Showing posts with label अम्मा. Show all posts
Showing posts with label अम्मा. Show all posts

Monday, November 9, 2020

मैं धीमी आवाजों को अभिव्यक्ति दिलाने लिखता हूँ -सतीश सक्सेना

हिंदी के बदनाम जगत में , यारों  मैं भी लिखता हूँ !
उजड़े घर में ध्यान दिलाने, कड़वी बातें लिखता हूँ !

तुम्हें बुलाने भारी मन से, धुंधली आँखों लिखता हूँ !
टूटा चश्मा, रोती राखी , माँ की धोती लिखता हूँ !

मां को चूल्हा नजर न आये, पापा लगभग टूट चुके
तेरा बचपन याद दिलाने को कुछ बातें लिखता हूँ !

क्रूर विसंगतियाँ समाज की आगत को बतलानी हैं 
आसपास के खट्टे मीठे , कड़वे अनुभव लिखता हूँ !

मेरी कविता, गीत, लेख, साहित्य नहीं कहलायें, पर 
मैं धीमी आवाजों को अभिव्यक्ति दिलाने लिखता हूँ 

Friday, March 24, 2017

न जाने कौन सी तकलीफ लेकर दौड़ता होगा -सतीश सक्सेना

आज मैराथन रनिंग प्रैक्टिस में दौड़ते दौड़ते इस रचना की बुनियाद पड़ी , शायद विश्व में यह पहली कविता होगी जिसे 21 किलोमीटर दौड़ते दौड़ते बिना रुके रिकॉर्ड किया ! लगातार घंटों दौड़ते समय ध्यान में बहुत कुछ चलता रहता है उसकी परिणति आज इस रचना के रूप में हुई ! 

न जाने दर्द कितना दिल में लेकर, दौड़ता होगा
कभी छूटी हुई उंगली, किसी की, ढूंढता होगा !


सुना है जाने वाले भी , इसी दुनिया में रहते हैं ! 
कहीं दिख जाएँ वीराने में शायद खोजता होगा !

कोई सपने में ही आकर, उसे लोरी सुना जाए
वो हर ममतामयी चेहरे में, उनको ढूंढता होगा !

छिपा इज़हार सीने में , बिना देखे उन्हें शायद 
पसीने में छलकता प्यार, उनको भेजता होगा !

अकेले धुंध में इतनी कसक मन में लिए, पगला  
न जाने कौन सी तकलीफ लेकर , दौड़ता होगा !

Sunday, August 21, 2016

जाने कितने बरसों से यह बात सालती जाती है - सतीश सक्सेना

जैसे कल की बात रही 
हम कंचे खेला करते थे !
गेहूं चुरा के घर से लड्डू 
बर्फी,  खाया करते थे !
बड़े सवेरे दौड़ बाग़ में 
आम ढूंढते  रहते थे ! 
कहाँ गए वे संगी साथी 
बचपन जाने कहाँ गया  !
कस के मुट्ठी बाँधी फिर भी, रेत फिसलती जाती है !
इतनी जल्दी क्या सूरज को ? 
रोज शाम गहराती है !

बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के वैभव को देखा
हमने भी ,ऐयारी सीखी !

धीरे धीरे रंजिश की, कुछ बातें खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
मैली होती जाती है !

अपने चन्दा से, अभाव में 
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी 
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !   
अपनी बीमारी से लड़ते,
कदम कदम पर गिरती होंगीं !
जाने कितने बरसों से, यह बात सालती जाती है !
धीरे धीरे ही साहस की परतें 
खुलती जाती हैं !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Friday, November 21, 2014

तुमने उसके अपने घर को, घर अपना बतलाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से उसने दामन भी फैलाया होगा !

भूल गए तुम जब अम्मा की नज़र से सहमा करते थे
आज डांटकर तुमने उनको कैसे चुप करवाया होगा !

यह लड़की थी,जो भाई के लिए,हमेशा लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे  खुद सबके बीच बैठकर,  बेटे के गुण गाते रहते    
अब उनको परिवारजनों में, शर्मिंदा करवाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी,
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे से ही,  उन्हें डराया होगा !

