22 मई 2010 को एक प्रोग्रामर लैज़लो हनी (Laszlo Hanyecz) ने, पापा जॉन के दो पिज़्जा खरीदने के लिए 10000 bitcoin दिए थे , इन्होने सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि दो पीज़ा लायक यह डिजिटल करेंसी , सिर्फ दस साल बाद Rs 40000000000/= की होगी ,आज एक बिट कॉइन का रेट भारतीय करेंसी में 50 लाख रुपया है ! उनका पीज़ा बिल 30 $ का था और उन दिनों बिट कॉइन की कीमत एक पैनी से भी कम थी लगभग $0.003, सो उन्होंने यह बिल पेमेंट अपने डिजिटल करेंसी बैलेट से करने का फैसला किया और उन्हें डिजिटल वालेट में बेकार पड़े 10000 बिट कॉइन खर्च करने का फैसला किया और वे क्रिप्टो करेंसी इतिहास में सबसे महंगा पीज़ा खाने वाले के नाम से सुरक्षित हो गए ! विश्व का सबसे महंगा पीज़ा खाने वाला व्यक्ति को यह नहीं पता होगा कि वह खा क्या रहा है ! क्रिप्टो कैलेंडर में यह तिथि बिटकॉइन पीज़ा डे के नाम से सुरक्षित है !
बिट कॉइन , एथेरियम कॉइन या डॉग कॉइन आदि एक स्वतंत्र करेंसी है जिसके ऊपर विश्व के किसी भी देश का प्रभुत्व नहीं है ! यह एक ऐसा सिक्का जिसकी कीमत विश्व बाजार भाव निर्धारित करता है और उसे कोई भी व्यक्ति किसी भी अन्य व्यक्ति को जो उसे मान्यता देता हो , दे सकता है ! अब तक जापान , अमेरिका , फ्रांस ,जर्मनी , कनाडा , नीदरलैंड ,सिंगापुर और रूस और तमाम देश मान्यता दे चुके हैं ! भारत में कई क्रिप्टो एक्सचेंज खुल चुके हैं जिसके जरिये इसकी खरीद फरोख्त की जा सकती है , शीघ्र ही रिज़र्व बैंक भी, अपना क्रिप्टो करेंसी ज़ारी करने पर विचार कर रहा है !
क्रिप्टो कॉइन लेनदेन विश्व का सबसे सुरक्षित लेनदेन है , इसकी खरीद फरोख्त ब्लॉक चेन नामक एक नवीनतम टेक्नोलॉजी करती है जो कि अपने आप में औटोमैटिक है ! इसमें धन के लेनदेन में कोई बैंकिंग सिस्टम का उपयोग नहीं होता और टेक्नोलॉजी में सबसे कठिन मानकधारी है, शायद इसी लिए सबसे पहले मान्यता देने वालों में जापान , अमेरिका , जर्मनी जैसे विकसित राज्य आगे आये है , आने वाले समय में इसे विश्व करेंसी का दर्जा मिलेगा ऐसा इन देशों में अनुमान है !
पहले पहल मैंने बिट कॉइन का नाम शायद आठ वर्ष पहले सुना था , और आम भारतीय की तरह सरसरी नजर से पढ़कर भूल गया, 2013 में भी अगर किसी ने 10000 रूपये के बिट कॉइन खरीद लिये होते तो आज वह 2 करोड़ का मालिक था ! खरीदना आसान है , wazirx या zebpay पर रजिस्ट्रेशन कराइये , KYC पूरा करें और मनचाही क्रिप्टो खरीदें , मगर याद रहे यह धन बहुत तेजी से बढ़ता है उतनी ही तेजी से गिरता भी है , बेहतर सिलेक्शन में ही धन लगाएं और भुला दें यह सोचकर कि कहीं लुट गए और हो सकता है कुछ वर्षों बाद आपको एक दबा हुआ खजाना मिल जाए !
विश्व की पहली डिजिटल करेंसी बिटकॉइन, एक छद्मनाम सातोशी नाकामोतो नामक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने , 2008 में लांच की थी और इसकी कीमत ज़ीरो थी जो कि अगले तीन साल में बढ़कर 1$ प्रति बिट कॉइन और आजकल इसकी कीमत लगभग $50000 है ! विश्व में इतनी तेज प्रगति का यह अकेला पहलवान है सो इसको समय रहते नमस्कार करना सीख लेना चाहिए ...
ब्लॉग लेखन में कुछ सक्रियता तो आयी मगर आवश्यकता इस उत्साह को बनाये रखने की है ! हमें विस्तार से विगत का आकलन करना होगा अन्यथा कुछ दिनों में सब जोश ठंडा हो जाएगा !
फेसबुक के शुरू होने के साथ अधिकतर ने ब्लॉग लेखन बंद कर दिया इसके पीछे उन्हें कमेंट का न मिलना या कमेंट संख्या में भारी कमी थी, लोगों का अधिक ध्यान फेसबुक पर था जहाँ आसानी से लाइक और कमेंट मिल रहे थे और वे अधिक इंटरैक्टिव भी थे ! अपनी रचनाओं पर लोगों का ध्यान न देख कर निराशा और अपमान बोध जैसा महसूस हुआ और सबने अपना रुख फेसबुक की ओर कर लिया जहाँ अधिक पहचान मिलने की आशा थी !
मेरे ब्लॉग पर आने वाले कमेंट में 80 प्रतिशत की गिरावट आयी मगर मेरा लेखन इस कारण कभी कम न हुआ , ब्लॉग लेखन का उद्देश्य मेरे लेखन का संकलन मात्र रहा था मेरा विश्वास था कि इसे देर सबेर लोग पढ़ेंगे ज़रूर , इसमें बनावट से लोगों को प्रभावित करने की चेष्टा रंचमात्र भी नहीं थी ! मेरा अभी भी दृढ विश्वास है कि गूगल के दिए इस मुफ्त प्लेटफॉर्म से बेहतर और कोई प्लेटफॉर्म नहीं है जहाँ लोग अपनी रचनाये सदा के लिए सुरक्षित रख सकते हैं ! सो ब्लॉगर साथियों से अनुरोध है कि वे दिल से लिखें और क्वालिटी कंटेंट लिखें ताकि आज न सही कल आने वाली पीढ़ी उनकी अभिव्यक्ति समझे और पुरानी पीढ़ी को अपने साथ महसूस कर सके !
ब्लॉग लेखन में कोई संदेह नहीं कि टिप्पणियां जीवनदान का काम करती हैं , अगर सराहा न जाय तब बड़े बड़े कलम भी घुटनों के बल बैठते नज़र आएंगे ! मेरे शुरुआत के दिनों में उड़नतश्तरी की त्वरित टिप्पणियों का बड़ा योगदान रहा है और आज भी मैं उनका शुक्र गुज़ार हूँ, तब से अब तक 584 से अधिक रचनाएं , गद्य अथवा पद्य के रूप में ब्लॉग पर लिख चुका हूँ तथा पाठकों से 16649 टिप्पणियां एवं कुल 518380 पेज व्यू मिले हैं ! यह पाठक ही हैं जिन्होंने इन्हें मन से सराहा और उन के कारण कलम को सहारा मिलता रहा ! किसी भी रचनाकार के लिए, ध्यान से पढ़ के दिया गया कमेन्ट, प्रेरणा दायक होने के साथ साथ, उसके कार्य की समीक्षा और सुधार के लिए बेहद आवश्यक होता है , और मैं आभारी हूँ अपने उन मित्रों का जो लगातार मुझे पढ़ते रहे और उत्साह देते रहे ! इस बीच जब जब लेखन से मन उचाट हुआ इन्होने मुझे आकर जगाया और कहा कि लिखिए हमें पढ़ना है, और इन्ही मित्रों के कारण, कलम आज भी गति शील है ! साधारणतया ब्लॉग लेखन का एक उद्देश्य, अपने आपको स्थापित करने के साथ साथ, लोकप्रियता हासिल करना तो निस्संदेह रहता ही है, अपनी तारीफ़ सभी को अच्छी लगती है बशर्ते वह योग्य लोगों द्वारा पढ़ कर की जाए ! अक्सर टिप्पणियों के बदले में, लेख अथवा कविता को बिना पढ़े मिली ब्लोगर वाहवाही, अक्सर हमारे ज्ञान का बंटाधार करने को काफी है ! केवल वाहवाही की टिप्पणियां हमारे अहम् और फ़र्ज़ी प्रभामंडल को बढाने में ही सफल होती हैं चाहे हमारा लेखन कूड़ा ही क्यों न हो ! मेरा यह मानना है कि ब्लोगिंग के जरिये लेखन में विकास , भाषा के साथ साथ , मानसिकता में बदलाव भी लाने में सक्षम है जो शायद भारतीय समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
मेरे लिए ब्लॉगिंग करना हमेशा स्फूर्तिदायक रहा है, ब्लॉगिंग मेरे लिए पहले दिन से लेकर आजतक मेरे विचारों का एकमात्र संकलन स्थल रहा है और इसकी उपयोगिता मेरे लिए कभी कम नहीं हुई भले ही लोग आएं या न आएं ! शुरू से लेकर अबतक लगभग ४ पोस्ट प्रति माह लिखता रहा हूँ जो लगातार जारी रही दुखद यह है कि लोगों ने लिखना बंद कर दिया शायद इसलिए कि अब कमेंट मिलने कम हो गए ! लेखन से आपको अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का अवसर मिलता है इसपर तालियों की आशा नहीं करनी चाहिए बल्कि हर नए लेख को और अधिक ईमानदारी से लिखने का प्रयास करते रहना है !
लेखन पर कमेंट न मिलना निराशा का कारण नहीं होना चाहिए बल्कि लेखन में निखार लाने के प्रति कृतसंकल्प होना चाहिए ,निश्चित ही सतत लेखन, आपकी अभिव्यक्ति में सुधार करने में सहायक होगा !
