प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
ग्लानि थकान विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये , नारी हारी सी !
जग जननी लगती, कैसी गांधारी सी !
धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवा चौथ बिचारी सी !
किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में
पूरे जीवन रहना , एकाचारी सी !
छोटी उम्र से क्या बस्ती में सीखा है,
किसे सुनाये , बातें मिथ्याचारी सी !
धीरे धीरे कवच पुरुष का , तोड़ रही ,
कमर है मालिन जैसी चोट लुहारी सी !
छप्पर डाल के सोने वाले, भूल गए
नारी के मन सुलग रही , चिंगारी सी !
छप्पर डाल के सोने वाले, भूल गए
नारी के मन सुलग रही , चिंगारी सी !
ग्लानि थकान विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये , नारी हारी सी !

