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Thursday, November 8, 2018

कल दिवाली मन चुकी है ,जाहिलों के शहर में -सतीश सक्सेना

खांसते दम ,फूलता है 
जैसे लगती जान जाए 
अस्थमा झकझोरता है, 
रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब  
यह धुआं गन्दी हवा में 
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने 
दीप आँखों में जले,अब 
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !

धूर्त, बाबा बन बताते 
स्वयं को ही राज्यशोषित 
और नेता कर रहे हैं ,  
स्वयं को अवतार घोषित 
चोर सब मिल गा रहे हैं 
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े 
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक 
देख ठट्ठा मारते, अब 
राम बंधक बन चुके हैं , जाहिलों के शहर में ! 

Wednesday, September 5, 2018

जर्मनी और राज भाटिया -सतीश सक्सेना

टिकट मशीन 
यूरोप के अधिकतर देशों में नगर उपनगर यातायात के लिए , मेट्रो , ट्राम , बस और ट्रेन उपलब्ध हैं और इसके लिए   बेहतरीन व्यस्था है कि आपको हर जगह अलग अलग एजेंसीज से अलग टिकिट लेने की आवश्यकता नहीं है ! मेट्रो स्टेशन या बस स्टैंड पर लगी ऑटोमेटिक मशीन से लिया गया एक टिकिट हर जगह मान्य है और यह टिकिट आप अपने मोबाइल पर भी ऑनलाइन ले सकते हैं ! म्यूनिख में जहाँ एक स्थान से दुसरे स्थान का एक तरफ का टिकिट, किसी भी साधन से,  2.90 यूरो (250 रूपये ) है वहीँ एक दो जोन के लिए एक सप्ताह का अनलिमिटेड पास 12 यूरो का और पूरे म्यूनिख नेटवर्क में पूरे दिन के लिए, अनलिमिटेड यात्रा पास 24 यूरो का है ! यूरोप में किसी शहर में घूमने के लिए, अगर उसे बेहतर समझना हो तो उस शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम पहले समझना चाहिए , जहाँ आप ठहरे हैं उस स्थान से पॉपुलर रुट के स्टेशन और दिशा याद रखना आवश्यक है बाकी काम आसान हो जाता है ! ड्राइवर युक्त टैक्सी सर्विस बेहद महगीं हैं , 40 km की टैक्सी यात्रा लगभग 6000/=की पडेगी !  


राज भाटिया के साथ 
अगर यूरोप में वास्तविक प्राकृतिक खूबसूरती और रहनसहन का माहौल देखना हो तो किसी गांव में जा कर देखिये आपको आनंद आ जाएगा ! राज भाटिया म्यूनिख से लगभग ४५ km दूर एक गाँव इज़ेन में रहते हैं , उनका आमंत्रण पहले दिन से मेरे पास था मगर जाने का मौका कल मिला जब मैं किसी को छोड़ने एयरपोर्ट गया था और मेरी जेब में पूरे म्यूनिख नेटवर्क का पास था ! मैंने अपने आने के बारे में उन्हें इन्फॉर्म किया तो उनका कहना था कि आप गाँव तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट से न आएं बल्कि मैं आपको लेने आपके नजदीकी स्टेशन श्वाबिन मार्किट तक आ रहा हूँ आप वहीँ पर मेरा इंतज़ार करें ! जब मैं वहां पंहुचा तो राज भाई अपनी ऑडी के साथ इंतज़ार कर रहे थे ! खूबसूरत साफ सुथरे रास्तों से होते हुए जब उनके गांव पंहुचे तो हमारे जैसा गांव तो कहीं नजर नहीं आया समझ ही नहीं आया की प्रकृति का इतना सुंदर नज़ारा और शोर शराबे रहित, शांत जगह जहाँ धूल का नामोनिशान न हो , गाँव कैसे हो सकता है ! अगर हमारे देश में, शहर के नजदीक गलती से भी ऐसे गांव रहे होते तो निश्चित ही वहां बड़े सरकारी अधिकारियों के निवास स्थान बन गए होते और उसे सिविल लाइन्स का नाम दिया जाता क्योंकि शहर के सबसे बेहतरीन एरिया में रहने का हक़ कलक्टर एन्ड कंपनी का ही होता है ! बाकी तो सब कीड़े मकोड़े हैं कहीं भी रह लेंगे  ...... 


