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Monday, April 25, 2022

अब और न कुछ कह पाऊंगा, मन की अभिव्यक्ति मौन सही !

अब और न कुछ कह  पाऊंगा, मन की अभिव्यक्ति मौन सही !
कुछ लोग बड़े आहिस्ता से
घर के अंदर , आ जाते हैं !
चाहे कितना भी दूर रहें ,
दिल से न निकाले जाते हैं !
ये लोग शांत शीतल जल में
तूफान उठाकर जाते हैं !
सीधे साधे मन पर, गहरे 
हस्ताक्षर भी कर जाते हैं !
कहने को बहुत कुछ है लेकिन, अब यह अभिव्यक्ति मौन सही  !

इस रंगमंच की दुनिया में
गहरी चोटें खायीं हमने !
कितनी ही रातें नींद बिना   
किस तरह गुजारीं हैं हमने 
जब दिल पर गहरे जख्म लगे 
कुछ आकर मरहम लगा गए 
इन प्यारों द्वारा ही कड़वे 
अवशेष मिटाये जाते हैं !
अहसान न अपनों का होता सो यह अभिव्यक्ति मौन सही !

कुछ चित्रकार आसानी से 
निज चित्र, उकेरे जाते हैं !
आहिस्ता से मुस्कानों के 
गहरे रंग , छोड़े जाते हैं !
पत्थर पर निशाँ पड़े कैसे 
अनजाने, दिल में कौन बसा 
अनचाहे स्मृति चिन्ह बने 
मेटे न मिटाये , जाते हैं !
कहने को जाने कितना है पर यह अभिव्यक्ति मौन सही !

Sunday, August 30, 2020

अरसे के बाद मिले जाना,इतने निशब्द,नहीं मिलते -सतीश सक्सेना

जाने कितने ही बार हमें, मौके पर शब्द नहीं मिलते !
अहसासों के आवेगों में जिह्वा को शब्द नहीं मिलते !


सदियों बीतीं हैं यादों में  , क्यों मौन डबडबाईं आँखें   
अरसे के बाद मिले जाना, इतने निशब्द, नहीं मिलते !

उस दिन घंटों की बातें भी मिनटों में कैसे निपट गयीं
मिलने के क्षण जाने कैसे मनचाहे शब्द नहीं मिलते !

कितना सब कहना सुनना था, पर वाणी कैसे मौन रहीं
दुनिया के व्यस्त बाज़ारों में, इतने अशब्द नहीं मिलते !

हर बार मिले तो आँखों की भाषा में ही प्रतिवाद किये
कैसे भी अभागे हों जाना , इतने प्रतिबद्ध नहीं मिलते !

Monday, April 15, 2019

कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना -सतीश सक्सेना

इस हिन्दुस्तान में रहते, अलग पहचान सा लिखना !
कहीं  गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना !
दिखें यदि घाव धरती के तो आँखों को झुका लिखना 
घरों में बंद, मां बहनों पे, कुछ आसान सा लिखना !

विदूषक बन गए मंचाधिकारी , उनके शिष्यों के ,
इन हिंदी पुरस्कारों के लिए, अपमान सा लिखना !

किसी के शब्द शैली को चुरा के मंच कवियों औ ,
जुगाड़ू गवैयों , के बीच कुछ प्रतिमान सा लिखना !

अगर लिखने का मन हो तड़पते परिवार को लेकर
हजारों मील पैदल चल रहे , इंसान पर लिखना !

तेरी भोगी हुई अभिव्यक्ति , जब चीत्कार कर बैठे
बिना परवा किये तलवार की, सुलतान सा लिखना !


Monday, April 11, 2016

सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये -सतीश सक्सेना

कल ही कुछ याद किया, रात सो नहीं पाये
औ तड़प के जो बुलाया भी , तो नहीं पाये !

तेरी रुखसत का भरोसा ही नहीं है मुझको 
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये !

कसम खुदा की सिर्फ खैरियत बता जाएँ ! 
खिले वसंत अहले दिल से,खो नहीं पाये !

जाने कब से थे मेरे साथ,जानता ही नहीं 
बिन कहे जान सकें अक्ल ,वो नहीं पाये !

तुझे हर बार मना ही किया था मिलने को
आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये !

Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे, गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया, चाँद सितारों ने
मीठे गीत न गाओ तुम फंस जाओगे !




