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Saturday, December 26, 2020

तो फिर मेरी चाल देख ले -सतीश सक्सेना

शायद यह अकेला समाज है जहाँ ऊपरी दिखावे को सम्मान देना सिखाया जाता है ! अगर सामने से कोई गेरुआ वस्त्र धारी और पैर में खड़ाऊं पहने आ रहा है तो पक्का उस महात्मा के चरणों में झुकना होगा और आशीर्वाद मांगना ही है चाहे वह बुड्ढा पूरे जीवन डाके डालकर दाढ़ी बढ़ाकर छिपने के लिए बाबा क्यों न बना हो और किसी गए गुजरे का आशीर्वाद पाने के योग्य भी न हो !

मंदिर जाएँ तो पंडित (जी) धोती, कुरता में ही मिलेंगे , और आजतक किसी पुजारी की हिम्मत नहीं कि वह निक्कर या पैंट पहनकर भगवान की पूजा करे ! शायद यह मंदिर का ड्रेस कोड बना दिया गया है हमारे यहाँ , कष्ट निवारण हेतु पूजा पाठ के अलग अलग रेट हैं ज्यादा रेट तगड़ी पूजा की गारंटी है !

भारतीय राजनीति में खद्दर और सफ़ेद कपडे पहनने का रिवाज शुरू से ही है , खद्दर ग़रीबी की मदद करने और 90 प्रतिशत भूखे नंगे समाज में खुद को गरीब सा दिखाने की तड़प है , इससे बहुमत के वोट मिलने में, आसानी रहती है ! उन पर बहुत प्रभाव पड़ता है क्योंकि यही वह तबका है जो जीवन भर सफ़ेद कपडे कभी नहीं पहन पाता और सफ़ेद रंग स्पॉटलेस करेक्टर की पहचान है सो जितने भी दल्ले हमारे देश में दिखते हैं सब के सब बड़े नेताजी से लिंक का प्रतीक, खद्दर पहने ही मिलते हैं , यह लोग कोई भी असम्भव काम सरकार से कराने का वादा करते हैं और आपसे धन लेकर ऊपर पहुंचाते हैं , बदले में इनको बाकायदा मोटा पारितोषिक मिलता है और आपसे वाहवाही कि पैसे देकर नौकरी लगा दी लल्ला की ! अगले ही दिन इन श्वेत वस्त्रधारियों द्वारा श्वेत महंगे जूते भी ख़रीदे जाते हैं इससे इन्हें मिलने वाला सम्मान और अधिक हो जाता है देसी भाषा में इन्हें जमीन से जुड़ा पार्टी कार्यकर्ता कहा जाता है और इसका मुख्यतः काम नेता के पास लल्लुओं के काम कराने के लिए उनसे नेताजी के लिए नोट इकट्ठा करना होता है ! मोटा एक काम भी करा दिया तो अगले दिन इनके पास एक झंडा लगी एस यू वी मिलेगी !

और हिंदी का मशहूर विद्वान बनना और भी आसान है बस अपना खटारा सा सरनेम बदलकर एक बेहतरीन शास्त्रीय सांस्कृतिक नाम तलाश कर लें जैसे सतीश सक्सेना के नाम पर सतीश अपरिमेय हो तो मेरे पाठक मुझे आदरणीय कहना शुरू कर देंगे पक्का , और अगर मैं अपनी दाढ़ी महा गुरु जैसी रख लूँ तब लोग मुझे आचार्यश्री का दर्जा और जयजयकार आसानी से देंगे भले मैंने हिंदी की पढ़ाई, कक्षा १२ सेकंड डिवीजन पास तक ही की हो ! साहित्यिक लेख लिखने में कोई कष्ट ही नहीं , एक पैरा राजीव मित्तल और दूसरा शम्भुनाथ शुक्ल का और तोड़ मरोड़ कर उसे आकर्षक बनाकर पेश कर दूँ तो तालियों की जबरदस्त गड़गड़ाहट न मिले तो कहना क्योंकि आचार्य जैसी शक्ल और ज्ञान टपकाता नाम इनके पास है ही नहीं !

सो नए साल में क्यों न यह रंग ही धारण कर लूँ भाइयों और बैनों !!
तो फिर मेरी चाल देख ले ...!!

https://youtu.be/7iSDtiBipAk

Sunday, September 13, 2020

कवितायें बिकाऊ हैं , बग़ावत नहीं रही -सतीश सक्सेना

लोगों में इन कविताओं की, आदत नहीं रही
सुन भी लें तो भी ,मन में  इबादत नहीं रही !

