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Tuesday, April 14, 2020

बुरे हाल में साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का -सतीश सक्सेना

यह कविता यवतमाल के किसानों का हाल जानने हेतु आचार्य विवेक जी द्वारा भारत पद यात्रा (15 अप्रैल से 19 अप्रैल 2015)
के अवसर पर लिखी गयी थी जिसमें मुझे शामिल होने का सौभाग्य मिला .....

बुरे हाल में साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का
यवतमाल में पैदल जाकर जाने हाल किसानों का

जुड़ा हमारा जीवन गहरा भोजन के रखवालों से
किसी हाल में साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का

इंद्रदेव की पूजा करके भूख मिटायें मानव की
राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का

यदि आभारी नहीं रहेंगे मेहनत और श्रमजीवी के
मूल्य समझ पाएंगे कैसे बिखरे इन अरमानों का

चलो किसानों के संग बैठें जग चेतना जगायेंगे
सारा देश समझना चाहे कष्ट कीमती जानों का



Friday, May 31, 2019

हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना

लगा सब धर्मों का मेला
भीड़ का है रेलम पेला

अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें 
कतारें,  लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !

प्यार की, कष्टों में दरकार
मिले स्पर्श नेह इक साथ 
मुसीबत में शबरी का संग 
लगे परमेश्वर का  दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे 
हर भवन में , ईश्वर न्यारे !
पीठ पर है निर्भय अहसास 
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !
सूफियों का विरक्त संसार 
हमारी दुनिया न्यारी रे !!

मिले शर्तों के बदले राह
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
यहाँ  सारे व्यापारी रे !!

शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पियेंगे सागर तट से ही 
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आये देने विश्वास 
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को 
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे 
पागलों में ही, यारी रे !!

Monday, February 5, 2018

हम रहें या न रहें पदचिन्ह रहने चाहिए -सतीश सक्सेना


अबतक लगभग 300 गीत कवितायेँ एवं इतने ही लेख लिख चुका हूँ मगर प्रकाशनों, अख़बारों, कवि सम्मेलनों और गोष्ठियों में नहीं जाता और न प्रयास करता हूँ कि मुझे लोग पढ़ें या सुने ! 300 कविताओं में मुझे अपनी एक भी कविता की कोई भी छंद पंक्ति याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें लिखने के बाद कहीं भी सुनाता नहीं , न घर में न मित्रों में और न बाहर , मुझे लगता है अगर मैंने साफ़ स्वच्छ व आकर्षण लायक लिखा है तो लोग उसे अवश्य पढ़ेंगे चाहे समय कितना ही लगे , लेखन अमर है बशर्ते वह ईमानदार हो ! कवि नाम से चिढ है मुझे अब यह नाम सम्मानित नहीं रहा , कवि उपनाम धारी हजारों व्यक्ति अपनी दुकानें चमकाते चारो और बिखरे पड़े हैं !

मुझे पहला उल्लेखनीय सम्मान आनंद ही आनंद संस्था ने दिया जब विवेक जी ने मुझे राष्ट्रीय भाष्य गौरव पुरस्कार के लिए हिंदी साहित्य से, लोगों के चयन का जिम्मा लेने के लिए अनुरोध किया था , आश्चर्य यह था कि मैं आनंद ही आनंद संस्था और उसके संस्थापक आचार्य विवेक जी के बारे में पहले से कुछ नहीं जानता था मगर उन्हें मेरे लेखन को पढ़कर मेरी ईमानदारी पर भरोसा हुआ जिसे मैंने इस वर्ष तक सफलता पूर्वक निभाकर अब उनसे इस पदमुक्ति (अध्यक्ष भाष्य गौरव पुरस्कार ) के लिए अनुरोध किया है, लम्बे समय तक एक पद से जुड़े रहना मुझे उचित नहीं लगता !
पिछले माह भारत पेट्रोलियम स्टाफ क्लब में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमत्रित किया गया जहाँ मैं किसी को नहीं जानता था, हिंदी साहित्य जगत में लम्बे समय से कार्यरत एवं हिंदुस्तानी भाषा अकादमी के अध्यक्ष सुधाकर पाठक जी का अनुरोध था कि मैं वहां के स्टाफ को अपने स्वास्थ्य अनुभव के बारे में दो शब्द कहूं , इससे पहले सुधाकर पांडेय जी से न कभी भेंट हुई और न कोई परिचय था वे मेरी रचनाओं के मात्र मूक पाठक थे जिनसे मेरा कोई पूर्व परिचय न था !
भारत पेट्रोलियम में मुझे मंच सहभागिता का अवसर मिला जाने पहचाने ओलम्पियन गोलकीपर रोमियो जेम्स के साथ , वे लोग समझना चाहते थे कि रिटायर होने के बाद भी मैं मैराथन कैसे और क्यों दौड़ा और उससे क्या स्वास्थ्य लाभ मिले ? और इस वार्षिक उत्सव के अवसर पर उन्होंने बिना कोई मशहूर नाम के चुनाव के मुझ जैसे एक अनजान व्यक्ति को चुना , मुझे लगता है सुधाकर पाठक का व्यक्तित्व इस नाते विशिष्ट है और उनसे मिलने के बाद विश्वास है कि वे हिंदी जगत में नए आयाम कायम करेंगे !
ऐसे ईमानदार सम्मान अच्छे लगते हैं बशर्ते उसके पीछे अन्य उद्देश्य और प्रयास निहित न हों ! अफ़सोस कि हिंदी जगत में अधिकतर सम्मान प्रायोजित अथवा निहित व्यक्तिगत फायदे लिए होते हैं इस माहौल में आचार्य विवेक जी जैसे व्यक्तित्व का होना सुखद है एवं निश्चित ही शुभ संकेत है !