मेरा मानना है कि आप सकारात्मक लिखते रहिये अगर आपके विचारों में , रचनात्मकता है तो लोग एक दिन आपके लेखन को अवश्य पढ़ेंगे और उसे सम्मान भी मिलेगा ! सस्नेह मंगलकामनाएं कि आपकी कलम सुनहरी हो ! #हिन्दी_ब्लॉगिंग
63 वर्ष में, मेरा यह दृढ विश्वास है कि शरीर में व्याधि या बीमारी का कोई उपचार नहीं होना चाहिए , हमारा शरीर व्याधियों को खुद ठीक करने के लिए डिजाईन है हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति इतनी जटिल एवं इतनी शक्तिशाली होती है कि किसी भी शरीर को लगभग 100 वर्ष तक जीवित रखने में समर्थ है , यही नहीं, इसको मजबूत बनाये रखने के लिए किसी भी प्रकार के विशेष, मंहगे , दुर्लभ भोजन, टॉनिक, विटामिन की जरूरत नहीं होती केवल सामान्य हवा, जल, प्राकृतिक भोजन एवं शरीर को एक्टिव रखने के लिए थोड़ा बहुत दौड़ना या पसीना निकलने वाला काम करना आवश्यक है ! जानवरों का दूध उनके बच्चों के लिए है वह इंसानों के लिए नहीं है , माँ का दूध सूखने के साथ ही दांत निकलने की क्रिया पर, शक्तिशाली आरामपसंद मानव ने ध्यान दिया होता तो जानवरों का दूध पीना आवश्यक नहीं मानता !
शरीर का सबसे अधिक सत्यानाश मेडिकल प्रयोगों और "रोग" टेस्टिंग सिस्टम ने किया है , जिसके द्वारा मानव अपने शरीर में हो रहीं सामान्य स्वाभाविक क्रिया प्रतिक्रिया को , बीमारी समझकर उसमें अनावश्यक घुसपैठ करने की कोशिश करता है नतीज़ा शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना होता है इससे मानव को स्वस्थ होने में और अधिक समय लगता है ! जटिल मानव शरीर के बारे में हम आजतक जितना भी जान पाये वह शतांश भी नहीं है , उसके बावजूद मेडिकल बिजिनिस शतप्रतिशत अस्वस्थता को सही करने का दावा करता है एवं हम पढ़े लिखे संभावित मौत से भयभीत जाहिल मानव, आंख बंद कर मेडिकल अडवेर्टाइज़्मेंट को अप्रूव करते चले जाते हैं ! पिछले चार सौ वर्षों में मेडिकल साइंस के प्रयोगों ने जितने मानवों की जान ली वह पूरे विश्व की लड़ाइयों और युद्धों से कई गुना ज्यादा है !
63 वर्ष,शक्ति 30 वर्ष की,मेडिकल साइंस नहीं मानेगा
अफ़सोस कि ऐसा कोई कानून, कहीं नहीं बना जिसमे इन मेडिकल शैतानों को फांसी हो कि इनकी बुरी जानकारी एवं दवा बेंचने की जल्दी होते , लाखो इंसान इन पर गलत भरोसा करते हुए, अपनी जान गवां बैठे ! बढे हुए कोलेस्ट्रॉल की दवाएं बरसों से पूरा विश्व खाता रहा , और इसके होते, हजारों ऑपरेशन किये गए अब जाकर पता चला कि ह्रदय रोग से इसका कोई सम्बन्ध ही नहीं है ! एड्स और कैंसर इसके अन्य उदाहरण हैं , कुछ वर्ष पहले एड्स का अंधाधुंध प्रचार किया गया ऐसा लगा कि पूरा विश्व खतरे में हैं , अफ्रीकन देश तो शायद मनावरहित ही हो जाएंगे , मगर अब सब कुछ शांत है , इसी प्रकार कैंसर के बेकाबू टिश्यू को काबू करने के लिए हमारी प्रतिरक्षा शक्ति उसको एक मजबूत जैली से जकड कर काबू कर लेता है जिसे मेडिकल बिजिनिस, ट्यूमर का नाम देता है ! अगर इन्हें न काटा जाय तो शरीर की प्रतिरोधक शक्ति इसका उपचार कर, शमन करने में कामयाब रहती है ! भारतीय गाँवों कस्बों में हजारों लोग इन ट्यूमर्स के साथ , बरसों से सामान्य काम कर रहे हैं , वे बिलकुल ठीक इसी लिए हैं कि उनकी पंहुच किसी ऑपरेशन थियेटर तक नहीं है और वे मर चुके जिनके भयभीत घर वालों को मेडिकल इंस्टिट्यूट वालों ने बुरी तरह डरा दिया , भयभीत मानव , के मन में यह बैठा दिया है कि कैंसर असाध्य है और अब वह कुछ वर्ष का मेहमान है , बचा खुचा काम इनका ऑपरेशन , जहरीली दवाएं एवं इलाज में लगातार धन की होती कमी कर देती है !
इन तथाकथित असाध्य बीमारियों का इन अस्पतालों के पास एक ही इलाज है अधिक से अधिक धन उस पीड़ित व्यक्ति से छीन कर उस डरे हुए व्यक्ति के शरीर में जबरन जहरीले मेडिकल साधन पंहुचाये जाएँ जबकि प्राकृतिक साधन आसान है कि वह इस बीमारी को निर्भय होकर भुला दे व अपना ध्यान बिना डरे अन्य आवश्यक कार्यों में लगाए जो उसे पूरे करने हैं , रोज प्राणायाम पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर अपनी आत्मिक शक्ति का आवाहन करे कि इस अस्वस्थ स्थिति से मैं बाहर निकल रहा हूँ मेरा शरीर और मेरी आत्मा बेहद वलिष्ठ है , इन शक्तिशाली विचारों से अपने आपको हर वक्त घेर कर रखे, शीघ्र देखेगा कि इन पोजीटिव विचारों की ताकत से उस बीमारी का नाम भी नहीं बचेगा !
लगभग २० वर्ष से हर जाड़े में, मुझे लगातार क्रोनिक खांसी के साथ खून आता था , थोड़ा सा बोलते ही आवाज बैठ जाती थी ! सरे निशान कैंसर के थे , दो बार ह्रदय की पल्पिटेशन 300-400 हुई थी पारिवारिक मित्र डॉ ने तुरंत हॉस्पिटल ले जाने को कहा मगर मैं आई सी यू के बेड से भाग आया और रिटायर मेंट के बाद बढे हुए बीपी के साथ दौड़ने की ट्रेनिंग लेनी शुरू की और मैंने न केवल इन बीमारियों को भगाने में सफलता प्राप्त की बल्कि 63 वर्ष की उम्र में 4 लीटर पसीना बहाते हुए, 21 किलोमीटर आराम से भागता हूँ !
अगर आप आलसी हो गए हैं तो यकीन मानिए आपका शरीर खतरे में है , शरीर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए , पसीना बहना, नियमित आवश्यक क्रिया है अगर आप दिन भर कुर्सी पर या कार में रहते हैं , और शरीर को निष्क्रिय कर रखा है तो आप बीमारियों के शिकार अवश्य होंगे उनका नाम दमा , खांसी , बीपी , डायबिटीज , हार्ट अटैक अथवा कैंसर कुछ भी हो सकता है !
अगर आप इनसे जकड़े हुए हैं और पछतावा है तब उठे कल से शरीर को बिना जल्दबाजी, धीरे धीरे चलने की आदत डालना शुरू करें ! छह महीने में कायाकल्प शुरू होगा और आपके शरीर के सारे अवयब फुर्तीले होकर इन बीमारियों से एक जुट होकर लड़ पाएंगे एवं वे निस्संदेह जीतेंगे !
हमारी निम्न दवाओं के नाम याद रखिये आप स्वस्थ ही नहीं रहेंगे बल्कि जीवन को 10 वर्ष और बढ़ा पाएंगे :
-विश्वास अपनी आत्मिक प्रतिरक्षा शक्ति पर
-मुस्कान एवं हँसी
-खाने के लिए सामान्य प्राकृतिक भोजन
-बार बार खूब जल पीना
-एक घंटा रोज धीमे धीमें दौड़ते हुए शुद्ध हवा का आनंद जिससे शरीर कोर के आलसी अवयवों में फुर्ती आये
-सकारात्मक सोंच कि मुझे कुछ नहीं हो सकता , मरना मेरी इच्छा पर होगा !
यकीनन बुढापा दिमागी फितूर है , बड़प्पन का फितूर , लोग क्या कहेंगे का फितूर , अब हमारी उम्र हो गयी , का असर और कुछ नहीं , इसे नकारिये और पूरे जीवन स्वस्थ रहिये !
पूरा जीवन रोटी, कपड़ा, मकान , बच्चों की चिंता , पढ़ाई , भविष्य और बाद में उनकी शादी में ही निकल गया , शायद अपने लिए हंसने का भी समय नहीं मिला और जब इनसे निवृत्त हुए तो पता चला बाल सफ़ेद होने लगे लोग हमें बूढा समझने लगे हैं , हमारा आँगन नयी पीढ़ी ने कब का हथिया लिया , जिम्मेदारियों के बोझ तले पता ही नहीं चल पाया !
2014 में रिटायर होते समय ही फैसला कर किया था कि अब अपने लिए समय देना है , वे सारे काम करूँगा जो मन में दबे रह गए और पूरे नहीं कर पाया ! बच्चों की तरह खेलना , सुबह सुबह जाड़ों में शार्ट बनियान पहनकर दौड़ना , मुक्त मन हंसना , विश्व भ्रमण , गाना गाना , तबला बजाना , ड्रमर बनना , मोटरसाइकिल पर लंबी दूरियां तय करना , निर्जन पहाड़ियों में फोटोग्राफी करना आदि सपने पूरा करने का सबसे बेहतरीन समय यही था ! मगर इन सपनों को पूरा करने में एक बाधा थी सही और बढ़िया स्वस्थ बलिष्ठ शरीर नहीं था मेरे पास , पूरे चालीस वर्षों से आराम भोगता, ढीली ढाली मांसपेशियों वाला शरीर, एयरकंडीशंड माहौल का आदी हो चुका था पैरों को चलने की आदत ही नहीं थी वे सिर्फ गाड़ी से उतर कर माल में एक दिन घूमने में थक जाते थे ! पेट इतना बड़ा हो चुका था कि जमीन पर उकड़ूं बैठना एक प्रोजेक्ट लगता था , रात भर पेट में भरी गैस और एसिडिटी के कारण नींद नहीं आती थी उसपर ब्लड प्रेशर बढ़ कर 160/100 को छूने लगा था ! दो मंजिल सीढियां चढ़ने में बुरी तरह हांफना सामान्य हो गया था ! कितने ही मित्र और परिचित इस मध्य हार्ट अटैक के शिकार होकर या तो चले गए थे अथवा ऑपरेशन में जीवन भर की कमाई लगाकर बीमारों की भांति घिसट घिसट कर रोज आसन्न मृत्युभय के साथ जी रहे थे ! मैंने जीवन भर हार का मुंह नहीं देखा था अतः 60 वर्ष बाद स्वास्थ्य को ठीक निश्चय किया, इन दिनों मानव जाति को स्वस्थ रखने का झांसा देते मेडिकल व्यापारी आगे आकर सफल हो चुके थे , उनके अडवेर्टाइजमेंट इस हद तक सफल हो चुके थे कि उनके प्रोडक्ट , अस्वस्थता के साथ , दवा नाम से हर भयभीत मानव के साथ लिपट चुके थे ! किसी की अस्वस्थता में मिलने वालों का सबसे पहला प्रश्न, दवा ले आये ? पूंछना होता था , और यह हाल लगभग पूरे विश्व में था देश चाहे अविकसित हो या विकसित , मेडिकल व्यापार ने मानों पूरे मानवों को स्वस्थ रखने का ठेका ले लिया था , यह जानकर भयभीत मानवों की बुद्धि पर तरस आता था कि मानव मृत्य भय से, बुद्धि का प्रयोग बिना किये व्यापारियों के जाल में आसानी से कैसे फंस जाता है ! शायद ही किसी मानव ने इन निरर्थक जहरीली दवाओं के फायदे पर ध्यान दिया होगा कि आजतक यह तथाकथित मेडिकल साइंस अमेरिका के एक भी राष्ट्रपति या धनवान अरबपति की उम्र एक वर्ष भी बढ़ा नहीं सका , इसमें किसी भी बीमारी का इलाज़ होता तो संसार के अरबपति आज सबसे अधिक जवान दिखते ,यह साइंस के नाम पर सिर्फ धोखा है इस विश्वास के साथ आजतक मैंने एलोपैथिक मेडिसिन का बहिष्कार किया हुआ था !
