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Monday, July 25, 2022

होमियोपैथी औषधि और मानवीय व्यवहार -सतीश सक्सेना

होम्योपैथिक उपचार में उपयोग की जाने वाली शक्तिकृत दवाओं को दवा का दर्जा देना उचित नहीं क्योंकि दवा , एक केमिकल पदार्थ होता है जिसमें केमिकल का होना साबित किया जा सकता है जबकि होमियोपैथी की शक्तिकृत दवाओं में केमिकल गुण मिलने का प्रमाण किसी भी साइंस लैब द्वारा नहीं जाना जा सकता एलोपैथिक सिस्टम की नज़र में यह असंभव है जब वे आर्सेनिक की सूक्ष्मीकृत होम्योपैथिक दवा में आर्सेनिक का टेस्ट करते हैं तो उन्हें नहीं मिलता ! क्योंकि एलोपैथिक लैब एक बूंद केमिकल के एक करोड़ वें भाग को खोजने में असमर्थ है जबकि होम्योपैथिक दवाओं में उससे भी हजारों गुना कम दवा का अंश होता है , जिसे वे उस ड्रग की शक्ति कहते हैं और जिसके होने का प्रमाण आधुनिक संसार खोज नहीं पाता !

जहर ही जहर को मारता है, यही सिद्धांत होमियोपैथी का भी है , बस होमियोपैथी दवाओं में क्रूड मेडिसिन इतनी कम मात्रा में करते जाते हैं कि उसका अंश मिलना भी असम्भव हो जाए ! यही कारण है कि आर्सेनिक एल्बम नामक दवा की 3 शक्ति तक तो आधुनिक लैब बता देगी कि यह दवा आर्सेनिक नामक जहर से बनायी गयी है मगर आर्सेनिक 12, 30 , 200 या अधिक शक्ति की दवा के टेस्ट में उनका रिजल्ट शुद्ध अलकोहल आता है जिसमें आर्सेनिक का नामोनिशान नहीं मिलता मगर यही दवा होमियोपैथी में बेहद कारगर है , जिसे एलोपैथी क्वेकरी का दर्जा देती आयी है !

डॉ जगदीशचंद्र बसु का एक प्रयोग था जिसमें उन्होंने पौधों में जीवन की पुष्टि की थी और उसे विश्व के वैज्ञानिकों ने स्वीकार भी किया था ! उन्होंने प्रूव किया था की उनमें मानव जैसा ही जीवन एवं जनन चक्र है और वे अपने आसपास के वातावरण के प्रभाव का वही असर महसूस करते हैं जैसे कि हम और इसमें सुख दुःख क्रोध भय आदि सबका अहसास शामिल है ! विश्व में लगभग हर पैथी में दवा निर्माण अधिकतर इन्हीं प्लांट के रस, जड़ और पत्तों से होता है , बस उनका बनाने का तरीका और चरित्र भिन्न होता है ! एलोपैथिक तरीके में अधिकतर क्रूड मेडिसिन की सीमित मात्रा उपयोग में लायी जाती हैं , जबकि होमियोपैथी में इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए उस दवा की न्यूनतम मात्रा , इतनी कम कि उसे किसी लैब में तलाश न किया जा सके , का उपयोग करते हैं , जिसे होमियोपैथ उस प्लांट की शक्ति कहते हैं !

होमियोपैथी में दवा निर्माण करने से पहले उसका मानवों पर प्रयोग किया जाता है , उसकी बेहद कम मात्रा की एक खुराक रोज कुछ दिन तक देने के पश्चात उसकी मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाया जाता है और उसके परिणाम को मानवों के ऊपर सावधानी से नोट किया जाता है , जहरीली दवा की मात्रा बढ़ाने से जो बीमारियां उस इंसान में उत्पन्न हुईं और उसकी मानसिक दशा में जो बदलाव आये उनका सावधानी पूर्वक लिखा गया विवरण ही दवा बनाने का सिद्धांत है ! 

