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Monday, September 26, 2016

एक अनुरोध - सतीश सक्सेना

प्रणाम प्रभु ,
कल सुबह नेहरू पार्क में दौड़ने से पहले 

आज के समय में मानव अपने स्वास्थ्य के प्रति बेहद लापरवाह हो गया है और इसमें बहुत बड़ा हाथ हमारे मन का होता है जो कि हमारे काबू में ही नहीं है , हमें समोसे, जलेबी, पकौड़े राह चलते ललचाते हैं  और कठोर व्यायाम करना हमारे बस में नहीं उससे बचने के लिए , हमारा मन हमें तरह तरह से समझाता है कि रात को बारह बजे सोकर, जल्दी नहीं उठ सकते सो सुबह का व्यायाम या टहलना कैसे हो ! ऑफिस से घर पंहुचते ही बहुत समय निकल जाता है , नौकरी तो करनी है न आदि आदि .......
भारत में हर व्यक्ति, समस्या निदान के लिए, विश्व का सबसे बड़ा विद्वान है , आप कोई समस्या बताइये जवाब हाज़िर है खास तौर पर बीमारियों के इलाज़ , बिना शरीर हिलाये तो टिप्स पर हैं  .... हार्ट एवं मोटापे के इतने इलाज हैं कि उन्हें सुनकर आपको लगेगा कि मैं बेकार ही चिंता करता हूँ शायद ही कोई भारतीय होगा जो मेथी, जामुन व् लहसुन नहीं खाता होगा और यह इलाज बचपन से मालूम हैं , उसके बाद सबसे अधिक मौतें इन्हीं बीमारियों से होती हैं मगर मजाल है कि किसी घर में यह देसी इलाज बंद हुए हों !

आज सुबह नेहरू पार्क दिल्ली जो मेरे घर से 20 km है वहां जाकर 15 km दौड़ाना बेहद सुखद रहा ,चित्र में लाल शर्ट में बेयर फुट रनर पंकज प्रसाद हैं उनके साथ कूल डाउन रनिंग में कुछ टिप सीखने का मौका मिला , डॉ प्रभा सिंह लखनऊ से किसी सेमिनार के लिए आयीं थीं , वे भी रनर ग्रुप को तलाश करते हुए , वहां पंहुचीं थी यकीनन इन जवानों के साथ दौड़ते हुए मैं ३० वर्ष पुरानी दुनियां में महसूस करता हूँ साथ ही बीपी अथवा अन्य बीमारियों से जाने कबसे निज़ात मिल चुकी है !  
  
कायाकल्प आसान नहीं है प्रभु , इसे करने के लिए दृढ निश्चयी होकर कुछ कठोर तथा अप्रिय फैसले करने ही होंगे , अगर आप रात को घर 10-11 बजे ही पंहुचते हैं तब आपको घर के गरम खाने का मोह त्यागना होगा, इसके लिए घर से सुबह ही रात का भोजन लेकर निकलें और शाम ६ बजे उसे ग्रहण करने की आदत डालें और अगर ठंडा भोजन स्वीकार नहीं तब शाम को बाजार से ताजे फल खरीदकर वहीँ कुर्सी पर बैठकर खाइये और रात के भोजन की आदत त्यागिये !

रात को १०-११ बजे तक हर हालत में सोना है , जिससे की आप सुबह ५ बजे पास के पार्क में जाकर टहल सकें , अगर दौड़ते हुए आपकी सांस फूलती है तो कृपया दौड़ना तुरंत बंद करें सिर्फ वाक् करना शुरू करें , टहलने के अंत के २ मिनट जॉगिंग अथवा तेज चलना शुरू करें और हांफने से पहले ही उसे बंद कर दें ! धीरे धीरे शरीर दौड़ने की आदत विकसित कर लेगा !