हमारे देश में अब अतिथि सत्कार दिखावा और बीते दिनों की बात हो चली है , मगर देश से इतनी दूर , भाटिया दम्पति ने जिस प्यार से विशुद्ध भारतीय भोजन कराया वैसा बहुत कम ही नजर आता है ! भोजन अच्छा तभी लगता है जब वह प्यार से कराया जाय इस मायने में श्रीमती भाटिया साक्षात् अन्नपूर्णा सी लगीं  यूँ भी जर्मनी में किसी भी भारतीय घर में, भारतीय भोजन की उपलब्धता होना आसान नहीं, अधिकतर जगह आपका स्वागत वेस्टर्न नाश्ते या भोजन से होगा क्योंकि यहाँ देशी सामग्री इम्पोर्टेड है और अधिकतर सामान जैसे तेल , देशी घी , हरी मिर्च , मसाले सब तलाश करने के लिए इंडियन स्टोर में ही जाना होगा एवं अत्यंत महंगे (गेंहू का आटा 5किलो 1200 रुपया) भी हैं ! 3000 sqft एरिया में बना उनका साफ़ सुथरा घर बॉलीवुड की फिल्म बनाने योग्य था इतने बड़े घर में धूल और अव्यवस्था का नाम नहीं उसके लिए इन दोनों की जितनी तारीफ की जाय वह कम ही होगी ! 

उसके बाद वे हमें गाँव भ्रमण पर ले गए एक साफ़ सुथरे खेत के बाहर एक छोटे स्टाल पर ताज़ी निकली सब्जियां जिसमें विभिन्न रंग के ऑक्टोपस नुमा कद्दू देखकर हम आश्चर्यचकित थे , सब्जियों पर रेट लिखा था साथ में छोटा सा मनी बॉक्स परन्तु बेंचने वाला कोई नहीं ! आप अपनी मन पसंद सब्जी उठाइये और पैसे बॉक्स में डाल दीजिये कोई देखने वाला नहीं कि आपने पैसे डाले भी कि नहीं  ..... 

एक अन्य जगह अंडे रखे दिखे, यहां भी रेट के साथ मनी बॉक्स था उठाइये, जितने चाहिए और पैसे डाल दीजिये ! आप बेईमानी करना चाहते हैं मुफ्त में ले जाइये कोई आप पर शक नहीं करेगा , सब आपसी विश्वास और भरोसा ! भाटिया जी ने यह भी कहा कि हम अधिकतर समय, घर खुले छोड़ आते हैं कोई ख़तरा नहीं, यहाँ कोई बेईमानी की सोंच भी नहीं सकता ! पुलिस या अन्य सरकारी विभाग रिश्वत लेने अथवा देने की कोई सोंच भी नहीं पाता ! 

इस छोटे से जर्मन गांव में , जब कोई व्यक्ति जब सड़क या पगडण्डी से, कुत्ते के साथ निकल रहा हो तब उसकी जेब में एक
डॉग पूप के लिए थैली यहाँ से लें 
छोटा लिफाफा होगा जिसे वह कुत्ते का पूप कलेक्ट करने के लिए रखता है इसके अलावा पगडण्डी के साथ साथ एक छोटा बक्सा होगा जिससे कोई भी लिफाफा निकाल सकता है किसी भी हालत में, कोई व्यक्ति  कुत्ते की पूप बाहर नहीं फेंकेगा ! 

यहाँ कौन देख रहा  .... वाले शब्द बोलने वाले लोगों के देश से आये हुए मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह सब देखना आश्चर्य के सिवा और कुछ नहीं था  .....