मेरे शरीर के अंदर उपस्थित वाइटल फाॅर्स बेहद ताकतवर है और वह अकेली ही मेरे शरीर को स्वस्थ रखने की शक्ति रखती है और यही उसका काम भी है , इस विश्वास के साथ मैंने अपने शरीर का पुनर्निर्माण करने का संकल्प लिया और सबसे पहले बॉडी कोर जिसमें हार्ट, फेफड़े, किडनी, लिवर, पेन्क्रियास एवं डायजेस्टिव सिस्टम शामिल थे, को शक्ति देने का फैसला किया और यह काम रनिंग से बेहतर कोई नहीं कर सकता था !
और मैंने यह काम सिर्फ 15 सितम्बर 2015 से शुरू करके फरबरी 2017 तक के समय में पूरा करने में सफलता प्राप्त कर ली , आज शरीर में 25 वर्षीय जवान की फुर्ती है जिसे शायद ही कोई मेडिकल व्यापारी स्वीकार करेगा और इसके लिए मैंने कोई गोली , विटामिन , पौष्टिक भोजन , जूस और दूध के बिना ही किया है ! इस बीच मैंने साधारण रोटी और भोजन लिया और कुछ नहीं , और मेरी वाइटल फाॅर्स ने अपनी शक्ति का सबूत देकर मेरे विश्वास की रक्षा की है ! भय रहित मानव मन किसी भी बीमारी को सही कर सकता है इसमें कोई संदेह नहीं !
इंडियागेट के खुशगवार माहौल में कल की हॉफ मैराथन से पहले, आज एक आसान रन पूरा किया , मेरे पिछले माह किये गए
संकल्प अनुसार इस माह, हर सप्ताह एक हॉफ मैराथन करने के बाद, सात सप्ताह में सात हॉफ मैराथन रन पूरे हो जाएंगे ! 2015 में जहाँ एक हॉफ मैराथन ( 21 Km ) की तैयारी में 3 माह और उसके बाद 15 दिन पैरों की थकान मिटाने में लगते थे वहीँ अब बिना थकान हर शनिवार 21 किलोमीटर दौड़ता हूँ एवं सप्ताह में एवरेज रनिंग 40 किलोमीटर की होती है ! अब रनिंग में वह आनंद आता है जिसे मस्ती कहते हैं , आज इंडियागेट पर दौड़ते हुए जो गाना गा रहा था उसे सुने ....
आज को पोस्ट बेहद महत्वपूर्ण है उनके लिए जो इसे ध्यान से पढ़ें और मनन कर समझ सकें हो सकता है यह उनके जीवन में एक नया अध्याय ही खोल दे , विषय सामान्य है शायद सभी जानते होंगे मगर शायद ही किसी ने इसपर कभी ध्यान दिया हो ! मेरा यह दृढ विश्वास है कि मानव शरीर लगभग 100 वर्ष जीने के लिए डिज़ायन किया हुआ है , और इसके लिए इसे किसी दवा, गोली या डॉक्टर की आवश्यकता नहीं होती बशर्ते हम इसके साथ अत्याचार न करें ! मानव लगभग एक लाख वर्ष से इस धरती पर है और इसने लगभग दस हज़ार वर्ष पहले सामाजिक ढर्रे में जीने का प्रयत्न शुरू कर दिया था ! उस वक्त हम लोग पानी के किनारे किसी गुफा में छिपकर रहना सीखे थे , जहाँ रोज भोजन के इंतज़ाम के लिए लगभग 10 किलोमीटर रोज शिकार के पीछे दौड़ना अथवा खूंखार जानवरों से जान बचाने के लिए भागना पड़ता था तब कहीं परिवार के लिए एक दिन के खाने का इंतज़ाम हो पाता था इसप्रकार उन दिनों पैरों का ,शरीर में लगभग पचास प्रतिशत हिस्सा होने की तरह, उनका योगदान जीवन रक्षा में लगभग इतना ही था ! आधा दिन दौड़ते रहने से human core की, जिसमें शरीर के महत्वपूर्ण अवयव थे, न केवल बेहतरीन एक्सरसाइज हो जाती थी बल्कि मसल्स भी खासे बलिष्ठ व कसे होते थे ! हमारे पास मजबूत हाथ पैरों के साथ साथ, अन्य जीवों की तुलना में अधिक समझदार मानवीय मस्तिष्क, ने हमें अजेय बनाया था और हम जंगल में सबसे शक्तिशाली भी माने जाते थे ! आज हमने, अपने आलसी मन और स्वभाव के कारण , परिश्रम के शॉर्टकट तलाश कर लिए, नतीजा हमारा मजबूत बदन दयनीय हो गया है , आज के इंसान के पीछे अगर कुत्ता भी भागे तो वह बचने के प्रयत्न में निश्चित ही जमीन पर मुंह के बल गिरा नजर आएगा क्योंकि उसके हाथ और पैरों में वह शक्ति नहीं बची जिसके लिए वह मशहूर था !
इस कमजोरी के फलस्वरूप मानव में अपने जीवन रक्षा के लिए भय का संचार हुआ फलस्वरूप मेडिकल बिजिनिस की शुरुआत हुई ! आज मेडिकल साइंस की तथाकथित कामयाबी पर फूल कर कुप्पा होते मानव को शायद यह सोंचने की भी फुरसत नहीं कि आज भी मानव संरचना और जटिल मस्तिष्क के बारे में मेडिकल साइंस को एक प्रतिशत भी जानकारी नहीं है अन्यथा कबका कृत्रिम मानव निर्माण हो चुका होता ! हर शारीरिक प्रतिक्रिया बुखार , खांसी , जुकाम जैसी सामान्य मानवीय प्रतिक्रियाओं (जो कि वास्तव में मानव प्रतिरक्षा शक्ति द्वारा चलाये गए जीवाणु संक्रमण के आंतरिक उपचार मात्र हैं ) को जिसे मानव, बीमारी का नाम देता है, भयवश समाप्त करने के लिए , एंटी बायोटिक्स और खतरनाक स्टीरॉइड्स का प्रयोग किया जाता है , जिसके जहरीले असर से लड़ते लड़ते मजबूत मानवीय रक्षा तंत्र बेकार हो जाता है ! मानवरक्षा के लिए शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र हमेशा मजबूत और चौकन्ना रहा है, कोई भी बाहरी आक्रमण , गोली , घाव , या आंतरिक व्यवधान जैसे अनियंत्रित टिश्यू बढ़वार को इसी प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा प्रभावी तौर पर निष्क्रिय किया जाता रहा है और उसके लिए किसी डॉ की या ऑपरेशन की आवश्यकता, शरीर को नहीं पड़ती , हजारो सैनिकों के शरीर में युद्ध के समय घुसी जहरीली गोलियों के चारो और एक ऐसा मजबूत टिश्यू आवरण लपेट दिया जाता है जिसे भेदकर वह जहर अथवा अनियंत्रित टिश्यू का गुच्छा ( कैंसर ) बाहर निकल ही न सके ! लाखों लोग जिनपर मेडिकल बिजिनिस की नजर नहीं पड़ी , आज भी बड़े बड़े ट्यूमर लेकर जिन्दा ही नहीं हैं बल्कि अपने सारे कार्य आसानी से कर रहे हैं , मारा वह गया जो घबराकर इन्हें चेक कराने डॉ के पास पंहुच गया और ऑपरेशन से शरीर प्रतिरक्षा शक्ति द्वारा किये गए इस प्रयास को काट कर फेंक दिया गया ! मैंने रिटायर होने के बाद नयी नौकरी ज्वाइन करने की न सोंच अपने शरीर की इस शक्ति को परखने का निश्चय किया और संकल्प लिया कि पुराणों में लिखी गयी भीष्म पितामह की शक्ति प्राप्त क्यों न करूँ कि जब चाहूँ तब मरुँ ..... मैंने अपने पूरे जीवन में कभी व्यायाम , स्कूल में पीटी आदि तक कभी नहीं की , मैंने अपने शरीर की इस प्रकृति प्रदत्त शक्ति को परखने का निश्चय किया और तमाम बीमारियों ( बढ़ा कोलस्ट्रोल, ब्लड प्रेशर , क्रोनिक खांसी, ब्रोंकाइटिस, खराब फेफड़े , क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन, कमजोर आँखे, स्पोंडिलायटिस, मानसिक तनाव एवं कमजोर हड्डियों के साथ दिल्ली की प्रदूषित हवा में रहते हुए , बिना किसी टॉनिक और बेहतरीन भोजन के अपने बीमार कमजोर शरीर की कायाकल्प करने में सफलता प्राप्त की ! पहली बार जब भागने गया था तब मुझे याद है कि 500 मीटर वाक् और 30 मीटर जॉगिंग कर पाता था , मगर मन में दृढ संकल्प लिया था कि मैंने एक वर्ष के अंदर स्वेटर जैकेट के बिना सिर्फ बनियान में कड़ाके की ठण्ड में कम से कम 2 km दौड़ना है और मैं सफल रहा मानवीय शरीर वाकई बेहद ताकतवर सिद्ध हुआ , सिर्फ स्वच्छ हवा को अंदर बाहर निकालते हुए बंद फेफड़े पूरे खोलने में सफल ही नहीं रहा , दौड़ते हुए पेट के अंदर, अवस्थित शरीर के महत्वपूर्ण अंग, बेहतरीन तौर पर दौड़ने से