इक वक्त था जब कवि थे देश में गिने चुने
 
यह  वक्त चारणों का, मुहब्बत नहीं रही !

जब से बना है काव्य चाटुकार , राज्य का 
जनता को भी सत्कार की आदत नहीं रही 

माँ से मिली ज़ुबान , कब के भूल चुके हैं !
गीतों से कोई ख़त ओ क़िताबत नहीं रही !

संस्कार माँ बहिन की गालियों में ,खो गए
कवितायें बिकाऊ हैं , बग़ावत नहीं  रही  !

Tuesday, March 31, 2020

शाही सलाम में कलम, क्या ख़ाक लिखेगी ? -सतीश सक्सेना

जयकार में उठी कलम, क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में, खतरनाक लिखेगी !

अवसाद में निराश कलम , ज्ञान लिखेगी ?
मन भाव ही कह न सकी, चार्वाक लिखेगी ?

बस्ती को उजड़ते हुए देखा है , मगर वो   
तकलीफ ए क़ौम को भी इत्तिफ़ाक़ लिखेगी !

किसने दिया था दर्द, वह बतला न सकेगी !
दरबार के खिलाफ ,क्यों  बेबाक लिखेगी ?

सुलतान की जय से ही, वो धनवान बनेगी !
एतराज ए हुक्मरान को , नापाक लिखेगी !

Thursday, February 7, 2019

तू अमरलता, निष्ठुर कितनी -सतीश सक्सेना

वह दिन भूलीं कृशकाय बदन,
अतृप्त भूख से , व्याकुल हो,  
आयीं थीं , भूखी, प्यासी सी 
इक दिन इस द्वारे आकुल हो 
जिस दिन से तेरे पाँव पड़े  
दुर्भाग्य युक्त इस आँगन में !
अभिशप्त ह्रदय जाने कैसे ,
भावना क्रूर इतनी मन में ,
पीताम्बर पहने स्वर्णमुखी, तू अमरलता निष्ठुर कितनी !

सोंचा था मदद करूँ तेरी
इस लिए उठाया हाथों में ,
आश्रय , छाया देने, मैंने 
ही तुम्हें लगाया सीने से !
क्या पता मुझे ये प्यार तेरा,
मनहूस रहेगा, जीवन में ,
राक्षसी भूख , निर्दोष रक्त
से कहाँ बुझे अमराई में ! 
निर्लज्ज,बेरहम,शापित सी, तुम अमरलता निर्मम कितनी !

धीरे धीरे रस  चूस लिया,
दिखती स्नेही, लिपटी सी !
हौले हौले ही जकड़ रही,
आकर्षक सुखद सुहावनि सी
मेहमान समझ कर लाये थे 
अब प्रायश्चित्त, न हो पाए !
खुद ही संकट को आश्रय दें 
कोई प्रतिकार न हो पाये !
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !


Thursday, March 22, 2018

रिश्ते दिखावे के -सतीश सक्सेना

मैंने आज तक किसी को बेटी नहीं कहा क्योंकि मेरे पास अपने पापा को बेहद प्यार करने वाली बेटी पहले से ही मौजूद है, मैंने किसी को बहिन नहीं बनाया क्योँकि मेरी हर वक्त चिंता करने वाली दो बड़ी बहिनें पहले से ही हैं , बहनों और बेटी को जितना प्यार और समय मुझे देना चाहिए वह मैं इन्हें नहीं दे पाता और कहीं न कहीं अपने आपको इन दोनों रिश्तों के प्रति गुनाहगार मानता हूँ !


ऐसे में , मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ जब मैं मित्रों को आपस में , भाई या बहिन बनाते हुए राखी बांधते बंधवाते देखता हूँ जबकि उनके घर में अपने भाई बहिन पहले से ही मौजूद हैं जिनके साथ उनके रिश्ते तल्ख़ हैं या हजारों शिकायतें मन में लिए, मात्र दिखावे के लिए बातचीत है !

लोगों के, समाज के भय से हम उन्हें मित्र या दोस्त खुलकर न कह पाते हैं और न मित्रता के रिश्ते निभा पाते हैं मगर राखी बाँधने के बाद हमारा ज़ाहिल समाज उसे स्वीकार ही नहीं करता बल्कि घर में सम्मान भी दिलाता है ! समाज के बनाये पवित्र रिश्तों का चालाक दिमाग ने कितना बदसूरत उपयोग किया है !