इस गांव में हर रास्ते में फूल और फल लगे देखे जिन्हें सुबह के अँधेरे में आकर भगवान की पूजा के लिए कोई नहीं चुराता ! पके हुए सेब हर घर में  लगे हैं और बाहर भी लटके हैं , इस खूबसूरती की हम अपने यहाँ कल्पना भी नहीं कर सकते , अगर किसी की जेब से टहलते हुए कोई तौलिया रूमाल या मोबाइल गिर जाए तो घबराने की कोई बात नहीं वह अगले दिन सुबह भी वहीँ पड़ा मिलेगा ! इस राम राज्य की कल्पना हमारे पूर्वजों ने सैकड़ों बरसों से की थी और लगता नहीं कि हमारे देश में जहाँ हर व्यक्ति चतुरसेन पहले है, अब कभी भी पूरी होगी ! पश्चिमी देशों की, बिना उन्हें देखे, समझे, मूर्खों की तरह  जमकर 
उनकी बुराई करते हैं यही हमारी सभ्यता को पहचान बची है ! अगर रामराज्य कहीं है तो वह वाकई इन देशों में है जिन्हें हम गाली देना अपनी शान समझते हैं !

यहाँ की सड़क पर स्पीड लिमिट तोड़ने को कोई कोशिश नहीं करता अगर किसी कैमरे में आ गयी तो जुर्माना जो लगभग १५००० रूपये होगा घर आ जाएगा और सफाई देने की कोई गुंजाइश नहीं ! मानव जीवन को यहाँ बहुमूल्य माना जाता है अगर आप
मुसीबत में हैं तब डिस्ट्रेस कॉल में एम्बुलेंस पंहुचने का समय ३ मिनट और अगर डॉ उपलब्ध न हो तो हैलकॉप्टर एम्बुलेंस तत्काल हाजिर होगी और मुफ्त का इलाज होगा ! राज भाई के 3 हार्ट ऑपरेशन हुए और बिलकुल मुफ्त , बदकिस्मती से आपके घर में बच्चे आपका ख़याल रखने और तीमारदारी करने को उपलब्ध नहीं हों तो नर्स की मुफ्त सेवा है आपका एक पैसा खर्च नहीं होगा ! सारा भारी भरकम बिल का खर्चा इंस्युरेन्स कम्पनियाँ उठाएंगी और बिना वह भी किसी लिखा पढ़ी के, सीधा हॉस्पिटल के साथ  !

शराब पीकर ड्राइविंग करना आपको कम से कम 40000 रूपये से 120000 रूपये तक महंगा पड़ सकता है यहाँ तक कि आपकी साइकिल पर अगर लाइटिंग इक्विपमेंट नहीं लगे हैं तब 2000 रुपया जुर्माना होगा अगर वह रेड लाइट क्रॉस करता है तो 60 यूरो ( 5000 रूपये ) जुर्माना है और पैदल चलने वाले को भी माफ़ी नहीं है , पेडस्ट्रियन क्रॉसिंग पर अगर आपने पैदल चलते हुए जल्दी से रेड लाइट जंपिंग की है तो 400 रुपया देने को तैयार रहिये !

यहाँ घर पर नौकर रखना और मरम्मत करवाना बेहद खर्चीला साबित होगा क्योंकि कामगरों की तनख्वाह बहुत अधिक हैं उनसे व्यक्तिगत काम कराना नया सामान खरीदने जितना पड सकता है अतः घरों में मरम्मत, रिपेयर, पेण्ट आदि खुद करना होता है !
सो यहाँ के लोग कामचोर नहीं है इसीलिए फिटनेस की कोई समस्या नहीं ! साईकिल से बाजार जाना , बगीचे की तथा अपने घर से बाहर की घास काटना, झाड़ू लगाना, बर्तन धोना , घर का फर्श आदि सब कुछ आपको खुद करना होगा वह और बात है कि अधिकतर काम के लिए आप मशीनों का उपयोग करते हैं ! 

