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Thursday, April 4, 2019

मिट्ठी का स्वागत है अपने घर में , ढेरों प्यार से -सतीश सक्सेना

अंततः इंतज़ार समाप्त हुआ , विधि, गौरव की पुत्री मिट्ठी ने, आज (3April) म्युनिक, जर्मनी में जन्म लिया और मुझे बाबा कहने वाली इस संसार में आ गयी !

मिट्ठी का स्वागत है अपने घर में , ढेरों प्यार से !
गुलमोहर ने भी बरसाए लाखों फूल गुलाल के !

नन्हें क़दमों की आहट से,दर्द न जाने कहाँ गए
नानी ,दादी ,बुआ बजायें ढोल , मंगलाचार के !

Friday, October 19, 2018

शाब्बाश बुड्ढे ! यू कैन रन - सतीश सक्सेना

मेरी उम्र के लोगों को यह कविता पसंद नहीं आएगी , इसे बेहद दोस्ताना अन्दाज़ में लिखा गया है और वे इसके आदी नहीं हैं , 50 वर्ष से ऊपर के लोग बच्चों की तरह हंसने में असहज होते हैं उन्हें सिर्फ सम्मान चाहिए और वह भी सभ्यता के साथ और जीर्ण शरीर और बुढ़ापा भी यही चाहते हैं !
यह रचना दिल्ली में हो रहे रनर्स महाकुम्भ ADHM (Airtel Delhi Half Marathon 2018 ) के अवसर पर लिखी है जिसमें मैं हाफ मैराथन में भाग ले रहा हूँ !


शाब्बाश बुड्ढे ! यू कैन रन ! 
तवा बोलता छन छन छन !

सारे जीवन काम न करके
तूने सबकी वाट लगाईं !
ढेरों चाय गटक ऑफिस में
जनता को लाइन लगवाई !
चला न जाना अस्पताल में
बेट्टा , वे पहचान गए तो
जितना माल कमाया तूने 
घुस जाएगा डायलिसिस में
बचना है तो भाग संग संग
रिदम पकड़ कर छम छम छम , 
शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

जब से उम्र दराज बने हो  
सबके आदरणीय बने हो
सारी दुनिया के पापों को
खुलके आशीर्वाद दिए हो !

इस सम्मान मान के होते
देह हिलाना भूल गए हो
पिछले दस वर्षों से दद्दू 
छड़ी पकड़ के घूम रहे हो
आलस तुझको खा जाएगा
फेंक छड़ी को रन, रन, रन , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !

साठ बरस का मतलब सीधा
साठ फीसदी ताकत कम
ह्रदय बहाए खून के आंसू
बरसे जाएँ झम झम झम
चलना फिरना छोड़ा कब से
घुटने रोते , चलते दम !
साँसें गहरी, भूल चुका है
ऑक्सीजन पहले ही कम
अभी समय है रक्ख भरोसा
गैंग बना कर धम धम धम , शाब्बाश बुड्ढे, यू कैन रन !


डायबिटीज खा रही तुझको 
ह्रदय चीखता, जाएगा मर
सीधा साधा इक इलाज है
उठ खटिया से दौड़ने चल
आधे धड़ को पैर मिले हैं
उनको खूब हिलाता चल
ताकतवर शरीर होगा फिर
मगर तभी जब, मेहनत कर
सब देखेंगे जल्द , करेंगे
दुखते घुटने, बम बम बम , शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !



Sunday, August 21, 2016

जाने कितने बरसों से यह बात सालती जाती है - सतीश सक्सेना

जैसे कल की बात रही 
हम कंचे खेला करते थे !
गेहूं चुरा के घर से लड्डू 
बर्फी,  खाया करते थे !
बड़े सवेरे दौड़ बाग़ में 
आम ढूंढते  रहते थे ! 
कहाँ गए वे संगी साथी 
बचपन जाने कहाँ गया  !
कस के मुट्ठी बाँधी फिर भी, रेत फिसलती जाती है !
इतनी जल्दी क्या सूरज को ? 
रोज शाम गहराती है !

बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के वैभव को देखा
हमने भी ,ऐयारी सीखी !

धीरे धीरे रंजिश की, कुछ बातें खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
मैली होती जाती है !