एक्टिव हो गए , लगा जैसे 25 वर्ष का जीवन दुबारा पा लिया हो ! सबसे महत्वपूर्ण तथ्य याद रखें , डरना नहीं है , बिना डरे हुए अपनी जीवनीशक्ति पर विश्वास करें कि वे जियेंगे और कायाकल्प कर जवानों की भांति जियेंगे, इसके लिए सिर्फ हंसना , हवा , जल और प्राकृतिक भोजन काफी है हमारा जीवन बदलने के लिए , दवाओं पर निर्भरता हमारे शरीर की शक्ति को कमजोर बनाता है , हमें सिर्फ अपनी शारीरिक शक्ति पर भरोसा करना है ! एकबार ठान लें कि मैं यह कर सकता हूँ , मैं स्वस्थ हूँ और रहूँगा , अपने आपको कभी नेगेटिव सलाह न दें , बुढापा या वृद्धावस्था कुछ नहीं होती है , इसे नकारें आपमें उत्साह बना रहना चाहिए जिस दिन नयी रुचियां अथवा उत्साह समाप्त हुआ समझिये बुढापा आ गया ! उम्र बढ़ने के साथ हम इनएक्टिव होते जाते हैं , हमारे हड्डियों के जॉइंट्स , दांत अथवा घुटने उपयोग न करने के कारण कमजोर होते जाते हैं , मैंने इन सबका उपयोग करते हुए इन्हें वृद्धावस्था में सक्रिय कर दिया और यह मजबूत हो गए किसी भी नौजवान की तरह ! अपनी शक्ति पर भरोसा होने के कारण मुझे शरीर की किसी शक्ति का क्षरण महसूस आज तक नहीं हुआ ! आप अपने शरीर को दौड़ना सिखाएं , ध्यान रखिये यह काम धीरे धीरे ही सिखाना है अन्यथा शरीर इसे रिजेक्ट कर देगा , शुरू में शरीर की सामर्थ्य के हिसाब से ही उसे मेहनत कराना शुरू करें , जबरदस्ती न करें हाँ विश्वास बनाये रखें कि मैं यह कर सकता हूँ , जल्द देखेंगे कि वाकई आपके शरीर ने यह कर दिखाया ! स्वच्छ हवा में उपलब्ध ऑक्सीजन रनिंग या वाक् के समय फेफड़ों के प्रदूषण को दूर करते हुए खून को पतला व अधिक शक्तिशाली बनाती है, जिससे ह्रदय रोग व् डायबेटीज़ का भयावह ख़तरा समाप्त होगा !
-रनिंग से डरने वाले यह जान लें कि मैंने अपने जीवन की रनिंग सीखने की शुरुआत अपना बीपी, हार्ट पल्पिटेशन, कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए 61 वर्ष की उम्र में शुरू की थी , इससे पूर्व मैंने विद्यार्थी जीवन में भी रनिंग नहीं की !
- आज मैं 62 वर्ष की उम्र में लगातार बिना रुके 21 km तक दौड़ता हूँ , और तमाम बीमारिया गायब हो चुकी हैं !
-अगर रनिंग का पहला कदम बढ़ाने की हिम्मत आज आप में आयी है तो यह विश्वास रखिये कि अगले दो तीन महीने में आप 5 km दौड़ रहे होंगे ! -रनिंग और वाक में फर्क है कि रनिंग के समय आपके हर गिरते कदम पर बॉडी का तीन गुना वजन पड़ता है और यह तमाम वजन आपकी हड्डियां और मसल्स सँभालते हैं , अगर आप नौसिखिये हैं शुरुआत में आपको सावधान रहना पड़ेगा कि शरीर पर एक साथ प्रेशर न पड़े , आपका शरीर धीरे धीरे हर आदत को स्वीकार करने को तैयार होगा बशर्ते आप उसके साथ जबरदस्ती न करें ! -शुरुआत में चार मिनट वाक के बाद एक मिनट रनिंग , या लगातार आधा घंटा वाक समाप्त करने के बाद 2 मिनट की रनिंग बिना हांफे , रनिंग की स्पीड और समय धीरे धीरे ही बढ़ाना है अगर आप इन दो मिनट में दौड़ते समय बात कर पा रहे हैं तब आप ठीक भाग रहे हैं बिना अपना बीपी बढाए, यह सबसे पहला मंत्र है ! - वाकिंग/रनिंग से पहले और बाद में 5-10 मिनट व्यायाम कर, स्ट्रेचिंग अवश्य करें , यह बेहद आवश्यक है , जो व्यायाम आवश्यक हैं उनमें body weight squats, pushup, lunges एवं planks उपयोगी हैं ! थकी हुई मसल्स को यह व्यायाम रिलैक्स देते हैं और मसल्स इंजरी का खतरा काम हो जाता है ! -हर रनर के लिए पानी बेहद आवश्यक होता है , डिहाइड्रेशन होने की स्थिति में आप मसल्स इंजुरी को आमंत्रित कर रहे हैं यह ध्यान रहे - हमेशा हलके और आरामदेह जूते पहनकर दौड़ते समय पैरों की पोजिशन का ध्यान रहे , गड्ढे या ऊबड़खाबड़ रास्ते आपको जख्मी कर सकते हैं -अगर जीपीएस वाच न हो तब strava या endomondo नामक app अपने स्मार्टफोन में इंसटाल कर लें यह जीपीएस सिस्टम के जरिये दौड़ते समय आपकी लोकेशन एवं समय रिकॉर्ड करता है ताकि बाद में आप एनालिसिस कर सकें -दौड़ते समय पानी की 300 ml की पानी की बोटल हाथ में लेकर गला सूखने की स्थित में सिप ले कर अपने को सहज रखें -दौड़ते समय स्पीड बिलकुल न बढ़ाएं सिर्फ सहज भाव से जॉगिंग करें , शरीर को धीरे धीरे अभ्यस्त बनाएं
मानवीय शक्ति अपरिमित है और हम उसका अपने मस्तिष्क की तरह शतांश भी उपयोग नहीं करते , अक्सर 40 वर्ष का होते होते अपने आपको समझाना शुरू कर देते हैं कि चढ़ना नहीं, दौड़ना नहीं , गिर जाओगे ! असुरक्षा इस कदर होती है कि शरीर को , दांतों को , मजबूत बनाने के लिए तुरंत डॉक्टर की शरण में भागते हैं बिना सोंचे कि न केवल हम अपने बेहद मजबूत शरीर , जो बिना दवा के 90 वर्ष के लिए डिजाइन है, को न केवल केमिकल जहर दे रहे हैं बल्कि दवा विक्रेताओं के निर्मम और निर्दयी उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे अधिक मानव शरीर का नुकसान, विश्व में किसी ने नहीं किया है !
मैं जब भी सामान्य रोगों में एलोपैथिक दवा खाते किसी व्यक्ति को देखता हूँ तब मुझे उसके शरीर की सुरक्षा शक्ति की स्पष्ट चीत्कार सुनाई देती है , हमारा शरीर लंबे समय जीने के लिए डिज़ाइन है , जिसमें हर बीमारी का उपचार करने के लिए शक्तिशाली रोग प्रतिरोधक शक्ति निहित है जो कि संक्रमण होने पर शरीर में तुरंत सक्रिय हो जाती है और उसके एक्शन को मानव विभिन्न रूपों में जैसे प्यास,पसीना, बुखार, जुकाम ,खांसी,बीपी, गांठे, खुजली, आदि के रूप में अनुभव करता है और अगर ऐसा न होता तो लाखों वर्ष की मानव यात्रा यहाँ तक पंहुचती ही नहीं इसकी रक्षा के लिए मेडिकल व्यवसाय कुछ ही वर्षों से है !
शक्तिशाली धनवान मेडिकल व्यवसाय की मेहरबानी है कि हम शरीर की प्राकृतिक रोगनाशक शक्ति के हर आवश्यक उत्पन्न प्रतिक्रिया (बुखार , गांठे आदि ) से भयभीत होकर उसे गोलियां खाकर अथवा ऑपरेशन कराकर बेकार कर देते हैं और अपने ताकतवर शरीर को एक शक्तिशाली भयानक जकड़न के हवाले कर देते हैं जिसका इलाज मानव प्रदत्त उपचार मात्र है ! ऐसा करते हम भूल जाते हैं कि हम मानव शरीर के जटिल रक्षातंत्र को, अपने अविकसित मस्तिष्क ( ढाई प्रतिशत ) द्वारा निर्दयता पूर्वक बर्वाद कर रहे हैं ..... कैंसर की गांठों के ऑपरेशन एक सामान्य उदाहरण है , जिसे हमारे शरीर ने रोक लिया था और हमने उसे कटवाकर मुक्त दिया !
मानव शरीर की इस रक्षा शक्ति के दो उदाहरण देने आवश्यक हैं यहाँ ...... पंजाब के एक दबंग किसान को उसके दुश्मनों ने रात को जंगल में पकड़कर उसके दोनों हाथ और दोनों पैर काट डाले थे , डॉक्टरों को आश्चर्य था कि उसका खून नहीं बहा था , क्योंकि उसके मन में हाथ पैर कटते समय भय न होकर, उन लोगों से बदला लेने की भावना इतनी प्रबल थी कि उसकी सुरक्षा शक्ति ने उसका खून नहीं बहने दिया और वह जीवित बच गया ! जीवित रहने की प्रबल भावना के कारण ही उसकी प्रतिरोधक शक्ति ने उसकी रक्षा की !
