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Thursday, April 2, 2015

जागो देशवासियों अब भी समय बचा - सतीश सक्सेना

चलो गांव की ओर, व्यथाएँ  बांटेंगे, 
इकले नहीं किसान यकीन दिलाएंगे 

कसमें खाकर घर से पैदल आये हैं 
भूखे नहीं किसान कभी सो पाएंगे !

अन्न उगाने वाले क्यों कमजोर रहें 
आत्मचेतना,बोध,विवेक जगायेंगे !

हो आनंद  हमेशा इनके आँगन में 
इन चौपालों में,सौभाग्य जगायेंगे !

जागो देशवासियों ! वरना भारत में
खद्दरधारी दीमक , जश्न मनाएंगे !

कृषिप्रधान देश की खेती चाट गए
अब गरीब की रोटी,चट कर जाएंगे ! 

हिम्मत हारें नहीं,समय वह आएगा
खलिहानों में जीवनदीप जलायेंगे !

(यवतमाळ पदयात्रा 15 से  19 april के अवसर पर )

Thursday, January 30, 2014

कर्म भूमि बस्तर पुकारती, और नहीं संघर्ष करें -सतीश सक्सेना

30 jan 2014, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में  छत्तीस गढ़ पुलिस द्वारा , नक्सलबादियों  के आत्मसमर्पण के लिए, एक हिंदी कविता के जरिये आवाहन किया है ! निस्संदेह यह एक स्वागत योग्य कदम है ! 
कविता, अगर मन से लिखी जाए तो जनमानस को बदलने की शक्ति रखती है और ऐसे कदम, अपने स्थायी प्रभाव छोड़ने में समर्थ रहते हैं ! 
छत्तीस गढ़ पुलिस के इस आवाहन को अपने शब्दों में देते हुए, यह रचना, इस मंगलकारी कार्य हेतु छत्तीस गढ़ पुलिस को समर्पित है ! मुझे विश्वास है कि ऐसे प्रयत्न, इस जलती आग में, ठन्डे जल का काम करेंगे ! 
इस खूबसूरत पहल के लिए मंगलकामनाएं, छत्तीस गढ़ पुलिस को !! 

कर्म भूमि  बस्तर  पुकारती , और नहीं संघर्ष करें  !
आओ हम आवाहन करते, जन मन सद्भावना करें  !

बौद्धजनों की कर्म भूमि औ महर्षियों की तपोभूमि से 
जन जन की आवाजे आतीं , खेल खून का बंद करें  !

आंदोलन विरोध के रस्ते और भी हैं इस दुनियां में
आओ मिलकर बात करेंगे, क्रोध के गाने, बंद  करें !

कर्म  परायणता गरीब की , सम्मानित करवाएंगे !
मार काट  के रास्ते त्यागें , काली राहें , बंद  करें !

नक्सल और पुलिस मुठभेड़ें, कितनी जाने लेती हैं 
खड़े हैं हम बाहें फैलाए , शस्त्र समर्पण शुरू करें  !

शस्त्र समर्पण मंगल कारक,सम्मानित मानवता है !
हंसकर तुमको गले लगाने आये हैं , विश्वास करें  !

हथियारों का यही समर्पण, साहस का परिचायक है
बच्चों के भविष्य की खातिर,एक नयी शुरुआत करें !
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