Sunday, May 25, 2014

दुनियां वाले कैसे समझें , अग्निशिखा सम्मोहन गीत -सतीश सक्सेना

कलियों ने अक्सर बेचारे
भौंरे  को बदनाम किया !
खूब खेल खेले थे फिर भी  
मौका पा अपमान किया !
किसने शोषण किया अकेले, 
किसने फुसलाये थे गीत !
किसको बोलें,कौन सुनेगा,कहाँ से हिम्मत लाएं गीत !

अक्सर भोली ही कहलाये
ये सजधज कर रहने वाली !
मगर मनोहर सुंदरता में 
कमजोरी , रहती हैं सारी !
केवल भंवरा ही सुन पाये, 
वे  धीमे आवाहन  गीत !
दुनियां वाले कैसे समझें, कलियों के सम्मोहन गीत !

स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः
शक्तिः एवं सामर्थ्य-निहितः 
व्यग्रस्वभावः , सदा मनुष्यः !
इसी शक्ति की कर्कशता में, 
पदच्युत रहते पौरुष गीत !
रक्षण पोषण करते फिर भी, निन्दित होते मानव गीत !

नारी से आकर्षित  होकर
पुरुषों ने जीवन पाया है !
कंगन चूड़ी को पहनाकर
मानव ने मधुबन पाया है !
मगर मानवी समझ न पायी, 
मंजुल मधुर समर्पण गीत !
अधिपति दीवारों का बनके , जीत के हारे पौरुष गीत !

निर्बल होने के कारण ही 
हीन भावना मन में आयी 
सुंदरता  आकर्षक  होकर  
ममता भूल, द्वेष ले आयी 
कड़वी भाषा औ गुस्से का 
गलत आकलन करते गीत ! 
धोखा खायें सबसे ज्यादा,  अपनी  जान गवाएं गीत !

दीपशिखा में चमक मनोहर
आवाहन  कर, पास बुलाये !
भूखा प्यासा , मूर्ख  पतंगा , 
कहाँ पे आके, प्यास  बुझाये  ! 
शीतल छाया भूले घर की,
कहाँ सुनाये जाकर गीत !
जीवन कैसे आहुति देते , कैसे जलते  परिणय गीत !

 (स्वप्न गीत के लिए )

Wednesday, April 16, 2014

गीतकार की हर कविता के, जाने कितने माने होंगे -सतीश सक्सेना

घने कष्ट  और वीरानों में , तुम्हें गीत भी गाने होंगे !
कितनी बार अकेले बेमन,उत्सव तुम्हें मनाने होंगे !

सांस नहीं ले सके सुबह से,ऐसे कैसे शाम हो गयी,
बारिश के आने से पहले,उजड़े छप्पर छाने होंगे !

अंतिम क्षण तक टूट न पाएं , ऐसे हों ये रिश्ते नाते ,
आधी जान हमारी उस घर ,वे कैसे अनजाने होंगे !

अर्थ, समीक्षाकार लिखेंगे,कैसे उनकी बात बताऊँ ,
गीतकार की हर कविता के,जाने कितने माने होंगे !

स्वाद हमें कड़वे शब्दों का,बड़े सबेरे ही मिल जाता,

जलतरंग सी मीठी ध्वनि को, चूड़ी कंगन लाने होंगे !

गिनती के दिन चुकने आये,अपने सारे काम करा लें !
कौन जानता कल सतीश के जाने कहाँ ठिकाने होंगे !


Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !

Friday, January 10, 2014

विश्व बन्धु बन जाएँ गीत -सतीश सक्सेना

हम तो केवल हंसना चाहें 
सबको ही, अपनाना चाहें 
मुट्ठी भर जीवन  पाए  हैं 
हंसकर इसे बिताना चाहें 
खंड खंड संसार बंटा है , 
सबके अपने , अपने गीत ।  
देश नियम,निषेध बंधन में,क्यों बांधे जाते हैं गीत !

नदियाँ,झीलें,जंगल,पर्वत
हमने लड़कर बाँट लिए।  
पैर जहाँ पड़ गए हमारे ,
टुकड़े,टुकड़े बाँट लिए।  
मिलके साथ न रहना जाने,
गा न सकें,सामूहिक गीत !
अगर बस चले तो हम बांटे,चांदनी रातें, मंजुल गीत । 

कितना सुंदर सपना होता 
पूरा विश्व  हमारा  होता । 
मंदिर मस्जिद प्यारे होते 
सारे  धर्म , हमारे  होते ।  
कैसे बंटे,मनोहर झरने,
नदियाँ,पर्वत,अम्बर गीत ?
हम तो सारी धरती चाहें , स्तुति करते मेरे गीत ।  