अपने चन्दा से, अभाव में 
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी 
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !   
अपनी बीमारी से लड़ते,
कदम कदम पर गिरती होंगीं !
जाने कितने बरसों से, यह बात सालती जाती है !
धीरे धीरे ही साहस की परतें 
खुलती जाती हैं !

Friday, April 22, 2016

! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना

आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है  ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !

जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!

है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !

निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि 
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !

नमस्तुभ्यं  मां शारदे,  वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !

आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !

हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !

गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Friday, March 27, 2015

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है ! - सतीश सक्सेना

आम आदमी भी कितने अरमान छिपाए बैठा है !
बुझती नज़रों में कितने, तूफ़ान छिपाए बैठा है !

धनाभाव भी तोड़ न पाया साहस बूढी सांसों का, 
सीधी साधी आँखों में अभिमान छिपाए बैठा है !

जाने पर भी, उनके कर्जे ,मर के मिटा न पाएंगे  !
अपने पुरखों के कितने,अहसान छिपाए बैठा है !

कबसे बुआ नहीं आ पायीं अपने घर में रहने को,
अपने सर पर पापा के, भुगतान छिपाए बैठा है !

आस्तीन में रहने वालों से, थोड़ा हुशियार रहें
जाने कितने बरसों के अपमान छिपाए बैठा है !

दुश्मन शांत न सोने देगा, गद्दारों का ध्यान रहे,
क्या मालूम वो कितने इत्मीनान छिपाए बैठा है !

Saturday, August 30, 2014

आखिरी फैसला - सतीश सक्सेना

"बेटा मैंने वह ऍफ़ डी  तुड़वा  कर सारे पैसे निकाल लिए तुम भी अपनी बीबी के साथ हिल स्टेशन जा सकते हो....."
 

              उसी दिन दे देते तो दोनों भाइयों के साथ ही चला जाता न  तब सबके सामने इतनी गाली गलौज  की  जरूरत नहीं पड़ती उस दिन तो दबाये बैठे रहे कि आखिरी ऍफ़ डी है ! लाइए पैसे, भाइयों को मत बोलना कि मैंने आपसे लिए हैं ! नहीं तो वह मुझसे अपना हिस्सा लड़ के ले लेंगे ! आज मन करे तो बड़े भाई के कमरे में ऐ सी चलाकर सो जाओ अच्छी नींद आएगी , मैं किसी को नहीं कहूँगा ! जीने के नीचे गर्मी ज्यादा है !

"नहीं पांच छह सालों में मेरी अब मेरी आदत पड़ गयी है , मैं यही ठीक हूँ !"

                                                  ***********
                    जैसा आपसे बात हुई थी सारे अमाउंट का चेक आपकी बैंक में जमा करा दिया गया है यह रही रसीद ! अब आप यहाँ यहाँ दस्तखत कर दीजिये मगर अब आप अकेले कैसे रहेंगे  ?

          "मैंने इस घर के सामने वाले मकान में एक कमरा किराए  पर ले लिया है , काम करने को मेरी पुरानी नौकरानी रहेगी ! इन लड़कों ने धीरे धीरे मकान के तीनो कमरे कब्ज़ा लिए , ड्राइंग रूम में मेरे सोने से घर में इन्फेक्शन फैलता था सो पिछले २ वर्ष से सीढियों के नीचे मेरी खाट डाल दी, अब यह तीनो मेरे मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ! मुझे कम पैसों की चिंता नहीं जो तुमने इस मकान के बदले दिए हैं मेरे बुढ़ापे के लिए काफी हैं ! रही बात मकान की , सो मैंने अपने पैसों से बनाया था , उसी मकान में मेरे इन लालची लड़कों ने , धीरे धीरे मुझे सीढियों के नीचे  तक पंहुचा दिया ! तुम तीनों कमरों का सारा सामान निकाल कर सड़क पर रख दो और बाहर एक चौकीदार रख दो, जब तक यह तीनों बापस आएं !"

वे तीनों आपसे लड़ेंगे बाबूजी !

"मुझे परवाह नहीं, पुलिस एस पी से मिल चूका हूँ उन्होंने मेरी रिपोर्ट दर्ज कर ली है किसी भी गलत हालत में तीनों अपनी बीबियों के साथ जेल जायेंगे,मैं अब डरता नहीं !"

