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Wednesday, July 20, 2022
Monday, April 25, 2022
अब और न कुछ कह पाऊंगा, मन की अभिव्यक्ति मौन सही !
अब और न कुछ कह पाऊंगा, मन की अभिव्यक्ति मौन सही !
घर के अंदर , आ जाते हैं !
चाहे कितना भी दूर रहें ,
दिल से न निकाले जाते हैं !
ये लोग शांत शीतल जल में
तूफान उठाकर जाते हैं !
सीधे साधे मन पर, गहरे
हस्ताक्षर भी कर जाते हैं !
कहने को बहुत कुछ है लेकिन, अब यह अभिव्यक्ति मौन सही !
इस रंगमंच की दुनिया में
गहरी चोटें खायीं हमने !
कितनी ही रातें नींद बिना
किस तरह गुजारीं हैं हमने
जब दिल पर गहरे जख्म लगे
कुछ आकर मरहम लगा गए
इन प्यारों द्वारा ही कड़वे
अवशेष मिटाये जाते हैं !
अहसान न अपनों का होता सो यह अभिव्यक्ति मौन सही !
कुछ चित्रकार आसानी से
निज चित्र, उकेरे जाते हैं !
आहिस्ता से मुस्कानों के
गहरे रंग , छोड़े जाते हैं !
पत्थर पर निशाँ पड़े कैसे
अनजाने, दिल में कौन बसा
अनचाहे स्मृति चिन्ह बने
मेटे न मिटाये , जाते हैं !
कहने को जाने कितना है पर यह अभिव्यक्ति मौन सही !
Sunday, August 30, 2020
अरसे के बाद मिले जाना,इतने निशब्द,नहीं मिलते -सतीश सक्सेना
जाने कितने ही बार हमें, मौके पर शब्द नहीं मिलते !
अहसासों के आवेगों में जिह्वा को शब्द नहीं मिलते !
अहसासों के आवेगों में जिह्वा को शब्द नहीं मिलते !
सदियों बीतीं हैं यादों में , क्यों मौन डबडबाईं आँखें
अरसे के बाद मिले जाना, इतने निशब्द, नहीं मिलते !
उस दिन घंटों की बातें भी मिनटों में कैसे निपट गयीं
मिलने के क्षण जाने कैसे मनचाहे शब्द नहीं मिलते !
उस दिन घंटों की बातें भी मिनटों में कैसे निपट गयीं
मिलने के क्षण जाने कैसे मनचाहे शब्द नहीं मिलते !
कितना सब कहना सुनना था, पर वाणी कैसे मौन रहीं
दुनिया के व्यस्त बाज़ारों में, इतने अशब्द नहीं मिलते !
हर बार मिले तो आँखों की भाषा में ही प्रतिवाद किये
दुनिया के व्यस्त बाज़ारों में, इतने अशब्द नहीं मिलते !
हर बार मिले तो आँखों की भाषा में ही प्रतिवाद किये
कैसे भी अभागे हों जाना , इतने प्रतिबद्ध नहीं मिलते !