हिंदी जर्जर, भूखी प्यासी

निर्बल गर्दन में फंदा है !
कोई नहीं पालता इसको
कचरा खा खाकर ज़िंदा है !
कर्णधार हिंदी के,कब से
मदिरा की मस्ती में भूले !
साक़ी औ स्कॉच संग ले
शुभ्र सुभाषित माँ को भूले
इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ !
भूखी प्यासी सिसक रही,अभिव्यक्ति
को चारा लाया हूँ !




Friday, April 22, 2016

! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना

आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है  ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !

जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!

है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !

निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि 
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !

नमस्तुभ्यं  मां शारदे,  वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !

आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !

हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !

गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !

Tuesday, March 8, 2016

किसी की वेदना के साथ,मन में वेदना तो हो - सतीश सक्सेना

युवा आचार्य  विवेक जी  की कही दो पंक्तियाँ दिल में उतर गयीं , और एक काव्य अभिव्यक्ति ने जन्म ले लिया , आभार संत विवेक जी का , प्रणाम करते हुए यह रचना उन्हीं के सद्प्रयासों को समर्पित करता हूँ !

न हो यदि आस्था, श्रद्धा, मगर संवेदना तो हो !
किसी की वेदना के साथ, मन में वेदना तो हो !

भले विश्वास ईश्वर पर न हो, पर भावना तो हो !
वहां पर सर झुके या न झुके पर चेतना तो हो !

हजारों बार गप्पें मारते , शमशान हो  आये,
किसी का पुत्र कंधे पर हो, अंतर्वेदना तो हो !

सभी नज़रें झुका लेते , तेरे  दरबार में आकर ,
किसी गुस्ताख़ का नज़रें मिलाके छेड़ना तो हो !

ये गुस्सा, ये विरक्ति, ये नज़र नीचे हुई कैसे , 
हमीं खो जाएंगे, विश्वास की अवमानना तो हो ! 


Wednesday, April 22, 2015

बुरे हाल में साथ न छोड़ें देंगे साथ किसानों का - सतीश सक्सेना

                 15 से 19 अप्रैल 2015 यवतमाळ जिला में आनंद ही आनंद और भारतीय शांति परिषद के संयुक्त तत्वावधान में गाँव गांव पैदल जाकर किसानों से मिलने का दुर्लभ मौका मिला जहाँ पिछले कुछ वर्षों से सर्वाधिक किसान आत्महत्या करते हैं ! पूरे विश्व में
भारत की शानदार संस्कृति और बौद्धिकता के झंडे उठाये लोगों के देश में, सीधे साधे किसान आत्महत्या करें इससे शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता ! सन  2012 में हमारे देश में 14000 किसानों ने आत्महत्या की है , और हमारे राजनेता बिना इन अनपढ़ों की चिंता किये अगले इलेक्शन की तैयारी में जन लुभावन घोषणाएं करते रहते हैं !
यवतमाळ पदयात्रा 

              किसान हमारी प्राथमिकताओं में कहीं नहीं आता , भारतीय किसानों के बारे में टसुये बहाने वालों को यह भी नहीं मालुम कि साधारण किसान की सामान्य दिनचर्या क्या है वह किन समस्याओं से जूझ रहा है और शायद इसकी जरूरत भी नहीं है क्योंकि इलेक्शन के समय यह फटेहाल भोला व्यक्ति अपने दरवाजे पर आये, अपने ही गांव के प्रमुख लोगों से घिरे, इन महामहिमों को निराश करने की हिम्मत नहीं कर पाता और उसे अपने पूरे कुनबे खानदान के साथ वोट इन्हीं खद्दर धारी दीमकों को देना पड़ता है !

