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Friday, June 26, 2020

पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी -सतीश सक्सेना

खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी !
सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !

पढ़ने लिखने का काम नहीं बेईमानों की बस्ती में !
बाबा-गुंडों में स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !


चोट्टे बेईमान यहाँ आकर बाबा बन घर को लूट रहे 
जनता को समझाते हांफे, पुख्ता शमशेर हमारे भी !

जाने क्यों वेद लिखे हमने, हँसते हैं हम अपने ऊपर
भैंसे भी, कहाँ से समझेंगे, यह गोबर ढेर, हमारे भी !


फिर भी कुछ ढेले फेंक रहे ,शायद ये नींदें खुल जाएँ ! 
पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी !

Tuesday, May 22, 2018

भगवा लिवास को कभी लुच्चा नहीं कहते -सतीश सक्सेना

हम मुफ्त में सूरज को भी अच्छा नहीं कहते !
इस देश में अच्छे को ही,अच्छा नहीं कहते !

बच्चों को भूल पर तो माफ़ कर ही दें ,मगर 
कम उम्र,नर पिशाच को ,बच्चा नहीं कहते !

आधार हिल रहा यहाँ  , बचपन से ,नशे में !
इस पाशविक प्रवृत्ति को,कच्चा नहीं कहते !

उस रात एक स्वप्न का , दम घोट चुका है ,
बच्चा है ये शैतान का , टुच्चा नहीं कहते !

बस्ती में जाहिलों की,चोर डाकुओं को भी 
भगवा लिवास में, कभी लुच्चा नहीं कहते ! 

सारे डकैत  मिल के , चोर चोर  कह रहे !
अरविन्द को इस देश में सच्चा नहीं कहते !




Thursday, March 22, 2018

तीक्ष्ण अभिव्यक्ति को,खतरे भी उठाने होंगे - सतीश सक्सेना

आस्था को  ही, प्रायश्चित्त उठाने होंगे !
ढोंगियों के दिए  ,वरदान भुलाने होंगे  !

रूप संतों का रखे , चोर - उचक्के पूजे ,
बीच गंगा में  ये , अपराध बहाने होंगे !

एक दिन आँख खुलेंगीं जरूर भक्तों की
जाहिलों को ही , सभी ढोंग गिराने होंगे !

अब न गुरुदेव मिलेंगे किसी डेरे में यहाँ 
लम्बी दाढ़ी रखे , ये धूर्त  भगाने  होंगे !

झूठ के बीज को , जड़ से समाप्त करने को
तीक्ष्ण अभिव्यक्ति को,खतरे भी उठाने होंगे !

Thursday, June 22, 2017

ध्यान बटाने को मूर्खों का, राजा के सहयोगी आये ! - सतीश सक्सेना

भुला पीठसंकल्प कलियुगी आकर्षण में योगी आये,
वानप्रस्थ को त्याग,राजसुख लेने वन से,जोगी आये !

तड़प किसान खेत में मरते,ध्यान बटाने को भूखों का, 
योग सिखाने जोगी बनकर,राजनीति के ढोंगी आये !

महंगाई से त्रस्त,भूख बेहाल ग्राम,शमशान बना के,  
ध्यान बटाने को मूर्खों का, राजा के सहयोगी आये !

लालकिले तक पंहुचाने में जाने कितने पापड बेले,
अश्वमेध फल लेने अपना, भगवा पहने भोगी आये !

कष्ट दूर चुटकी में करने धूर्त,धर्म,भय चूरन लेकर,
रोगमुक्त करने माँ बहिनें,ये संपत्ति वियोगी आये !

Tuesday, November 15, 2016

सच कहूँ तो देश मेरा , जाहिलों का देश है - सतीश सक्सेना

सच कहूँ तो देश मेरा ,जाहिलों का देश है !
मूढ़,मूरख औ निरक्षर,काहिलों का देश है !

ढोर झुंडों की तरह आपस में लड़ते ही रहे 
जाति धर्मों में बंटे, लड़ते जिलों का देश है !

सुना करते थे बड़ों से कभी हम भी,मगर अब 
रक्षकों से ही लुटे , जर्जर किलों का देश है !

लड़कियां बाज़ार में चलतीं सहमती सी हुईं  
डूबतों को ताकते, जड़ साहिलों का देश है !

ढोंगियों के सामने, घुटनों पर बैठे हैं सभी !
संत बनकर ठग रहे, व्यापारियों का देश है !

देश मेरा भी जगेगा जल्द लेकिन इन दिनों,
स्वर्ण सपने बेंचते , कुछ धूर्तों का देश है !

Saturday, September 10, 2016

जाहिलों पर मीडिया का,मुस्कराना देश में - सतीश सक्सेना

देशभक्तों ने किया खाली, खजाना देश में !
धनकुबेरों को बिका, शाही घराना देश में !

बेईमानों और मक्कारों की छवि अच्छी रहे,
जाहिलों पर मीडिया का, मुस्कराना देश में !