Friday, August 7, 2020
मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत -सतीश सक्सेना
हम तो केवल हंसना चाहें सबको ही, अपनाना चाहें
मुट्ठी भर जीवन पाए हैं
हंसकर इसे बिताना चाहें
खंड खंड संसार बंटा है ,
सबके अपने अपने गीत ।
देश नियम, निषेध बंधन में, क्यों बांधा जाए संगीत ।
नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वत
हमने लड़कर बाँट लिए।
पैर जहाँ पड़ गए हमारे ,
टुकड़े, टुकड़े बाँट लिए।
मिलके साथ न रहना जाने,
गा न सकें, सामूहिक गीत ।
अगर बस चले तो हम बांटे, चांदनी रातें, मंजुल गीत ।
कितना सुंदर सपना होता
पूरा विश्व हमारा होता ।
मंदिर मस्जिद प्यारे होते
सारे धर्म , हमारे होते ।
कैसे बंटे, मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत ।
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।
काश हमारे ही जीवन में
पूरा विश्व , एक हो जाए ।
इक दूजे के साथ बैठकर,
बिना लड़े, भोजन कर पायें ।
विश्व बंधु , भावना जगाने,
घर से निकले मेरे गीत ।
एक दिवस जग अपना होगा, सपना देखें मेरे गीत ।
जहाँ दिल करे, वहां रहेंगे
जहाँ स्वाद हो, वो खायेंगे ।
काले, पीले, गोरे मिलकर
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे ।
तोड़ के दीवारें देशों की,
सब मिल गायें मानव गीत ।
मन से हम आवाहन करते, विश्व बंधु बन, गायें गीत ।
श्रेष्ठ योनि में, मानव जन्में
भाषा कैसे समझ न पाए ।
मूक जानवर प्रेम समझते
हम कैसे पहचान न पाए ।
अंतःकरण समझ औरों का,
सबसे करनी होगी प्रीत ।
माँ से जन्में, धरा ने पाला, विश्व निवासी बनते गीत ?
मानव में भारी असुरक्षा
संवेदन मन, क्षीण करे ।
भौतिक सुख, चिंता, कुंठाएं
मानवता का पतन करें ।
रक्षित कर, भंगुर जीवन को,
ठंडी साँसें लेते मीत ।
खाई शोषित और शोषक में, बढती देखें मेरे गीत ।
अगर प्रेम, जज़्बात हटा दें
कुछ न बचेगा मानव में ।
बिना सहानुभूति जीवन में
क्या रह जाए, मानव में ।
पशुओं जैसी मनोवृत्ति से,
क्या प्रभाव डालेंगे गीत !
मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत ।
मुट्ठी भर जीवन पाए हैं
हंसकर इसे बिताना चाहें
खंड खंड संसार बंटा है ,
सबके अपने अपने गीत ।
देश नियम, निषेध बंधन में, क्यों बांधा जाए संगीत ।
नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वत
हमने लड़कर बाँट लिए।
पैर जहाँ पड़ गए हमारे ,
टुकड़े, टुकड़े बाँट लिए।
मिलके साथ न रहना जाने,
गा न सकें, सामूहिक गीत ।
अगर बस चले तो हम बांटे, चांदनी रातें, मंजुल गीत ।
कितना सुंदर सपना होता
पूरा विश्व हमारा होता ।
मंदिर मस्जिद प्यारे होते
सारे धर्म , हमारे होते ।
कैसे बंटे, मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत ।
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।
काश हमारे ही जीवन में
पूरा विश्व , एक हो जाए ।
इक दूजे के साथ बैठकर,
बिना लड़े, भोजन कर पायें ।
विश्व बंधु , भावना जगाने,
घर से निकले मेरे गीत ।
एक दिवस जग अपना होगा, सपना देखें मेरे गीत ।
जहाँ दिल करे, वहां रहेंगे
जहाँ स्वाद हो, वो खायेंगे ।
काले, पीले, गोरे मिलकर
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे ।
तोड़ के दीवारें देशों की,
सब मिल गायें मानव गीत ।
मन से हम आवाहन करते, विश्व बंधु बन, गायें गीत ।
श्रेष्ठ योनि में, मानव जन्में
भाषा कैसे समझ न पाए ।
मूक जानवर प्रेम समझते
हम कैसे पहचान न पाए ।
अंतःकरण समझ औरों का,
सबसे करनी होगी प्रीत ।
माँ से जन्में, धरा ने पाला, विश्व निवासी बनते गीत ?
मानव में भारी असुरक्षा
संवेदन मन, क्षीण करे ।
भौतिक सुख, चिंता, कुंठाएं
मानवता का पतन करें ।
रक्षित कर, भंगुर जीवन को,
ठंडी साँसें लेते मीत ।
खाई शोषित और शोषक में, बढती देखें मेरे गीत ।
अगर प्रेम, जज़्बात हटा दें
कुछ न बचेगा मानव में ।
बिना सहानुभूति जीवन में
क्या रह जाए, मानव में ।
पशुओं जैसी मनोवृत्ति से,
क्या प्रभाव डालेंगे गीत !