होमियोपैथी का यह विश्वास है कि जितने तरह के इंसान दुनिया में पाए जाते हैं उनके व्यवहार से हूबहू मिलते हुए पौधे भी मौजूद हैं , अगर हम किसी इंसान का व्यवहार का सही अध्ययन कर उसी व्यवहार के पौधे की खोज कर लें तब उस पौधे से बनायी गयी होम्योपैथिक औषधि उस व्यक्ति के लिए संजीवनी का कार्य करेगी फिर बीमारी का नाम कुछ भी क्यों न हो !

अब एलोपैथिक सिस्टम के रोने का कारण समझने का प्रयास करते हैं , होमियोपैथी में मान लो बेलाडोना पौधे के रस की एक बूँद दवा को 100 बूंद अलकोहल में मिलाकर जो दवा बनती है उसे बेलाडोना -1 कहा जाता है ! अब बेलाडोना -1 का एक बूंद 100 बूंद एल्कोहल में डालने पर जो दवा बानी उसे बेलाडोना -2 कहा जाएगा ,  बेलाडोना -2 की एक बूंद 100 भाग शुद्ध अल्कोहल में डालने पर जो दवा बनी उस पर बेलाडोना -3 कहा जाएगा ! इस प्रकार अगर बेलाडोना -3 को किसी लैब में टेस्ट कराने हेतु भेजा जाए तो उसमें वन ड्राप बेलाडोना का 100X100X100 वां  हिस्सा ही मिलेगा , मगर इसके बाद इसी प्रकार बनायी गयी बेलाडोना 4 अथवा बेलाडोना 30 में विश्व की कोई लैब उसमें केमिकल पदार्थ नहीं पा सकती ! जब कि क्रोनिक या तथाकथित लाइलाज बीमारियों का इलाज करते समय हमें सबसे बेहतरीन रिजल्ट इन्ही शक्तियों से मिलते हैं !

क्रमश: 


Tuesday, July 19, 2022

होमियोपैथी, प्रचार शक्ति के अभाव में, एक आश्चर्यजनक प्रभावी मगर उपेक्षित विधा -सतीश सक्सेना

आधुनिक युग में प्रचार साधनों का जिसने भी बेहतर उपयोग कर लिया वही ज्ञानी और समृद्ध माना जाता है ! समाज में अधिकतर लोग लकीर के फ़क़ीर होते हैं जहाँ सब जाते हैं उसी रास्ते जाना सही समझते हैं , प्रमाण के रूप में प्रसाधनिक जैसे फेस पाउडर को लीजिये इसका फायदा गिनाते हैं सुंदरता बढ़ाना , पसीना रोकना , शरीर से बदबू भगाना और हम यह फ़ायदा, बिना सोचे, स्किन के महीन छेद बंद करके पाते हैं जो खुद में एक हेल्थ ब्लंडर है ! 

इसी तरह से विशाल विश्व में स्वास्थ्य सुधार की तमाम विधाएँ प्रचलित रही हैं , जिनको आधुनिक धनवान मेडिकल व्यवसाय ने, प्रचार के जरिये खा लिया , विश्व में न जाने कितनी खूबसूरत स्वास्थ्य विधाएँ या तो लुप्त हो चुकी हैं या दम तोड़ रही हैं ! ताकतवर एलोपैथी ने होमियोपैथी को समझने की बिना कोशिश किये उसे फेथ हीलिंग का दर्जा दे दिया वे यह भूल गए कि जिन जिन एलोपैथिक डॉक्टर्स ने उसे समझने और आजमाने की कोशिश की वे एलोपैथी को छोड़कर , होमियोपैथी को अपना चुके हैं , बहुत कम लोग जानते होंगे कि होमियोपैथी का जनक खुद एक एलोपैथिक डॉक्टर थे ! इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि आज विश्व में हजारों एलोपैथिक प्रैक्टिशनर होमियोपैथी के जरिये अपने रोगियों का उपचार करते हैं मगर एलोपैथिक दवा व्यवसाय इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं क्योंकि उनके व्यवसाय का अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा क्योंकि होमियोपैथी में कोई बीमारी असाध्य नहीं है जबकि एलोपैथी में तमाम बीमारियों यहाँ तक कि जुकाम का इलाज ही नहीं वे सिर्फ एंटीबायोटिक /स्टेरॉयड का उपयोग कर शरीर की जीवाणुओं को मारकर इलाज करते हैं जिसमें शरीर एक बीमारी से मुक्त होकर अन्य बीमारियों का शिकार हो जाता है ! 