राज भाई के घर में इन्होने एक कमरा वर्कशॉप में बदल रखा है , उनके पास हर तरह के टूल्स देखकर पता चला कि समय ने इन्हें हर काम खुद करना भी सिखा दिया इनके घर से निकलते समय एक संकल्प मैंने भी लिया कि अब से घर में अधिकतर काम और रिपेयर खुद करना है जब राज भाई यह कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं ! 

Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस गाँव में,कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते औ ज्वार की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ चलाना भी इन गुलाबों को 
आज भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते हाक़िम  
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरसती है,जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,देश में  नाले देखे !

Sunday, December 7, 2014

दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे - सतीश सक्सेना

समय प्रदूषित, लेकर आये,  क्या दोगे ?
कालचक्र विकराल,तुम मुझे क्या दोगे ?

दैत्य , शेर , सम्राट 
ऐंठ कर , चले गए !
शक्तिपुरुष बलवान

गर्व कर  चले गए ! 
मैं हूँ प्रकृति प्रवाह, 
तुम मुझे क्या दोगे ?  
हँसता काल विशाल, तुम मुझे क्या दोगे ?

मैं था ललित प्रवाह 
स्वच्छ जल गंगे का 
भागीरथ के समय 
बही, शिव गंगे का !
किया प्रदूषित स्वयं,
वायु, जल, वृक्षों को ?
कालिदास संतान ! तुम मुझे  क्या  दोगे ?

अपनी तुच्छ ताकतों 
का अभिमान लिए !
प्रकृति साधनों का 
समग्र अपमान किये  
करते खुद विध्वंस, 
प्रकृति संसाधन के !
धूर्त मानसिक ज्ञान, तुम मुझे क्या दोगे !

विस्तृत बुरे प्रयोग 
ज्ञान संसाधन  के  !
शिथिल मानवी अंग
बिना उपयोगों  के !
खंडित वातावरण, 
प्रभा मंडल  बिखरा ,
दुखद संक्रमण काल, तुम मुझे क्या दोगे !

यन्त्रमानवी बुद्धि , 
नष्ट कर क्षमता को,
कर देगी बर्बाद ,
मानवी प्रभुता को !
कृत्रिम मानव ज्ञान, 
धुंध मानवता पर !
अंधकार विकराल, तुम मुझे क्या दोगे !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे साथ में,ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हँस हँस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Thursday, July 10, 2014

कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !

झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,
कैसे कैसे लोग भी , गंगा  नहाये इन दिनों !

सैकड़ों बलवान चुनकर , राजधानी आ गए !
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !

देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !

ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए, 
साफ़ करने के लिए,चलती हवायें इन दिनों !

Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, 
सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, 
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, 
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  
है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

Thursday, February 20, 2014

आदतें पशुओं के जैसी, जानवर घबराएंगे ! - सतीश सक्सेना

मानवों की बस्तियों में , बेजुबां मर जाएंगे !
दूध के बदले उन्हें हम प्लास्टिक खिलवाएंगे

हम जहाँ होंगे ,वहीँ कुछ गंदगी बिखरायेंगे !
आदतें पशुओं के जैसी, जानवर  घबराएंगे !

हर मोहल्ले में,जिधर देखो, उधर कूड़ा पड़ा !
भिनभिनाती मख्खियों के साथ,बच्चे खायेंगे !

जाहिलों के द्वार, ये  आये हैं  खाना ढूंढते !

सडा खाना पन्नियों में डालकर खिलवाएंगे !

जूँठने , थैली में भरकर, घर के बाहर है रखी !

गाय देती दूध हमको, हम जहर खिलवाएंगे !

Monday, October 7, 2013

राजा हैं वे, औ हम है प्रजा , वे और बढ़ावा क्या देते - सतीश सक्सेना

अच्छा है दिखावे ख़त्म हुए , वे हमें कलावा क्या देते 
मंदिर में घुसने योग्य नहीं , वे हमें  चढ़ावा क्या देते ! 

जाते जाते,बातें करके,कुछ उखड़ा मन बहलाये थे !