मानवता खतरे में पाकर, चिंतित रहते मानव गीत ।
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Friday, May 31, 2019
हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना
लगा सब धर्मों का मेला
भीड़ का है रेलम पेला
सूफियों का विरक्त संसार
मिले शर्तों के बदले राह
भीड़ का है रेलम पेला
अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें
कतारें, लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !
प्यार की, कष्टों में दरकार
मिले स्पर्श नेह इक साथ
मुसीबत में शबरी का संग
लगे परमेश्वर का दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे
मिले स्पर्श नेह इक साथ
मुसीबत में शबरी का संग
लगे परमेश्वर का दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे
हर भवन में , ईश्वर न्यारे !
पीठ पर है निर्भय अहसास
पीठ पर है निर्भय अहसास
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !सूफियों का विरक्त संसार
हमारी दुनिया न्यारी रे !!
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
यहाँ सारे व्यापारी रे !!
शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पियेंगे सागर तट से ही
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आये देने विश्वास
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को
डुबायें दर्द, दीवानी में !
कौन आये देने विश्वास
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे
पागलों में ही, यारी रे !!
Monday, August 7, 2017
Friday, June 23, 2017
जाने कहाँ वे खो गए कुछ शब्द, जो बोले नहीं - सतीश सक्सेना
बरसों से सोंचे शब्द भी उस वक्त तो बोले नहीं
विश्वास ही पहचान हो निर्मल ह्रदय की भावना
मृदु ह्रदय मंजुल भाव तो हमने कभी तौले नहीं !
जब सामने खुद श्याम थे तब रंग ही घोले नहीं !
कुछ अनछुए से शब्द थे, कह न सके संकोच में,
जानेंगे क्या छूकर भी,हों जब राख में शोले नहीं !
जानेंगे क्या छूकर भी,हों जब राख में शोले नहीं !
प्रत्यक्ष देव,विरक्त मन, किससे कहें, नंदी के भी
सीने में कितने राज हैं,जो आज तक खोले नहीं !
विश्वास ही पहचान हो निर्मल ह्रदय की भावना
मृदु ह्रदय मंजुल भाव तो हमने कभी तौले नहीं !
उलझी अनिश्चय में रही, मंदाकिनी हर रूप में
थी चाहती निर्झर बहे, शिवकेश थे,भोले नहीं !
Monday, December 5, 2016
मेरे जाने पर मेरी आँख, गुर्दे, ह्रदय, लीवर जलाना नहीं - सतीश सक्सेना
जिन मित्रों को मेरी उम्र पता चल जाती है वे मेरे नाम के साथ आदरणीय लगाना शुरू कर मुझे अपने से दूर कर देते हैं, मुझे लगता है आदर देने की जगह अपनापन और उन्मुक्त व्यवहार मिलता तो अधिक अच्छा था , उसमें मुझे अधिक फायदा होता ! अक्सर अधिक उम्र वालों को आदर देकर हम अपने से दूर रखने में सफल होते हैं जबकि उन्हें इस आदर से अधिक मित्रता की आवश्यकता अधिक होती है !
मेरे यहाँ कई मित्र हैं जिन्हें मैं बुड्ढा कहता हूँ , अपनी बेटी को नसीहत देते समय, बुढ़िया, और कई महिला मित्रों को उनके जबरदस्त स्नेही स्वभाव और अपनापन के कारण अम्मा कहने में आनंद आता है ! पूरे जीवन हम अपने आपको ढंके रहते हैं , घर परिवार , यहाँ तक कि बच्चों तक से औपचारिक व्यव्हार करने के आदि हो गए हैं ! आदर हो या स्नेह , खुल कर करें , यही ईमानदारी है ! अपनापन को दिखावा क्यों ?