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको रातों में ,रुलाता है कोई,
रोज आकर,थपथपाता है,कोई !

करवटें , रोज़  बदलता  पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी दर्द में झपकी न लगे
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँख भर आयी, तभी 
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई 

जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !

एक बच्चे से, न जाने क्या हुआ
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

Friday, July 4, 2014

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !


माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो ! 


इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे  अदा  करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !


रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !


मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ पे रखना
तेरा अता किया  , ये ईमान मुबारक हो !

Sunday, April 20, 2014

इक असंभव गीत, गाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

              अपने बचपन के उन सबसे बुरे दिनों में,जब माँ की मृत्यु हुई , मैं इतना छोटा था कि अपनी माँ का चेहरा भी याद नहीं ……
               काश एक बार वे सपने में ही दिख जाएँ ! ऐसी कौन सी भूल हुई मुझ बच्चे से, जो वे छोड़ कर हमेशा को, वहां चली गयीं जहाँ से कोई कभी बापस नहीं लौटा !! 

             यह मात्र एक रचना न होकर माँ को लिखा एक एक पत्र है,मेरा अपना, माँ के लिए …… 

माँ ,तुझे वापस , बुलाना चाहता हूँ !
इक असंभव गीत , गाना चाहता हूँ !

इक झलक तेरी, मुझे मिल जाये तो,
एक कौरा ही, खिलाना चाहता हूँ !

मुझसे हो नाराज, मत मिलना मुझे,
अपने बच्चों से, मिलाना चाहता हूँ !

जानता हो अब न तुम आ पाओगी
सिर्फ सपने में , बुलाना चाहता हूँ !

जाने कितनी बार ये, रुक -रुक बहे !
माँ, मैं आंसू को, जिताना चाहता हूँ !

देख तो लो माँ , कि बेटा है कहाँ ?
तेरा घर तुझको दिखाना चाहता हूँ !

बहुत दिन से चल रहे हैं , बिन रुके !
आज दिनकर को बिठाना चाहता हूँ !

(आज पता चला कि यह कतील शिफ़ाई की जमीन पर लिखा गया , अनजाने में ) - ३१ अगस्त १५  

Friday, March 21, 2014

रिटायरमेंट का वर्ष और अपने ही घर में वृद्ध शेरों की दुर्दशा - सतीश सक्सेना

लगता है ३० वर्ष में ही, ६० वर्ष पूरे होने का घंटा बजा दिया कि अब स्कूल बंद हो गया, आज के बाद अब यहाँ नहीं आना, फीस आदि का रिफंड के लिए चेक घर भेज दिया जाएगा ! :)

रिटायरमेंट के वर्ष में, पहला तनाव यह होता है कि फंड, ग्रेचुटी के पैसे बच्चों और बच्चों की अम्मा द्वारा झपटने से  कैसे बचाये जाएँ जिनपर इन लोगों की नज़र, पिछले सालों से टिकी है ! परिवार में बहुमत एवं असर माँ बेटे का है जो इस विषय में एकमत हैं ! मैंने रिटायरमेंट के साल अक्सर अपने साथियों को अप्रत्याशित तनाव में पाया है और वह भी अपने ही परिवार से, जिसके लिए बरसों से अपने मित्रों में, तारीफे करते नहीं अघाते थे, वे  अब यह कैसे बताएं  कि परिवार के तमाम जरूरतें, उनके रिटायर होने का इंतज़ार कर रहीं हैं !

रिटायरमेंट के समय इंसान अक्सर शेष बचे हुए, १५-२० वर्षों की सिक्यूरिटी के लिए बेहद तनाव में पाता है ! पूरे जीवन अपने परिवार के लिए, जी तोड़ मेहनत कर पालने वाले इन वृद्ध शेरों, को अपने घरों में ही उपेक्षा और हिकारत का शिकार होना पड़ता है , उन्हें यह अहसास कराया जाता है कि वे लालची हैं व उन्हें अपने बच्चों की आवश्यकताओं का ध्यान नहीं है ! 