हमारे देश में ही ऐसे कितने ही फौजी मिल जाएंगे जिनके शरीर में लगीं दसियों गोलियों में से डॉक्टरों द्वारा खतरनाक गोलियां ही निकाली जा सकीं बाकी शरीर में ही छोड़ दी गयीं , जहरीले लेड से बनीं गोलियों के चारो ओर शरीर की प्रतिरोधक शक्ति, एक जैली जैसा मजबूत कवच चढ़ा देती है जिसके अंदर से कोई भी इंफेक्शन , इन्फेक्टेड टिश्यू अथवा , जहर बाहर नहीं आ सकता मगर आज हम सबसे पहले इन सुरक्षा करती गांठों को काट कर निकाल देते हैं !
आश्चर्य जनक धूर्तता यह है कि हमारे पाठ्यक्रम में शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता या हम ( मेडिकल व्यापारी ) पढ़ाना ही नहीं चाहते अन्यथा उनका पूरा व्यवसाय ही नष्ट हो जाने का खतरा है !
आज मैं बहुत थक गया हूँ , इस उम्र में अब यह हमारे काम नहीं , कभी हम भी मोटर साइकिल चलाते थे , जैसे वाक्य हमारी मजबूत आत्मिक शक्ति को कमजोर मानने के लिए मजबूर कर देते हैं ! ऐसे शब्दों का उपयोग की जगह कहना यही चाहिए कि मैं भी यह कर सकता हूँ और नौजवानों से अधिक बेहतर कर सकता हूँ क्योंकि मैं उनसे अधिक अनुभवी हूँ ! अपने शरीर की शक्ति पर विश्वास करें यह आपको शर्मिंदा नहीं होने देगी !
अपने ऊपर विश्वास पैदा करें कि आप यह कर सकते हैं !! सो आप कायाकल्प आसानी से कर सकते हैं !
@मेरा रक्तचाप असहज है। ये शर्मनाक है मेरे लिए। मूर्ख हूं मैं। संसार को ठीक होने की नसीहतें बकता रहता हूं लेकिन खुद के प्रति लापरवाही करता हूं। ये निपट चूतियापा है।
मेरी जरूरत है मुझे और हमारे अपनों को। जैसे मुझे जरूरत है उनकी तो... पहली शर्त कि सब ठीक रखने की जरूरत है। केवल मन ही नहीं तन और धन भी। ... तो जय हो! अब बस! बहुत हुआ.... बहुत हुई लापरवाही और बहाने, टाला जाना। तंग आ गया हूं मैं खुद से। अब और नहीं। ये धोखा है, खुद से, अपनों से, उनसे जो आपसे प्यार करते हैं। ये सही नहीं है। ...आप मुझे सुधारने में मेरी मदद करें प्लीज। लताड़िए मुझे। ********************************************************* ये हैं कृष्ण आनंद चौधरी के ये सहज शब्द जो बिना किसी दिखावे के बोले गए, पढ़कर आनंद आया, थोड़ा गुस्सा भी कि अगर इन जैसा भव्य व्यक्तित्व भी बीमारियों का शिकार होगा तो सामान्य जन से क्या शिकायतें करनी , आनंद इसलिए आया कि आनंद के लिए अपना बीपी बिना दवा के सहज रखना बेहद आसान है , रनिंग जैसी मस्ती सीखते ही बीपी के साथ ह्रदय रोग की चिंताएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी ! हमारे पिछड़े समाज में बहुत कम लोग हैं जो बिना दिखावे के सहज हो सकें , वे असहज हैं क्योंकि उन्हें खुलापन पसंद नहीं , वे असहज हैं क्योंकि वे सोंचते हैं कि मजाक करने और खुलकर बोलने पर न जाने लोग क्या सोंचेंगे , वे असहज हैं क्योंकि वे हर हंसी के पीछे कुछ कारण ढूंढने लगते हैं , दुनियाभर के कॉम्प्लेक्स लिए ये लोग , खुल कर हंसना चाहते हैं पर दूसरों के सामने हंस नहीं पाते ! आइये मुक्त अंदाज़ सीखिये आज और बीमारियों को भगाइये .... - सबसे पहले शुरुआत करते हैं एक मस्त गाने से इसे सुनिए और गाकर दिखाइए और हो सके तो नाचिये भी झूम के, अगर शर्म आये तो सोंचिये कि आपको कोई नहीं देख रहा .... https://www.youtube.com/watch?v=-11EKfRYU2o ...... क्रमश:
उम्र कुछ भी हो, मानव शरीर की क्षमताएं असीमित हैं , कल की इस रेस में , मैं धुंध , धुआं , थकान भुला कर दौड़ा और पहली बार अपना व्यक्तिगत रिकॉर्ड कायम करने में कामयाब रहा ! बचपन से हर जगह एक ही लिखा पढता रहा कि बुढ़ापा अभिशाप है , शरीर बीमार ही रहता है , बुढ़ापे में हम दौड़ भाग नहीं कर सकते आदि आदि और हमने जैसा सुना और जीवन में देखा, वैसा आसानी से मान भी लिया , इसी को ब्लॉक माइंडस कहते हैं न , हमने कभी खुद पर आजमाया ही नहीं और न कभी सोंचने की जहमत उठायी कि यह गलत भी हो सकता है !
मानव शरीर लंबे समय को जीवित रहने के लिए डिज़ाइंड है बशर्ते हम उसका ठीक से उपयोग समझ सकें , यह हर परिस्थितियों में अपने को ढाल सकता है बशर्ते हम उन परिस्थितियों से बाहर निकलने के लिए बेचैन होकर , उनका त्याग न कर दें ! पेंटर , कोयला मजदूर , खनन मजदूर , आटा चक्की , स्टोन क्रेशर , देसी चूल्हे पर फुकनी से धुआं फूंकती हमारी करोड़ों माएँ , बस डिपो की रिपेयर वर्कशॉप के मिस्त्री, कार स्कूटर रिपेयर शॉप मजदूर दिन भर में जितना धुआं एब्जॉर्व करते हैं उसकी कल्पना भी, इन पढ़े लिखे ब्लॉक माइंडस ने नहीं की होगी जो दिल्ली को प्रदूषित और न रहने लायक घोषित कर रहे हैं !
2 वर्ष पहले रिटायर होते समय मुझे, ब्रोंकाइटिस, हाई ब्लडप्रेशर, कॉन्स्टिपेशन, बढे वजन, निकली तोंद , हार्ट पल्पिटेशन, क्रोनिक खांसी, बढे कोलोस्ट्रोल, ट्रायग्लिसराइड , और बेहद आलस्य की शिकायत थी और विज्ञानं के हिसाब से यह सब दौड़ने में बाधक ही नहीं , घातक भी थे मगर मैं इन सबको जानते हुए भी नकार कर दौड़ा और इन सब बीमारियों से सिर्फ एक वर्ष में ही आसानी से बिना दवा, मुक्त हो चुका हूँ !
इस समय बहुत से बाबा लोग, योग को भुनाकर देश में करोड़ पति बन चुके हैं , उनका दावा है कि योग से सारे रोगों से मुक्ति मिल जायेगी और तो और बरसों से उपेक्षित पड़ा बिना किसी रिसर्च, आयुर्वेद भी आजकल चकाचक हो रहा है , बांछे खिली हुई हैं इन सब व्यापारियों की !
इनमें से कोई नहीं बताता कि कितने पुराने पुराने योग करने वाले , हार्ट अटैक से असमय ही मर गए , मेरे एक बेहतरीन मित्र जिन्हें योग की सारी क्रियाओं का नियमित ज्ञान था , पचास वर्ष की उम्र में , ही असमय चले गए मैं उनसे ही योग सीखता था , उनके जाने के साथ ही अपने आपको इन ब्लॉक धारणाओं से मुक्त किया कि योग हर व्याधि की एकमात्र दवा है !
जिस प्रकति से आपको पैदा किया है उसने ही रोग मुक्ति की शक्ति भी प्रदान की हुई है , किसी की भी मजबूत इच्छा शक्ति, उसे भीष्म पितामह बना सकती है , गंगापुत्र की इच्छा थी सूर्य के उत्तरायण में आने तक वे प्राण नहीं त्यागेंगे और वैसा ही हुआ भी ! शरीर में प्राणशक्ति बेहद शक्तिशाली होती है उसपर व्याधियों का कोई प्रभाव नहीं बशर्ते हम उसके काम में व्यवधान न डालें ! जुकाम होते ही दवा लेने भागते मूर्ख मनुष्य ने अपनी रोग निवारक शक्ति को ही नष्ट कर दिया है .....
शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पिएंगे सागर तट से ही
आंसुओं में डूबा पानी, कौन आयेगा देने प्यार हमारी सांस आखिरी में हंसाएंगे इन कष्टों को डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे
पागलों में ही, यारी रे !!
सस्नेह मंगलकामनाएं !!
