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Friday, July 24, 2020

न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना

जब से फ्री व्हाट्सप्प और कई तरह के मेसेंजर आये है तब से दोस्तों के, परिवार जनों के गुड मॉर्निंग, विभिन्न अवसर पर बधाई सन्देश इतने आने लगे हैं कि अगर सब संदेशों का जवाब दिया जाये तो रोज सुबह एक घंटा कम से कम लगता है ! सन्देश भेजने वाला दोस्त कॉपी पेस्ट कर उस सन्देश को २० मित्रों को एक साथ भेजता है और भूल जाता है , उसकी यह समझ है कि इससे मित्रता संबंधों में गर्माहट रहती है , जबकि सच्चाई यह है कि अगर नेट पर एक सन्देश भेजने की कीमत 5 रुपया कर दी जाए तो सारी गर्माहट और प्यार गायब हो जाएगा और एक भी सन्देश भेजना दूभर हो जाएगा !

अगर आपस में वास्तविक प्यार है तो वह वक्त पर अपनी पहचान भी करा देगा और अहसास भी , उसके लिए कृत्रिम शब्दों का प्रयोग बिलकुल आवश्यक नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्रा है अगर प्यार का दिखावा करना आवश्यक हो तभी इन संदेशों की उपयोगिता है अन्यथा यह हमारे चारो और एक मास्क आवरण का काम ही करते हैं जो वक्त पर कभी दिखाई नहीं पड़ेंगे !  

यह दिखावा शायद हमारे देश में सबसे अधिक होता है , हैरानी की बात यह है कि कुछ अच्छे और शानदार व्यक्तित्व भी इसे आवश्यक मानकर इतना आत्मसात कर चुके हैं कि वे इसे आवश्यक मानते हैं और दूसरी तरफ से यही उम्मीदें भी करते हैं ! स्नेह और प्यार का अहसास अब इन कृत्रिम बधाई और नमन संदेशों ने ले लिया है !

मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? 

कुछ लोग मुझे कवि समझते हैं कुछ साहित्यकार जबकि यह सम्बोधन सुनकर मुझे चिढ होती है , 300 से अधिक कवितायें लिखी हैं
मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए ! 

आज हिंदी साहित्यकार गिने चुने ही बचे हैं और जो वाकई साहित्यकार हैं उनमें से भी अधिकतर अपनी जयकार बोलते चेलों से घिरे रहते हैं तो मुझे लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व सिर्फ अपने शिष्यों के बीच में ही साहित्यकार है , अभिव्यक्ति से इसका शायद ही कोई सरोकार हो और जिसकी भाषा ही सामान्य जन अभिव्यक्ति के किसी काम की न हो वह साहित्यकार हो ही नहीं सकता वह सिर्फ क्लिष्ट हिंदी शब्दों का उपयोग कर, अपनी विद्वता सिद्ध करने की कोशिश करता , एक तुच्छ जीव है जो गरीब हिंदी के ऊपर सवार होकर अपनी जयकार  बुलवाने में सफल रहा है !

प्रणाम आप सबको !!
    

Monday, October 29, 2018

कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना -सतीश सक्सेना

इस हिन्दुस्तान में रहते , अलग पहचान सा लिखना !
कहीं  गंगा किनारे  बैठ कर , रसखान सा लिखना !
 
दिखें यदि घाव धरती के, तो आँखों को झुका लिखना  
घरों में बंद, मां बहनों पे, कुछ आसान सा लिखना !

विदूषक बन गए मंचाधिकारी , उनके शिष्यों के ,
अनुग्रह पुरस्कारों के लिए, अपमान सा लिखना !

किसी के शब्द शैली को चुराये मंच कवियों औ ,
जुगाड़ू  गवैयों , के बीच कुछ प्रतिमान सा लिखना !

व्यथा लिखने चलो तब, तड़पते परिवार को लेकर
हजारों मील, पैदल चल रहे , इंसान पर लिखना !