स्वाभाविक है कि यह पवित्र रिश्तों का ढिंढोरा समाज को दिखाने के लिए बजाया जाता है जिससे लोग उनके रिश्तों पर शक न कर सकें और इस पाखण्ड की आड़ में उनकी मित्रता सुरक्षित रहे !

Monday, January 8, 2018

करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !-सतीश सक्सेना


आग लगाई संस्कारों में 
सारी शिक्षा भुला गुरु की
दाढ़ी तिलक लगाये देखो  
महिमा गाते हैं कुबेर की !
डर की खेती करते,जीते 
नफरत फैला,निर्मम गीत !
करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !

खद्दर पहने नेतागण अब
लेके चलते , भूखे खप्पर,
इन पर श्रद्धा कर के बैठे
जाने कब से टूटे छप्पर !
टुकुर टुकुर कर इनके मुंह 
को,रहे ताकते निर्बल गीत !
कौन उठाये  नज़रें अपनी , इनके टुकड़े खाते  गीत !

धन कुबेर और गुंडे पाले 
जितना बड़ा दबंग रहा है
अपने अपने कार्यक्षेत्र में 
उतना ही सिरमौर रहा है 
भेंड़ बकरियों जैसी जनता,
डरकर इन्हें दिलाती जीत !
पलक झपकते ही बन जाते सत्ताधारी, घटिया गीत !

जनता इनके पाँव  चूमती
रोज सुबह दरवाजे जाकर
किसमें दम है आँख मिलाये 
बाहुबली के सम्मुख आकर  
हर बस्ती के गुंडे आकर 
चारण बनकर ,गाते गीत !
हाथ लगाके इन पैरों को, जीवन धन्य बनाते गीत !

लोकतंत्र के , दरवाजे पर 
हर धनवान जीतकर आया
गुंडा राष्ट्र भक्त कहलाया 
राजनीति में जब पद पाया
अनपढ़ जन से वोट मांगने,
बोतल ले कर मिलते मीत !
बिका मीडिया हर दम गाये, अपने दाताओं के गीत !

खादी कुरता, गांधी टोपी,
में कितने दमदार बन गये  !
श्रद्धा और आस्था के बल 
मूर्खों के  सरदार बन गये !
वोट बटोरे झोली भर भर, 
देशभक्ति के बनें प्रतीक ! 
राष्ट्रप्रेम भावना बेंच कर, अरबपति बन जाएँ गीत !

Tuesday, April 4, 2017

बड़े बेचैन हैं वे लोग , जो सब याद रखते हैं - सतीश सक्सेना

हमारे यार, धनदौलत, जमीं, जायदाद रखते हैं !
नवाबी शौक़, सज़दे के लिए, सज्जाद रखते हैं !

मदद लेकर हमारी वे हुए , गद्दी नशीं जब से !  
सबक यारों को देने, साथ में जल्लाद रखते हैं !

वे अब सरदार हैं बस्ती के, हैरत में हूँ मैं तबसे,
हमारे संत धन्धों  से , नगर आबाद रखते हैं  !

वही कहलायेंगे शेरे जिगर, जंगल में रह के भी  
वे अंतिम साँस में भी, हौसला फौलाद रखते हैं !

ये चोटें याद रखने की, हमें आदत नहीं यारों !
बड़े बेचैन हैं वे लोग , जो सब याद रखते हैं !

Friday, December 30, 2016

मक्कारों के दरवाजे से ये दीप नहीं बुझने पाए ! -सतीश सक्सेना

पहचान करो  गद्दारों की,
खादी पहने मक्कारों की !
दोनों हाथों से लूट रहे ,
इस घर के बेईमानों की !
इनकी चौखट पर जा जाकर
इक दीप जलाएंगे ऐसा 
जिससे विशेष पहचान रहे
दुनियां में इन दरवाजों की 
बारिश हो या तूफ़ान मगर यह दीप नहीं बुझने पाये !

धूर्तों के  दरवाजे  जाकर 
इक अक्षयदीप जलाना है 
जो देशभक्त का रूप रखे
उनका चेहरा दिखलाना है
बस्ती समाज बरबाद किये
बरसों से  श्वेत दीमकों ने !
जाकर थूकें, घर को खाते 
इन ध्यान लगाए बगुलों पर  
बेईमानी के उद्गम  पर,  श्रमदीप नहीं बुझने पाये ! 

