंतिम सीढ़ी पर,कैसे अपनी हार हो गयी !  
कुछ तो भूल हुई जीवन में, पूजा अस्वीकार हो गयी !

तुम तो कहते थे कि सत्य को आंच,झूठ को पाँव नहीं,
बेईमानी मठ वालों की  बापू , सरे बाजार हो गयी !

तुम तो कहते थे कि सभी की,चाल समझ में आती है !
यहाँ तो बाजी से पहले ही,इक प्यादे से ,मार हो गयी !

तुम तो कहते थे ,जीवन में ,बड़े  बड़ों को ठीक किया !
एक  चिरैया को , फंदे में पकड़ न पाए, खार हो गयी !

तुम्हीं बताते थे  , सन्यासी,ऋषि, मुनि पावन होते हैं !
कैसी गोपनीय गुरु दीक्षा , आज सरे बाज़ार हो गयी !

Saturday, December 17, 2011

अब शब्दों की जिम्मेदारी -सतीश सक्सेना


पिछली पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी पढ़कर देखता ही रह गया ...
"मैंने तो मन की लिख डाली, 
अब शब्दों की जिम्मेदारी  ! "और उनको एक पत्र लिखा ...
प्रवीण भाई,
आपकी दी हुई उपरोक्त दो लाइने अच्छी लगी हैं ! इस गीत को आगे पूरा करने का दिल है ...इजाज़त दें तो  ... :-) 
और जवाब तुरंत आया ....
आपको पूरा अधिकार है, निश्चय ही बहुत सुन्दर सृजन होगा, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं मैने भी पर भाव अलग हैं। प्रतीक्षा रहेगी आपके गीत की। सादर ,   प्रवीण
प्रवीण पाण्डेय,मेरी नज़र में बहुत ऊंचा स्थान ही नहीं रखते अपितु उनकी रचनाओं से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है ! हिंदी भाषा का यह सौम्य सपूत वास्तव में बहुत आदर योग्य है ! 
उनके प्रति आभार के साथ, इस रचना का आनंद लें ...अगर आप लोग आनंदित हुए तो रचना सफल मानी जायेगी !

रचनाकारों की नगरी में 
मैंने कुछ रंग लगाये हैं 
अंतर्मन से ही नज़र पड़े 
ऐसे  अरमान जगाये हैं  !
मानवता गौरवशाली हो 
तब झूम उठे, दुनिया सारी !
मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी  !

ये शब्द ह्रदय से निकले हैं 

इन पर न कोई संशय आये
वाक्यों  के अर्थ बहुत से हैं,
अपने  भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की , 
हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी !
जाने क्या अर्थ निकालेगी, इन छंदों का,  दुनिया सारी !

असहाय, नासमझ जीवों  की 

आवाज़ उठाना लाजिम है !
मानव की कुछ करतूतों से  
आवरण उठाना वाजिब है !
पाशविक प्रवृत्ति का नाश करे,
मानवता हो, मंगल कारी
इच्छा है, अपनी भूलों को , स्वीकार करे दुनिया सारी !

जिस तरह  प्रकृति का नाश ,

करें खुद ही मानव की संताने
फल,फूल,नदी,झरते झरने
यादें लगती, बीते  कल  की  !
गहरा प्रभाव छोड़े अपना , 
कुछ ऐसी करें कलमकारी !
प्रकृति की अनुपम रचना का, सम्मान करे दुनिया सारी !

मृदु भावों का अहसास रहे ,

पिछली पीढ़ी का ध्यान रहे
बचपन से, मांगे  मुक्त हंसी
स्वागत सबका, सम्मान रहे !
दुश्मनी रंजिशें भूल अगर,
झूमेगी तब महफ़िल सारी !
यदि गैरों की भी पीड़ा का ,अहसास करे दुनिया भारी !

बच्चों को  टोकें , हंसने से !

कलियों को रोकें खिलने से
हर हृदय कष्ट में आ जाता 
आस्था पर प्रश्न उठाने से !
क्रोधित मन, कुंठाएँ पालें, 
ये बुद्धि गयी  कैसे मारी ! 
गुरुकुल की, शिक्षाएँ भूले , यह कैसी है पहरेदारी !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर

सुनकर उल्लास उठे मन से
कुछ ऐसा मृदु संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों से !
यदि गीतों में  झंकार न हो,
तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी  !
हर रचना के मूल्यांकन में इन शब्दों की जिम्मेदारी !

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