तेरे मन की तड़प अभिव्यक्ति जब चीत्कार कर बैठे
बिना परवा किये तलवार की, सुलतान सा लिखना !

Sunday, August 19, 2018

निराशाओं के दौर में जीना कर्तव्य बन जाता है : सतीश सक्सेना

बढ़ती उम्र, घटती सामर्थ्य, अपनों में ही कम होता महत्व, बुढ़ापा जल्दी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ! पूरे जीवन सम्मान से जीते हुए इंसान के लिए, निराशाओं के इस दौर में हँसते हुए जीना कर्तव्य होना चाहिए साथ ही बदलते समय से समझौता कर, अपने कार्यों का पुनरीक्षण करना, लगातार होती हुई गलतियों में सुधार भी, परिपक्व उम्र की आवश्यकता होती है ! 
निराशा बेहद खतरनाक रोल अदा करती है इससे बाहर निकलने के लिए नयी रुचियाँ और उत्साह पैदा करना होगा अन्यथा यह निराशा असमय जान लेने में समर्थ है ! 

गोपालदास नीरज की यह कालजयी रचना मुझे बेहद पसंद है 

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,
उन मुश्किलों में मुस्कुराना , धर्म है।

जिस वक़्त जीना गैर मुमकिन सा लगे,
उस वक़्त जीना फर्ज है इंसान का,
लाजिम लहर के साथ है तब खेलना,
जब हो समुन्द्र पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।


जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयं जंजीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।

Thursday, May 10, 2018

चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ? -सतीश सक्सेना

घर कुटुंब की जिम्मेदारी क्या समझेंगे ?
शक संशय में रिश्तेदारी,क्या समझेंगे ?

पर निंदा ,उपहास में, रस तलाशने वाले
व्यथित पिता की हिस्सेदारी क्या समझेंगे ?


नन्हीं बच्ची, तिनके चुग्गा लाने निकली
चिंतित माँ की चौकीदारी क्या समझेंगे ?

सुंदरता में फंस कर ,कितने राजा डूबे
धूर्त कैकेयी की मक्कारी क्या समझेंगे ?

अभी नशे में डूबे हैं , सरकार हुस्न की
चकाचौंध में,आपसदारी क्या समझेंगे ?

Friday, February 9, 2018

उम्मीदें कुछ कम कर बेटा -सतीश सक्सेना

अर्थ अनर्थ है,अक्सर बेटा !
शब्द अर्थ,रूपान्तर बेटा !


क्रूर, कुटिल, सूखे पत्थर में ,
धड़कन,न तलाश कर बेटा !

सूख गए , तालाब प्यार के
अब न रहे, पद्माकर बेटा !

इस निष्ठुर जंगल में तुमको
मिलें खूब , आडम्बर बेटा !

अच्छे दिन जुमले हैं केवल,
उम्मीदें कुछ कम कर बेटा !


Monday, August 7, 2017

एक मित्र को दी गयी सलाह - सतीश सक्सेना


अगर परिवार में कुछ समय से बिना कारण एक घातक लड़ाई का वातावरण तैयार हो चुका हो तो आपस में न लड़कर शांत मन से तलाश करें कि घर में कोई भेड़िया तो नहीं आ गया जिसे आपने कुत्ता समझकर घर की चौकीदारी ही सौंप दी हो !


अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते !

Saturday, July 8, 2017

क्षमा करें,यदि चढ़ा न पायें, अर्ध्य देव को,मेरे गीत - सतीश सक्सेना

नेह के प्यासे धन की भाषा
कभी समझ ना पाए थे !
जो चाहे थे ,नहीं मिल सका 
जिसे न माँगा , पाए थे !

इस जीवन में, लाखों मौके,
हंस के छोड़े, हमने मीत !
धनकुबेर को, सर न झुकाया, बड़े अहंकारी थे गीत !