Monday, August 4, 2014

दरो दीवार को , हर हाल बचाना होगा - सतीश सक्सेना

दर ओ दीवार को हर हाल बचाना होगा ! 
आंधी तूफ़ान से लड़ने का बहाना होगा !

कैसी ज़िल्लत है नाचने में,बताने के लिए  
भरी महफ़िल में,मदारी को नचाना होगा !

माँ के तकिये में सिले,मेरे ही फोटो निकले 
मेरा ख़याल था, इसमें तो खज़ाना होगा !

आजकल आसमां पर,लोग नज़र रखते हैं
इन चमकते हुए , तारों को हटाना होगा !

कबसे ठहरा हुआ यह दर्द,पोंछने के लिए ! 
सूखे बंजर में भी मेंहदी को लगाना होगा !

Sunday, August 3, 2014

कभी कभी बेचारा मन -सतीश सक्सेना

माँ का रहा, दुलारा मन !
उन आँखों का तारा मन !

कितनी मायूसी में सोया 
उनके बिन बेचारा मन !

चंदा सूरज से लड़ आया
ऐसे कभी  न हारा मन !

कैसे बेमन होकर माना  
माँ ममता का मारा मन 

जाने किसको ढूंढ रहा है    
गलियो  में बंजारा मन !

Friday, July 25, 2014

मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना

मुझको रातों में ,रुलाता है कोई,
रोज आकर,थपथपाता है,कोई !

करवटें , रोज़  बदलता  पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !

जब कभी दर्द में झपकी न लगे
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !

जब कभी आँख भर आयी, तभी 
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई 

जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं 
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !

एक बच्चे से, न जाने क्या हुआ
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा , लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे 
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

दुःख में कभी नहीं घबराना,अपने हाथ नहीं फैलाना
अगर याद ईश्वर की आये , माँ के पैर दबाना सीख !


Sunday, April 20, 2014

इक असंभव गीत, गाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

              अपने बचपन के उन सबसे बुरे दिनों में,जब माँ की मृत्यु हुई , मैं इतना छोटा था कि अपनी माँ का चेहरा भी याद नहीं ……
               काश एक बार वे सपने में ही दिख जाएँ ! ऐसी कौन सी भूल हुई मुझ बच्चे से, जो वे छोड़ कर हमेशा को, वहां चली गयीं जहाँ से कोई कभी बापस नहीं लौटा !! 

             यह मात्र एक रचना न होकर माँ को लिखा एक एक पत्र है,मेरा अपना, माँ के लिए …… 

माँ ,तुझे वापस , बुलाना चाहता हूँ !
इक असंभव गीत , गाना चाहता हूँ !

इक झलक तेरी, मुझे मिल जाये तो,
एक कौरा ही, खिलाना चाहता हूँ !

मुझसे हो नाराज, मत मिलना मुझे,
अपने बच्चों से, मिलाना चाहता हूँ !

जानता हो अब न तुम आ पाओगी
सिर्फ सपने में , बुलाना चाहता हूँ !

जाने कितनी बार ये, रुक -रुक बहे !
माँ, मैं आंसू को, जिताना चाहता हूँ !

देख तो लो माँ , कि बेटा है कहाँ ?
तेरा घर तुझको दिखाना चाहता हूँ !

बहुत दिन से चल रहे हैं , बिन रुके !
आज दिनकर को बिठाना चाहता हूँ !

(आज पता चला कि यह कतील शिफ़ाई की जमीन पर लिखा गया , अनजाने में ) - ३१ अगस्त १५  

Wednesday, March 19, 2014

माँ को अक्सर मैंने घर के, कपडे धोते ही देखा है -सतीश सक्सेना

बेटा, मैंने इस जीवन में 
ऐसा इक इंसान न देखा !
जीवन के झंझावातों में 
जिसने कोई कष्ट न देखा !
वैभव सम्पन्नों का जीवन  
बीमारी से , लड़ते बीता ,
जलन द्वेष और भेदभाव की    
इन गलियों में चलते चलते ,
धनकुबेर जितने पाये थे , उनको रोते ही देखा है !