मेरे यहाँ कई मित्र हैं जिन्हें मैं बुड्ढा कहता हूँ , अपनी बेटी को नसीहत देते समय, बुढ़िया, और कई महिला मित्रों को उनके जबरदस्त स्नेही स्वभाव और अपनापन के कारण अम्मा कहने में आनंद आता है ! पूरे जीवन हम अपने आपको ढंके रहते हैं , घर परिवार , यहाँ तक कि बच्चों तक से औपचारिक व्यव्हार करने के आदि हो गए हैं ! आदर हो या स्नेह , खुल कर करें , यही ईमानदारी है ! अपनापन को दिखावा क्यों ?
बरसों से खूनदान के लिए कई हॉस्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि वे मुझे खून की कमी के वक्त बुला सकते हैं ! मरते दम तक किसी के काम आ जाएँ तो जीवन सफल हो इस इच्छा को निभाते हुए , बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में अपने शरीर के सारे अंग और शरीर दान कर चुका हूँ !
यह लिख रहा हु ताकि सनद रहे और मित्र मेरी मृत्यु पर परिवार को मेरा संकल्प याद दिलाएं कि यह ऑंखें , गुर्दे, ह्रदय और लीवर किसी को जीवनदान देने में सक्षम हैं !
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Wednesday, November 23, 2016
इक दिन के लिए द्वार पे , रहमान बन के आ - सतीश सक्सेना
किसने कहा कि दिल में तू मेहमान बनके आ,
ये तेरी सल्तनत है, तू सुल्तान बन के आ !
साँसे तो कुछ बाकी तेरे दीदार के लिए,
मुफलिस के पास कर्ज का भुगतान बन के आ !
मुफलिस के पास कर्ज का भुगतान बन के आ !
कब तक यहाँ तड़पें सनम रह के भी बावफ़ा,
इक दिन के लिए द्वार पे , रहमान बन के आ !
इक दिन के लिए द्वार पे , रहमान बन के आ !
पहली दो पंक्तियाँ सुदेश आर्या द्वारा लिखी हैं , उनके द्वरा अनुरोध किये जाने पर यह ग़ज़ल पूरी बन गयी !
Sunday, August 21, 2016
जाने कितने बरसों से यह बात सालती जाती है - सतीश सक्सेना
जैसे कल की बात रही
गेहूं चुरा के घर से लड्डू
बर्फी, खाया करते थे !
बड़े सवेरे दौड़ बाग़ में
आम ढूंढते रहते थे !
कहाँ गए वे संगी साथी
कहाँ गए वे संगी साथी
बचपन जाने कहाँ गया !
कस के मुट्ठी बाँधी फिर भी, रेत फिसलती जाती है !
इतनी जल्दी क्या सूरज को ?
रोज शाम गहराती है !
बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के वैभव को देखा
हमने भी ,ऐयारी सीखी !
धीरे धीरे रंजिश की, कुछ बातें खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
मैली होती जाती है !
रोज शाम गहराती है !
बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के वैभव को देखा
हमने भी ,ऐयारी सीखी !
धीरे धीरे रंजिश की, कुछ बातें खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
मैली होती जाती है !
अपने चन्दा से, अभाव में
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !
अपनी बीमारी से लड़ते,
कदम कदम पर गिरती होंगीं !
जाने कितने बरसों से, यह बात सालती जाती है !
धीरे धीरे ही साहस की परतें
खुलती जाती हैं !
Saturday, July 9, 2016
संवेदना बिलख कर रोये,कवि न वहां पाये जाएंगे - सतीश सक्सेना
यह कैसा माहौल ? अब यहाँ द्वेष गीत गाये जाएंगे !
संवेदना बिलख के रोये ,कवि न यहां पाये जाएंगे !
दयाहीनता के आलम में उम्मीदें तो कम हैं लेकिन
संवेदन संतप्त ह्रदय की, हम कसमें खाये जाएंगे !
द्वेषभाव को जल देने को,ढेरों लोग उगे हैं फिर भी
दिल से दूषित भाव हटाने, गंगा हम लाये जाएंगे !