             यह पदयात्रा युवा आचार्य विवेक के आह्वान में पूरी हुई जिनकी मीठी वाणी और मोहक व्यक्तित्व से लगता है कि स्वामी  विवेकानंद का पुनर्जन्म हो चुका है , शिवसूत्र उपासक  विवेक पिछले कई वर्षों से , अपनी विदेशी नौकरी और विवाह त्याग कर, अध्यात्म साधना पथ पर चल रहे हैं , सुखद आश्चर्य है कि दिखावटी महात्माओं, बाबाओं के देश में, खादी का कुरता पैंट पहने यह सहज सरल युवा आचार्य,जनमानस पर अपनी छाप छोड़ने में समर्थ रहा है ! इस यात्रा में चलने वालों में विभिन्न समुदायों के लोग जिनमें वयोवृद्ध पुरुष, नवजवान और महिलायें शामिल थे, अपने कार्य छोड़कर इस कड़ी धूप में किसानों के साथ दुःख बांटने को तत्पर दिखे और यह विशाल साधना कार्य बिना किसी अखबार , टेलीविजन न्यूज़ चैनल्स को बिना दावत पार्टी दिए , रोटी दाल खाते हुए बड़ी सादगी से किया गया !

विवेक जी के इस कथन पर कि आनंद ही आनंद किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता से नहीं जुड़ा है और न हम इसके कार्यक्रमों में किसी राजनीतिक दल को शामिल करेंगे, हम जैसे बेआशीष फक्कड़ ने भी किसानों के दर्द में जाने का फैसला किया था और इस राह के आध्यात्मिक आयोजनों में भी, मैंने यही पाया यह मेरे लिए एक बड़े संतोष और राहत का विषय था !

               इस दौरान हमने विवेक जी के शिष्यों की गाड़ियों में लगभग 700 km यात्रा की जिसमें लगभग 85 किलोमीटर की दूरी तेज धूप में पैदल चलकर तय की गयी ! पदयात्रा के रास्ते में आचार्य बिनोबा भावे का पवनार आश्रम एवं  महात्मा गांधी के सेवाग्राम के दर्शन सुखद रहे ! उससे भी सुखद यह था कि एक आध्यात्मिक फ़क़ीर के पीछे कवि , साहित्यकार , डॉक्टर , इंजीनियर , सॉफ्टवेयर इंजीनियर , व्यापारी , किसान , मजदूर , चार्टर्ड एकाउंटेंट ,महिलायें , गृहणी और उनके बच्चे सब शामिल थे ! महिलायें न केवल कार चला रहीं थी बल्कि पैदल यात्रिओं के लिए भोजन पानी की व्यवस्था इस ४० डिग्री तेज धूप में पैदल चल कर , कर रही थीं और शामिल लोग इतनी विविधिता लिए थे कि उनसे बात करके थकान का नाम नहीं रहता ! ६० वर्षीय राजेश पारेख जो कि नागपुर के बड़े ज्वैलर्स में से एक हैं, ऐसे ही एक आदर पुरुष थे !  


और इस भक्ति भावना का प्रभाव ग्रामीणों पर भी पड़ा , शुरू में किसान पदयात्रा के उद्देश्य से शंकित थे क्योंकि पहले गांव में काफिला सिर्फ महामहिमों का आता था और ढेर सारे वादे देकर जबरन वोट ले जाता था मगर जब उन्हें यह कहा गया कि हमारा वोटों से कोई लेना देना नहीं , हम भाषण देने नहीं, आपको सुनने आये हैं तब राहत की सांस लेते किसानों ने अपना दर्द खुल कर बताया ! उनके कष्ट अवर्णनीय हैं, उनके अपने उपजाए देसी बीज, खाद , कीटनाशक छीन लिए गए और उन्हें बाज़ार का प्रोडक्ट खरीदने को मजबूर करने के कानून बना दिए गए यही नहीं उनकी फसल की कीमत भी खरीदार तय करेंगे, यह कानून बना दिया गया ( फसल का रेट सरकार तय करती है )  ! 