काश हमारे ही जीवन में 
पूरा विश्व , एक हो जाए । 
इक दूजे के साथ  बैठकर,
बिना लड़े,भोजन कर पायें ।
विश्वबन्धु,भावना जगाने, 
घर से निकले मेरे गीत । 
एक दिवस जग अपना होगा,सपना देखें मेरे गीत । 

जहाँ दिल करे,वहां रहेंगे 
जहाँ स्वाद हो,वो खायेंगे ।
काले,पीले,गोरे मिलकर  
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे । 
तोड़ के दीवारें देशों की, 
सब मिल गायें  मानव  गीत । 
मन से हम आवाहन करते,एक ही मुद्रा,एक ही गीत । 

श्रेष्ठ योनि में, मानव जन्में  
भाषा कैसे समझ न पाए । 
मूक जानवर प्रेम समझते  
हम कैसे पहचान न पाए । 
अंतःकरण समझ औरों का,
सबसे करनी होगी प्रीत ।  
माँ से जन्में,धरा ने पाला, विश्वनिवासी बनते गीत ?

अगर प्रेम,ज़ज्बात हटा दें 
क्या बच पाये  मानव में ? 
बिना सहानुभूति जीवन में 
क्या रह जाए, मानव में ?
जानवरों सी मनोवृत्ति पा,
क्या उन्नति कर पायें गीत । 
मानवता खतरे में  पाकर चिंतित रहते मानव गीत !

Friday, November 29, 2013

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत - सतीश सक्सेना

"मेरे गीत " पर, २४ मई २००८ को पहली कविता "पापा मुझको लम्बा कर दो "  प्रकाशित की गयी थी, जिसकी  रचना ३०-१०-१९८९ को हुई जब मेरी ४ वर्षीया बेटी के मुंह के शब्द कविता बन गए ! इस कविता का एक एक शब्द उस नन्हें मुख की मनुहार का सच्चा वर्णन है जो उसने अपने पापा से कही थी ! यह बाल कविता स्वर्गीय राधेश्याम "प्रगल्भ" को समर्पित की गई थी, जो कि उस समय "बालमेला" नाम की पत्रिका का संपादन कर रहे थे !

और आज ४०० प्रविष्टियों एवं १६२०६ टिप्पणियों एवं १,९६,३७२ पेज व्यू के साथ "मेरे गीत" को, अलेक्सा ट्रैफिक रैंक के अनुसार  भारत में १८६२६ एवं विश्व में १८१०३७ रैंक पर पाकर , खासा संतोष अनुभव कर रहा हूँ !

 शुरुआत में लेखन पर अधिक जोर था , मेरे एक पाठक ने उस समय लिखा था कि मेरे गीत पर गीत कम होते हैं , कहीं दिल को छू गया  और कविता ,पद्य लेखन शुरू किया और अब जब मैं गीत ग़ज़ल अधिक लिख रहा हूँ तो कुछ लोग मुझे कवि भी कहने लगे हैं !

आजकल लेखन में अक्सर मौलिकता की कमी पायी जाती है , मेरी कोशिश रही है कि किसी अन्य मशहूर कवि का प्रभाव मेरी रचनाओं में न आ सके जो कुछ निकले प्रभावी अथवा अप्रभावी मेरे दिल से निकले चाहे लोग पसंद करें या न करें , और शायद मैं इसमें कामयाब रहा हूँ ! इस पूरे रचना काल में मैंने कभी व्याकरण और शिल्प के सुधार की  आवश्यकता के कारण अपनी रचना को नहीं बदला ! मुझे लगता है , ईमानदार भाव अभिव्यक्ति, मौलिक और विशिष्ट होनी चाहिए न कि उसे पुरानी एवं खूब बखानी गयी शैली में बाँध दिया जाय !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर,
सुनकर उल्लास उठे मन से !
कुछ ऐसी लय संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों  से !
गीतों में यदि झंकार न हो,तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी !
रचना के मूल्यांकन में है  , इन  शब्दों की जिम्मेदारी  !


ब्लॉग जगत में सब लेखक हैं अतः पाठकों का अभाव रहता है , बहुत कम लोग ऐसे हैं जो मित्रों को ध्यान से पढ़ते हैं शायद इतना समय ही नहीं है अतः अक्सर बेहद उत्कृष्ट ब्लॉग लेखकों को भी, लोग पढ़ने से वंचित रह जाते हैं ! अफ़सोस है कि नवोदित लेखकों को, जो प्रोत्साहन हम सबसे मिलना चाहिए नहीं मिल पाता ! मेरा विचार है कि बड़े लेखकों द्वारा प्रोत्साहन के अभाव एवं विपरीत माहौल में और उत्कृष्ट लिखना चाहिए, मुझे विश्वास है आज नहीं तो कल कलम अपनी पहचान करा देगी ! 

ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे  
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे  ?
हानि लाभ का लेखा लिखते  ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

हमने हाथ में,  नहीं उठायी ,
तख्ती कभी क्लास जाने को !
कभी न बस्ता, बाँधा हमने,
घर से, गुरुकुल को जाने को !
काव्यशिल्प, को फेंक किनारे,मैं आँचल के गीत लिखूंगा !
प्रथम परीक्षा के,पहले दिन,निष्काषित का दर्द लिखूंगा !

शब्द अर्थ ही जान न पाए ,
विद्वानों  का वेश बनाए ! 
क्या भावना समझ पाओगे
धन संचय के लक्ष्य बनाए !
माँ की दवा, को चोरी करते, बच्चे की वेदना लिखूंगा ! 
श्रद्धा तुम पहचान न पाए,एकलव्य की व्यथा लिखूंगा ! 

अंत में सब मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने जब तब मेरे ब्लॉग का ज़िक्र कर मेरा उत्साह वर्धन किया निस्संदेह उनका उपकार है मेरे ऊपर , इसके बिना शायद कलम में वह ताकत नहीं होती जिसके कारण मैं आत्मसंतुष्टि महसूस करता हूँ , मैं अपने मित्रों के इस उत्साह वर्धन को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार मानता हूँ  ! 

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत !!

Wednesday, November 20, 2013

कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार, सजना - सतीश सक्सेना

विवाह पर गीत गाने की परम्परा, हमारे समाज में शुरू से ही है , सजधज कर मांगलिक अवसर पर महिलाओं द्वारा, ढोलक की थाप पर, यह गीत गुनगुनाइए एक बार …दूसरी बार रचना की है किसी विवाह गीत की  अगर आप पसंद करें तो सफल मानूं !
  

कैसे आये हो गली में लेके प्यार सजना ?
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार सजना ?

सजके आये हो हमारे द्वार,खूब सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से , ले उधार सजना ! 

फेरे डाले हैं यहाँ पे तुमने सात, सजना !
कैसे जाओगे यहाँ से, लेके हार सजना !

कसमें खायीं हैं,हमारे घर सात सजना   
कैसे दोगे तुम प्यार का, उधार सजना !

गांठें  बाँधी हैं , ननद ने , हमारी सजना !  
कैसे जाआगे छुटाके,पल्लू यार सजना !

खाना मामा ने खिलाया हमें साथ सजना !
कैसे खाओगे अकेले, अबकी बार सजना !

सारे नाचे हो गली में आके,आज सजना ! 
कैसे जाओगे गली से, ऐसे यार सजना !

यह आनंद दायक गीत अर्चना चाओजी की मधुर आवाज में सुने …  

Monday, August 26, 2013

कौन किसे सम्मानित करता,खूब जानते मेरे गीत -सतीश सक्सेना

अक्सर अपने ही कामों से 
हम अपनी पहचान कराते 
नस्लें अपने खानदान की 
आते जाते खुद कह जाते ! 
चेहरे पर मुस्कान, ह्रदय से 
गाली देते ,अक्सर मीत !
कौन किसे सम्मानित करता, खूब जानते मेरे गीत !

सरस्वती को ठोकर मारें 
ये कमज़ोर लेखनी वाले !
डमरू बजते भागे ,आयें   
पुरस्कार को लेने वाले  !
बेईमानी छिप न सकेगी,
आशय खूब समझते गीत !
हुल्लड़ , हंगामे पैदा कर ,नाम कमायें  ऐसे  गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले 
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी  
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये  !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी, 
कैसे  बनें  यशस्वी, गीत !
बेच प्रतिष्ठा, गौरव अपना , पुरस्कार हथियाते  गीत !

लार टपकती देख ज्ञान की 
कुछ राजे,  मुस्काते आये  !
मुट्ठी भर , ईनाम  फेंकते 
पंडित  गुणी , लूटने धाएं  ! 
देख दुर्दशा आचार्यों की , 
सर धुन रोते , मेरे गीत  ! 
दबी हुई, राजा बनने की इच्छा, खूब समझते गीत  !

चारण, भांड हमेशा रचते 
रहे , गीत   रजवाड़ों  के  !
वफादार लेखनी रही थी ,
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ये ,
खूब सुनाये  स्तुति  गीत !
हुए पुरस्कृत दरबारों से, फिर भी नज़र झुकाएँ गीत !