आग लगाते इन शोलों में, ह्रदय वेदना कौन पढ़ेगा,
जब तक सूरज आसमान में,हम छप्पर छाये जाएंगे !
राजनीति के इन धूर्तों ने, बेशर्मी की हदें पार कीं,
जल्द आयेगा वक्त,रेत के किले सभी ढाए जाएंगे !
द्वेषभाव को जल देने को,ढेरों लोग उगे हैं फिर भी
दिल से दूषित भाव हटाने, गंगा हम लाये जाएंगे !
आग लगाते इन शोलों में, ह्रदय वेदना कौन पढ़ेगा,
जब तक सूरज आसमान में,हम छप्पर छाये जाएंगे !
राजनीति के इन धूर्तों ने, बेशर्मी की हदें पार कीं,
जल्द आयेगा वक्त,रेत के किले सभी ढाए जाएंगे !
Friday, July 1, 2016
आ जाएँ , बैठें पास मेरे , बतलायें, भारत कहां लिखूँ - सतीश सक्सेना
लो आज कष्ट की स्याही से
संतप्त ह्रदय का गान लिखूं
धनपतियों से इफ़्तार दिला
मैं निर्धन का रमजान लिखूं
बतलाओ तुमको यार कहूँ ,
या केवल मित्र सुजान लिखूं !
अनुराग कहां सम्मानित हो
मनुहार रचाये चरणों में !
आ जाएं कभी आनंदमयी, बतलायें व्यथा मन कहां लिखूं !
नेताओं को कह देश भक्त ,
अधपके देश की शान लिखूं
धन पर मरते, सन्यासी को
दरवेशों का लोबान लिखूं !
या बरसों बाद मिले, जीवन
में, भूखे का जलपान लिखूं
धनपति बनने को राष्ट्रभक्त
उग आये, रातों रात यहाँ !
कह जाएं किसी दिन रूपमयी , मन का वृन्दावन कहां लिखूं !
सूरज को श्रद्धा नत होकर ,
मंत्री का स्वागत गान लिखूं !
या तिल तिल कर मरते, निर्जल
इन वृक्षों को , उपहार लिखूं !
उम्मीदों में , बादलों सहित,
आती बारिश जलधार लिखूं !
कोसों तक प्यार नहीं दिखता
नफ़रत फैलाती , दुनिया में !
पथ दिखलायें ,अनुरागमयी, बोलें न , बुलावन कहां लिखूं !
संक्रमण काल में गीत बना
कर छंदों का अपमान लिखूं
या धूर्त काल में गीतों की
चोरी कर काव्य महान लिखूं
फिर महागुरु के चरण पकड़
कर, उनको दिव्य सुजान लिखूं
कवितायें जन्म कहाँ लेंगी ,
गुरु शिष्य बिकाऊ जिस घर में,
आ जाएं एक दिन दिव्यमयी, कह जाएं, स्तवन कहां लिखूं !
बंगाल सिंध कश्मीर कटा,
नफरत में, हिंदुस्तान लिखूं ,
जिसके रिश्ते, आधे उसमें
उस घर को, पाकिस्तान लिखूं !
गांधार, पाणिनी आर्यक्षेत्र को
अब अफ़ग़ानिस्तान लिखूं !
कुल, जाति, धर्म, फ़र्ज़ी गुरुर
पाले, नफरत में हांफ रहे !
आ जाएं किसी दिन करुणमयी , समझाएं तपोवन कहां लिखूं !
संतप्त ह्रदय का गान लिखूं
धनपतियों से इफ़्तार दिला
मैं निर्धन का रमजान लिखूं बतलाओ तुमको यार कहूँ ,
या केवल मित्र सुजान लिखूं !
अनुराग कहां सम्मानित हो
मनुहार रचाये चरणों में !
आ जाएं कभी आनंदमयी, बतलायें व्यथा मन कहां लिखूं !
नेताओं को कह देश भक्त ,
अधपके देश की शान लिखूं
धन पर मरते, सन्यासी को
दरवेशों का लोबान लिखूं !