आचार्य विवेक 
इस देश में आज किसान अपने आपको हारा और बंधुआ मज़दूर मानने को मजबूर है और शायद ही कोई नेतृत्व उन्हें दिल से प्यार करता हो सब के सब इन भेंड़ों से अपनी रुई लेने आते हैं और यह झुण्ड अपना बचाव भी नहीं कर पाता ! इनकी पूरे साल की कमाई (उत्पादन ), सरकार की मदद से, अपनी मनमर्जी का पैसा देकर, कुटिल शहरी व्यापारी ले जाकर खरीद की मूल्य से आठगुने, दसगुने भाव पर बेंच कर अपनी तिजोरी भरते हैं और इलेक्शन के समय राजनेताओं को मदद के बदले धन देते हैं ताकि वे अगले ५ वर्षों के लिए दुबारा सत्ता में आ जाएँ और फिर इन्हें नोचते रहें , उनकी खुशकिस्मती से यह असंगठित भेड़ें भी करोड़ों की संख्या में हैं , सो कोई समस्या दूर दूर तक नहीं ! दैहिक, मानसिक शोषण और प्रताड़ना की यह मिसाल, पूरे विश्व में अनूठी व बेमिसाल है ! यही एक देश है जहाँ मोटे पेट वाले बेईमान सबसे अधिक भारत माता की जय बोलते नज़र आते हैं !

अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें  इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !


झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,  
कैसे कैसे लोग भी , योद्धा कहायें इन दिनों !

मेरा यह दृढ विश्वास है कि हर क्षेत्र में हमारी ईमानदारी, पतन के गर्त तक पंहुच चुकी है , हम कोई भी काम बिना फायदे के नहीं करते , निर्ममता से अपनी छबि निर्माण के लिए कमजोरों  को सिर्फ धोखा देते हैं और शक्तिशालियों से धोखा खाते हैं ! पूरा देश बेईमानों का गढ़ बन गया है अब यहाँ जीने के लिए और धनवान बनने के लिए राष्ट्रप्रेम के नारे के झंडे के साथ अपनी पीठ पर और गले में मालिक (राजनीतिक दल  ) की पट्टी आवश्यक है !  लोग आपको देख भयभीत होकर आदर देते दुम हिलाएंगे ही ! 

             इस बेहद खराब माहौल में  " चला गांवां कडे " का नारा दिया है आचार्य विवेक ने , इस नारे को सार्थक बनाने के लिए एक ऑफिस खोला गया है जिसका कार्य गाँव की समस्याओं का अध्ययन करना है ! विदर्भ के विभिन्न गांवों से वर्तमान व्यवस्था से व्यथित युवाओं और स्वयं सेवकों ने ग्राम प्रतिनिधि का कार्य करने को अपना नाम दिया है ! मैनेजमेंट के बेहतरीन जानकार, विवेक ने अपना कार्य बड़ी सादगी और शालीनता से किया है, पूरी यात्रा में इस नवयुवक आचार्य के चेहरे पर थकान, विषाद  का एक भाव नज़र नहीं आया हर वक्त एक आत्मविश्वास से सराबोर प्रभावशाली स्नेही प्रभामंडल नज़र आता था जिसे उसके प्रशंसक एवं शिष्य हर समय घेरे रहते ! उनके कई मजबूत समर्पित शिष्य उनके हर आदेश को मानने को तत्पर रहते थे !


             विवेक जहाँ जहाँ जा रहे थे , महिलाओं और पुरुषों ने ,घर से निकल निकल उनका तिलक लगाकर अभिनन्दन किया ! मेरा विश्वास है कि मध्य भारत क्षेत्र में, आने वाले समय में तेजी से बढ़ती उनकी लोकप्रियता निश्चित ही स्वयंभू नेताओं और मठाधीशों को चौंकाने के लिए काफी होगी ! 

              इन पांच दिनों में आनंद ही आनंद  की ओर से, बिना किसी भाषण बाजी के केवल अपना और आचार्य विवेक का संक्षिप्त परिचय देकर किसानों से अपनी बात कहने का अनुरोध किया जाता था ! इन धुआंधार मीटिंगों से जो बातें सामने आयीं वे निम्न थीं !