घायल शेरनी, जो बरसों से अपने पति की बड़बड़ और अकड़ से परेशान रही है उसे यही मौक़ा सही मिलता है , बुड्ढे के कमजोर दिनों में ,सामर्थ्यवान पुत्र का साथ देकर,काफी संतोष का अनुभव करती है और वह पहले से ही टूटी कमर और असहाय अकेले व्यक्ति पर, जोरदार हमला करने का कोई मौका नहीं चूकती ! उसकी पूरी कोशिश यह रहती है कि इस बुड्ढे सरदार की, सिक्यूरिटी छीन कर, परिवार पर आश्रित कर दिया जाए इससे इसकी अकड़ भी सुधर जायेगी तथा बच्चों को पैसे भी मिल जायेंगे और फिर बेटे का दिल करे तो ठीक नहीं तो इस मरे और सड़े से इंसान का क्या करना ! :)

अफ़सोस यह है कि अक्सर पुत्र भी अपने पिता को सहयोग नहीं करते उन्हें अपनी जवानी में ही , पिता के पूरे जीवन के बचाये २०-३० लाख रूपये, उनके सपने पूरे करने, घर खरीदने अथवा कार खरीदने को मिल जाएँ, इससे अच्छा आसान साधन और कुछ नज़र नहीं आता !

इस वर्ष मैं भी रिटायर हो रहा हूँ , सामर्थ्यवान एवं पर्याप्त शक्तिशाली बच्चों के कारण मेरे जैसे भाग्यवान लोग इस दुनिया में बहुत कम ही होंगे मगर जब अपने मित्रों को देखता हूँ तो दिल दहल जाता है !  कल ऑफिस में अपने दो हमउम्र मित्रों से बात करते समय , मैंने यह फैसला किया कि इन सर्वगुण संपन्न एवं अनुभवी रिटायर शेरों को संगठित करूंगा एवं इस शक्ति का उपयोग आपस में एक दूसरे की मदद देकर करेंगे ! यह कार्य करने के लिए  "dignified lion's club" की स्थापना का संकल्प करता हूँ !

विवेक जी  से कवि दिवस पर हुई चर्चा में , उन्होंने एक बेहतरीन आयडिया, जिस पर वह काम कर रहे हैं, के बारे  बताया था कि हर शहर में वृद्धों का एक डाटा बेस तैयार किया जाएगा जिनमें उनकी आवश्यकताएं एवं सहायता देने  हेतु, उन्हीं शहरों में रहने वाले स्वयंसेवक स्वेच्छिक रूप से आगे आयेंगे  ! मेरी अपनी इच्छा, इस कार्य के लिए, ह्रदय से लगने की है जिसे अब ३० वर्ष (६० ) उम्र में मैं शुरू करना चाहता हूँ ! :) 
यहाँ मददगारों की कमीं नहीं है सिर्फ नेतृत्व चाहिए, भीड़ की भीड़ उठ खडी होगी मदद करने के लिए !!

सहायकों की कमीं नहीं है, साथ हज़ारों आयेंगे !
इन बूढ़ों की मदद के लिए हाथ हज़ारों आयेंगे !

Monday, March 17, 2014

अब तो ऐसे लोग भी होते नहीं -सतीश सक्सेना

अब तो तेरी, याद में रोते नहीं
किन्तु रातों में कभी सोते नहीं !

आइये माँ को नज़र भर देखिये 
कौन कहता है,खुदा होते नहीं !

कुछ रहीं थीं ऎसी जिम्मेदारियां
वरना रिश्तों को कभी ढोते नहीं !

क्या पता था मेरे दर पे आओगे 
वरना होली रंग, हम धोते नहीं !

कौन आशीषों को,लेने आयेगा
घर में ये दस्तूर  अब होते नहीं !

Sunday, February 16, 2014

जब देखोगे खाली कुर्सी, पापा याद बड़े आयेंगे - सतीश सक्सेना

आज अनुलता राज नायर  के पिता को श्रद्धांजलि देते हुए न जाने क्यों , अपने पिता की याद आ गयी ! सो यह

रचना पिता को समर्पित हैं , श्रद्धाश्रुओं के साथ !!

चले गए वे अपने घर से 
पर वे मन से दूर नहीं हैं !
चले गए वे इस जीवन से  
लेकिन लगते दूर नहीं हैं !
उन्हें  याद करने पर अपने, 
कंधे  हाथ रखे पाएंगे !
अपने आसपास रहने का, वे आभास दिए जायेंगे !