ऊपर से बढ़िया स्वभाव ले 
हम सब दुनिया में आये हैं,
अक्सर झूठे व्यवहारों से , 
इस दुनिया को भरमाये हैं ,
सारे जग को धोखा देते ,
ऋषि मुनियों का वेश बनाए  
जो बखान करते हैं अपने, 
पाप पुण्य की चर्चा करते,
उनकी माँ को अक्सर मैंने, कपडे धोते ही देखा है !

शुभचिंतक से, लगते सारे 
चेहरों पै विश्वास न करना
गुरु मन्त्र पा, उस्तादों  से   
ऐसे भी उपवास न करना
कर्म श्रेष्ठ है, धर्म गौण है ,
तंत्र मंत्र विश्वास न करना 
भक्तों को रोमांचित करके,
रहे नाचते,  रंग मंच पर ,  
श्रीवर, संत, साध्वी को भी , मूर्ख बनाते ही देखा है !

पूरा जीवन बीता इनका 
अपनी तारीफें करवाने ,
बैठे जहाँ , वहीँ गायेंगे 
अपने सम्मानों के गाने , 
ऊपर पहलवान से लगते,
बार बार पिटते हैं घर में !
बात बात पर झाग उगलते 
विनयशील को,गाली देते 
पगड़ी बांधे इन पुतलों को, घर में लुटते ही देखा है ! 

जीवन भर दो चेहरे रखते 
समय देख के रंग बदलते
अपना सारा जीवन काला    
औरों पर ये, छींटे  कसते !
लोकलुभावन मोहक बातें
मंत्रोच्चारण बीच बीच में 
रावण मन,रामायण पढ़ते, 
रोज दिखायी पड़ते, ऐसे 
श्वेत वसन शुक्राचार्यों को, मंदिर बैठे ही देखा है !

Monday, March 17, 2014

अब तो ऐसे लोग भी होते नहीं -सतीश सक्सेना

अब तो तेरी, याद में रोते नहीं
किन्तु रातों में कभी सोते नहीं !

आइये माँ को नज़र भर देखिये 
कौन कहता है,खुदा होते नहीं !

कुछ रहीं थीं ऎसी जिम्मेदारियां
वरना रिश्तों को कभी ढोते नहीं !

क्या पता था मेरे दर पे आओगे 
वरना होली रंग, हम धोते नहीं !

कौन आशीषों को,लेने आयेगा
घर में ये दस्तूर  अब होते नहीं !

Friday, February 28, 2014

वे आवारा क्या समझेंगे ! -सतीश सक्सेना

जिनको माँ घर में बोझ लगे वे नाकारा क्या समझेंगे !
पशुओं जैसा जीवन जीते वे आवारा क्या समझेंगे !


कुछ जीव हमेशा बस्ती में, कीचड़ में ही रहते आये !
गंदे जल में रहने वाले, निर्मल धारा क्या समझेंगे !

वृद्धों को भरी बीमारी में, असहाय अकेले छोड़ दिया,
सर झुका नहीं माँ के आगे ठाकुर द्वारा क्या समझेंगे 

जानवर कहाँ ममता जानें हर जगह लार टपकाएंगे 
माँ के धन पर नज़रें रखते वे भंडारा क्या समझेंगे !

ये क्रूर ह्रदय, ऐसे ही हैं , हंसों के संग, न रह पायें !
अपने ही बसेरे भूल गए, वे गुरुद्वारा क्या समझेंगे !


Tuesday, December 10, 2013

हमको अपने से मनचाहे,लोग कहाँ मिल पाते हैं - सतीश सक्सेना


घर में ख़ुशियाँ लाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं 
जीवन भर संग देने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !

अम्मा,दादी,चाची,ताई,किस दुनियां में चलीं गयीं , 
बचपन याद दिलाने वाले लोग कहाँ मिल पाते हैं !

महज दिखावे के यह आंसू, आँख में भर के आये हैं,
संग , दर्द में रोने वाले , लोग कहाँ  मिल पाते हैं !