यह दीपक आँखें खोलेगा
मूर्खों को राह दिखायेगा  
मानव की सुप्त चेतना को
ये दरवाजे, दिखलायेगा !
धूर्तों के चेहरे, नोच तुम्हें 
असली चेहरे दिखलायेगा
भ्रामक विज्ञापन के जरिये  
आस्था गरीब की बेच रहे ,
बाबाओं के दरवाजे से, जनदीप नहीं बुझने पाये !

Thursday, December 1, 2016

बंदरों के हाथ में , परमाणु बम है -सतीश सक्सेना

झूठ,मक्कारी, दिखावे भी न कम है,
सौ करोड़ों को नचाने का भी दम है !

ध्यान लोगों का न घोटालों पे जाए
ये बताओ खूब कि खतरे में हम हैं !

दुश्मनी से देश को खतरा तो है पर 
वोट बरसेंगे जभी खतरे में जन है !

धन कुबेरों के लिए , खोले खजाने
इन ग़रीबों के लिए तो आँख नम है !

हो सके तो देश अपने को बचा लो
बंदरों के हाथ में , परमाणु बम है !

Friday, November 25, 2016

ईद को ख़तरा बताते, आज भी कुछ लोग हैं - सतीश सक्सेना

अमन को बरबाद करते,आज भी कुछ लोग है,
नफरतों का गान करते,आज भी कुछ लोग हैं !

रूप त्यागी सा, प्रबल आवाज, मन में धूर्तता !
देश का विश्वास हरते,आज भी कुछ लोग हैं !

रंग, सिवइयां जाने कब से, ही रहे हैं, साथ में,
ईद को ख़तरा बताते, आज भी कुछ लोग हैं !


धूर्त मन,मक्कार दिल,पर ओढ़ चादर केसरी,
देशभक्त स्वरुप रखते आज भी कुछ लोग हैं !

हमको लड़ना ही पड़ेगा , इन ठगों से, गांव में,

कौम को मुर्दा समझते,आज भी कुछ लोग हैं !

Tuesday, November 15, 2016

सच कहूँ तो देश मेरा , जाहिलों का देश है - सतीश सक्सेना

सच कहूँ तो देश मेरा ,जाहिलों का देश है !
मूढ़,मूरख औ निरक्षर,काहिलों का देश है !

ढोर झुंडों की तरह आपस में लड़ते ही रहे 
जाति धर्मों में बंटे, लड़ते जिलों का देश है !

सुना करते थे बड़ों से कभी हम भी,मगर अब 
रक्षकों से ही लुटे , जर्जर किलों का देश है !

लड़कियां बाज़ार में चलतीं सहमती सी हुईं  
डूबतों को ताकते, जड़ साहिलों का देश है !

ढोंगियों के सामने, घुटनों पर बैठे हैं सभी !
संत बनकर ठग रहे, व्यापारियों का देश है !

देश मेरा भी जगेगा जल्द लेकिन इन दिनों,
स्वर्ण सपने बेंचते , कुछ धूर्तों का देश है !

Wednesday, September 14, 2016

हिंदी पुरस्कार शॉर्टकट - सतीश सक्सेना

हिंदी दिवस पर गुरुघंटालों, चमचों और बेचारे पाठकों को बधाई कि आज हिंदी, साहित्य चमचों के हाथ, जबरदस्त तरीके से फल फूल रही है, बड़े बड़े पुरस्कार पाने के शॉर्टकट तरीके निकाल कर लोग पन्त , निराला से भी बड़े पुरस्कार हासिल कर पाने में समर्थ हो पा रहे हैं !

ज्ञात हो कि हिंदी के तथाकथित मशहूर विद्वान, जो भारत सरकार , राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कृत हैं, सब के सब किसी न किसी आशीर्वाद के जरिये ही वहां तक पहुँच पाए हैं और इसमें उनके घटिया चोरी किये लेखों, रचनाओं का कोई हाथ नहीं !

अधिकतर हिंदी मंचों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राजनीतिज्ञों की विरुदावली खुश होकर गाते हैं एवं उनके सामने कमर झुका कर खड़े रहने को मजबूर हैं अगर उन्हें आगामी पद्म पुरस्कारों एवं विदेश यात्राओं में अपना नाम चाहिए !