आज से लगभग 42 वर्ष पहले मुझे सर्वाइकल स्पोंडोलाइटिस हुआ था , तमाम एलोपैथिक जांच और इलाज के बावजूद ठीक नहीं हुआ , डॉ विरमानी मशहूर डॉक्टर के अनुसार अब यह बोन डेफ्लेक्शन ठीक होना असंभव है , केवल एक्सरसाइज के जरिये मसल्स मजबूत बनाइये एवं मसल्स कमजोर होने पर अधिक उम्र में कॉलर का उपयोग ताउम्र करना होगा ! उन दिनों रात रात भर दर्द से तड़पता रहता था ! इंफ्रारेड लैंप के जरिये सिकाई करने पर आराम मिलता था मगर बढ़े दर्द के समय इंफ्रारेड लैम्प का अधिक उपयोग करने से गर्दन के पिछले हिस्से में बर्न हो गए थे और स्किन जल कर काली हो गयी थी तब घबरा कर मैंने होमियोपैथी की शरण ली , करोल बाग़ में दो मशहूर डॉक्टर बनर्जी और चटर्जी के पास इलाज कराया जिनके यहाँ लम्बी लाइन में लगने के बाद नंबर आता था ! दो माह में बहुत कम आराम मिला मगर उनकी दुकान से ही लाइन में लगे लगे होमियोपैथी की दो किताबें खरीदी और पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि उनकी दी हुई दवाएँ तो होमियोपैथी के मूल सिद्धांत के खिलाफ थीं और इससे मैं कभी ठीक नहीं हो सकता !

अपने जिद्दी स्वभाव के अनुसार मैंने रात रात भर जागकर वो दोनों किताबें ख़त्म कर होमियोपैथी सिद्धांत से अपना इलाज खुद करने का फैसला लिया और अगले दो महीने में पूर्ण स्वस्थ हो गया उसके बाद आज 40 साल बाद भी वह दर्द दुबारा नहीं हुआ !  

होमियोपैथी के जरिये अगर कोई डॉ अपनी रोजी रोटी चलाना चाहता है तब यह बहुत मुश्किल होगा कि वह रोगियों के साथ न्याय कर सके क्योंकि होमियोपैथी में एक रोगी पर पहले दिन ही डॉ को बहुत समय देना होगा वह पूरे दिन में मात्र एक या दो रोगियों का उपचार करने हेतु ही समय निकाल पायेगा जिसमें उसका खर्चा निकलना भी असम्भव होगा अगर वह पूरे दिन में 20 या अधिक रोगियों को ठीक करने का प्रयत्न करेगा तब उसे कम से कम 24 घंटे काम करना होगा जो असम्भव होगा और डॉ अपना खर्चा निकालने को यही करते हैं और वे अक्सर आंशिक तौर पर ही रोगी को ठीक करने में कामयाब होते हैं एवं होमियोपैथी का नाम खराब करते हैं !

होमियोपैथी सिद्धांत के अनुसार संसार में हर रोग का इलाज प्रकृति में उत्पन्न पौधों में छुपा है , उनका विश्वास है कि संसार में जितने प्रकार और व्यवहार के मानव, मानवी हैं उतने ही प्रकार या व्यवहार के पौधें हैं जो जाग्रत ,पूर्ण जीवित और इनसान के आचरण के हैं ! अगर इंसानों और पौधों के स्वभाव और आचरण का सही अध्ययन कर लिया जाए तब रोगी के आचरण के पौधे के रस से बनी दवा , उसी आचरण के इंसान के लिए संजीवनी बूटी का काम करेगी चाहे उस रोगी के रोग का नाम कुछ भी क्यों न हो ! 