अब न मिलेगी पप्पी उनकी  
पर स्पर्श , तो बाकी होगा ! 
अब न मिलेगी आहट उनकी 
पर अहसास तो बाकी होगा !
कितने ताकतवर लगते थे,
वे कठिनाई के मौकों पर !
जब जब याद करेंगे उनको , हँसते हुए खड़े पाएंगे !

अपने कष्ट नही कह पाये
जब जब वे बीमार पड़े थे 
हाथ नहीं फैलाया आगे 
स्वाभिमान के धनी बड़े थे
पाई पाई बचा के कैसे, 
घर  की दीवारें  बनवाई !
जब देखेंगे खाली कुर्सी, पापा  याद बड़े आयेंगे !

तिनका तिनका जोड़ उन्होंने 
अपना घर निर्माण किया था !  
कैसे कैसे हम बच्चों को 
अपने पैरों खड़ा किया था 
हमें पता है वे सुख दुःख 
के सपनों में, जरूर आयेंगे !
हमें रास्ते प्यास लगी तो , जल से भरे घड़े पाएंगे !

उनके बचे काम को हमने 
तन मन से पूरा करना है,
उनके दायित्यों को सबने  
हंस हंसकर पूरा करना है ! 
चले गए वे बिना बताये 
पर ऐसा आभास रहेगा ! 
दुःख में हमें सहारा देने, पापा पास खड़े पाएंगे !

Saturday, October 26, 2013

काले घने, अँधेरे घेरें , धीरे धीरे अम्मा को - सतीश सक्सेना

जिन प्यारों की, ठंडी छाया 
में तुम पल कर बड़े हुए हो ! 
जिस आँचल में रहे सुरक्षित 
जग के सम्मुख खड़े हुए हो !
बढ़ती उम्र, बीमारी भारी ,
रुग्ण शरीर, स्नेही  आँखें
इनको कब से छोड़ अकेला ,
कैसे  भूले , अम्मा को ! 

घर न भूले, खेत न भूले , केवल भूले, अम्मा को !

उस सीने पर थपकी पाकर 
तुम्हें नींद आ जाती  थी !
उस उंगली को पकडे कैसे  
चाल बदल सी, जाती थी !
तुम्हें उठाने वे , पढ़ने को 
रात रात भर  जगती  थींं , 
वो ताक़त कमज़ोर दिनों में,
धोखा देती , अम्मा को !
काले  घने , अँधेरे  घेरें ,  धीरे - धीरे  , अम्मा को ! 

जिस सुंदर चेहरे को पाकर
रोते रोते  चुप हो जाते !
अगर दिखे न कुछ देरी को
रो रो कर, पागल हो जाते !
जिस कंधे पर सर को रखकर  
तुम अपने को , रक्षित पाते !
आज वे कंधे बीमारी से , 
दर्द  दे  रहे , अम्मा को  !
इकला पन अब , खाए जाता, धीरे धीरे अम्मा को !

वही पुराना , आश्रय  तेरा ,
आज बहुत बीमार हुआ है !
जिसने तुमको पाला पोसा 
पग पग को लाचार हुआ है !
जब भी चोटिल पाया तुमको  
उसकी आँखों में आंसू थे  !
रातें बीतें , करवट बदले , 
नींद न आये , अम्मा को !
कौन सहारा देगा इनको ,  नज़र न आये  अम्मा को !

कितने अरमानों से उसने
भैया तेरा व्याह रचाया !  
कितनी आशाओं से उसने 
अपना बेटा, बड़ा बनाया !
धुंधली आँखों रोते रोते
सन्नाटों  में, घुलती रहती !
कैसा शाप मिला है  भैया,
तेरे जन्म से , अम्मा को !
ब्याह रचाकर , कुछ बरसों में , भूले केवल अम्मा को !


Wednesday, October 9, 2013

दुरवाणी ही याद रहेगी यूँ आखिर -सतीश सक्सेना

"Excuse me aunty . . ." 
झूठ मूठ नाम रख लिया वाणी , दुर्वाणी हुई जा रही हो "  
यह शब्द हैं वाणी जी की लड़कियों श्रेया और श्रुति के और बोले हैं अपनी माँ से. . . .  