अपने अपने सुख दुःख लेकर इस दुनियां में आये हैं 
केवल सुख ही पाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !

क्यों करते हो याद उन्हें, जो हमें अकेला छोड़ गए, 
दूर क्षितिज में जाने वाले, लोग कहाँ मिल पाते हैं !

Saturday, October 26, 2013

काले घने, अँधेरे घेरें , धीरे धीरे अम्मा को - सतीश सक्सेना

जिन प्यारों की, ठंडी छाया 
में तुम पल कर बड़े हुए हो ! 
जिस आँचल में रहे सुरक्षित 
जग के सम्मुख खड़े हुए हो !
बढ़ती उम्र, बीमारी भारी ,
रुग्ण शरीर, स्नेही  आँखें
इनको कब से छोड़ अकेला ,
कैसे  भूले , अम्मा को ! 

घर न भूले, खेत न भूले , केवल भूले, अम्मा को !

उस सीने पर थपकी पाकर 
तुम्हें नींद आ जाती  थी !
उस उंगली को पकडे कैसे  
चाल बदल सी, जाती थी !
तुम्हें उठाने वे , पढ़ने को 
रात रात भर  जगती  थींं , 
वो ताक़त कमज़ोर दिनों में,
धोखा देती , अम्मा को !
काले  घने , अँधेरे  घेरें ,  धीरे - धीरे  , अम्मा को ! 

जिस सुंदर चेहरे को पाकर
रोते रोते  चुप हो जाते !
अगर दिखे न कुछ देरी को
रो रो कर, पागल हो जाते !
जिस कंधे पर सर को रखकर  
तुम अपने को , रक्षित पाते !
आज वे कंधे बीमारी से , 
दर्द  दे  रहे , अम्मा को  !
इकला पन अब , खाए जाता, धीरे धीरे अम्मा को !

वही पुराना , आश्रय  तेरा ,
आज बहुत बीमार हुआ है !
जिसने तुमको पाला पोसा 
पग पग को लाचार हुआ है !
जब भी चोटिल पाया तुमको  
उसकी आँखों में आंसू थे  !
रातें बीतें , करवट बदले , 
नींद न आये , अम्मा को !
कौन सहारा देगा इनको ,  नज़र न आये  अम्मा को !

कितने अरमानों से उसने
भैया तेरा व्याह रचाया !  
कितनी आशाओं से उसने 
अपना बेटा, बड़ा बनाया !
धुंधली आँखों रोते रोते
सन्नाटों  में, घुलती रहती !
कैसा शाप मिला है  भैया,
तेरे जन्म से , अम्मा को !
ब्याह रचाकर , कुछ बरसों में , भूले केवल अम्मा को !


Friday, October 25, 2013

तुम माँ बन मुझे सुलाओ, तो सो सकता हूँ - सतीश सक्सेना

मैं चाहूँ भी , सिद्धार्थ नहीं बन सकता हूँ 
राहुल यशोधरा को कैसे खो सकता हूँ !

जग जाने कब से गीत,युद्ध के  गाता है
क्या गीतों से विद्वेष रोज धो सकता हूँ !

यूँ आसानी से, हमको भुला न पाओगे !
आशाओं के मधुगीत रोज बो सकता हूँ !

जी करता आग लगा दूँ,निष्ठुर दुनियां में 
माँ आकर मुझे मनाये, तो रो सकता हूँ !

बरसों से नींद न आयी  मुझको रातों में ,
कोई आकर लोरी गाये,तो सो सकता हूँ !

Friday, September 27, 2013

पंचों से फैसला करा के ,मम्मी पापा बाँट लिए -सतीश सक्सेना

बरसों से झगडा आपस में आधा आधा बाँट लिए 
पंचों से फैसला करा के , मम्मी पापा बाँट लिए !

अम्मा के जेवर तो पहले से ही, गिरवी रक्खे थे !
स्वर्ण फूल दोनों बहुओं ने,चुप्पा चुप्पा बाँट लिए !  