ध्यान रहे होमियोपैथी में दवा का नाम नहीं होता , अलग अलग व्यक्तियों में किसी भी बीमारी की दवा, उनके विशेष स्वभाव के अनुसार अलग अलग होगी अतः एक व्यक्ति की कैंसर की कामयाब दवा दूसरे व्यक्ति के कैंसर में काम नहीं आएगी अगर उनका स्वभाव अलग अलग हुआ ! होमियोपैथी रेपर्टरी में मानव के लाखों गुणों का समावेश किया गया है जिससे व्यक्ति विशेष की दवा निकालना संभव है उसके लिए अस्वस्थ इंसान के गुणों का सावधानी से चयन आवश्यक है और असम्भव रोग का इलाज भी ! 

अपने स्वभाव का अध्ययन कर मैंने अपनी होम्योपैथिक संजीवनी की आसानी से तलाश कर ली , फलस्वरूप 68 वर्ष की आयु में भी मैं रोग मुक्त रहता हूँ काश मित्र लोग होमियोपैथी का अध्ययन करने की सलाह मान लें तो मेरे अधिकांश मित्रों का कल्याण होगा उन्हें किसी डॉ के पास जाने की आवश्यकता नहीं होगी ! 
 

Thursday, January 6, 2011

नए वर्ष पर होमिओपैथी की सौगात -सतीश सक्सेना

एक साल बाद, ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट देख, मन झूम उठा ! मेरी बेटी का निष्क्रिय  थायरोइड ग्लैंड , अब बिलकुल स्वस्थ है ! ....लगभग दो साल पहले , एलोपैथिक दवाएं बंद कर,अपनी बच्ची का इलाज़, खुद करने का निर्णय लिया था और इस जटिल बीमारी और मेरे आत्मविश्वास की जंग में , अंततः होमियोपैथी  के साथ साथ मेरे होमिओपैथी अध्ययन की विजय हुई  !
रिजल्ट निम्न थे ....
6-1-09  - TSH  -  46.96  ( 0.35-5.50 )
23-9-09  TSH -   21.57   
13-12-09 -TSH - 7.05  
2-2-10    - TSH  - 6.29 
1-1-11    - TSH  - 3.83 ( normal )


शायद यह मेरे पूरे जीवन में, खुद के आत्मविश्वास के साथ ,सबसे बड़ी लड़ाई थी  जिसमें मेरे विश्वास की जीत हुई ! और साथ ही होमिओपैथी के प्रति मेरा यह विश्वास और बढ़ा है कि यह मानवता के प्रति वरदान है !