हिंदी  का  अपमान कराएं 
लेखक खुद को कहने वाले 
रीति रिवाज़ समझ न पायें 
लोक गीत को, रचने वाले 
कविता का उपहास उड़ायें,
करें प्रकाशित घटिया गीत !
गली गली के ज्ञानी लिखते, अपनी कविता, अपने गीत !

कविता, गद्य, छंद, ग़ज़लों पर ,
कब्ज़ा कर ,लहरायें  झंडा !
सुंदर शोभित नाम रख लिए 
ऐंठ के चलते , लेकर डंडा  !
भीड़ देख, इन आचार्यों  की, 
आतंकित  हैं , मेरे गीत  !
कहाँ गुरु को ढूंढें जाकर, कौन  सुधारे आकर, गीत !

Saturday, March 16, 2013

आओ छींटें मारे, रंग के -सतीश सक्सेना


ताऊ रामपुरिया ने , होली के अवसर पर अपने कविसम्मेलन में आने का न्योता दिया ! ताऊ ने इस अवसर पर मुझे बढ़िया सिल्क के कपडे पहनाये थे , जो कि प्रोग्राम ख़त्म होने पर यह कह कर उतरवा लिए कि अगले कवि सम्मेलन में काम आयेंगे ! 
ताऊ जैसे गुरुघंटाल से और क्या उम्मीद करूं ......खैर 

होली के अवसर पर बुद्धिमान, मित्रों से अनुरोध है कि इस रचना में ,गंभीर अर्थ तलाशने के लिए बुद्धि प्रयोग न करें , केवल आनंद लें ! :)

आभार आपके आने का ! 

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !
ताऊ चालीसा को पढ़ते, 
खेलें  ब्लोगर  होली है !  
आओ छींटें मारे, रंग के,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 

चेला शक्कर 
गुरु के अली 
पटाये जाकर  ! 
गुरु भाई से राज पूंछकर, 
गुरु की गैया,दुह ली है !
तीखे तीरंदाज़ ,सह्रदय , रंग मिज़ाज  त्रिवेदी हैं !


चेले बन कर 
नाम कमाते 
गुरुघंटाल पे ,
बुदधि लगाते 
बाते करते,हंसी हंसीं में,
शह और मात सीखली है !   
घोडा बनकर,इस प्यादे ने,गुरु की धोती खोली है !


कबसे लिखते  ,
आस लगाये !
इतना लिखा 
न कोई आये !
नज़र  न आये, कोई भौजी ,
किससे  खेलें  ? होली है  !
कुछ तो आहट दरवाजे पर,कहीं तो पायल छनकी है !


ब्लोगिंग करते 
सब चलता है !
कुछ भी लिखदो 
सब छपता है !
जिनको कहीं न सुनने वाले,
यहाँ पर बजतीं ताली हैं !
यहाँ पन्त जी और  मैथिली , अक्सर भरते पानी  हैं !

चार कोस पे 
पानी बदले ,
आठ कोस  
पर   बानी  !
देसी बानी पढ़ी, न समझी,
अर्थ  अनर्थ  पहेली है  ! 
किसके कपडे साफ़ बचे हैं,किसकी रंगत गोरी है ! 

कचरा लिख दो ,
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो
कवि बैठे हैं, माथा पकडे  ,
कविता  कैसी   होली  है !
एक पंक्ति में,दो शब्दों की, माला  लगती सोणी है !

कापी  कर  ले ,

जुगत  भिडाले !  
ब्लोगर बनकर  
नाम कमा  ले ,
मधुर गीत की बातें अब तो ,
बड़ी पुरानी हो ली हैं  !
ताऊ ने हाइकू लिखमारा,शिकी की गागर फोड़ी है !

अधर्म करते 

धर्म सिखाते  
बड़े रसीले,
शीर्षक लिखते  !
नज़र बचाके ,कैसे उसने,
दूध में गोली, घोली है !
नया मुखौटा लगा के देखो,पीठ में मारे गोली है !

ब्लू लेवल 

की बोतल आई ,
नई कार 
बीबी को भायी
बाबू जी का,टूटा चश्मा,
माँ  की  चप्पल आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू  देखे , यही  तो प्यारे होली है !