  • आज तक गाँव में कोई सरकारी मदद नहीं मिली , जो घोषणाएं हुई भी हैं वे बरसों से दसियों इंस्पेक्टरों की जांच होते होते नगण्य रह जाती हैं ! 
  • पहले किसान अपनी फसल  उगाने के लिए बिना एक पैसा खर्च किये, अपने खुद के द्वारा जमा किये गए बीज ,खाद और कीटनाशकों पर निर्भर था वहीँ अब उसे हाइब्रिड बीज , विशिष्ट कीटनाशक और खाद बाहर से खरीदने पड़ते हैं जिसमें उसकी जमा पूँजी अथवा कर्ज का एक भारी हिस्सा खर्च हो जाता है , सूखा या अतिवृष्टि के कारण फसल नष्ट होने की हालत में यह कर्जा और अगले साल की भोजन की समस्या , शादी व्याह और सामाजिक दवाब उसके आगे भयावह स्वप्न जैसे खड़े नज़र आते हैं और उसकी स्थिति बदतर करने के लिए भरी रोल अदा करते हैं !  
  • बैंक का पैसा हर हालत में वर्ष के अंत में बापस करना पड़ता है चाहे फसल से भारी लागत लगाने के बावजूद एक रूपये का भी मुनाफ़ा न हुआ हो या सारी फसल असमय वर्षा या सूखा से खराब क्यों हुई हो !
  • सरकार द्वारा निर्धारित कपास का समर्थन मूल्य, लागत से भी काम पड़ता है , यह वर्तमान में 4000 /= है जो किसानों के हिसाब से कम से कम 6000 /= पर क्विंटल होना चाहिए !
  • यह विडम्बना है कि किसान अपना धन और श्रम लगाकर फसल उगाता है और उसका मूल्य निर्धारण शहरों में बैठे सरकारी दफ्तर के बाबू करते हैं , छोटे किसान जिसको लागत अधिक पड़ती है और बड़े किसान दोनों को एक सा मूल्य दिया  जाता है , सरकारी व्यवस्था को, विभिन्न कारणों से फसल खराब होने अथवा जानवरों व मौसम  द्वारा बर्वादी से कोई मतलब व जानकारी नहीं अतः लगभग हर किसान ने एक मत से अपनी फसल का मूल्य निर्धारण स्वयं करने की मांग की ! वे चाहते हैं कि बाजार की डिमांड के हिसाब से वे अपनी फसल को बेंचें तभी गांवों में खुशहाली आ सकती है !
  • आज किसानों के बच्चे किसी हाल में किसान नहीं बनना चाहते उनका कहना था कि शहरों से सम्मन देने वाला चपरासी गाँव में टू व्हीलर से आता है जबकि हमारे पास साईकल भी नहीं होती हम कुछ भी कर लेंगे पर किसान नहीं बनना चाहते , स्वतंत्र भारत में , अपनों के द्वारा अपनों के शोषण की यह जीती जागती तस्वीर किसी का दिल दहलाने को काफी है !अनपढ़  किसानों और गृहणियों के मध्य जमकर नोट कूटता चालाक टेलीविजन मिडिया आजकल धनपतियों को सुबह शाम दो बार सलाम करता है और फिर जो माई बाप कहते हैं वही करता है ! किसानों के बारे में नीरस जानकारी देने के लिए
  • मशहूर दूरदर्शन के दिखावटी  कृषि चैनल खोलकर सरकार मस्त है लोकल खद्दरधारी दीमकों ने शेतकारी कमिटी , किसान यूनियन व अन्य किसान नामधारी संगठन बनाकर अपने शराबी चमचों को वहां अध्यक्ष और सेक्रटरी बना दिया है यह राष्ट्रप्रेमी शिष्य गण अपने दफ्तरों में भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद की तस्वीर लगाकर शाम को दारु सम्मेलनों में किसानों की समस्याओं पर चर्चा कर अपना कर्तव्य पालन कर मस्त रहते हैं ! 
बड़ी क्रूरता के साथ, अपनी सीधी साधी गाय मारकर, उसे परोसकर हम सिर्फ धनवानों को  और ताकतवर और हृष्ट पुष्ट बना रहे हैं  !पहली बार जीवन में मुझे कोई लेख लिखते समय अपने दिल में कम्युनिस्टों के प्रति आदर सम्मान की भावना जाग्रत हो रही है , मगर उन बेचारों के, मार्क्स लेनिन को अनपढ़ किसान समझे कैसे ? 
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उपरोक्त लेख नवसंचार समाचार ने सम्पादकीय पृष्ठ पर छापा है , इस सम्मान के लिए उनका आभार !
http://navsancharsamachar.com/%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A5-%E0%A4%A8-%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A5%9C%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A6%E0%A5%87/