जीवन भर तो रहे अकेले
झोली कहीं नहीं फैलाई
गहरे अन्धकार में रहते ,
माँगा कभी दिया, न बाती
कभी न रोये, मंदिर जाकर ,
सदा मस्त रहते थे गीत !
कहीं किसी ने, दुखी न देखा, जीवन भर मुसकाए गीत  !

सब कहते, ईश्वर लिखते ,
है, भाग्य सभी इंसानों का !
माता पिता छीन बच्चों से
चित्र बिगाड़ें, बचपन का !
कभी मान्यता दे न सकेंगे,
निर्मम रब को, मेरे गीत !
मंदिर, मस्जिद, चर्च न जाते, सर न झुकाएं मेरे गीत ! १०

बचपन से, ही रहे खोजता
ऐसे , निर्मम, साईं को !
काश कहीं मिल जाएँ मुझे
मैं करूँ निरुत्तर, माधव को !
अब न कोई वरदान चाहिए,
सिर्फ शिकायत मेरे मीत !
विश्व नियंता के दरवाजे , कभी न जाएँ , मेरे गीत !

क्यों तकलीफें देते, उनको ?
जिनको शब्द नहीं मिल पाए !
क्यों दुधमुंहे, बिलखते रोते
असमय, माँ से अलग कराये !
तड़प तड़प कर अम्मा खोजें,
कौन सुनाये इनको गीत !
भूखे पेट , कांपते पैरों , ये कैसे , गा पायें गीत ??

जैसी करनी, वैसी भरनी !
पंडित , खूब सुनाते आये !
पर नन्हे हाथों की करनी
पर, मुझको विश्वास न आये
तेरे महलों क्यों न पहुँचती 
ईश्वर, मासूमों की चीख !
क्षमा करें, यदि चढ़ा न पायें अर्ध्य, देव को, मेरे गीत !

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Monday, December 5, 2016

मेरे जाने पर मेरी आँख, गुर्दे, ह्रदय, लीवर जलाना नहीं - सतीश सक्सेना

जिन मित्रों को मेरी उम्र पता चल जाती है वे मेरे नाम के साथ आदरणीय लगाना शुरू कर मुझे अपने से दूर कर देते हैं, मुझे लगता है आदर देने की जगह अपनापन और उन्मुक्त व्यवहार मिलता तो अधिक अच्छा था , उसमें मुझे अधिक फायदा होता ! अक्सर अधिक उम्र वालों को आदर देकर हम अपने से दूर रखने में सफल होते हैं जबकि उन्हें इस आदर से अधिक मित्रता की आवश्यकता अधिक होती है !
मेरे यहाँ कई मित्र हैं जिन्हें मैं बुड्ढा कहता हूँ , अपनी बेटी को नसीहत देते समय, बुढ़िया, और कई महिला मित्रों को उनके जबरदस्त स्नेही स्वभाव और अपनापन के कारण अम्मा कहने में आनंद आता है ! पूरे जीवन हम अपने आपको ढंके रहते हैं , घर परिवार , यहाँ तक कि बच्चों तक से औपचारिक व्यव्हार करने के आदि हो गए हैं ! आदर हो या स्नेह , खुल कर करें , यही ईमानदारी है ! अपनापन को दिखावा क्यों ?

बरसों से खूनदान के लिए कई हॉस्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि वे मुझे खून की कमी के वक्त बुला सकते हैं ! मरते दम तक किसी के काम आ जाएँ तो जीवन सफल हो इस इच्छा को निभाते हुए , बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में अपने शरीर के सारे अंग और शरीर दान कर चुका हूँ !

यह लिख रहा हु ताकि सनद रहे और मित्र मेरी मृत्यु पर परिवार को मेरा संकल्प याद दिलाएं कि यह ऑंखें , गुर्दे, ह्रदय और लीवर किसी को जीवनदान देने में सक्षम हैं !