इस सबके लिए कोई नेताओं के बच्चों के विवाह में काव्य पत्र अर्पित कर अपनी जगह बनाता है तो कोई नेता जी का अभिभाषण लेखन पर अपना हस्त कौशल दिखाता है ! नेताजी के खुश होने का नतीजा हिंदी के अगले वर्ष बंटने वाले पुरस्कार समारोह में पुरस्कृत होकर मिलता है ! एक बार मंच पर चढ़ने का आशीर्वाद पाकर यह हिंदी मार्तण्ड पूरे जीवन हर दूसरे वर्ष कोई न कोई कृपापूर्वक बड़ा पुरस्कार प्राप्त करते रहते हैं एवं मूर्ख मीडिया जिसको भाषा की कोई समझ नहीं इन्हें ही हिंदी का सिरमौर समझ, बार बार टीवी गोष्ठियों में बुलाकर, हिंदी कविराज, विद्वान की उपाधि से नवाज, इनके प्रभा मंडल में इज़ाफ़ा करती रहती है !
हाल में दिए एक विख्यात सरकारी हिंदी मंच की पुरस्कार लिस्ट देख कर हँसी आ गयी, इस एक ही लिस्ट में परमगुरु, महागुरु , गुरु , शिष्य और परम शिष्यों को सम्मान दिया जाना है इन पुराने भांड गवैय्यों को छोड़ एक भी स्वाभिमानी  हिंदी लेखक/कवि  इनकी नजर में पुरस्कृत होने योग्य नहीं है ...

जब तक इन चप्पल उठाने वाले धुरंधरों से छुटकारा नहीं मिलता तबतक हिंदी उपहास का पात्र ही रहेगी !
हिंदी पाठकों को मंगलकामनाएं हिंदी दिवस की !

Saturday, September 10, 2016

जाहिलों पर मीडिया का,मुस्कराना देश में - सतीश सक्सेना

देशभक्तों ने किया खाली, खजाना देश में !
धनकुबेरों को बिका, शाही घराना देश में !

बेईमानों और मक्कारों की छवि अच्छी रहे,
जाहिलों पर मीडिया का, मुस्कराना देश में !

गेरुए कपडे पहन कर डाकू, व्यापारी बने
कैसे, कैसे धूर्तों का , हाकिमाना देश में ! 

खर्च लाखों हो गए तो कार पे झंडा लगा,
पांच वर्षों में समंदर भर , कमाना देश में !

चोर, बेईमान खुद को, राष्ट्रवादी  मानते,
आजकल ईमानदारी का वीराना देश में !

Sunday, July 17, 2016

अच्छे दिन भी आते होंगे , हर हर मोदी बोल किसानों -सतीश सक्सेना


मेहनत करते जीवन बीता,मेहनत करते रहो ,किसानों !
अच्छे दिन भी आते होंगे ,हर हर मोदी बोल किसानों !


जित्ती चादर ले के लाये, पैर मोड़ सो जाओ किसानों !
भला करेंगे, राम तुम्हारा, कोई शक न करो किसानों !

रखो भरोसा नेताओं पर , क्यों हताश होकर मरते हो,
बेटी की शादी में तुमको, लाला देगा, कर्ज किसानों !

अफ्रीका में खेत दाल के, लगते सुंदर बहुत किसानों !
दाल उगाएं वे, हम खाएं , हर हर गंगे बोल किसानों !

केजरी झक्की , खांसे इतना , नींद न आने दे, रातों में ,
कांग्रेस,मीडिया,कचहरी और भी गम हैं,बहुत किसानों !


Saturday, July 9, 2016

संवेदना बिलख कर रोये,कवि न वहां पाये जाएंगे - सतीश सक्सेना

यह कैसा माहौल ? अब यहाँ द्वेष गीत गाये जाएंगे !
संवेदना बिलख के रोये ,कवि न यहां पाये जाएंगे !

दयाहीनता के आलम में उम्मीदें तो कम हैं लेकिन   
संवेदन संतप्त ह्रदय की, हम कसमें खाये जाएंगे !

द्वेषभाव को जल देने को,ढेरों लोग उगे हैं फिर भी 
दिल से दूषित भाव हटाने, गंगा हम लाये जाएंगे !