ध्यान रहे हांफना, आपके ह्रदय पर आये खतरे को बताता है , इससे मुक्ति पाने को धीमे धीमे वाक् को बढ़ाना होगा कुछ समय बाद आप देखेंगे कि हांफना समाप्त हो गया है ! यह बेहद खुशनुमा दिन होगा आपके लिए यह पहचान है आपके स्वस्थ ह्रदय की !
फेसबुक पर इस विषय पर  #healthblunders पर मेरे उपयोगी लेख हैं, कृपया उन्हें अवश्य पढ़ लें ! मेरा दावा है कि अगर ऐसा करेंगे तो आप हमेशा के लिए आपरेशन थियेटर से बच पाएंगे अन्यथा पूरे जीवन की कमाई, एक झटके में लूटने के लिए यह एयरकंडीशंड हॉस्पिटल तैयार खड़े हैं !

क्या पता भूल से दिल रुलाया कोई 
गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए !

आने वाली नसल,आलसी बन गयी
उनको हिम्मत बंधाने को भी दौड़िए !

शक्ति ,साहस,भरोसा,रहे अंत तक 
हाथ में जब समय हो, जभी दौड़िए !

always remember that Running is the best Cardio and diabetes control exercise   
सस्नेह 

Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !

Wednesday, March 5, 2014

आज रात भी साथ बैठकर,कितनी देर स्वप्न देखे थे -सतीश सक्सेना

बरसों बीते, बिछुड़े तुमसे 
जाने कब से देख न पाया 
बार बार जाकर बस्ती में  
भी दरवाजे पहुँच न पाया
लेकिन फिर भी हार गए तुम,
ओ समाज के ठेकेदारों  !
आज रात भी साथ बैठकर, मनकों की माला पोए थे !

कौन छीन पायेगा हमसे
सपने जो मन में रहते हैं ! 
कौन रोक पायेगा आंसू  
जो हँसने, में भी बहते हैं !
तुम समझे थे हमें दूर कर, 
ये अनुराग ख़त्म कर दोगे !
लेकिन कितनी बार रात में, दोनों पास पास सोये थे !

दुनिया वाले हंस कर कहते 
दीवानों को अलग कर दिया
सारी शक्ति लगाकर अपनी
अरमानों  को दूर कर दिया ! 
जलने वालों की नज़रों में,
उजड़ी आंगन की फुलवारी ! 
मगर उसी दिन हम दोनों ने, वादे साथ साथ बोये थे !

उस दिन मेले में देखा था ,
आँखों आँखों बात हो गयी !
विरह व्यथा का वर्णन करते  
मन में ही बरसात हो गयी !
जब भी चाहें तब मिलते हैं,
क्या कर लेंगे बस्ती वाले !
दुनिया भर की, ऊँच नीच  के कपडे , आंसू से धोये थे !

मन मयूर के साथ हर समय 
रहने वाले  को क्या जानो !
अंतर्मन मंदिर की भाषा ,  
सप्त पदों को क्या पहचानो !
प्यार की भाषा सीख न पाये 
कैसे हम तुमको समझाएं !
पता नहीं कितने युग बीते, प्यार की दुनिया में खोये थे !

कैसे छीनोगे तुम हमसे
जो मेरे मन में रहती है !
कैसे छीनोगे वे यादें जो 
जन्मों से लिखी हुईं हैं  !
मरते दम तक साथ न छोड़ें,
जो मन में आये कर लेना !
इतने गहरे कष्ट याद कर, फफक फफक कर हम रोये थे !

Monday, February 10, 2014

नीची नज़रों वाले अक्सर, तीखी चोटें करते हैं - सतीश सक्सेना

चंदा, सूरज, बादल ,कितना काम हमारा करते हैं !
कुदरत की ताकत बतलाने, सिर्फ इशारा करते हैं !

खुशी हमारी देख हमेशा, जलते हैं दुनिया वाले !
नज़र लगाने वाले अक्सर, नज़र उतारा करते हैं !

लड़के अक्सर ही लुट जाते चूड़ी, सुरमा, लाली से  
संवेदना, समर्पण पाकर, दिल को हारा करते हैं !

करुणा दया से रिश्ता कैसा, पथरीली चट्टानों से 
डूबते दिल को, बैठे साहिल सिर्फ निहारा करते हैं 

नज़र बचा के चलने वालों, से रहना चौकन्ने ही   
नीची नज़रों वाले , तीखी चोटें , मारा करते हैं !

Wednesday, November 6, 2013

घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे,सारे सबक जवानी के -सतीश सक्सेना

कितने मीठे से लगते थे,किस्से अपनी नानी के 
राजा रानी ही रहते थे, नायक सदा कहानी के !