वे अपने चेहरे दिखा गए , वे और छलावा क्या देते !

उसदिन तो हमारी तरफ देख ,वे हौले से मुस्काये थे !
राजा हैं वे,औ हम है प्रजा, वे और बढ़ावा क्या देते !

उस दिन देवों ने , उत्सव में, नर नारी भी बुलवाए थे ! 
बादल गरजे,बिजली चमकी,वे और बुलावा क्या देते !

रुद्राभिषेक करने हम तो,परिवार सहित जा पंहुचे थे  !
भक्ति के बदले मुक्ति मिली,वे इसके अलावा क्या देते !




Monday, July 22, 2013

मानव वेश में अक्सर फिरें, शैतान दुनिया में -सतीश सक्सेना

अगर ताकत तुम्हारे पास, सब स्वीकार दुनिया में !
कभी मांगे नहीं मिलते ,यहाँ अधिकार, दुनिया में !

फैसलों की घड़ी आये ,तो अपनी समझ से लेना,
मदारी रोज लगवाते हैं, जय जयकार दुनिया में !

किताबें खूब पढ़ डालीं, मगर लिखा नहीं पाया कि
पर्वत भी लिया करते हैं अब, प्रतिकार दुनिया में !

इसी बस्ती में, मानव रूप , कुछ  शैतान  रहते हैं !
बड़े सज धज सुशोभित रूप में मक्कार दुनिया में !

अधिकतर गिरने वाले घर के, अन्दर ही फिसलते हैं !  
तुम्हारे हर कदम पर , ध्यान की दरकार, दुनिया में !

Friday, June 21, 2013

हिमालय, को समझते,उम्र गुज़र जायेगी - सतीश सक्सेना

                   यह नहीं समझ आया, कि इंसानियत भूलों से, पहाड़ के नुक्सान को पूरा करने को , इस ग़ज़ल में ऐसा क्या लिखें   कि अर्थ पूरा हो ???
                   हमारी बेवकूफियों से पहाड़ रो रहे हैं , नदियाँ क्रोधित हैं , अगर नहीं सुधरे तो अभी बहुत कुछ सहना बाकी है  ! Ref: 16 june 2013, केदार घाटी 

लगता भूलों में ही यह, उम्र गुज़र जायेगी !
हिमालय को समझते, उम्र गुज़र जायेगी ! 

आज सब दब गए, इस दर्द के, पहाड़ तले
अब तो लगता है रोते, उम्र गुज़र जायेगी !

किसको मालूम था, उस रात उफनती, वह 
नदी, देखते देखते ऊपर से, गुज़र जायेगी !

कैसे मिल पाएंगे ?जो लोग, खो गए घर से,
मां को, समझाने में ही, उम्र गुज़र जायेंगी !

बहुत गुमान था, नदियों को बांधते, मानव 
केदार ऐ खौफ में ही, उम्र, गुज़र जायेगी  !

Saturday, December 17, 2011

अब शब्दों की जिम्मेदारी -सतीश सक्सेना


पिछली पोस्ट में प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी पढ़कर देखता ही रह गया ...
"मैंने तो मन की लिख डाली, 
अब शब्दों की जिम्मेदारी  ! "और उनको एक पत्र लिखा ...
प्रवीण भाई,
आपकी दी हुई उपरोक्त दो लाइने अच्छी लगी हैं ! इस गीत को आगे पूरा करने का दिल है ...इजाज़त दें तो  ... :-) 
और जवाब तुरंत आया ....
आपको पूरा अधिकार है, निश्चय ही बहुत सुन्दर सृजन होगा, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं मैने भी पर भाव अलग हैं। प्रतीक्षा रहेगी आपके गीत की। सादर ,   प्रवीण
प्रवीण पाण्डेय,मेरी नज़र में बहुत ऊंचा स्थान ही नहीं रखते अपितु उनकी रचनाओं से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है ! हिंदी भाषा का यह सौम्य सपूत वास्तव में बहुत आदर योग्य है ! 
उनके प्रति आभार के साथ, इस रचना का आनंद लें ...अगर आप लोग आनंदित हुए तो रचना सफल मानी जायेगी !