Saturday, February 16, 2013

देख के इन कवियों की भाषा , आँख चुराएं मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कलम उठा अपने हाथों में 
ज्ञानमूर्ति , कहलाते हैं !
दुष्ट प्रकृति के स्वामी अपना 
नाम व्यास बतलाते हैं !
शारद को अपमानित करते ,
लिखते बड़े रसीले गीत !
देख के इन कवियों की भाषा ,आँख चुराएं मेरे गीत !

कौन धूप में,जल को लाकर
सूखे मन को तृप्त कराये ?
प्यासे को आचमन कराने 
गंगा , कौन ढूंढ के लाये ?
नंगे पैरों, गुरु दर्शन को ,
आये थे, मन में ले प्रीत !
सच्चा गुरु ही राह दिखाए , खूब जानते मेरे गीत !

धवलवस्त्र, मंत्रोच्चारण ,
से मुख पर भारी तेज दिखे 
टीवी से हर घर में आये
इन संतों से , दूर रहें !
रात्रि जागरण में बैठे हैं ,
लक्ष्मीपूजा करते गीत !
श्रद्धा के व्यापारी गाते , तन्मय हो जहरीले गीत !

कष्टनिवारक से लगते हैं, 
वस्त्र पहन, सन्यासी के !
राम नाम का ओढ़ दुशाला
बुरे करम, अधिवासी के !
मन में लालच ,नज़र में धोखा,
मुंह से बोलें , मीठे गीत !
श्रद्धा बेंचें,घर घर जाकर, रात में मस्त निशाचर गीत !


शिक्षण की दीक्षा देते हैं ,
गुरुशिष्टता मर्म, न जाने
शिष्यों से रिश्ता बदला है,
जीवन के सुख को पहचाने
आरुणि ठिठुर ठिठुर मर जाएँ,
आश्रम में धन लाएं खींच !
आज कहाँ से ढूँढें ऋषिवर, बड़े दुखी हैं, मेरे गीत !



Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 
घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए , सब गाएंगे  इसके गीत ! 

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !

Monday, June 18, 2012

ब्लोगर साथियों के समक्ष, मेरे गीत का लोक समर्पण - सतीश सक्सेना

16 जून लगभग ५:३० सायं हिन्दी के प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ राजेंद्र अग्रवाल जी, डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा , डॉ भारतेंदु मिश्र जी, श्री अशोक गुप्ता ,एवं प्रोफ़ेसर डॉ अम्बरीश सक्सेना, जिन्हें देश में मीडिया  गुरु का दर्ज़ा प्राप्त है , की उपस्थिति में, डॉ देवेन्द्र देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र " ने ज्योतिपर्व प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित पुस्तक "मेरे गीत " का विमोचन किया !


वयोवृद्ध आचार्य  श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं। उनकी 50 से अधिक पुस्तकें जिनमे गीत, कविता, ग़ज़ल और आलोचना की पुस्तके शामिल हैं, प्रकाशित हुई हैं ! दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष श्री इन्द्र पर कम से कम 20 विद्यार्थियों ने शोध किया है।यहाँ उपस्थिति ,टेलीविजन जर्नलिज्म के कद्दावर चेहरों में से एक डॉ अम्बरीश सक्सेना मेरे स्कूल दिनों के सहपाठी रहे हैं ! भयानक गर्मी में, सायं 5 बजे कड़ी धुप में,  घर से चलकर , एक किताब के विमोचन में पंहुचना आसान काम नहीं था , अतः साथियों का आवाहन करते समय मैंने यह पंक्तियाँ लिखी थीं !


आज तुम्हारे पदचापों  की ,
सांस रोककर आशा करता,
तेज धूप में घर से  निकलें
मैं दिल से,आवाहन करता,
देखें कितना प्यार मिला है,कितने घर तक पंहुचे गीत !
कड़ी  धूप में , घर से बाहर,  तुम्हें  बुलाते  मेरे गीत  !


इस दुनियां में मुझसे बेहतर
गीत, सैकड़ो लिखने वाले  !
मुझसे अच्छा कहने वाले,
मुझसे  अच्छा गाने वाले  !
भरी दुपहरी घर से निकले, सुनने आये मेरे गीत  !
मात्र उपस्थित होने से ही, गौरव शाली मेरे गीत !


इस गीत यज्ञ में उपस्थित गुरु जनों का स्वागत करने हेतु , कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं   ...


देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" मेरी नज़र में साक्षात् गीतेश भी हैं, उनके समक्ष गीत सुनाना, दुस्साहस सा लग रहा था ! मगर देव वंदना और गुरु वंदना किसी भी आयोजन में आवश्यक मानी गयीं हैं ...