Sunday, August 21, 2016

जाने कितने बरसों से यह बात सालती जाती है - सतीश सक्सेना

जैसे कल की बात रही 
हम कंचे खेला करते थे !
गेहूं चुरा के घर से लड्डू 
बर्फी,  खाया करते थे !
बड़े सवेरे दौड़ बाग़ में 
आम ढूंढते  रहते थे ! 
कहाँ गए वे संगी साथी 
बचपन जाने कहाँ गया  !
कस के मुट्ठी बाँधी फिर भी, रेत फिसलती जाती है !
इतनी जल्दी क्या सूरज को ? 
रोज शाम गहराती है !

बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के वैभव को देखा
हमने भी ,ऐयारी सीखी !

धीरे धीरे रंजिश की, कुछ बातें खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
मैली होती जाती है !

अपने चन्दा से, अभाव में 
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी 
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !   
अपनी बीमारी से लड़ते,
कदम कदम पर गिरती होंगीं !
जाने कितने बरसों से, यह बात सालती जाती है !
धीरे धीरे ही साहस की परतें 
खुलती जाती हैं !

Sunday, June 5, 2016

कैसी व्यथा लिखा के लाई अपनी मांग भराई में -सतीश सक्सेना

अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों  एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके हैं यह आपको पता ही नहीं चलता !
बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं !
भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते  पाये जाते हैं ! 
अक्सर इसकी  शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है !
आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी  याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा !
घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते  !
अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए !
दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें  .....
आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी !

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! 
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !
http://satish-saxena.blogspot.in/2014/10/blog-post_28.html

Tuesday, March 8, 2016

किसी की वेदना के साथ,मन में वेदना तो हो - सतीश सक्सेना

युवा आचार्य  विवेक जी  की कही दो पंक्तियाँ दिल में उतर गयीं , और एक काव्य अभिव्यक्ति ने जन्म ले लिया , आभार संत विवेक जी का , प्रणाम करते हुए यह रचना उन्हीं के सद्प्रयासों को समर्पित करता हूँ !

न हो यदि आस्था, श्रद्धा, मगर संवेदना तो हो !
किसी की वेदना के साथ, मन में वेदना तो हो !

भले विश्वास ईश्वर पर न हो, पर भावना तो हो !
वहां पर सर झुके या न झुके पर चेतना तो हो !

हजारों बार गप्पें मारते , शमशान हो  आये,
किसी का पुत्र कंधे पर हो, अंतर्वेदना तो हो !

सभी नज़रें झुका लेते , तेरे  दरबार में आकर ,
किसी गुस्ताख़ का नज़रें मिलाके छेड़ना तो हो !

ये गुस्सा, ये विरक्ति, ये नज़र नीचे हुई कैसे , 
हमीं खो जाएंगे, विश्वास की अवमानना तो हो ! 


Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाओ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
क्या जरूरत जंगली से, प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कड़वाहट कैसे कर पाए, अनुवाद गीत भाषाओं  का ! 
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम भाषाओं का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें, जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

ईर्ष्यालु समझ पाएगा क्या, जीवन स्नेहिल रंगों को 
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनिया को कुटिलों ने
अनुभूति समर्पण न जाने अभिमान, हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावना शून्य कैसे समझें, आचरण सरल भाषाओं का !

Saturday, December 6, 2014

दर्द में भी , मुस्कराना चाहिए - सतीश सक्सेना

चाँद को माँ से, मिलाना चाहिए
नज़र का टीका लगाना चाहिए !

दर्द जब जब, आसमां छूने लगे,
गम भुलाकर मुस्कराना चाहिए !

आइये अब तो गले लग जाइये 
समय कम है, गीत गाना चाहिए !

कोई अपना रूठ जाए , भूल से, 
पास जा उसको मनाना चाहिए !

वक्त कम है काम बाकी है पड़े,   
नींद से, सबको जगाना चाहिए !