एक बार आँखें खोलें तो , हस्ताक्षर करवाना है  !
दादाजी के पूरे जीवन का , अपनापा बाँट लिए !

सब चिंतित थे उनके हिस्से में जाने क्या आयेगा 
अम्मा के मैके से आये,गणपति बप्पा बाँट लिए !

आधे दरवाजे से घुसने, दो फुट जगह ही बाकी है ! 
अशुभ रोकने को दादी के हाथ के थापा बाँट लिए !

Saturday, October 6, 2012

माँ, तुम्हे अपना भी तो कुछ, ख़याल रखना चाहिए - सतीश सक्सेना

नीचे लिखा पत्र ,डॉ गीता कदायप्रथ ( कैंसर कंसल्टेंट ) का है, जिसमें उन्होंने ब्रेस्ट कैंसर के खतरे के लिए , महिलाओं को जागरूक करने हेतु , एक रचना का अनुरोध किया है  ! डॉ गीता, मैक्स हॉस्पिटल, साकेत , दिल्ली में, कैंसर सर्जन के रूप में कार्यरत हैं !   

Dear Mr Saxena,
It was really good talking to you and am glad you are also enthusiastic about writing a few lines for creating breast cancer awareness.
Dr Geeta Kadayaprath 9810169286

1. Breast cancer is on the rise, and actually can be defeated just by early detection / screening.2. Health consciousness in terms of lifestyle: tobacco, food, exercise.3. pink and breast cancer should remain the main theme, touching indirectly on lifestyle and screening. 
The central idea is to make women realise they are all important to their families and the society at large.They need to take care of themselves and put their health as a priority.We all need her, as a mother,a sister, a daughter, a wife etc.For her to be able to do justice to all these roles, she has to look after herself.She has to listen to her body, she has to be familiar with her body, because she knows her body best. She has to come forth herself if she finds a problem and not postpone it for another day.The urgency to ensure her fitness should not diminish ever.This mindset that no disease can touch her has to go and her vulnerability should make her more aware and forthcoming in reporting a problem at the earliest

She lights up everyone's lives. She is an enigma,a pillar of strength- she is the sunshine, the rainbow, the gentle breeze,the earth, all enduring, selfless and patient.She gives endlessly.Let us care for her, nurture her and keep her healthy because our existence is inextricably linked to her.She means the world to us, so let us paint her canvas in pink and ensure she is aware of her own self and submits herself to a check even if she is ostensibly well.'
Sent from BlackBerry® on Airtel

Dr Geeta kadayaprath
MS, FRCS Senior Consultant (Breast Surgeon)

यदि तुम्हीं अस्वस्थ हो
कैसे उठें, किलकारियाँ 
अगर तुम ,भूखी रहीं ,
कैसे जमेंगी , बाज़ियाँ ,
अगर तुम चाहो कि हम भी, 
छू सकें वह आसमां !
माँ  तुम्हें भी स्वयं का कुछ  ध्यान रखना चाहिए !

याद रख , तेरी हँसी ,
जीवंत रखती है, हमें !
तेरी सेहत में कमी ,
बेचैन करती है, हमें !
जाना तो इक दिन सभी को, 
मगर अपनों के लिए
माँ, तुम्हें  अपने बदन का , ध्यान रखना चाहिए !

कुछ बुरी बीमारियां 
खतरा है नारी के लिए
कैंसर सीने में जकड़े
उम्र , सारी के लिए
वक्त रहते जांच करवा कर, 
जियें, सब के लिए !
कुछ तो माँ अपने लिए ,अरमान रखना चाहिए !

तुमसे ही सुंदर लगे
संसार जीने के लिए
तुम नहीं, तो कौन है ?
हँसने, हंसाने के लिए
सिर्फ नारी  जगत में , 
जीती है गैरों के लिए !
माँ, हमें अपने लिए ,इक शक्ति रूपा चाहिए !

मायके में, आंख भर
आयी, तुझे ही याद कर
और मुँह में कौर न जा
पाए तुमको याद कर !
अगर मन में प्यार है ,
परिवार  अपने के लिए !
माँ, शारीरिक व्याधियों की, जांच होनी चाहिए !