मैंने आज इस नोक झोंक का काफी देर आनंद लिया , और कुछ पंक्तियाँ लिख गयीं माँ और बेटियों पर , वे वाकई खुश किस्मत हैं कि उन्हें दो दो पुत्रियाँ मिलीं और वह भी लड़ाका :)
माँ बेटियों में यह स्नेहिल नोक झोंक चलती रहे , मंगलकामनाएं इस प्यारे परिवार को !

इक दिन ये घर को छोड़ जायेगी ही आखिर !

कितने दिन अम्मा पास रखेगी , यूँ अाखिर !

ये बच्चों सी , शैतानी भी,  खो जायेगी ! 
ये रूठी रूठी कब तक रहेंगी, यूँ आखिर !

इकदिन जब,इसकी डोली, इसको ढूँढेगी
ये लाड़ली अपनी कहाँ रुकेगी, यूँ आखिर !

ये आँखें, इनको यहाँ वहां, जब ढूँढेंगीं !
फिर केवल हिचकी याद करेगी यूँ आखिर !

ये प्यार बेटियों का, किसका हो पाया है , 
ये एक जगह फिर,कहाँ मिलेंगीं यूँ आखिर !

माँ की वाणी, तब याद बहुत ही आयेगी !
तब दुर्वाणी भी भली लगेगी यूँ आखिर !

हर बेटी को बस विदा एक दिन होना है,
ये सारा जीवन मस्त जियेगी यूँ आखिर ! 

Friday, September 27, 2013

पंचों से फैसला करा के ,मम्मी पापा बाँट लिए -सतीश सक्सेना

बरसों से झगडा आपस में आधा आधा बाँट लिए 
पंचों से फैसला करा के , मम्मी पापा बाँट लिए !

अम्मा के जेवर तो पहले से ही, गिरवी रक्खे थे !
स्वर्ण फूल दोनों बहुओं ने,चुप्पा चुप्पा बाँट लिए !  

एक बार आँखें खोलें तो , हस्ताक्षर करवाना है  !
दादाजी के पूरे जीवन का , अपनापा बाँट लिए !

सब चिंतित थे उनके हिस्से में जाने क्या आयेगा 
अम्मा के मैके से आये,गणपति बप्पा बाँट लिए !

आधे दरवाजे से घुसने, दो फुट जगह ही बाकी है ! 
अशुभ रोकने को दादी के हाथ के थापा बाँट लिए !

Monday, August 19, 2013

अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे हैं -सतीश सक्सेना

ऐसे ही एक भावुक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....
बेटी की विदाई के साथ ही , उसका घर, मायके में बदल जाता है , हर लड़की के लिए और उसके भाई के लिए, एक कमी सी घर में हर समय कसकती है कि कहाँ चला गया इस घर का सबसे सुंदर टुकड़ा ...फिर एक मुस्कान कि हमारी लाडो अपने घर में बहुत खुश है ...  

हम दोनों जन्मे इस घर में 
औ साथ खेल कर बड़े हुए
अपने इस घर के आंगन में  
घुटनों बल, चलकर खड़े हुए
तू विदा हुई शादी करके 
पर इतना याद इसे रखना 
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं रक्षक हूँ , तेरे घर का  !
अब रक्षा बंधन के दिन पर , घर के दरवाजे , बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था !
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घरद्वार सजाया जाता था !
होली औ दिवाली उत्सव 
में, पकवान बनाये थे हमने 
लेकिन तेरे घर से जाते ही 
सारी रौनक ही चली गयी 
राखी के प्रति , अनुराग लिए , उम्मीद लगाए बैठे हैं  ! 

पहले इस घर के आंगन में

संगीत , सुनाई पड़ता था  !
मुझको घर वापस आने पर ,
ये घर रोशन सा लगता था !
झंकार वायलिन की सुनकर
मेरे घर में उत्सव लगता था 
जब से तू जिज्जी विदा हुई 
झाँझर पायल भी रूठ गयीं  
आहट  पैरों  की, सुनने  को, हम  कान  लगाए  बैठे  हैं  !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी !
चीं चीं करती, अपनी  बातें 
सब मुझे सुनाया करती थी !
तेरे जाते ही चिड़ियों सी 
चहकार न जाने कहां गयी !
जबसे तू विदा हुई घर से , 
हम लुटे हुए से , बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं !

पहले घर के,  हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
पापा की लाई चीजों पर 
हर बात पे झगड़ा करती थी 
जबसे गुड्डे, संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए  से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
हम सब उसके आगे पीछे 
वो खूब लाडली होती थी  
तब राजमहल सा घर लगता
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी, आना छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए , उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

Friday, May 4, 2012

आओ बच्चो मिल कर के ये कसम उठानी है - सतीश सक्सेना

कल ज्योतिपर्व प्रकाशन के डिज़ाईनर अबनीश ने मेरे गीत पर काम करते करते , मुझे बताया कि उन्हें गीतों का गहरा शौक है ,एक बार पिता के कहने पर उन्होंने चार लाइने लिख कर एक मंच पर सुनाई थी , पहली लाइन "शीर्षक " सुनकर, अवनीश के अनुरोध पर यह रचना की गयी , आओ बच्चो मिलकर के इक कसम उठानी है " पर लिखी इस रचना को महसूस करें !

एक रंग है सबके अन्दर  
एक   सा  भोजन  पायें  !  
एक पिता है सबके अंदर
तब क्यों नज़र झुकाएं  !
फिर क्यों  ऊँच नीच 
समझाती,राम कहानी है !
आदि ग्रन्थ बदले स्वारथबस , यही कहानी है  !

कमजोरों को प्यार करेंगे 
साथ बैठकर  बात करेंगे 
कष्ट दूसरों का समझेंगे  !
एक  साथ खाना खायेंगे  !
और आक्रमणकारी  को  
इक  सीख  सिखानी है 
आओ बच्चो मिलकर के, इक कसम उठानी है !

अपनी माँ  की इज्ज़त जैसी 
महिलाओं की  इज्ज़त होगी 
जैसी अपनी बहिन सुरक्षित 
और सभी की करनी होगी  !
प्रथम सुरक्षा  उनकी , 
जिनकी भीत पुरानी है !
आओ बच्चों मिलकर के ,एक प्रीत जगानी है !  

थके चरण कमजोर पड़े हैं !
हम बच्चों के लिए चले हैं ,
हाथ थक गए मेहनत करते 
हमको मंजिल पर पंहुचाते  
कसम तुम्हे इन छालों की,
बस आस जगानी है !
नेह दिया, मृदु बाती  से , एक ज्योति जगानी है  !

Friday, April 13, 2012

मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा होकर बैठे हैं ! -सतीश सक्सेना

हम कैसे तुम्हें भुला पाएं
माँ जन्मे कोख तुम्हारी से
जो दूध पिलाया बचपन में ,
कैसे ऋण चुके, उधारी से
जबसे तेरा आँचल छूटा,

हम हँसना अम्मा भूल गए !
हम अब भी आंसू भरे , तुझे टकटकी लगाए बैठे हैं !

कैसे अपनों ने घात किया ?

किसने ये जख्म,लगाये हैं !
कैसे टूटे , रिश्ते -नाते ,
कैसे , ये दर्द छिपाए हैं ?
कैसे तेरे बिन  दिन बीते, 

यह तुझे बताने का दिल है !
ममता मिलने की चाह लिए, बस आस लगाये बैठे हैं !

बचपन में जब मंदिर जाता ,
कितना शिवजी से लड़ता था ?
छीने क्यों तुमने माँ, पापा
भोले से नफरत करता था !
क्यों मेरा मस्तक झुके वहां,

जिसने माँ की उंगली छीनी !
मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा  होकर  बैठे  हैं !

इक दिन सपने में तुम जैसी,
कुछ देर बैठकर चली गयी ,
हम पूरी रात जाग कर माँ ,
बस तुझे याद कर रोये थे !
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , 

तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !

एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
कुछ साथ बिताने आ जाओ
एक दिन बेटे की चोटों को
खुद अपने आप देख जाओ
कैसे लोगों संग दिन बीते ? 
यह तुम्हें   बताने बैठे  हैं !
हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

Sunday, April 8, 2012

हम लोग - सतीश सक्सेना

पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों (नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी, यह परम्पराएं होती देखीं हैं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी, सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...

और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !

              अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची (आज की नव वधु) से, जो उस समय, घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं !  

हमें अपने घर में विरोध करना आना चाहिए .... 

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