या बरसों बाद मिले, जीवन
में, भूखे का जलपान लिखूं
धनपति बनने को राष्ट्रभक्त
उग आये, रातों रात यहाँ !
कह जाएं किसी दिन रूपमयी , मन का वृन्दावन कहां लिखूं !
सूरज को श्रद्धा नत होकर ,
मंत्री का स्वागत गान लिखूं !
या तिल तिल कर मरते, निर्जल
इन वृक्षों को , उपहार लिखूं !
उम्मीदों में , बादलों सहित,
आती बारिश जलधार लिखूं !
कोसों तक प्यार नहीं दिखता
नफ़रत फैलाती , दुनिया में !
पथ दिखलायें ,अनुरागमयी, बोलें न , बुलावन कहां लिखूं !
संक्रमण काल में गीत बना
कर छंदों का अपमान लिखूं
या धूर्त काल में गीतों की
चोरी कर काव्य महान लिखूं
फिर महागुरु के चरण पकड़
कर, उनको दिव्य सुजान लिखूं
कवितायें जन्म कहाँ लेंगी ,
गुरु शिष्य बिकाऊ जिस घर में,
आ जाएं एक दिन दिव्यमयी, कह जाएं, स्तवन कहां लिखूं !
बंगाल सिंध कश्मीर कटा,
नफरत में, हिंदुस्तान लिखूं ,
जिसके रिश्ते, आधे उसमें
उस घर को, पाकिस्तान लिखूं !
गांधार, पाणिनी आर्यक्षेत्र को
अब अफ़ग़ानिस्तान लिखूं !
कुल, जाति, धर्म, फ़र्ज़ी गुरुर
पाले, नफरत में हांफ रहे !
आ जाएं किसी दिन करुणमयी , समझाएं तपोवन कहां लिखूं !
Wednesday, June 15, 2016
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं -सतीश सक्सेना
हम भी यूँ तो गिरेंगे, जमीं पर नहीं !
वैसे हंसकर कहूँ , यदि बुरा न लगे
तुम निछावर हुये हो, हमीं पर नहीं !
पर भरोसा सा है, आओगे एक दिन
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं !
वे मेहरबां सभी पर, हमीं पर नहीं !
हंसने का भी समय, हो मुक़र्रर यहाँ
खूब खुल के हंसें पर गमीं पर नहीं !
हंसने का भी समय, हो मुक़र्रर यहाँ
खूब खुल के हंसें पर गमीं पर नहीं !
वैसे हंसकर कहूँ , यदि बुरा न लगे
तुम निछावर हुये हो, हमीं पर नहीं !
पर भरोसा सा है, आओगे एक दिन
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं !
Sunday, June 5, 2016
कैसी व्यथा लिखा के लाई अपनी मांग भराई में -सतीश सक्सेना
अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके हैं यह आपको पता ही नहीं चलता !
बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं !
भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते पाये जाते हैं !
अक्सर इसकी शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है !
आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा !
घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते !
अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए !
दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें .....
आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी !
ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की !
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !
http://satish-saxena.blogspot.in/2014/10/blog-post_28.html
बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं !
भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते पाये जाते हैं !
अक्सर इसकी शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है !
आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा !घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते !
अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए !
दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें .....
आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी !
ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की !
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !
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Thursday, May 12, 2016
Friday, April 22, 2016
! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना
आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !
जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!
है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !
निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !
नमस्तुभ्यं मां शारदे, वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !
नमस्तुभ्यं मां शारदे, वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !
आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !
हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !
गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !
Monday, April 11, 2016
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये -सतीश सक्सेना
कल ही कुछ याद किया, रात सो नहीं पाये
औ तड़प के जो बुलाया भी , तो नहीं पाये !
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये !
कसम खुदा की सिर्फ खैरियत बता जाएँ !
खिले वसंत अहले दिल से,खो नहीं पाये !
