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Wednesday, October 8, 2014

कैसे सिसके करवाचौथ बिचारी सी - सतीश सक्सेना

प्रतिबद्धता कहें अथवा लाचारी सी !
जग जननी लगती, कैसी गांधारी सी !

धुत्त शराबी से जीवन भर, दर्द सहे !
कैसे सिसके करवा चौथ बिचारी सी ! 

किसने नहीं सिखाया, उसे विदाई में 
पूरे  जीवन रहना , एकाचारी  सी  !

छोटी उम्र से क्या बस्ती में सीखा है,  
किसे सुनाये , बातें मिथ्याचारी सी !

धीरे धीरे कवच पुरुष का , तोड़ रही ,
कमर है मालिन जैसी चोट लुहारी सी !

छप्पर डाल के सोने वाले, भूल गए 
नारी के मन सुलग रही , चिंगारी सी !

ग्लानि थकान विषाद और उत्पीड़न भी
मिल कर देख न पाये , नारी हारी सी !

Tuesday, October 22, 2013

करवाचौथ पर भूखे प्यासे,कैसा लोकाचार किया - सतीश सक्सेना

जीवन भर,  तपते मरुथल को , नंगे पैरों पार किया !
रंजिश अपने द्वारे पाकर,उसका भी सत्कार किया !

क्या देखोगे ज़ख्म हमारे, कहाँ कहाँ पर चोट लगी !
जैसा मौका जिसने पाया , उसने वैसा वार किया !

पशुपक्षी और असहायों को गले लगाके जीवन में   
हमने सारे नियम तोड़कर,कैसे वर्जित प्यार किया !

लोग यहाँ पर,जुआ खेलकर,लक्ष्मी पूजा करते हैं !  
आधे जीवन  रहे  मुसद्दी, आधे  हाहाकार किया !

पूरा जीवन खुश न रहीं तुम जैसे तैसे काट  लिया 
करवाचौथ पर भूखेप्यासे, कैसे लोकाचार किया !
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