@अचंभित हूँ और चिंतित भी दिल्ली के प्रदूषण का डंका बजा है. बच्चों के स्कूल तक बंद हैं और आप उसी अंदाज में दौड़ रहे हैं.!!! Devendra का कमेंट कल की पोस्ट पर #healthblunders
आज के समय में मानव अपने स्वास्थ्य के प्रति बेहद लापरवाह हो गया है और इसमें बहुत बड़ा हाथ हमारे मन का होता है जो कि हमारे काबू में ही नहीं है , हमें समोसे, जलेबी, पकौड़े राह चलते ललचाते हैं और कठोर व्यायाम करना हमारे बस में नहीं उससे बचने के लिए , हमारा मन हमें तरह तरह से समझाता है कि रात को बारह बजे सोकर, जल्दी नहीं उठ सकते सो सुबह का व्यायाम या टहलना कैसे हो ! ऑफिस से घर पंहुचते ही बहुत समय निकल जाता है , नौकरी तो करनी है न आदि आदि ....... भारत में हर व्यक्ति, समस्या निदान के लिए, विश्व का सबसे बड़ा विद्वान है , आप कोई समस्या बताइये जवाब हाज़िर है खास तौर पर बीमारियों के इलाज़ , बिना शरीर हिलाये तो टिप्स पर हैं .... हार्ट एवं मोटापे के इतने इलाज हैं कि उन्हें सुनकर आपको लगेगा कि मैं बेकार ही चिंता करता हूँ शायद ही कोई भारतीय होगा जो मेथी, जामुन व् लहसुन नहीं खाता होगा और यह इलाज बचपन से मालूम हैं , उसके बाद सबसे अधिक मौतें इन्हीं बीमारियों से होती हैं मगर मजाल है कि किसी घर में यह देसी इलाज बंद हुए हों ! आज सुबह नेहरू पार्क दिल्ली जो मेरे घर से 20 km है वहां जाकर 15 km दौड़ाना बेहद सुखद रहा ,चित्र में लाल शर्ट में बेयर फुट रनर पंकज प्रसाद हैं उनके साथ कूल डाउन रनिंग में कुछ टिप सीखने का मौका मिला , डॉ प्रभा सिंह लखनऊ से किसी सेमिनार के लिए आयीं थीं , वे भी रनर ग्रुप को तलाश करते हुए , वहां पंहुचीं थी यकीनन इन जवानों के साथ दौड़ते हुए मैं ३० वर्ष पुरानी दुनियां में महसूस करता हूँ साथ ही बीपी अथवा अन्य बीमारियों से जाने कबसे निज़ात मिल चुकी है ! कायाकल्प आसान नहीं है प्रभु , इसे करने के लिए दृढ निश्चयी होकर कुछ कठोर तथा अप्रिय फैसले करने ही होंगे , अगर आप रात को घर 10-11 बजे ही पंहुचते हैं तब आपको घर के गरम खाने का मोह त्यागना होगा, इसके लिए घर से सुबह ही रात का भोजन लेकर निकलें और शाम ६ बजे उसे ग्रहण करने की आदत डालें और अगर ठंडा भोजन स्वीकार नहीं तब शाम को बाजार से ताजे फल खरीदकर वहीँ कुर्सी पर बैठकर खाइये और रात के भोजन की आदत त्यागिये ! रात को १०-११ बजे तक हर हालत में सोना है , जिससे की आप सुबह ५ बजे पास के पार्क में जाकर टहल सकें , अगर दौड़ते हुए आपकी सांस फूलती है तो कृपया दौड़ना तुरंत बंद करें सिर्फ वाक् करना शुरू करें , टहलने के अंत के २ मिनट जॉगिंग अथवा तेज चलना शुरू करें और हांफने से पहले ही उसे बंद कर दें ! धीरे धीरे शरीर दौड़ने की आदत विकसित कर लेगा ! ध्यान रहे हांफना, आपके ह्रदय पर आये खतरे को बताता है , इससे मुक्ति पाने को धीमे धीमे वाक् को बढ़ाना होगा कुछ समय बाद आप देखेंगे कि हांफना समाप्त हो गया है ! यह बेहद खुशनुमा दिन होगा आपके लिए यह पहचान है आपके स्वस्थ ह्रदय की ! फेसबुक पर इस विषय पर #healthblunders पर मेरे उपयोगी लेख हैं, कृपया उन्हें अवश्य पढ़ लें ! मेरा दावा है कि अगर ऐसा करेंगे तो आप हमेशा के लिए आपरेशन थियेटर से बच पाएंगे अन्यथा पूरे जीवन की कमाई, एक झटके में लूटने के लिए यह एयरकंडीशंड हॉस्पिटल तैयार खड़े हैं ! क्या पता भूल से दिल रुलाया कोई गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए ! आने वाली नसल,आलसी बन गयी उनको हिम्मत बंधाने को भी दौड़िए ! शक्ति ,साहस,भरोसा,रहे अंत तक हाथ में जब समय हो, जभी दौड़िए ! always remember that Running is the best Cardio and diabetes control exercise सस्नेह
हिंदी दिवस पर गुरुघंटालों, चमचों और बेचारे पाठकों को बधाई कि आज हिंदी, साहित्य चमचों के हाथ, जबरदस्त तरीके से फल फूल रही है, बड़े बड़े पुरस्कार पाने के शॉर्टकट तरीके निकाल कर लोग पन्त , निराला से भी बड़े पुरस्कार हासिल कर पाने में समर्थ हो पा रहे हैं !
ज्ञात हो कि हिंदी के तथाकथित मशहूर विद्वान, जो भारत सरकार , राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कृत हैं, सब के सब किसी न किसी आशीर्वाद के जरिये ही वहां तक पहुँच पाए हैं और इसमें उनके घटिया चोरी किये लेखों, रचनाओं का कोई हाथ नहीं !
अधिकतर हिंदी मंचों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राजनीतिज्ञों की विरुदावली खुश होकर गाते हैं एवं उनके सामने कमर झुका कर खड़े रहने को मजबूर हैं अगर उन्हें आगामी पद्म पुरस्कारों एवं विदेश यात्राओं में अपना नाम चाहिए !
इस सबके लिए कोई नेताओं के बच्चों के विवाह में काव्य पत्र अर्पित कर अपनी जगह बनाता है तो कोई नेता जी का अभिभाषण लेखन पर अपना हस्त कौशल दिखाता है ! नेताजी के खुश होने का नतीजा हिंदी के अगले वर्ष बंटने वाले पुरस्कार समारोह में पुरस्कृत होकर मिलता है ! एक बार मंच पर चढ़ने का आशीर्वाद पाकर यह हिंदी मार्तण्ड पूरे जीवन हर दूसरे वर्ष कोई न कोई कृपापूर्वक बड़ा पुरस्कार प्राप्त करते रहते हैं एवं मूर्ख मीडिया जिसको भाषा की कोई समझ नहीं इन्हें ही हिंदी का सिरमौर समझ, बार बार टीवी गोष्ठियों में बुलाकर, हिंदी कविराज, विद्वान की उपाधि से नवाज, इनके प्रभा मंडल में इज़ाफ़ा करती रहती है !
हाल में दिए एक विख्यात सरकारी हिंदी मंच की पुरस्कार लिस्ट देख कर हँसी आ गयी, इस एक ही लिस्ट में परमगुरु, महागुरु , गुरु , शिष्य और परम शिष्यों को सम्मान दिया जाना है इन पुराने भांड गवैय्यों को छोड़ एक भी स्वाभिमानी हिंदी लेखक/कवि इनकी नजर में पुरस्कृत होने योग्य नहीं है ...
जब तक इन चप्पल उठाने वाले धुरंधरों से छुटकारा नहीं मिलता तबतक हिंदी उपहास का पात्र ही रहेगी !
भारत सरकार में 37 वर्ष सेवा करने के उपरान्त, आखिरकार 31 दिसंबर 2014 को रिटायर हुआ जिसमें मुझे साथी अधिकारियों द्वारा पूरे सम्मान के साथ, आखिरी विदाई समारोह आयोजित कर, सरकारी कार में घर तक पंहुचाया गया था ! पूरे जीवन एक कमी हमेशा रही कि विद्यार्थी जीवन से लेकर अब तक शारीरिक एक्सरसाइज पर कभी ध्यान नहीं दिया, सो भारतीय समाज में अभिशप्त रिटायरमेंट के बाद फैसला किया कि ढीले ढाले शरीर का कायाकल्प करूँगा ! बच्चों और परिवार जनों के सामने अपनी बीमारी में कराहते , लुंजपुंज, असहाय व्यक्तित्व मुझे सिर्फ दया के पात्र लगते थे ऐसे लोग अपने परिवार अथवा समाज को अपने विशद अनुभव से कोई भी दिशा देने में पूरी तौर पर असमर्थ थे , जिनके साथ शामिल होने को, मेरा मानस कभी तैयार न था ! अतः सबसे पहले अपना ही कायाकल्प करने का फैसला किया, और यह फैसला उस समय किया जब मैं मॉल में अथवा बाज़ार में घूमने को, सुबह का टहलना मान लिया करता था ! उन दिनों १ किलोमीटर अथवा आधा घंटा टहलने में कमर में दर्द हो जाता था ! दो दिन के मनन के बाद फैसला किया कि
मीठा, आइसक्रीम और शुगर मोटापा बढ़ाने में सबसे अधिक रोल निभाती है अतः इसे बंद करना होगा !
पकौड़े, पापड , कश्मीरी दम आलू , पंजाबी दाल फ्राई , जीरा और प्याज परांठा , के साथ साथ हर प्रकार की शोरबे की मसालेदार मुगलई सब्जी छोड़नी होगी !
शराब और बियर का शौक़ीन नहीं था मगर परहेज भी नहीं करता था अगर अच्छी कंपनी हो तो दो पैग ड्रिंक्स या गर्मी के दिनों में एक बियर पीना हमेशा आनंददायक लगता था , इसके साथ काजू अथवा पनीर कहकर आसानी से भारी भरकम कैलोरी मिलती थी , उसे बेहद कम करना होगा !
दूध की चाय और साथ में नमकीन कुरकुरे नमकपारे , तली नमकीन मूंगफली तुरंत बंद करनी होगी !
रात का डिनर बेहद हल्का एवं सात बजे से पहले खाना होगा !
बचपन से छोड़ी हुई हरी सब्जियां एवं अंकुरित सलाद के साथ कम से कम एक फल रोज अवश्य खाना होगा
जमीन पर उकड़ू बैठकर चलना, एवं रोज पांच मंजिल सीढिया चढ़ना सीखना होगा !
पार्क में सुबह ५ बजे उठकर , हलकी एकसार गति से , हांफना शुरू होने तक धीमे धीमे दौड़ना होगा
यह सब करना मेरे जैसे आलसी और बढ़िया खाने के शौक़ीन व्यक्ति के लिए एक सज़ा से कम न था मगर सवाल 61 वर्ष की उम्र में कायाकल्प का संकल्प लेने का था और हार जाना स्वीकार कभी नहीं था सो यह संकल्प लिया कि इसे अपने ऊपर लागू कर अपने परिवार के बच्चों के लिए एक नयी दिशा छोड़ने में कामयाब रहूंगा !
बुढापे में आकर नए सिरे से 35 वर्षीय जवान बनने की क्रिया आसान नहीं थी , शुरुआत से ही आलसी मन ने अड़चने डालनी शुरू कर दी , पैरों में दर्द रोज होता था , मन हमेशा सलाह देता रहता था कि घुटने बर्बाद कर लोगे बुड्ढे , दौड़ना बिलकुल बेकार है आदि आदि ...
कुछ दिनों में ही समझ में आ गया कि यह मन जीतने नहीं देगा और मज़ाक बन जायेगी इस संकल्प की , सो दो माह बाद होने वाले हाफ मैराथन ( 21 km ) रनिंग का फार्म भर दिया और परिवार व् नज़दीक मित्रों में घोषणा कर दी !
और इज़्ज़त बचाने के लिए हांफते हांफते भी हाफ मैराथन दौड़ना ही पड़ा और जब मैंने यह असंभव जैसा कार्य कर लिया तब आत्मविश्वास से सराबोर अगले ४ माह में ही , 3 हाफ मैराथन सहित दसियो मैडल आसानी से हासिल किये !