गेरुए कपडे पहन कर डाकू, व्यापारी बने
कैसे, कैसे धूर्तों का , हाकिमाना देश में ! 

खर्च लाखों हो गए तो कार पे झंडा लगा,
पांच वर्षों में समंदर भर , कमाना देश में !

चोर, बेईमान खुद को, राष्ट्रवादी  मानते,
आजकल ईमानदारी का वीराना देश में !

Friday, April 3, 2015

चोर उचक्के राजा के सहयोगी , मेरे देश में - सतीश सक्सेना

मंचों से सम्मानित होते ढोंगी ,मेरे देश में !
आँख दबाएं करें इशारे योगी , मेरे देश में !

धूर्त हमेशा आगे रहते , राजनीति मैदान में 
चोर उचक्के राजा के सहयोगी ,मेरे देश में !

श्री पूजा में धूर्त, आहुति देते, नफरत यज्ञ में 
द्वेष संक्रमण काल बढ़ाये रोगी ,मेरे देश में !

वृद्ध किसान जान देते हैं, रोकर अपने गांव में
आसानी से अरबपति सब जोगी ,मेरे देश में !

साध्वी सत्ताचार्य खेत में बीज बो रहे वोट के
झाग उगलते राजभक्त, उपयोगी मेरे देश में !

धनकुबेर के आगे कैसे राजा बिके बाजार हैं
पहरे राधा पर हैं , कृष्ण वियोगी मेरे देश में !

Monday, March 16, 2015

निकलो बंद मकानों से जंग लड़ो बेईमानों से - सतीश सक्सेना

निकलो बंद मकानों से, जंग लड़ो बेईमानों से !
सावधान रहना भक्तों के, राष्ट्रभक्ति के गानों से !

बड़ी बड़ी गाडी में घूमें झंडा लगा गुमानों का 
मूर्ख बनी है जनता कबसे खादी के शैतानों से 

चर्बी चढ़ी है गद्दारों को, नोट कमाने निकले हैं 
भारत माँ को खतरा ऐसे, राष्ट्रभक्त हनुमानों से !

राष्ट्रभक्ति से अरबपति, बन बैठे हैं आसानी से
कानों को न सुनाई पड़ता, स्पर्धा धनवानों से ! 

खद्दरधारी दीमक सुर में, देशभक्ति का गान करें, 
देश हमारा शर्मिन्दा है, दसलक्खा परिधानों से !

Thursday, February 5, 2015

हिन्दु मुसलमानों से , अंशदान चाहिए - सतीश सक्सेना

समस्त राजनीति, स्व 
समृद्धि हेतु बिक चुकी 
समस्त बुद्धि भीड़ में 
दिवालिया सी हो चुकी
देश विपत काल में 
प्रवंचकों से मुक्ति हेतु 
हिन्दु मुसलमानों से , 
अंशदान  चाहिए !
शुद्ध, सत्यनिष्ठ, मुक्त  आसमान चाहिए !

चाटुकार भांड यहाँ 
राष्ट्र भक्त बन गए !
देश के दलाल सब 
खैरख्वाह बन गए !
चोर बेईमान सब, 
ध्वजा उठा के चल पड़े !
तालिबानी  देश को , 
कबीर  ज्ञान चाहिए !
अपाहिजों के देश में, कोचवान  चाहिए !

चेतना कहाँ से आये 
जातियों के, देश में 
बुरी तरह से बंट  चुके 
विभाजितों के देश में 
प्यार की जगह, जमीं 
पै नफरतों को पालते !
भूखे पेट वोटरों को 
त्मज्ञान चाहिए  !
सड़ी गली परम्परा में , अग्निदान चाहिए !

अकर्मण्य बस्तियां 
शराब के प्रभाव में !
खनखनातीं थैलियां 
चुनाव के प्रवाह में ! 
बस्तियों के जोश में,
उमंग नयी आ गयी !
शिथिल प्रसुप्त देश को 
नयी अज़ान चाहिए !
मानसिक अपंग देश , बोध ज्ञान चाहिए !

सही समय दुरुस्त पा  
निरक्षरों को लूटते !
विदेशियों से जो बचा 
ये राजभक्त लूटते !
दाढ़ियों को मंत्रमुग्ध , 
मूर्ख तंत्र, सुन रहा !
समग्र मूर्खशक्ति को, 
विचारवान चाहिए !
निपट गुलाम देश को, चैतन्यवान चाहिए !

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

अचानक मुझे पा , बदल ही तो जाते ,
अदेखा मुझे कर निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !

बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें  
न जाने कभी का, निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते !




Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,
कैसे कैसे लोग भी , गंगा  नहाये इन दिनों !

सैकड़ों बलवान चुनकर , राजधानी आ गए !
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए,चलती हवायें इन दिनों !

Saturday, May 31, 2014

जाने कैसी नज़र लगी,खलिहानों को !-सतीश सक्सेना

मूरख जनता चुन लेती धनवानों को !
बाद में रोती, रोटी और मकानों को !

रामलीला मैदान में, भारी भीड़ जुटी,
आस लगाए सुनती, महिमावानों को !