जाने कब से थे मेरे साथ,जानता ही नहीं
बिन कहे जान सकें अक्ल ,वो नहीं पाये !
तुझे हर बार मना ही किया था मिलने को
आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये !
Friday, April 8, 2016
सितारे भूल गलती से मेरे आँगन में आ बरसे - सतीश सक्सेना
लगा जैसे चमन को भूल कंटक बन में आ बरसे !
लगा सहला गयीं यादें, उन्हें हमसे बिछड़ने की
बिना आवाज आहिस्ता से सूनेपन में आ बरसे !
बिना आवाज आहिस्ता से सूनेपन में आ बरसे !
हमारा घर तो कोसों दूर था, जल के किनारे से,
अचानक फूट के झरने, मेरे जीवन में आ बरसे !
हमारा क्या अकेले हैं, कहीं सो जाएंगे थक के
तुम्ही पछताओगे ऐसे, कहाँ निर्जन में आ बरसे !
अचानक फूट के झरने, मेरे जीवन में आ बरसे !
हमारा क्या अकेले हैं, कहीं सो जाएंगे थक के
तुम्ही पछताओगे ऐसे, कहाँ निर्जन में आ बरसे !
Monday, April 4, 2016
कुछ मिलावट लग रही है जहर में -सतीश सक्सेना
पहले जल्दी सी नहीं थी शहर में ,
बहुत कुछ था बुजुर्गों के सबर में !
कैसे इस दिल में अभी भी जान है !
कुछ मिलावट तो नहीं है जहर में !
मना कर दो,हम चले ही जाएंगे !
कब तलक लटके रहेंगे अधर में !
तेरे जाने का यकीं दिल को नहीं
बेईमानी ही लगी , इस खबर में !
होश में जाना दिलाने याद कुछ
दम अभी बाकी बचा है, लहर में !
बहुत कुछ था बुजुर्गों के सबर में !
कैसे इस दिल में अभी भी जान है ! कुछ मिलावट तो नहीं है जहर में !
मना कर दो,हम चले ही जाएंगे !
कब तलक लटके रहेंगे अधर में !
तेरे जाने का यकीं दिल को नहीं
बेईमानी ही लगी , इस खबर में !
होश में जाना दिलाने याद कुछ
दम अभी बाकी बचा है, लहर में !
Saturday, March 26, 2016
हम जैसे सख्त जान भी, बरबाद हो गए ! -सतीश सक्सेना
कुछ श्राप भी दुनिया में आशीर्वाद हो गए,
जब भी तपाया आग में, फौलाद हो गए !
यह राह खतरनाक है , सोचा ही नहीं था ,
हम जैसे सख्तजान भी, बरबाद हो गए !
कितने तो कट गए बिना आवाज किये ही
बच वे ही सके, जो कहीं आबाद हो गये !
ख़त ध्यान से पढ़ने की जरूरत ही नहीं थी
हर शब्द के मनचाहे से, अनुवाद हो गए !
क्यों दर पे तेरे आके ही सर झुक गया मेरा
काफिर न जाने क्यों यहाँ , सज़्ज़ाद हो गए !
न जाने कब से तेरे सामने बेबस रहे थे हम
इस बार उड़ाया तो , हम आज़ाद हो गए !
जब भी तपाया आग में, फौलाद हो गए !
यह राह खतरनाक है , सोचा ही नहीं था ,हम जैसे सख्तजान भी, बरबाद हो गए !
कितने तो कट गए बिना आवाज किये ही
बच वे ही सके, जो कहीं आबाद हो गये !
ख़त ध्यान से पढ़ने की जरूरत ही नहीं थी
हर शब्द के मनचाहे से, अनुवाद हो गए !
क्यों दर पे तेरे आके ही सर झुक गया मेरा
काफिर न जाने क्यों यहाँ , सज़्ज़ाद हो गए !
न जाने कब से तेरे सामने बेबस रहे थे हम
इस बार उड़ाया तो , हम आज़ाद हो गए !
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