और मैं जीत गया अपने संकल्प में, सिर्फ ८ माह की मेहनत में.....
जीवन भर पसीने से चिढ़ने वाले व्यक्ति ने , लगातार 3 घंटे दौड़ने के साथ, शरीर से ३ लीटर पसीने के साथ साथ जमा चर्बी बहने का सुख भी महसूस कर लिया था !
काया कल्प इतना आसान था, ये पता होता तो बहुत पहले कर लिया होता !
आखिरकार किसी डॉ ने इस धंधे से जुड़े काले सत्य को उजागर करने की कोशिश करते हुए पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी है ,डॉ अरुण गाडरे एवं डॉ अभय शुक्ला ने अपनी पुस्तक "Dissenting Diagnosis " में जो सत्य उजागर किये हैं वे वाकई भयावह हैं ! लोगों की मेहनत की कमाई को मेडिकल व्यापारियों द्वारा कैसे लूटा जा रहा है इसका अंदाज़ा तो था पर इस कदर लूट है, यह पता नहीं था ! डॉक्टर भगवान का स्वरुप होता है क्योंकि वह मुसीबत में पड़े व्यक्ति को भयानक बीमारी से बाहर निकालने में समर्थ होता है , इस तरह रोगी के परिवार के लिए वह देवतुल्य ही होता है मगर आज समीकरण उलट चुके हैं , डॉक्टर बनने के लिए लाखों रुपया खर्च होता है , उसके बाद क्लिनिक पर किये गए करोड़ों रूपये जल्दी निकालने के लिए, धंधा करना लगभग अनिवार्य हो जाता है अफ़सोस यह है कि यह धन निकालने का धंधा , मानव एवं रोगी शरीर के साथ किया जाता है ! अधिकतर डॉक्टर सामने बैठे रोगी को सबसे पहले टटोलते हैं कि वह मालदार कितना है , और इस समय हर रोगी अपने आपको रोग मुक्त होना चाहता है अतः उसे धन खर्च करने में ज्यादा समस्या नहीं होती और वह डॉक्टर की हाँ में हाँ मिलता रहता है , पहली ही मीटिंग में उसके प्रेस्क्रिप्शन में 5 से 10 टेस्ट लिख दिए जाते हैं और साथ ही लैब का नाम भी , जहाँ से टेस्ट करवाना है ! बीमारी के डाइग्नोसिस के लिए आवश्यक टेस्ट में, कुछ ऐसे टेस्ट भी जुड़े रहते हैं जिनके बारे में उक्त लैब से पहले ही, डॉक्टर कोरिक्वेस्ट आई होती है ! जब आप लैब पंहुचते हैं तब यह आवश्यक बिलकुल नहीं कि सारे टेस्ट किये ही जाएंगे , जिन टेस्ट को करने के लिए लैब का अधिक कीमती केमिकल और समय खर्च होता है उनकी रिपोर्ट अक्सर आपके डॉक्टर की राय से बिना किये हुए ही दे दी जाती है एवं आपके डॉक्टर एवं लैब की आपसी सुविधा से यह टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव या पॉजिटिव अथवा नार्मल कर दी जाती है !लीवर पॅकेज , किडनी पैकेज , वेलनेस पैकेज और अन्य रूटीन पैकेज टेस्ट के सैंपल अक्सर बिना वास्तविक टेस्ट किये नाली में बहा दिए जाते हैं एवं उनकी रिपोर्ट कागज पर, डॉक्टर की राय से, जैसा वे चाहते हैं , बनाकर दे दी जाती है !
एक निश्चित अंतराल पर इन फ़र्ज़ी तथा वास्तविक टेस्ट पर आये खर्चे को काट कर, प्रॉफिट में से डॉक्टर एवं लैब के साथ आधा आधा बाँट लिया जाता है ! अप्रत्यक्ष रूप से रोगी की जेब से निकला यह पैसा , उस रोग के लिए दी गयी डॉक्टर की फीस से कई गुना अधिक होता है , अगर आपने डॉ को फीस ५०० रूपये और लगभग 8000 रुपया टेस्ट लैब को दिए हैं , तब डॉक्टर के पास लगभग 4800 रुपया पंहुच चुका होता है , जबकि आपके हिसाब से आपने फीस केवल 500 रुपया ही दी है ! लगभग हर लेबोरेटरी को सामान्य टेस्ट पर ५० प्रतिशत कमीशन देना है वहीं एम आर आई आदि पर 33 % देना पड़ता है ! आपरेशन थिएटर का खर्चा निकालने को ही कम से कम एक आपरेशन रोज करना ही होगा अतः अक्सर इसके लिए आपरेशन केस तलाश किए जाते हैं चाहें फ़र्ज़ी आपरेशन ( सिर्फ स्किन स्टिचिंग ) किए जाएं या अनावश्यक मगर ओ टी चलता रहना चाहिए अन्यथा सर्जन एवं एनेस्थेटिस्ट का व्यस्त कैसे रखा जाए ! अाज शहरी भारत में लगभग हर तीसरा बच्चा, आपरेशन से ही होना इसका बेहतरीन उदाहरण है ! भगवान आपकी रक्षा करें .....
कलमधारियों के बीच शायद मैं अकेला बुद्धिहीन, विवेकहीन हूँगा जिसने ६० वर्ष की बाद दौड़ना शुरू किया कई विद्वान मित्र सोंचते होंगे कैसे दिन आ गए हैं कि पहलवानी करने वाले लोग भी कलम उठाकर अपने आपको लेखक अथवा कवि समझते हैं बहरहाल मैं सोंचता हूँ कि एथलीट कोई भी बन सकता है बशर्ते उसमें कुछ नया करने का मन हो , मजबूत अच्छा शक्ति के आगे बढ़ती उम्र का कोई बंधन, उसे रोक नहीं पायेगा ! लोग कहेंगे कि आप खुश किस्मत हैं कि आपको इस उम्र में कोई बीमारी नहीं है अन्यथा इस उम्र में दौड़ के दिखाने में, नानी याद आ जाती ! मैं सोंचता हूँ , बीमारी तो कई थीं और हैं भी , मगर मैं उन पर कभी ध्यान ही नहीं देता , मेरा यह विश्वास है कि बीमारी ठीक करने का काम मेरे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति का है जिसे मैं दौड़कर और मजबूत बना रहा हूँ ! ध्यान देता हूँ तो सिर्फ दौड़ने पर ताकि बढ़ता भयावह बुढ़ापा दूर दूर तक नज़र भी न आये और मुझे हर रोज सुबह लगातार ५-१० किलोमीटर दौड़ता देख, डर के कहीं छिप जाए कि यह आदमी पागल है कौन इससे पंगा ले ! जब सुबह मोहल्ले में सब सो रहे होते हैं उस वक्त कुछ एक टहलने वालों के सामने से दौड़ता हुआ पसीने से लथपथ जब मैं अपने घर में घुसता हूँ तब बहता हुआ पसीना अमृत जैसा लगता है और लोग आश्चर्य चकित होते हैं कि कमाल है इस उम्र में यह दौड़ क्यों रहा है उस समय उनके इस हैरानी के अहसास से ही मेरी सारी थकान गायब हो जाती है और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है ! मुझे याद है ५ वर्ष पहले मैंने कुकिंग गैस का सिलेंडर एक झटके से उठाया था और मेरे सीधे हाथ की सॉलिड मसल्स एक झटके से टूट कर अपनी जगह से हटकर लटक गईं थी उस दिन लगा था कि लगता है वे दिन गए जब खलील खां फ़ाख्ते उड़ाया करते थे , मगर आज दौड़ने के साथ ही वह मसल्स फिर रिपेयर होकर न केवल पहले से अधिक ताकतवर बन गयी है बल्कि अब अपने आपको अधिक शक्तिशाली महसूस करता हूँ ! कल २ बजे की तेज धूप में २ किलोमीटर सड़क पर पैदल चलकर जब टपकते पसीने के साथ मॉल में घुसा तब कार से उतरते लोगों को देख बड़ा सुकून महसूस हो रहा था कि मैं वह कर सकता हूँ जो इस गर्मीं में इनके बस की बात नहीं और मैं वही हूँ जो अपनी पूरी युवावस्था में बस में कभी इसी लिए नहीं चढ़ा था कि दिल्ली की बसों में चढ़ने के लिए उनके पीछे भागना पडेगा ! पूरे जीवन पैदल न चलने वाला व्यक्ति प्रौढ़ावस्था या बुढ़ापे में, जो भी आप समझें , बिना रुके, लगातार 10 किलोमीटर दौड़ सकता है , इसका अहसास ही, पूरे दिन दिमाग को तरोताजा रखने के लिए काफी है ! -मुझे याद है रनर का सबसे मुश्किल पहला महीना जब मैं रनिंग की कोशिश कर रहा था , उन दिनों पैरों में तेज दर्द होता था लगता था अब नहीं दौड़ पाउँगा वह दर्द अब कहाँ गया इसका पता ही नहीं चला .... -मुझे याद है कि 50 वर्ष की उम्र में, ह्रदय की धड़कन तेज होने पर, एक बार मैं पूरी रात हॉस्पिटल में ऑक्सीजन के सहारे रहा तब लोगों ने कहा था कि बाज आइये अब आपकी उम्र हो गई है मगर अब ६२ वर्ष में ,ह्रदय लगता है दुबारा जवान हो गया है -बढे ब्लड प्रेशर का कभी कोई इलाज नहीं किया न कराया आजकल जब चेक करता हूँ , परफेक्ट जवानी वाला 82 / 140 आता है ! -कॉन्स्टिपेशन लगता है कभी था ही नहीं .... - उँगलियों तक खून का बहाव लाने के लिए पागलों की तरह तालियां बजाना कब का बंद कर चुका हूँ ! सो अपनी शानदार तोंद को , बढ़िया लम्बे कुर्ते से छिपाए मंच पर बैठे साहित्यकारों, कवियों , लेखिकाओं से निवेदन है कि इस लेख पर सरसरी नजर न डाल , ध्यान से पढ़ें और कल से जॉगिंग के लिए घर से निकलने का संकल्प लें, भले ही गुस्से में गालियाँ मेरे हिस्से में आएं मगर प्लीज़ सुबह सवेरे ट्रेक पर जाने में अधिक न सोचिये कि सब लोग क्या कहेंगे याद रखें हमारे देश में सबसे अधिक डायबिटीज़ तथा ह्रदय रोगी हैं तथा रनिंग इन सबका सबसे अच्छा और निरापद इलाज है , Running is the best cardio exercise ... आप सबके स्वास्थ्य के लिए चिंतित ....