Saturday, August 7, 2010

साइंस द्वारा चमत्कार को मान्यता - सतीश सक्सेना

                       इंडियाना यूनिवर्सिटी द्वारा, हाल में की गयी एक स्टडी के जरिये , विज्ञान को अब पता चला है :-)कि किसी बीमार के लिए, उसके पास बैठकर की गयी प्रार्थना का चमत्कारिक फायदा मिलता है और असाध्य बीमारियों में भी इसकी भरपूर उपयोगिता पायी गयी है ! उपरोक्त स्टडी, प्रोफ़ेसर ब्राउन की देखरेख में ,मोजाम्बिक के ग्रामीण एरिया में, मेडिकल डाक्टर और वैज्ञानिकों की टीम की मदद से किया  ! उनके द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है कि आंशिक अंधे और बहरे लोगों में , इस प्रार्थना प्रयोग के बाद, आशातीत सुधार हुआ है ! इनके प्रयोग का उद्देश्य , बीमारों के ऊपर प्रार्थना  के असर का अध्ययन करना था !
                     भगवान् का शुक्र है कि विज्ञान गाहे बगाहे यह आश्चर्यजनक  तथ्य स्वीकार करने लगता है कि  "कुछ तो है " जो हम समझ नहीं पाते "   ! काश  भाई प्रवीण शाह भी इसे जल्दी समझ लें ....
                     विश्व में बरसों से एलोपैथी का प्रभुत्व स्थापित है मगर आज भी दूरदराज के क्षेत्रों में ऐसी संस्कृतियाँ और परम्पराएं जाग्रत हैं जो  सदियों से वैकल्पिक चिकित्सा पर ही निर्भर हैं और सफलता पूर्वक इलाज़ कर स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं !
                    होमिओपैथी और रेकी आदि में प्राण शक्ति का बड़ा महत्व हैं  ! स्थूल शरीर की चिकित्सा न करके सूक्ष्म शरीर ( वाइटल फ़ोर्स ) को स्वस्थ करने का प्रयत्न किया जाता है ! अगर वाइटल फ़ोर्स  स्वस्थ है तो शरीर भी स्वस्थ महसूस करेगा ! सवाल सिर्फ सूक्ष्म शरीर को समझने का है  ! 
                     भारतीय योग विद्वानों द्वारा इच्छाशक्ति और मानसिक शक्तियों  के द्वारा मृतःप्राय व्यक्तिओं को  जीवनदान देने की बहुत घटनाएं हुई हैं , एकाग्रचित्त हो ध्यान लगा कर अस्वस्थ व्यक्ति के स्वस्थ होने की कामना करने एवं स्पर्श द्वारा रोग उपचार करने की अनगिनत घटनाएं उपलब्ध हैं ! यह प्रयोग करने के लिए कोई योगी होना आवश्यक नहीं है बल्कि एक मज़बूत इच्छा शक्ति वाला व्यक्ति इस प्रकार का प्रयोग कर सकता है और हर बार बेहतर परिणाम सामने आते हैं ! 
                      रेकी इसी ज्ञान का परिष्कृत रूप है, जिसमें स्पर्श द्वारा रोगी व्यक्ति पर साधक, शक्तिपात कर रोग को ठीक करने में समर्थ है ! रेकी के अभ्यास करने वाले सबसे पहले  ५ सिधान्तों का पालन करते हैं !
सिर्फ आज भर के लिए गुस्सा न हों, चिंता न करें, कृतज्ञ बनें ,निष्ठां के साथ कार्य करें  एवं दूसरों के प्रति दयालु बनें  ! प्यार और स्नेह पर आधारित यह शक्तिपात हो और स्वस्थ न हों यह कैसे हो सकता है !