काली दाढ़ी , आँख दबाये , मुस्कायें ,
अब तो जल्दी पंख लगें, अरमानों को !

रक्तबीज  शुक्राचार्यों  के , पनप रहे 
निंदा, नहीं सुनायी देती , कानों को !

दद्दा , ताऊ  कितने, गुमसुम रहते हैं !
जाने कैसी नज़र लगी, खलिहानों को !



नोट :  यह रचना आज जयपुर में छपी , बताने के लिए संतोष त्रिवेदी का आभार 
http://dailynewsnetwork.epapr.in/283149/Daily-news/04-06-2014#page/8/2 

Saturday, April 19, 2014

मुझको इस देश के आँगन में दिखता है चन्दा कोई नहीं -सतीश सक्सेना

इन बुरी अँधेरी रातों में , दिखता है  बंदा  कोई नहीं !
तारों को हिम्मत दिलवाए, ऐसा भी चंदा कोई नहीं !

बच्चियां सिर्फ खतरा झेलें इंसानों के इस जंगल में 
सारी दुनिया के जीवों में, मानव से गंदा कोई नहीं ! 

वृद्धों को घर में ही लूटा, बिन ममता मोह शातिरों ने 
ज़िंदा रहने की चाह नहीं, पर घर में फंदा कोई नहीं !

उस रात बिना पैसे आकर, इक  बूढ़ा द्वार सुधार गया   
दिखने में बढ़ई लगता था, पर हाथ में रंदा कोई नहीं !

लाखों कतार में राष्ट्रभक्त , बैठे हैं, नोट कमाने को !
इन दिनों राज नेताओं के , धंधे में मंदा कोई नहीं !

Wednesday, March 19, 2014

माँ को अक्सर मैंने घर के, कपडे धोते ही देखा है -सतीश सक्सेना

बेटा, मैंने इस जीवन में 
ऐसा इक इंसान न देखा !
जीवन के झंझावातों में 
जिसने कोई कष्ट न देखा !
वैभव सम्पन्नों का जीवन  
बीमारी से , लड़ते बीता ,
जलन द्वेष और भेदभाव की    
इन गलियों में चलते चलते ,
धनकुबेर जितने पाये थे , उनको रोते ही देखा है !

ऊपर से बढ़िया स्वभाव ले 
हम सब दुनिया में आये हैं,
अक्सर झूठे व्यवहारों से , 
इस दुनिया को भरमाये हैं ,
सारे जग को धोखा देते ,
ऋषि मुनियों का वेश बनाए  
जो बखान करते हैं अपने, 
पाप पुण्य की चर्चा करते,
उनकी माँ को अक्सर मैंने, कपडे धोते ही देखा है !

शुभचिंतक से, लगते सारे 
चेहरों पै विश्वास न करना
गुरु मन्त्र पा, उस्तादों  से   
ऐसे भी उपवास न करना
कर्म श्रेष्ठ है, धर्म गौण है ,
तंत्र मंत्र विश्वास न करना 
भक्तों को रोमांचित करके,
रहे नाचते,  रंग मंच पर ,  
श्रीवर, संत, साध्वी को भी , मूर्ख बनाते ही देखा है !

पूरा जीवन बीता इनका 
अपनी तारीफें करवाने ,
बैठे जहाँ , वहीँ गायेंगे 
अपने सम्मानों के गाने , 
ऊपर पहलवान से लगते,
बार बार पिटते हैं घर में !
बात बात पर झाग उगलते 
विनयशील को,गाली देते 
पगड़ी बांधे इन पुतलों को, घर में लुटते ही देखा है ! 

जीवन भर दो चेहरे रखते 
समय देख के रंग बदलते
अपना सारा जीवन काला    
औरों पर ये, छींटे  कसते !
लोकलुभावन मोहक बातें
मंत्रोच्चारण बीच बीच में 
रावण मन,रामायण पढ़ते, 
रोज दिखायी पड़ते, ऐसे 
श्वेत वसन शुक्राचार्यों को, मंदिर बैठे ही देखा है !

Monday, December 2, 2013

घर की इज्जत बेंच,किसी के घर का पानी भरते हैं -सतीश सक्सेना


कैसे, कैसे लोग राष्ट्र की ध्वजा उठाये चलते हैं !
राजनीति के मक्कारों के, चंवर उठाये चलते हैं !

नोट कमाने,राष्ट्रभक्त बन,खद्दर पहन के आये हैं !
पीठ पे नाम लिखाये उनका,पूंछ उठाये चलते हैं !

मंत्री का विश्वास मिला तो वारे न्यारे हो जाएंगे !
दल्लागीरी करते , मन में लड्डू खाये, चलते हैं !

नेता के मंत्री बनते ही, नोट कमाएंगे जी भर के,  
जोश जोश में दुश्मन के, कंगूरे ढाये चलते हैं !

खुद पार्टी के ड्रमर बन गए,बच्चे ढोल बजायेंगे,
धन पाने को राष्ट्रभक्ति के,रंग लगाये चलते हैं !
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