ग्राम विधवाएं, जिनके पति चले गए  

Thursday, April 2, 2015

जागो देशवासियों अब भी समय बचा - सतीश सक्सेना

चलो गांव की ओर, व्यथाएँ  बांटेंगे, 
इकले नहीं किसान यकीन दिलाएंगे 

कसमें खाकर घर से पैदल आये हैं 
भूखे नहीं किसान कभी सो पाएंगे !

अन्न उगाने वाले क्यों कमजोर रहें 
आत्मचेतना,बोध,विवेक जगायेंगे !

हो आनंद  हमेशा इनके आँगन में 
इन चौपालों में,सौभाग्य जगायेंगे !

जागो देशवासियों ! वरना भारत में
खद्दरधारी दीमक , जश्न मनाएंगे !

कृषिप्रधान देश की खेती चाट गए
अब गरीब की रोटी,चट कर जाएंगे ! 

हिम्मत हारें नहीं,समय वह आएगा
खलिहानों में जीवनदीप जलायेंगे !

(यवतमाळ पदयात्रा 15 से  19 april के अवसर पर )

Thursday, March 19, 2015

राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का -सतीश सक्सेना

बुरे हाल मे  साथ न छोड़ें, देंगे साथ किसानों का !
यवतमाळ में पैदल जाकर जानें दर्द किसानों का !

जुड़ा हमारा जीवन गहरा ,भोजन के रखवालों से !
किसी हाल में साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का

इन्द्र देव  की पूजा करके, भूख मिटायें मानव की  
राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का !

यदि आभारी नहीं रहेंगे मेहनत और श्रमजीवी के     
मूल्य समझ पाएंगे कैसे इन बिखरे अरमानों का !

चलो किसानों के संग बैठे, जग चेतना जगायेंगे 
सारा देश समझना चाहे कष्ट कीमती जानों का !

(यवतमाळ पदयात्रा १५-१९ अप्रैल २०१५ के अवसर पर )

Friday, March 21, 2014

रिटायरमेंट का वर्ष और अपने ही घर में वृद्ध शेरों की दुर्दशा - सतीश सक्सेना

लगता है ३० वर्ष में ही, ६० वर्ष पूरे होने का घंटा बजा दिया कि अब स्कूल बंद हो गया, आज के बाद अब यहाँ नहीं आना, फीस आदि का रिफंड के लिए चेक घर भेज दिया जाएगा ! :)

रिटायरमेंट के वर्ष में, पहला तनाव यह होता है कि फंड, ग्रेचुटी के पैसे बच्चों और बच्चों की अम्मा द्वारा झपटने से  कैसे बचाये जाएँ जिनपर इन लोगों की नज़र, पिछले सालों से टिकी है ! परिवार में बहुमत एवं असर माँ बेटे का है जो इस विषय में एकमत हैं ! मैंने रिटायरमेंट के साल अक्सर अपने साथियों को अप्रत्याशित तनाव में पाया है और वह भी अपने ही परिवार से, जिसके लिए बरसों से अपने मित्रों में, तारीफे करते नहीं अघाते थे, वे  अब यह कैसे बताएं  कि परिवार के तमाम जरूरतें, उनके रिटायर होने का इंतज़ार कर रहीं हैं !

रिटायरमेंट के समय इंसान अक्सर शेष बचे हुए, १५-२० वर्षों की सिक्यूरिटी के लिए बेहद तनाव में पाता है ! पूरे जीवन अपने परिवार के लिए, जी तोड़ मेहनत कर पालने वाले इन वृद्ध शेरों, को अपने घरों में ही उपेक्षा और हिकारत का शिकार होना पड़ता है , उन्हें यह अहसास कराया जाता है कि वे लालची हैं व उन्हें अपने बच्चों की आवश्यकताओं का ध्यान नहीं है ! 