आग लगाते इन शोलों में, ह्रदय वेदना कौन पढ़ेगा, 
जब तक सूरज आसमान में,हम छप्पर छाये जाएंगे !

राजनीति के इन धूर्तों ने,  बेशर्मी  की हदें पार कीं,
जल्द आयेगा वक्त,रेत के किले सभी ढाए जाएंगे !

Monday, July 4, 2016

तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में - सतीश सक्सेना

हाल में ढाका हादसे पर अातंकवादियों और उनके रहनुमाओं के लिए ....

न हैं इस्लाम  खतरे मे, न है भगवान खतरे मे !
तुम्हारे शौक़ में, इंसानियत , इंसान खतरे में !

न हिंदुस्तान खतरे में न, पाकिस्तान खतरे में !
तेरी अय्याशियां औ महले आलीशान खतरे में 

न आयत ही कभी पढ़ पाए, न श्लोक गीता के, 
चाय का कांपता कप हाथ में,हैरान,खतरे में 

भले बच्चे हों पेशावर के, कत्लेआम ढाका हो ,
कहीं रोये तड़प कर माँ, इसी अनजान खतरे में 

बुरा हो तेरी मक्कारी औ अंदाज़े बयानी का !
तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में !

Friday, June 24, 2016

भगवान आपकी रक्षा करें - सतीश सक्सेना

आखिरकार किसी डॉ ने इस धंधे से जुड़े काले सत्य को उजागर करने की कोशिश करते हुए पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी है ,डॉ  अरुण गाडरे एवं डॉ अभय शुक्ला ने अपनी पुस्तक  "Dissenting Diagnosis " में जो सत्य उजागर किये हैं वे वाकई भयावह हैं ! लोगों की मेहनत की कमाई को मेडिकल व्यापारियों द्वारा कैसे लूटा जा रहा है इसका अंदाज़ा तो था पर इस कदर लूट है, यह पता नहीं था !

डॉक्टर भगवान का स्वरुप होता है क्योंकि वह मुसीबत में पड़े व्यक्ति को भयानक बीमारी से बाहर निकालने में समर्थ होता है , इस तरह रोगी के परिवार के लिए वह देवतुल्य ही होता है मगर आज समीकरण उलट चुके हैं , डॉक्टर बनने के लिए लाखों रुपया खर्च होता है , उसके बाद क्लिनिक पर किये गए करोड़ों रूपये जल्दी निकालने के लिए, धंधा करना लगभग अनिवार्य हो जाता है अफ़सोस यह है कि यह धन निकालने का धंधा , मानव एवं रोगी शरीर के साथ किया जाता है !
अधिकतर डॉक्टर सामने बैठे रोगी को सबसे पहले टटोलते हैं कि वह मालदार कितना है , और इस समय हर रोगी अपने आपको रोग मुक्त होना चाहता है अतः उसे धन खर्च करने में ज्यादा समस्या नहीं होती और वह डॉक्टर की हाँ में हाँ मिलता रहता है , 

पहली ही मीटिंग में उसके प्रेस्क्रिप्शन में 5 से 10 टेस्ट लिख दिए जाते हैं और साथ ही लैब का नाम भी , जहाँ से टेस्ट करवाना है ! बीमारी के डाइग्नोसिस के लिए आवश्यक टेस्ट में, कुछ ऐसे टेस्ट भी जुड़े रहते हैं जिनके बारे में उक्त लैब से पहले ही, डॉक्टर कोरिक्वेस्ट आई होती है ! जब आप लैब पंहुचते हैं तब यह आवश्यक बिलकुल नहीं कि सारे टेस्ट किये ही जाएंगे , जिन टेस्ट को करने के लिए लैब का अधिक कीमती केमिकल और समय खर्च होता है उनकी रिपोर्ट अक्सर आपके डॉक्टर की राय से बिना किये हुए ही दे दी जाती है एवं आपके डॉक्टर एवं लैब की आपसी सुविधा से यह टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव या पॉजिटिव अथवा नार्मल कर दी जाती है !लीवर पॅकेज , किडनी पैकेज , वेलनेस पैकेज और अन्य रूटीन पैकेज टेस्ट के सैंपल अक्सर बिना वास्तविक टेस्ट किये नाली में बहा दिए जाते हैं एवं उनकी रिपोर्ट कागज पर, डॉक्टर की राय से, जैसा वे चाहते हैं , बनाकर दे दी जाती है ! 
एक निश्चित अंतराल पर इन फ़र्ज़ी तथा वास्तविक टेस्ट पर आये खर्चे को काट कर, प्रॉफिट में से डॉक्टर एवं लैब के साथ आधा आधा बाँट लिया जाता है ! अप्रत्यक्ष रूप से रोगी की जेब से निकला यह पैसा , उस रोग के लिए दी गयी डॉक्टर की फीस से कई गुना अधिक होता है , अगर आपने डॉ को फीस ५०० रूपये और लगभग 8000 रुपया टेस्ट लैब को दिए हैं , तब डॉक्टर के पास लगभग 4800 रुपया पंहुच चुका होता है , जबकि आपके हिसाब से आपने फीस केवल 500 रुपया ही दी है ! लगभग हर लेबोरेटरी को सामान्य टेस्ट पर ५० प्रतिशत कमीशन देना है वहीं एम आर आई आदि पर 33 % देना पड़ता है !