नारी आँचल में पले हैं ,
गाँठ  घातक रोग के !
धीरे धीरे कसते जाते
रेशे , दारुण रोग के !
इनके संकेतों की हमको , 
परख होनी चाहिए !
माँ , बड़ों की बात हमको याद रखना चाहिए !

Saturday, July 7, 2012

तुम्ही सो गयीं, दास्ताँ सुनते सुनते - सतीश सक्सेना

आज रश्मिप्रभा जी की एक रचना पढकर अनायास अभिमन्यु की पीड़ा याद आ गयी ! वैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे गर्भ से ही शिक्षा ग्रहण करने लगते हैं ! महाभारत काल की यह घटना बहुत मार्मिक है , काश उस दिन सुभद्रा को नींद न आयी होती तो शायद कथाक्रम  कुछ और ही लिखा जाता ! 
अभिमन्यु ,माँ  के गर्भ में, पिता को सुनते हुए,चक्रव्यूह भेदना समझ चुके थे  मगर इससे पहले कि अर्जुन पुत्र को बाहर निकलने का रास्ता बताते, माँ सुभद्रा को नींद आ चुकी थी !पिता के अधूरे रहते पाठ के कारण, अभिमन्यु चक्रव्यूह से कभी बाहर न निकल सके ! 
पांडवों को, कृष्णा की वह नींद बहुत भारी  पड़ी थी ! एक पुत्र का व्यथा चित्रण इस रचना द्वारा महसूस करें ! 
एक भयानक पूर्वाभास जैसा रहस्यमय संयोग कि यह कविता  लिखने के बाद, सबसे पहले 8 माह की गर्भवती अनु को उसकी असामयिक मृत्यु से एक सप्ताह पहले सुनाई गयी ... :(
मैंने यह रचना क्यों लिखी मुझे खुद नहीं पता , काश न लिखता !!

पिता ने कहा था !
कि जगती रहें  !
आप भी पुत्र  की ,
बात सुनती रहें !
काश कुछ देर भी  , 
ध्यान देतीं  अगर  !
तब न खोती मुझे नींद में, सुनते सुनते ! 

मैंने उनको बहुत ,
ध्यान देकर सुना !
पर तुम्हे उस समय 
पाया कुछ अनमना  
काश उस दिन पिता 
साथ, जगतीं अगर,
पर तुम्ही सो गयीं, दास्ताँ सुनते सुनते  !

मैं तो मद्धम ध्वनि 
में भी सुनता रहा  !
नींद में डूबते भी 
मैं  चलता  रहा  ! 
काश कुछ दूर तक, 
ऊँगली छुटती नहीं !
माँ  कहाँ खो गयीं ?दास्ताँ सुनते सुनते !

पिता  चाहते थे 
कि  यशवान  हो !
और तुम चाहती थीं 
कि  बलवान  हो !   
काश कुछ देर ऑंखें  
झपकती  नहीं ,
तेरा दीपक बुझा नींद में, सुनते सुनते !

एक दुख तो रहेगा
मुझे   भी  यहाँ  ,
मैं पिता की तरह
लड़ न पाया वहाँ,
उनका सम्मान, उस 
दिन बचा ना सका !
माँ , कहाँ ध्यान था, दास्ताँ सुनते सुनते !

Tuesday, May 8, 2012

काश कहीं से मना के लायें , मेरी माँ को , मेरे गीत ! - सतीश सक्सेना

सबसे पहला गीत सुनाया
मुझे सुलाते , अम्मा ने !
थपकी दे दे कर बहलाते
आंसू पोंछे , अम्मा ने !
सुनते सुनते निंदिया आई,
आँचल से निकले थे गीत !
उन्हें आज तक भुला न पाया, बड़े मधुर थे मां के गीत !

आज तलक वह मद्धम स्वर
कुछ याद दिलाये कानों में !
मीठी मीठी लोरी की धुन,
आज भी आये, कानों में !
आज मुझे जब नींद न आये,
कौन सुनाये ,आकर गीत ?
काश कहीं से मना के लायें , मेरी माँ को , मेरे गीत !