Monday, July 5, 2010

मानवता के लिए प्रकृति की एक महान भेंट होमिओपैथी -सतीश सक्सेना



                          सन २००८ में मेडिसिन क्षेत्र में फ्रेंच नोबल पुरस्कार विजेता  डॉ लिउक मोंतान्येये   ने  अंततः यह स्वीकार किया है कि होमिओपैथी की मान्यताओं का मज़बूत साइंटिफिक  आधार है ! जिन होमिओपैथिक सिद्धांतों को अब तक एलोपैथिक मान्यताओं  के आधार पर  क्वेकरी करार दिया जाता रहा है , अब इस महान साइंटिस्ट के द्वारा यह नया रहस्योदघाटन होमिओपैथी के अविश्वासियों के लिए एक गहरा झटका है ! 
                          एक होमिओपैथी के जानकार के लिए यह कोई अचरज की बात  नहीं है इससे पहले भी अनगिनत एलोपैथिक डॉ ,  एलोपैथी  को त्याग कर होमिओपैथी की प्रैक्टिस शुरू करते रहे हैं  !
                          १७५५ में जन्में , डॉ फ्रेडरिक सैमुअल हैनीमैन एम्. डी. जर्मनी के बेहद प्रतिभाशाली एलोपैथिक डाक्टर थे  ! बचपन से ही विलक्षण प्रतिभाशाली हैनिमन ने एक सिद्धांत की नीव रखी कि स्वस्थ शरीर में अधिक मात्रा में जिस औषधि को खाने से  जो लक्षण पैदा होते हैं ,चाहे उस रोग या लक्षण का नाम कुछ भी क्यों न हो , वे लक्षण इसी दवा की न्यूनतम मात्रा देने से ठीक होने चाहिए ! जितनी दवा की मात्रा  कम  करते जायेंगे  दवा के कार्य करने की शक्ति उतनी ही बढती जायेगे ! 
                           उदाहरण के लिए आर्सेनिक अल्बम  दवा का एक बूँद टिंक्चर लेकर ९९ भाग एल्कोहल में मिलाने पर, यह  आर्सेनिक अल्बम १ बन जाता है ! अब इस आर्सेनिक अल्बम १ नामक दवा से एक बूँद लेकर ९९ भाग एल्कोहल में मिलाने से नयी दवा आर्सेनिक एल्बम २ कहलाएगी ! आर्सेनिक एल्बम २ से एक बूँद लेकर ९९ भाग एल्कोहल में मिलाने के बाद आर्सेनिक अल्बम -३ नामक दवा तैयार होती है ! इस प्रकार आर्सेनिक अल्बम ३ में एक बूँद आर्सेनिक टिंक्चर का १० लाखवा भाग पाया जाएगा  ! निश्चित तौर पर इस तरह बनायी गयी आर्सेनिक ३० अथवा आर्सेनिक २०० या आर्सेनिक १००००० में एक बूँद का कौन सा परमाणु होगा , गिनती लगाना असंभव होगा ! किसी भी एलोपैथिक लैब में, ३ पोटेंसी के बाद की दवा चाहे उस पर कोई नाम क्यों न लिखा हो, रिजल्ट शुद्ध एल्कोहल ही आता है ! यही कारण है कि एलोपैथिक सिस्टम ने इसे कभी मान्यता नहीं दी , और दवा के रिजल्ट को वे आस्था और विश्वास के कारण ठीक होने की बात कह कर अमान्य ठहराते रहे !
                              डॉ जगदीश चन्द्र बसु ने यह साबित किया था कि पौधों में जीवन है और उनमें संवेदनशीलता ठीक जीवों की संवेदन शीलता से मिलती है  ! पौधों का व्यवहार भी इंसानों की तरह मृदु ,स्नेही और क्रूर होता है ! इनसे बनायी गयी दवाओं का असर, उनके व्यवहार से मिलते जुलते इंसानों पर सबसे अच्छा होगा ! 
                                अगर आप अपने व्यवहार से मिलते हुए पौधे को ढूंढ निकालें तो यकीनन उससे बनायी गयी औषधि  आपके लिए संजीवनी बूटी का कार्य करेगी ! एक बार अगर आपने अपनी संजीवनी बूटी किसी होमिओपैथ की सहायता से ढूँढ ली तो शरीर में चाहें कोई भयंकर बीमारी क्यों न हो यह संजीवनी की तरह ही कार्य करेगी !और आपकी संजीवनी ढूँढने का यह कार्य होमिओपैथी रिपर्टरी करती है ! मानवीय गुण और शारीरिक लक्षणों के लाखो लक्षण लिखे हैं इस किताब में , यह किताब नहीं हज़ारों होमिओपैथ, जिनमें अधिकतर एलोपैथिक डाक्टर थे , की दिन रात की लगन और परिश्रम का नतीजा है जो बीसियों वर्षों और एलोपैथिक डाक्टरों के विरोध के बाद भी इस संसार में  आई  ! 
                                 भयानक और असाध्य बीमारियाँ को समाप्त करने के लिए आपको एक बार होमिओपैथी की इस गीता की शरण में जाना पड़ेगा , किसी विद्वान् डाक्टर के १-२ घंटे के परिश्रम के बाद आपकी संजीवनी बूटी या उससे मिलती जुलती कुछ दवाये आपके सामने आ जाएँगी ! अगर आप मैटिरिया मेडिका में, इन दवाओं के चरित्र के बारे में पढेंगे तो आपको लगेगा कि आप अपने चरित्र के बारे में ही पढ़ रहे हैं ! और यकीन रखिये इस सेलेक्टेड  औषधि की एक बूँद आपको आपरेशन टेबल पर जाने से आसानी से रोक देगी !  