बिल्व पत्र और फूल धतूरा
पंचामृत अर्पित शिव पर !
देवराज सम्मान हेतु, खुद
गज आनन्, दरवाजे पर  !
इन्द्रदेव को घर में पाकर ,शंख   बजाएं मेरे गीत !
आचार्यों की नज़र पड़ी है , उत्साहित हैं मेरे गीत !


अपने श्रोताओं में , सहसा,
तुम्हे देखकर मन सकुचाया !
कैसे आये, राह भूलकर, मैं
लोभी,कुछ समझ ना पाया !
साधक जैसी श्रद्धा लेकर, तुम भी सुनने आये गीत !
कहाँ से वह आकर्षण लाऊँ, तुम्हें लुभाएं मेरे गीत !


हमारी मूल पुस्तकों में लिखा है कि गुरुकुल में, उच्च कोटि के प्राध्यापकों में, आचार्य, गुरु और उपाध्याय होते थे जिनमें आचार्य सर्व गुण संपन्न थे वहीँ उपाध्याय अपनी जीविकार्जन के लिए कुछ धन लेकर विद्यार्थी को वेद का कोई एक भाग पढाने पर सहमति व्यक्त करते थे ! इस सभा भवन में मेरे समक्ष न केवल गुरुजन मौजूद थे  बल्कि आचार्यवर की  भी उपस्थिति थी और मैं एक ऐसा विद्यार्थी जिसे कभी उपाध्याय के पाँव छूने का अवसर भी न मिला हों, संकोच में था कि वह  आचार्य समुदाय के समक्ष कैसे सुनाये और क्या सुनाये ....






गीतों का आकलन हेतु ,
आचार्य ,गुरु दरवाजे पर
उपाध्याय के पांव न देखे
क्या जाऊं , दरवाजे पर , 
सत्यवाक,ध्रतिमान सामने,हतप्रभ होते मेरे गीत !
पद्मनाभ की स्तुति करते, संकोचित हैं, मेरे गीत !


आज हवन को पूरा करने
कमल अष्टदल, आये हैं !
अक्षत पुष्प हाथ में लेकर
गुरु जन, घर में आये हैं !
यज्ञ अग्नि में समिधा देने, मंत्रोच्चारण करते  गीत !
स्वस्ति ध्वनि के साथ,गरजते बादल,देखें मेरे गीत !


मेरे गीतों की रचना कभी भी पुस्तक का आकार अथवा आकर्षण केंद्र बनने के लिए नहीं की गयी ! इस पुस्तक में संकलित मेरे गीत , पिछले २३ वर्षों में लिखे गए थे , शुरू के दिनों के लिखे कुछ गीत अपने मूल स्वरुप और अनगढ़  अवस्था में हैं एवं उन्हें कभी व्यवस्थित करने का भी प्रयास नहीं किया गया ! अधिकतर गीत सामाजिक जीवन की सच्चाइयों से सबक लेकर लिखे गए !


जब भी व्यक्तिगत अथवा किसी मित्र की वेदना का अनुभव हुआ , उसी समय अक्सर बिना प्रयास, एक गीत रचना हुई !


समस्त गीत बेहद ईमानदार हैं , वे तालियों की चाह के लिए अथवा किसी प्रकार के धनोपार्जन के लिए नहीं रचे गए ! सभा में ५-६ मेरे ऐसे सहकर्मी मित्र भी उपस्थिति थे जो मुझे २५ वर्षों से जानते थे और वे  यह देख अचंभित थे कि मैंने यह गीत बरसों पहले लिखे थे और इन्हें पहले कभी नहीं सुनाया गया ! मैंने अपने लेखन कर्म की चर्चा , अपने सहकर्मियों में  कभी नहीं की थी !


जहाँ माता,पिता, बहिन, भाई और वृद्धजनों पर मैं अक्सर गीत अथवा लेख लिखता रहा हूँ वहीँ एक और विषय मुझे अक्सर मुझे उद्वेलित करता रहा है ,हर पिता की लाडली पुत्री की, शेष बचे जीवन के लिए, अपने घर से विदाई ....


यह मेरे लिए बेहद तकलीफ देह है ! मज़बूत पिता के कठोर बदन का यह सबसे कमज़ोर हिस्सा , हमेशा के लिए, नए लोगों के मध्य अपना नया घोंसला बनाने के लिए, विदाई लेता है ! घर की  सबसे नाज़ुक डाली ही अपने वृक्ष से , नव जीवन रचना के लिए,  काट दी जाती है !