आपरेशन थिएटर का खर्चा निकालने को ही कम से कम एक आपरेशन रोज करना ही होगा अतः अक्सर इसके लिए आपरेशन केस तलाश किए जाते हैं चाहें फ़र्ज़ी आपरेशन ( सिर्फ स्किन स्टिचिंग ) किए जाएं या अनावश्यक मगर ओ टी चलता रहना चाहिए अन्यथा सर्जन एवं एनेस्थेटिस्ट का व्यस्त कैसे रखा जाए ! अाज शहरी भारत में लगभग हर तीसरा बच्चा, आपरेशन से ही होना इसका बेहतरीन उदाहरण है !

भगवान आपकी  रक्षा करें  ..... 

Tuesday, June 21, 2016

संगमरमरी फर्शों पर ही, पाँव फिसलते देखे हैं -सतीश सक्सेना

ड़े बड़ों के,सावन में अरमान मचलते देखे हैं 
सावन भादों की रातों, ईमान बहकते देखे हैं 

गर्वीले, अय्याश, नशे में रहें , मगर ये याद रहे  
संगमरमरी फर्शों पर ही, पाँव फिसलते देखे हैं 

कई बार मौसम भी, अपना रंग दिखा ही देता है
सावन की मदहोशी में, अंगार पिघलते देखे हैं 

झुग्गी से महलों के वादे, सदियों का दस्तूर रहा
राजमहल ने मोची के भी सिक्के चलते देखे हैं 

मूर्ख बना के कंगालों को, जश्न मनाते महलों ने
अक्सर ठट्ठा मार मारकर, जाम छलकते देखे हैं 

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढ़ेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी लेट लेट कर 
सुरा सुंदरी, भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , 
हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं, कैसे कैसे लोभी गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी
कैसे  बनें यशस्वी गीत  ?
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना, पुरस्कार हथियाते गीत !


इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में 
साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिड़कें  दारु, मोहित होते मेरे गीत !

चारण, भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, 
खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Sunday, August 16, 2015

बेशर्म गज़ल - सतीश सक्सेना

आजकल हिंदी में चोरों की बहुतायत है और अधिकतर चोर हैं जो दूसरों की शैली और रदीफ़ बेशर्मी के साथ कापी करते हैं ! मज़ेदार बात यह है कि उनका विरोध करने कोई आगे नहीं आ पाता क्योंकि ऐसा उन्होंने भी किया है अतः उनके पास इसे सही ठहराने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता ! सो हिंदी में ग़ज़ल लिखने वालों की धूम है ,और तालियां बजाने वालों की कोई कमी नहीं ! सो सोंचा आज हम भी हाथ फिरा लें दुष्यंत कुमार पर  …। 

माल बढ़िया लगे तो मुफ्त उड़ा लो यारो 
कौन मेहनत करे,हराम की खा लो यारो !

इसे लिख के कोई दुष्यंत मर गया यारो  !
उसकी शैली से ज़रा नाम कमा लो यारो ! 

बड़े बड़ों ने इस रदीफ़ का उपयोग किया
सबको अपनी ही तरह चोर बता लो यारो !

ग़ज़ल रदीफ़ तो , सब ने ही बनाये ऐसे ,
मीर ग़ालिब पे भी इलज़ाम लगा लो यारो ! 

बुज़दिलों जाहिलों में नाम कमाओ जमके 
बेहया आँख से , इक  बूँद गिरा लो यारो !
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