रचनाकारों की नगरी में 
मैंने कुछ रंग लगाये हैं 
अंतर्मन से ही नज़र पड़े 
ऐसे  अरमान जगाये हैं  !
मानवता गौरवशाली हो 
तब झूम उठे, दुनिया सारी !
मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी  !

ये शब्द ह्रदय से निकले हैं 

इन पर न कोई संशय आये
वाक्यों  के अर्थ बहुत से हैं,
अपने  भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की , 
हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी !
जाने क्या अर्थ निकालेगी, इन छंदों का,  दुनिया सारी !

असहाय, नासमझ जीवों  की 

आवाज़ उठाना लाजिम है !
मानव की कुछ करतूतों से  
आवरण उठाना वाजिब है !
पाशविक प्रवृत्ति का नाश करे,
मानवता हो, मंगल कारी
इच्छा है, अपनी भूलों को , स्वीकार करे दुनिया सारी !

जिस तरह  प्रकृति का नाश ,

करें खुद ही मानव की संताने
फल,फूल,नदी,झरते झरने
यादें लगती, बीते  कल  की  !
गहरा प्रभाव छोड़े अपना , 
कुछ ऐसी करें कलमकारी !
प्रकृति की अनुपम रचना का, सम्मान करे दुनिया सारी !

मृदु भावों का अहसास रहे ,

पिछली पीढ़ी का ध्यान रहे
बचपन से, मांगे  मुक्त हंसी
स्वागत सबका, सम्मान रहे !
दुश्मनी रंजिशें भूल अगर,
झूमेगी तब महफ़िल सारी !
यदि गैरों की भी पीड़ा का ,अहसास करे दुनिया भारी !

बच्चों को  टोकें , हंसने से !

कलियों को रोकें खिलने से
हर हृदय कष्ट में आ जाता 
आस्था पर प्रश्न उठाने से !
क्रोधित मन, कुंठाएँ पालें, 
ये बुद्धि गयी  कैसे मारी ! 
गुरुकुल की, शिक्षाएँ भूले , यह कैसी है पहरेदारी !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर

सुनकर उल्लास उठे मन से
कुछ ऐसा मृदु संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों से !
यदि गीतों में  झंकार न हो,
तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी  !
हर रचना के मूल्यांकन में इन शब्दों की जिम्मेदारी !

Monday, April 26, 2010

आभूषण रहित धरा को कर क्यों लोग मनाते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

कितने कवियों ने मौसम की
गाथा गायी कविताओं में !
अब मौसम पर कविता लिखते
लेखनी ठहर क्यों जाती है !
बरसों बीते , दिखती न कहीं 

हर ओर छा रही हरियाली !
अब धुआं भरे इस मौसम में क्यों लोग मनाते दीवाली ?


धरती की छाती से निकली 
सहमी सहमी कोंपलें दिखे
काला गहराता धुआं देख
कलियों में वह मुस्कान नहीं
जलवायु प्रकृति को दूषित कर 

धरती लगती खाली खाली
विध्वंस हाथ से अपना कर , क्यों लोग मनाते  दीवाली  ?

प्रकृति का चक्र बदलने को 
काटते पेड़ निर्दयता से  !
बरसात घटी बादल न दिखे
ठंडी जलधार बहे कैसे  !
कर रहीं नष्ट ख़ुद ही समाज,  

कालिदासों की संताने !
आभूषण रहित धरा को कर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अब नहीं नाचता मोर कहीं
घनघोर मेघ का नाम नहीं !
अब नहीं दीखता इन्द्रधनुष 
सतरंगी आभा साथ लिए !
कर उपवन स्वयं तवाह अरे 

क्यों फूल ढूँढता है माली ?
जहरीली सांसे लेकर अब,  क्यों लोग मनाते दीवाली ? 
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