Sunday, June 6, 2010

वजन कम रखने का तरीका -सतीश सक्सेना

पिछले कई सालों से निम्न चतुर्दिवसीय विधि अपनाता  रहा हूँ और मुझे अपना वजन घटाने में हमेशा  कामयाबी मिलती है ! जनरल मोटर्स  का  ७ दिन वाला मशहूर फार्मूला मैं अक्सर ४ दिन में तोड़ देता हूँ ...२-३ किलो कम ! कमाल की कामयाबी मिलती है हर बार ! 

  • पहले दिन केले को छोड़ केवल फल खाता हूँ , पूरे दिन में कम से कम १०-१२ गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए, अगर फलों की जगह केवल तरबूज खाया जाया तो पहले ही दिन लगभग डेढ़ किलो वजन घटता है !
  • दूसरे दिन की शुरुआत नाश्ते में एक भुना आलू आधा चम्मच मक्खन के साथ , और पूरे  दिन केवल कच्ची हरी सब्जियां और वेज सूप खाइए ..पानी खूब पीना है !
  • तीसरे दिन फल और सब्जियां ( केला और आलू को छोड़ कर ) बिना उबाले  या गरम किये बिना खाइए , भरपूर पानी पीते रहिये !
  • चौथे दिन सिर्फ ३ गिलास दूध और ६ केला  खाइए , भरपूर पानी पीजिये  !  
  • अगर वजन घटाने के साथ साथ जवान भी बने रहना चाहते हैं तो हँसना सीखिए , और हँसना तब आएगा जब हँसाना सीखेंगे ,खास तौर पर किसी रोते हुए को हंसाइये ! जीवन में अगर आज तक किसी को हंसाने की कोशिश नहीं  की हो तो शुरू कर के देखिये आपको भी हंसी आयेगी !   

Tuesday, April 13, 2010

होमिओपैथी और आपकी असाध्य बीमारियाँ -सतीश सक्सेना

          
आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी द्वारा लिखित क्या होमिओपैथी अवैज्ञानिक है ? पोस्ट पर बड़ी मनोरंजक प्रतिक्रियाएं पढने को मिलीं कुछ लोगों को होमिओपथी पर भरोसा था और कुछ इसे नितांत झोला छाप विद्या बता रहे थे !

                 कल यही मैंने अपने मित्र आदरणीय डॉ अमर कुमार , को कहने का प्रयत्न किया था कि जब आप एलोपैथ हो तो उस पैथी से, जिसपर आपका विश्वास ही नहीं है , नाराज क्यों हो ? एक एलोपैथिक डॉ की नाराजी स्वाभाविक है, जब उनके रोगी, उस बीमारी से स्वस्थ होने की खबर उन्हें देते हैं, जो एलोपैथिक नज़रिए से असाध्य है ! तो एक सबसे अधिक पढ़े लिखे आदमी ( एम् बी बी एस , एम् एस ) का झल्ला जाना स्वाभाविक है :-)

               जहाँ तक वैज्ञानिक विवेचना का सम्बन्ध है, तो आज तक विज्ञान ईश्वर शब्द पर ही भरोसा नहीं कर पाया है, तो उसकी बनाई शक्तियों को कैसे पहचानेगा सिर्फ उनके अहसास होने पर, अपने आपको चमत्कृत ही पाता है ! मैंने यहाँ कुछ सज्जनों को बिना समझे ही, होमिओपैथी का मज़ाक बनाते देखा है ! सबूत और इनामी राशि देने की बात कही जा रही है.....