किसे बताएं किस्से अपने बचपन की नादानी के
घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे, सारे सबक जवानी के !

कैसे तब हम,हुक्म अदूली, करते थानेदारों की !
सुनाके यारों को हँसते हैं,वे किस्से निगरानी के !

कैसे कैसे काम किये थे, हमने अपने बचपन में
टूटी चूड़ी, फटी चिट्ठियां,टुकड़े बचे निशानी के !

होते आये, युगों युगों से, अत्याचार स्त्रियों पर !
सुने तो हैं ,हमने भी किस्से, देवों की हैवानी के !

रात्रि जागरण,माँ की सेवा से ही,खर्चे चलते है ! 
दारू पीकर,नाच नाचकर,गाते भजन,भवानी के!

कितने नखरे महिलाओं के,अभी झेलने बाकी हैं !
गुस्सा होना,धमकी देना, थोड़े लफ्ज़ गुमानी के !

Monday, May 6, 2013

काश ! काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है दीवानों की .. -सतीश सक्सेना

ख़ामोशी का दर्द न जानों, हम फक्कड़ मस्तानों की 
कहाँ से लाओगे उजला मन आदत पड़ी बहानों की !
गंगटोक 30 मार्च 13 

हँसते हँसते सब दे डाला,अब इक जान ही बाकी है !
काश काम आ जाएँ किसी के,इच्छा है,दीवानों की !

प्यार बाँटते, दगा न करते , भीख न मांगे दुनिया से !
ज्वालामुखी मुहाने  जन्में , क्या  चिंता  अंगारों की  !

अभिशापित जीवन पाया है, क्या हमको दे पाओगे !
जाओ, जाकर, बाहर घूमो ,रौनक लगी बाजारों की  !

बंजारे  को  ख्वाब दिखाते , महलों और मेहराबों के !
बरगद तले, बसेरा काफी, मदद न लें इन प्यारों की !

Sunday, November 28, 2010

जब हम जवान थे - सतीश सक्सेना

चले सावन की मस्त बहार
हवा में उठती एक सुगंध,
कि मौसम दिल पर करता चोट
हमारे दिल में उठे हिलोर,
किन्ही सुन्दर नैनों से घायल होने का दिल करता है !

किसी चितवन की मीठी धार
किसी के ओठों की मुस्कान
ह्रदय में उठते मीठे भाव
देख के बिखरे काले केश
किसी के दिल की गहरी थाह नापने का दिल करता है !

किसी के मुख से झरता गान
घोलता कानों में मधुपान,
ह्रदय की बेचैनी , बढ़ जाए
जान कर स्वीकृति का संकेत
कहीं से लेकर मीठा दर्द, तड़पने का दिल करता है !

कहीं नूपुर की वह झंकार ,
कहीं कंगन की मीठी मार
किन्ही नयनों से छूटा तीर
ह्रदय में चोट करे, गंभीर !
कसकते दिल के गहरे घाव दिखाने का दिल करता है !

झुकाकर नयन करें संकेत ,
किसी के मौन ह्रदय की थाह
किसी को दे डालो विश्वास
कहीं पूरे कर लो अरमान !
किसी की चौखट पर अरमान लुटाने का दिल करता है !


Monday, August 16, 2010

क्या हमारा मन आज़ाद है ? - सतीश सक्सेना

सुश्री डॉ अजित गुप्ता  की हाल की एक पोस्ट पढ़ कर, लिखने के लिए ,यह विषय मिल गया ! उनका कहना है कि मन आपके व्यक्तित्व की गिरफ्त में रहता है उसे आज़ाद कैसे कराएं  ? क्या यह कभी संभव हो पायेगा  ? 
बरसों से अर्जित, बड़प्पन की चादर को लेकर जीते हम लोग, ३०-४० साल तक कई बार सोचते भी थे कि इस चादर को फ़ेंक, बेफिक्री के साथ,बिना बड़प्पन की परवाह किये, हम भी यह गाना गा पायें कि ....
दिल करदा ...ओ यारां दिलदार मेरा दिल करदा
सदियों जहाँ में हो, चर्चा हमारा ......   
मगर  शालीनता , और सर्वजन सम्मानित हम लोग चाहते हुए भी यह हिम्मत नहीं कर पाते कि झमाझम होती वारिश में अपने घर के सामने बने पार्क में छप छप करते हुए दौड़ सकें... लोग कहेंगे कि भाई साहब को अथवा मैडम को  क्या हो गया है ? 
ख़ास से आम बनने का बड़ा मन है, मगर यह जगत सम्मान का प्रभामंडल लिए हम लोग चाहते हुए भी यह बेड़ियाँ नहीं काट पाते  ....
क्या आप लोग कुछ रास्ता सुझायेंगे हम लोगों को  ?? 