घायल शेरनी, जो बरसों से अपने पति की बड़बड़ और अकड़ से परेशान रही है उसे यही मौक़ा सही मिलता है , बुड्ढे के कमजोर दिनों में ,सामर्थ्यवान पुत्र का साथ देकर,काफी संतोष का अनुभव करती है और वह पहले से ही टूटी कमर और असहाय अकेले व्यक्ति पर, जोरदार हमला करने का कोई मौका नहीं चूकती ! उसकी पूरी कोशिश यह रहती है कि इस बुड्ढे सरदार की, सिक्यूरिटी छीन कर, परिवार पर आश्रित कर दिया जाए इससे इसकी अकड़ भी सुधर जायेगी तथा बच्चों को पैसे भी मिल जायेंगे और फिर बेटे का दिल करे तो ठीक नहीं तो इस मरे और सड़े से इंसान का क्या करना ! :)

अफ़सोस यह है कि अक्सर पुत्र भी अपने पिता को सहयोग नहीं करते उन्हें अपनी जवानी में ही , पिता के पूरे जीवन के बचाये २०-३० लाख रूपये, उनके सपने पूरे करने, घर खरीदने अथवा कार खरीदने को मिल जाएँ, इससे अच्छा आसान साधन और कुछ नज़र नहीं आता !

इस वर्ष मैं भी रिटायर हो रहा हूँ , सामर्थ्यवान एवं पर्याप्त शक्तिशाली बच्चों के कारण मेरे जैसे भाग्यवान लोग इस दुनिया में बहुत कम ही होंगे मगर जब अपने मित्रों को देखता हूँ तो दिल दहल जाता है !  कल ऑफिस में अपने दो हमउम्र मित्रों से बात करते समय , मैंने यह फैसला किया कि इन सर्वगुण संपन्न एवं अनुभवी रिटायर शेरों को संगठित करूंगा एवं इस शक्ति का उपयोग आपस में एक दूसरे की मदद देकर करेंगे ! यह कार्य करने के लिए  "dignified lion's club" की स्थापना का संकल्प करता हूँ !

विवेक जी  से कवि दिवस पर हुई चर्चा में , उन्होंने एक बेहतरीन आयडिया, जिस पर वह काम कर रहे हैं, के बारे  बताया था कि हर शहर में वृद्धों का एक डाटा बेस तैयार किया जाएगा जिनमें उनकी आवश्यकताएं एवं सहायता देने  हेतु, उन्हीं शहरों में रहने वाले स्वयंसेवक स्वेच्छिक रूप से आगे आयेंगे  ! मेरी अपनी इच्छा, इस कार्य के लिए, ह्रदय से लगने की है जिसे अब ३० वर्ष (६० ) उम्र में मैं शुरू करना चाहता हूँ ! :) 
यहाँ मददगारों की कमीं नहीं है सिर्फ नेतृत्व चाहिए, भीड़ की भीड़ उठ खडी होगी मदद करने के लिए !!

सहायकों की कमीं नहीं है, साथ हज़ारों आयेंगे !
इन बूढ़ों की मदद के लिए हाथ हज़ारों आयेंगे !

Thursday, March 13, 2014

सोने जैसे दिल वाले ही कविता सुनने आयेंगे -सतीश सक्सेना

बेतुल में विवेक जी के आवाहन पर , पहली बार कविमंच पर गया था एवं यह जानकार अभिभूत था कि विवेक जी को यह भरोसा था कि कवि और कविता समाज को बदलने की सामर्थ्य रखती है अतः आवश्यकता है कि कवि की मर्यादा को वह सम्मान दिया जाए जिसके वह योग्य है ! 

इस रचना के प्रेरणा श्रोत विवेक जी हैं अतः यह रचना उनकी  विचारधारा आनंद ही आनंद को समर्पित है …. 

निर्मल औ निष्कपट संत ही कविता सुनने आएंगे  
प्रेमी, ज्ञानवान, अनुरागी, कवि से मिलने आएंगे !

निष्ठुर मन वाले गीतों के साथ बैठ क्या पाएंगे !
केवल शुद्ध विचारों वाले, प्रीति सीखने आएंगे !

सरस्वती का ऋण कवियों पर,गीतदान दे जाएंगे
आस्था और श्रद्धा का घर से अर्थ सीखने आएंगे !

भुला व्यथा,प्रतिबंध,समय को संवेदना सिखायेंगे !
गीतों के माध्यम से मानव ,प्यार सीखने आएंगे !

बहुत शीघ्र कविमंच देश में,खोया गौरव पायेंगे !
व्याकुल मानव,राहत पाने, गीत खोजने आएंगे !

Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !
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