Tuesday, November 18, 2014

मैं गंगा को ला तो दूंगा पर क्या धार संभाल सकोगे - सतीश सक्सेना

अगर हिमालय ले अंगड़ाई,कैसे भार संभाल सकोगे !  
सूरज के,नभ से बरसाए क्या अंगार, संभाल सकोगे ?

सृजनमयी के पास , अनगिनत रत्नों के भंडार भरे हैं !
मैं गंगा को ला तो दूंगा,पर क्या धार संभाल सकोगे ?

सारे जीवन गीत लिखे हैं , निर्धन और अनाथों पर, 
जाने पर मेरे  गीतों के , दावे दार संभाल सकोगे  ?

जीवन भर तुम रहे साथ में,ऊँगली पकडे पापा की  
बेईमानों बटमारों में ,क्या व्यापार संभाल सकोगे ?

खाली हाथों आया था मैं , खूब लुटाकर जाऊंगा ,
हँस हँस कर ली जिम्मेदारी बेशुमार संभाल सकोगे ?

Wednesday, November 5, 2014

तुम्हें देखकर बस मचल ही तो जाते - सतीश सक्सेना

अचानक मुझे पा , बदल ही तो जाते ,
अदेखा मुझे कर निकल ही तो जाते !

विदाई से पहले , खबर तक नहीं की  
तुम्हें देखकर, बस मचल ही तो जाते !

बुलावा जो आता तो आहुति भी देते  
हवन में भले हाथ, जल ही तो जाते !

अगर विष न होता तो नारी को दुमुहें  
न जाने कभी का, निगल ही तो जाते !

अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते !




Monday, October 27, 2014

अरे गुलामों कब जागोगे ? - सतीश सक्सेना

अरे गुलामों, कब जागोगे
देश लुट रहा,पछताओगे !

वतन हवाले, करके इनके   
तुम वन्देमातरम गाओगे !

राष्ट्रभक्ति के मिथ्या नारों
से कब तक मुक्ति पाओगे !

खद्दर कब से, मूर्ख बनाता,
इससे कब हिसाब मांगोगे !

राजनीति की इस बदबू में  
कैसे, खुली हवा लाओगे ?

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको रातों में ,रुलाता है कोई,
रोज आकर,थपथपाता है,कोई !

करवटें , रोज़  बदलता  पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी दर्द में झपकी न लगे
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँख भर आयी, तभी 
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई 

जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !

एक बच्चे से, न जाने क्या हुआ
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

Saturday, July 19, 2014

दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना

अदब कायदा रखिए भाई,देख कुएं औ खाई को
गिरना है, वो गिर के रहेगा, देगा दोष खुदाई को ! 

सारे फ़र्ज़ निभाए हमने, अब जाने का वक्त हुआ !   
दरवाजे पर कौन खड़ा है, इतनी रात बधाई को !

घर मे कीचड़ से खेले हो, गर्वीले दिन भूल गए,     
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !

लेना देना, रस्म रिवाजों से ही , घर का नाश करें 
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !

प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई, 
बरगद की  झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !

Monday, May 19, 2014

खो रहे विश्वास को,बापस बुलाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

सुलगते घर में,मधुर धारा बहाना चाहता हूँ ! 
हो रहे बरसों से ये,झगडे मिटाना चाहता हूँ !

मानवों को ज्ञान नफरत का पढ़ाया है बहुत
पंडितों  से दूर,इक बस्ती,बसाना चाहता हूँ !

साधुओं के रूप  में, शैतान सम्मानित न हो !
आस्था मासूम की,केवल बचाना चाहता हूँ !

जो भी जन्में साथ में,उनका भी हक़ पूरा रहे !
खो रहे विश्वास को,बापस बुलाना चाहता हूँ !

ढोंगियों ने देश को, बरबाद करके रख दिया !
मेरा घर खुशहाल हो ये गीत गाना चाहता हूँ !

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