Running ka Bachpan- "Appreciate a novice that's the only advice"
Appreciation and encouragement do wonders for a kid (and to a novice runner) taking baby steps--> balancing/ falling/ trying --> and the baby walks --> finally runs :) A novice runner tries, gets breathless, overcomes inhibitions, manages pain and finally a star runner is born...! It doesn't really matter where you are, what you are or who you are; What really matter is your Will to succeed and belief "I think I can..."
कोच रविन्दर की यह संक्षिप्त पोस्ट मेरी नज़र में शायद उनकी सबसे बेहतरीन पोस्ट है जो एक अनाड़ी मगर मजबूत इरादे वाले रनर के हौसले व मनोदशा बताने के लिए पर्याप्त है !
मुझे दुःख है कि अधिकतर शानदार रनर, जिन्होंने इस स्टेज पर पंहुचने के लिए ढेरों पसीना बहाया है अपना अनुभव शेयर नहीं करते हैं या यूं कहें कि उन्हें लिखने में झिझक होती है , काश वे यह सोंचते कि अगर वे अपना अनुभव लिख दें तो कितने नवोदित रनर उस दर्द तकलीफ से बच जाते जो वे अनाड़ीपन में झेल चुके हैं !
बड़े बूढ़े कहते हैं एथलीट या पहलवानों में बुद्धि नहीं होती अगर यह सच मान लें तो शायद यही कारण होंगे कि ज्यादातर रनर उसी श्रेणी के हैं जो पूरे जीवन ठोकरें खा खा कर, घायल मसल्स लेकर भी, लंगड़ाते हुए खुद शानदार रनर बन चुके हैं ,मगर वही अनुभव दूसरों को बांटने की समझ या दिल नहीं है ! यह शब्द कड़वे जरूर लगेंगे मगर सच्चाई यही है कि इस क्षेत्र में रनिंग के बारे में बहुत कम लिखा गया है !मैं सोंचता हूँ कि यह जिम्मेदारी अथाह कष्ट उठाकर प्रथम श्रेणी में दौड़ते उन्ही रनर की है जो अपने से जूनियर मगर तमीज की रनिंग सीखने की जद्दोजहद में लगे एक कमजोर रनर के लिए कुछ देना नहीं चाहते !
फिर सोंचता हूँ कि बिना मदद के सीखना , शायद अधिक अच्छा है कि उड़ना सीखने के लिए बच्चे को कई बार ऊंचाई से गिरना पड़ता है , और अंततः वह अनन्त आकाश की गहराइयों में एक दिन शान से उड़ रहा होता है !
एक अनुभव साझा करता हूँ , मुझे दूसरों के मुकाबले पसीना कई गुना अधिक आता है, मगर मेरा ध्यान पसीने के जरिये बहते शारीरिक शक्ति के लिए बेहद आवश्यक साल्ट पर कभी नहीं गया , २१ मई को , 44 डिग्री तापमान में starry night
अजय कुमार
marathon मुझे बेहद भारी पड़ा जब मैं पहले 10 किलोमीटर में ही लगभग दो-तीन लीटर पसीना बहा चुका था, हेडबैंड से टपकता नमकीन पसीना आँखों में जा रहा था और इस पसीने के जरिये बहते शरीर के बहुमूल्य साल्ट तेजी से शारीरिक शक्ति घटा रहे थे , शुरुआत से ही से मैंने अपनी गति धीमी रखी थी और जब 12 किलोमीटर के बाद मैंने अपनी गति बढ़ाना चाहा तब पैरों में क्रैंप आने शुरू हो गए ! मैं अपनी सीमित शारीरिक शक्ति को बचाते हुए गति धीमे कर जैसे तैसे दौड़ता रहा , काफ मसल्स में होते तीखे दर्द के बावजूद दृढ निश्चय था कि दौड़ हर हाल में पूरी करनी है , अंततः मेडल लेते हुए पसीने में बहते साल्ट की कमी की वैल्यू समझ आ चुकी थी ! 21 km रनिंग के बाद मुझे कम से कम 4-7 दिन का आराम करना चाहिए था जो
संतोष कुमार
लगातार सौ दिन दौड़ने में शामिल होने के कारण मैं नहीं कर सका और अगले दिन से ही दौड़ना शुरू कर दिया और 21 तारीख की हाफ मैराथन के बाद २२ तारीख से लेकर ४ जून तक मैं 53 किलोमीटर और दौड़ चुका था जिनमें पांच दिन मैं 5 किलोमीटर से 8 किलोमीटर तक दौड़ा था , बिना रेस्ट और एक्स्ट्रा साल्ट के लिए दौड़ने के पहले किलोमीटर में जांघों व् कमर में अजीब सी दुखन महसूस कर रहा था , listen to your body के तहत मुझे लगा कि मैं अति कर रहा हूँ अंततः मुझे अपनी लगातार रनिंग बंद करनी पड़ी , शायद इस दर्द का कारण मीठे का पूर्ण त्याग एवं बेहद पसीने के कारण बहते पोटेशियम सोडियम की कमी रही होगी ! अब पिछले ९ दिन से लगातार रेस्ट कर रहा हूँ , कल पहली बार काफी दिन बाद साइक्लिंग और पुशअप किये जो दर्द के दौरान, करना असम्भव हो गए थे !
यह आवश्यक है कि नए रनर के लिए हिम्मत दिलाते रहें उसके लिए तालियां बजाते रहें यही काफी होगा वह लड़खड़ाते हुए, गिरते हुए अपने पैरों से अपने आपको बैलेंस करके, दौड़ने की कोशिश तो कर रहा है, विश्वास रखिये आखिर कार एक दिन वह दौड़ेगा ....
एक नौसिखिया रनर अपनी उम्र भूलकर, झिझक छोड़कर, भारी बदन लेकर भी, अपना दर्द और तकलीफें भुलाकर अगर दौड़ने निकला है तो विश्वास रखें कि वह एक दिन स्टार रनर बनेगा और शान से दौड़ेगा
इससे कोई लेना देना नहीं कि आप क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं ,और कौन हैं ? रनिंग के लिए आवश्यक सिर्फ आपकी इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास है कि अगर वे कर रहे हैं तो मैं भी कर सकता हूँ !
अंत में मैं दो डायबिटिक रनर जिन्होंने अपनी डायबिटीज़ बिना दवा कंट्रोल कर ली उनके चित्र दे रहा हूँ , अजय कुमार एवं संतोष कुमार ने , न केवल बीमारी पर विजय पाई है बल्कि रनिंग में शानदार ऊंचाइयां भी हासिल की हैं !
अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके हैं यह आपको पता ही नहीं चलता ! बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं ! भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते पाये जाते हैं ! अक्सर इसकी शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है ! आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा ! घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते ! अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए ! दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें ..... आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी ! ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की ! http://satish-saxena.blogspot.in/2014/10/blog-post_28.html
आज बेहद सीलन वाले मौसम में, पसीने से तर बतर, ओखला बर्ड सेंक्चुरी में दौड़ते हुए 49.09 मिनट में 6.8 Km की दूरी तय की !
कम से कम 2 Km रोज दौड़ते हुए,लगातार 100 दिन दौड़ने का व्रत 30 अप्रैल से लिया है , आज 26 मई तक रोज दौड़ते हुए 132.85 Km की दूरी तय कर चुका हूँ , पिछले 8 माह से 134 बार रनिंग करते हुए आजतक 1035.60 Km दौड़ चुका हूँ और यह सब बिना किसी ट्रेनिंग और अपने 62 वर्षीय शरीर के साथ कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतते हुए किया है !
1000 km की दौड़ पार करते हुए, अब मुझे लगता है कि अनावश्यक सावधानी और तेज दौड़ने पर कुछ हो जाने का भय,मानवीय शक्ति को बेवजह डर में फंसाए रखता है नतीजा अथाह मानवीय शक्ति,मन के चंगुल में फंसकर अपने बैरियर कभी नहीं तोड़ पाती और इंसान पूरे जीवन,अपने मन का दास बनने को मजबूर रहता है अतः मन पर निर्दयता पूर्वक चोट करनी ही होगी ! अतः कल से 10 km एक स्पीड पर दौड़ने का प्रयत्न रहेगा और पहला टारगेट 10 km दूरी को 70 मिनट में आराम से दौड़ते हुए पूरा करने का मन है जो कि अब तक का मेरा पर्सनल बेस्ट है !
इस इलाके में यह मेरा पहला रन था और अगर मौसम में आद्रता कम होती तो इस खूबसूरत माहौल में यमुना के साथ साथ, दौड़ने का आनंद कुछ और ही होता ! दौड़ने में दुखी मन को भी राहत मिलती है .... क्या पता भूल से दिल रुलाया कोई गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए !
वायदे कुछ किये थे, किसी हाथ से मरते दम तक निभाना,तो भी दौड़िए ! - सतीश सक्सेना
-ये रचनाएं मौलिक व अनगढ़ हैं , इनका बाज़ार में बताई गयी किसी साहित्य शिल्प ,विधा और शैली से कुछ लेना देना नहीं !
-ये रचनाएँ किसी हिंदी धुरंधर को सलाम नहीं करतीं ये ईमानदार व मुक्त हैं और छपने की लाइन में लगना पसंद नहीं करती ! कोई भी इन्हें प्यार से मुफ्त ले जा सकता है !
-यह कलम किसी ख़ास जाति,धर्म,राजनैतिक विचारधारा से सम्बंधित नहीं केवल मानवता को मान देने को कृतसंकल्प है !
मेरी असाहित्यिक रचनाएं बिकाऊ नहीं और न पुरस्कार की चाहत रखती हैं, सहज मन की अभिव्यक्ति हैं, अगर कुछ पढ़ने आये हैं तो निराश नहीं होंगे !
विद्रोही स्वभाव,अन्याय से लड़ने की इच्छा, लोगों की मदद करने में सुख मिलता है ! निरीहता, किसी से कुछ मांगना, झूठ बोलना और डर कर किसी के आगे सिर झुकाना बिलकुल पसंद नहीं ! ईश्वर अन्तिम समय तक इतनी शक्ति एवं सामर्थ्य अवश्य बनाये रखे कि जरूरतमंदो के काम आता रहूँ , भूल से भी किसी का दिल न दुखाऊँ ..