मुझे याद है ,थपकी देकर,
माँ अहसास दिलाती थी !
मधुर गुनगुनाहट सुनकर
ही, आँख बंद हो जाती थी !
आज वो लोरी उनके स्वर में,
कैसे गायें मेरे गीत !
कहाँ से लाऊं उस थपकी को, माँ की याद दिलाते गीत !

अक्सर पेन पेन्सिल लेकर
माँ कैसी थी ?चित्र बनाते,
पापा इतना याद न आते
पर जब आते, खूब रुलाते !
उनके गले में, बाहें डाले ,
खूब झूलते , मेरे गीत !
पिता की उंगली पकड़े पकड़े ,चलाना सीखे मेरे गीत !

पिता में बेटा शक्ति ढूंढता
उनके जैसा कोई न देखा !
भय के अंधकार के आगे
उसने उनको लड़ते देखा !
वह स्वरुप, वह शक्ति देखकर,
बचपन से ही था निर्भीक !
शक्ति पुरुष थे , पिता हमेशा, उन्हें समर्पित मेरे गीत !

राम रूप कुछ विद्रोही थे ,
चाहे कुछ हो सर न झुकाएं
कुछ ऐसा कर पायें जिससे
घर में उत्सव रोज मनाएं !
सदा उद्यमी, जीवन उनका,
रूचि रहस्यमय, निर्जन गीत !
कभी कभी मेरे जीवन में, वे खुद ही लिख जाते गीत !

शक्ति पिता से पायी मैंने,
करुणा पायी माता से !
कोई कष्ट न पाए मुझसे ,
यह वर मिला विधाता से !
खाली हाथों आया था मैं ,
भर के गगरी छोड़े गीत !
प्यासे पक्षी, बया, चिरैया सबकी प्यास बुझायें गीत !

क्या मैं तुमसे करूं शिकायत
प्यास नहीं बुझ पाएगी !
क्या जीवन भर खोया पाया
उम्र फिसलती जायेगी !
जितना जिया, खूब पाया है,
खूब हंस लिए मेरे गीत !
मस्ती के अनंत सागर में, जी भर गोते खाते गीत !

जीवन की वे भूलें मेरी ,
याद आज भी आती है !
भरी डबडबाई, वे ऑंखें ,
दिल में कसक जगाती हैं !
जीवन भर के बड़े वायदे,
सपने खूब दिखाएँ गीत !
भुला के वादे, निश्छल दिल से, शर्मिन्दा हैं, मेरे गीत !

याद मुझे, वे निर्मल बातें ,
बचपन याद दिलाती बातें
दिवा स्वप्न जो हमने देखे
बिखर गए, भंगुर शीशे से !
जीवन भर के कसम वायदे,
नहीं बचा पाए थे गीत !
अब क्यों रोये मनवा मेरा, मदद नहीं कर पायें गीत !

बहुत दिनों से, बोझिल है
मन, कर्जा चढ़ा मानिनी का !
चलते थे, भारी मन लेकर
मन में बोझ, संगिनी का !
दारुण दुःख में साथ निभाएं, 
कहाँ आज हैं ऐसे मीत !
प्यार के क़र्ज़े उतर ना पायें , खूब जानते मेरे गीत !

जीवन की कड़वी यादों को
भावुक मन से भूले कौन ?
जीवन के प्यारे रिश्तों मे
पड़ी गाँठ, सुलझाए कौन ?
गाँठ पड़ी, तो कसक रहेगी,
हर दम चुभता रहता तीर !
जान बूझ कर, धोखे देकर, कैसे नज़र झुकाते गीत !

पता नहीं कुल साँसें कितनी
हम खरीद कर , लाये हैं !
कल का सूरज नहीं दिखेगा
आज समझ , ना पाए हैं !
भरी वेदना मन में लेकर ,
कैसे समझ सकोगे प्रीत !
मानव मन फिर चैन न पाए, जीवन भर अकुलायें गीत !
Related Posts Plugin for Blogger,