Saturday, March 20, 2010

जवान कैसे रहें -१ - सतीश सक्सेना

जीवन का हर क्षण अमूल्य है, जीवन में हर क्षण का मज़ा लें ,ख़ास तौर पर उस समय और भी जब कोई अन्य आपको कष्ट देना चाह रहा हो ! मैंने अपने जीवन का कमाया धन 7० % अपने बच्चों पर, 2० % अपनों की अथवा जरूरत मंदों की मदद पर और १० % सिर्फ अपने ऊपर खर्च किया जिससे मैं अपने आपको खुश रख सकूं ! मुझे पूरा विश्वास है कि अगर मैं सानन्द हूँ तो मेरे आश्रित भी सुखी रह पायेंगे !
बचपन से मेरे पसंद का एक शेर नज़र है ...

"उम्रेदराज़ मांग के लाये थे चार दिन 
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में "

आप अपनी जिन्दगी ऐसे  न कटने दें. वाकई में हम लोग दो चार दिन ही मांग के लाये हैं , हर दिन के, हर क्षण को, हँसते हुए और मस्ती में निकालें ,चाहे कितना ही अभाव ही क्यों न हो , रोते  समय भी हंसने का बहाना ढूँढ लें  !

बचपन से याद, गोपालदास नीरज की  यह पंक्तियाँ मेरी पसंदीदा लाइनें रहीं हैं  !
"जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो मना
उन मुश्किलों  में  मुस्कराना,  धर्म है !
जब हाथ से टूटे न,  अपनी हथकड़ी 
तब मांग लो ताकत स्वयं जंजीर से 
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी 
उस दम  हंसी ले लो किसी तस्वीर से 
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो 
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है !"

उपरोक्त रचना मैंने हमेशा  गुरु मंत्र मान कर कंठस्थ किया और उसका पालन किया  ! आज भी मेरे मित्र मुझ ( सही उम्र नहीं बताऊंगा ) ३० साल के जवान को देख कर आश्चर्य चकित होते हैं !
और हाँ मैं वाकई जवान हूँ ....

Saturday, May 24, 2008

अभिशाप -सतीश सक्सेना

बरसों पहले खेल खेल 
में हुआ किसी से प्यार 
और प्यार के बदले मुझको 
दिया तुम्ही ने शाप  ! 
तुम्हारा सत्य हुआ अभिशाप 
सुनयने ग्रहण किया वह शाप 

किसको अपना दर्द सुनाऊँ 
दिल की गहरी चोट दिखाऊँ 
ज्यों ज्यों बीते समय और 
भी बढ़ता जाता घाव , 
मानिनी जीवित रहता शाप  !
सुनयने ग्रहण किया वह शाप

क्यों आयीं जीवन में मेरे 
दोष अकेला मेरा कैसे 
बारम्बार भुलाना चाहूं ,    
ना     भूले  अभिशाप   ! 
रात भर दिल दहलता शाप !

हर आँगन में प्यार तलाशूँ 
मरुस्थल में  यार तलाशूं 
आशा लेकर फिरूं भटकता 
मिले   कहीं    ना  प्यार  , 
तुम्हारा पीछा करता शाप 
सुनयने जाग्रत  है वह शाप !  

चंदा  सूरज   चाहे  हमने 
मिलके देखे सपने हमने 
मगर विधाता ने किस्मत 
में   किया  क्रूर   उपहास  , 
चैन   से  ना  रहने   दे शाप  !
सुनयने ग्रहण किया वह शाप !   
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