               कम से कम, मैं जो एक होमियोपैथी श्रद्धालु और ३० साल से इन पुस्तकों का एक विद्यार्थी मात्र हूँ, इस मूर्खता पूर्ण बहस को, और चैलेन्ज को स्वीकार नहीं करूंगा, डरने के कारण नहीं बल्कि विद्वान् मगर इस महान वैकल्पिक चिकित्सा के प्रति,नासमझ लोगों की जमात के सामने, अपने आपको खड़ा करने में झिझक के कारण !

              अब आप मेरी शौक से मज़ाक उड़ाइए ... बेहतरीन विश्वासों की ऐसी मज़ाक हज़ारों सालों से, आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा उड़ाई जाती रही हैं सो मैं होमिओपैथी की मज़ाक उड़ाने पर, आपको मुस्कराते हुए शुभकामनायें  देता हूँ !

             आरोप लगने से, पहले मैं बता दूं कि बचपन से अंधविश्वासों और अंध धार्मिक आस्थाओं का घोर विरोधी रहा हूँ ! सवाल सिर्फ अपनी अपनी शिक्षा का और समझ का है !

             मैं एलोपैथिक मत पर विश्वास रखता हूँ परन्तु एलोपैथिक डॉ से बहुत डरता हूँ क्योंकि अक्सर वे भयभीत रोगी से पहला सवाल " क्या करते हो " का ही करते हैं, और बदकिस्मत रोगी अगर सर्जन के सामने हो तो भगवान् ही मालिक है  :-)

            मेरे एक सर्जन मित्र जो एक मशहूर क्लिनिक में कार्य करते थे इस लिए नौकरी छोड़ने को विवश होना पड़ा क्योंकि उन्होंने एक रोगी को, बिना आपरेशन ही ठीक कर दिया था ! आज से लगभग २६-२७ वर्ष पहले दिल्ली के मशहूर आर्थो स्पेशलिस्ट डॉ विरमानी ने मुझे गले में कालर लगाना और मोटर साइकिल छोड़ना अति आवश्यक बताया था ! उस समय स्पोंडलाइटिस के दर्द से कराहते हुए, मैंने अपनी इच्छा शक्ति को चैलेन्ज करते हुए, अपने आपको बिना किसी डॉ से सहायता लिए, ३ महीने में इसी होमिओपैथी से ठीक किया था और तब से आज तक अपने परिवार का ही लाखों रुपया डॉ को देने से और अपने शरीर को गिनी पिग बनाने से बचा लिया !

            मैं यहाँ यह जरूर बताना चाहता हूँ, सैकड़ों गरीबों और जरूरत मंदों की अनगिनत भयानक बीमारियाँ मैंने खुद निशुल्क ठीक की हैं उनमें गैंग्रीन, जिसमें पैर कटाने की तारीख मिल चुकी थी, स्पाइनल स्लिपडिस्क जिसमें ३ ओपरेशन बताए गए थे, आदि बहुत उदाहरण हैं ! इस वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के के कारण मैंने पिछले २५ वर्षों में मैंने अपने परिवार पर, एलोपैथिक डॉ को कोई पैसा नहीं दिया :-)

           अफ़सोस यह है कि होमिओपैथी को जानने वाले सैकड़ों जगह जगह मिल जायेंगे और बीमारी का नाम सुनकर ही दवाएं देने वाले भी हर जगह मौजूद हैं (जिनके कारण होमिओपैथी बदनाम है ) !अतः होमिओपैथी का इलाज़ करते समय डॉ का चुनाव बहुत अहम् है !


          मेरा विश्वास है कि अगर कोई होमिओपैथिक डॉ आपके मानसिक व्यव्हार को भली भांति जानता है तो और आपको ठीक करना चाहता है तो भयानक और असाध्य बीमारियों को भी आसानी से ठीक कर सकता है !

          अगर आप सही समझ के साथ पिछले १० वर्षो से होमिओपैथी के प्रभाव में हैं तो यकीन करें कि आपकी उम्र, सामान्य से १० वर्ष अधिक होगी !

          होमिओपैथी एक आश्चर्यजनक विधा है और कुशल डॉ की देख रेख में ,बेहद खतरनाक बीमारियों से तुरंत आराम दिलाती है !

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