अपने बचे हुए पूरे जीवन यह लडकियां अपने पिता और भाई को आशा भरी नज़र से देखती हैं कि वे उसे याद रखे रहेंगे !हमारा यह दायित्व है कि उनकी यह आशा हम हमेशा बनाए रखें और अपने घर के इस पौधे को, सदा हरा भरा रखने के लिए, उसके आसपास बने रहे ! अक्सर बेटी पर लिखे गीत पढ़ नहीं पाता , ऑंखें अक्सर साथ छोड़ जाती हैं ! आशा है पाठक इन भावनाओं के साथ इन गीतों को बेहतर आनंद ले पायेंगे ! 

इस सम्मलेन की विशेषता, दूर दूर से ब्लोगर साथी मेरा साथ देने को वहाँ उपस्थित हुए थे  यह मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था ! हालाँकि अरुण चंद्र रॉय आशंकित थे कि कड़ी गर्मी में इस प्रकार के आयोजन में १० - १५ लोग से अधिक लोग नहीं आ पाते हैं वहाँ इस छोटे से सभागार में लगभग १०० लोग एकत्रित थे ! इसी समारोह  में सुश्री रश्मि प्रभा द्वारा संकलित गीतों के  एक संग्रह खामोश खामोशी और हम का भी विमोचन किया गया !   

उपस्थित सम्मानित ब्लागर साथियों में, समाज को अपनी सेहत के लिए जागरूक बनाते  सर्वश्री कुमार राधारमण  , दिल्ली सरकार से गोल्ड मैडिल सम्मानित न्यूक्लियर मेडिसिन फिजिशियन  डॉ तारीफ़ दराल , संजय भास्कर, अमरेन्द्र त्रिपाठी, अस्वस्थ होने के बावजूद अविनाश वाचस्पति, मितभाषी निशांत मिश्र , ब्लागरों में इकलौता बाबा , दीपक बाबा , जय बाबा बनारस का उद्घोष  करते पुरविया कौशल किशोर मिश्र , स्नेही जज्बाती  एम् वर्मा , पहली बार संजू जी के बिना उपस्थित,हंसाते रहो के मस्त मौला  राजीव तनेजा , जिन्दगी की राहों में अपना साफसुथरा रास्ता तैयार करते  मुकेश कुमार सिन्हा , नवजवान कवि विनोद पाण्डेय, प्रेमी ह्रदय के साथ प्रेमरस वाले शाहनवाज़ सिद्दीकी, तेजतर्रार मगर गुरु के आरुणि  संतोष त्रिवेदी, के अतिरिक्त महिला ब्लोगरों की उपस्थिति मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य रहा !

बेहतरीन स्नेही मेज़बान सुश्री सुनीता "शानू "पिलानी से खास तौर पर अपने सुदर्शन,सुसंस्कृत पुत्र के साथ वहाँ आयीं थी , वहीँ क्षितिजा फेम  संवेदन शील एवं स्नेही अंजू चौधरी  "अनु " करनाल से अकेली पंहुचीं थीं ! हंसमुख  वंदना गुप्ता को अनायास वहाँ पाकर मैं आश्चर्य चकित था ,उनके वहां पंहुचने की  कोई पूर्व सूचना नहीं थी   ! स्टार न्यूज़ एजेंसी की ग्रुप एडिटर फिरदौस खान ऐसे आयोजनों में बहुत कम जाती हैं , वे भी वहाँ पूरे सब्र के साथ अंत तक उपस्थित थीं ! निस्संदेह इन महिलाओं की उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ी है और मैं व्यक्तिगत तौर पर इसके लिए आभारी हूँ !

अनुज खुशदीप सहगल की अनुपस्थिति, उनके अस्वस्थ होने के कारण बहुत अधिक खलती रही .......

"मेरे गीत " के बारे में विद्वानों की राय ...


अंतर्मंथन : http://tsdaral.blogspot.in/2012/05/blog-post_19.html
गीत मेरी अनुभूतियाँ : http://geet7553.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
क्वचिदन्यतोपि : http://mishraarvind.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
बैसवारी : http://www.santoshtrivedi.com/2012/06/blog-post.html
हरिभूमि : http://epaper.haribhoomi.com/Details.aspx?id=5377&boxid=142647772
जख्म जो ...http://redrose-vandana.blogspot.in/2012/06/blog-post_17.html
पुस्तकायन : http://padhatehue.blogspot.in/2012/06/blog-post.html
न दैन्यं न पलायनम : http://praveenpandeypp.blogspot.in/2012/06/blog-post_20.html
पंजाब केसरी :http://www.punjabkesari.com/E-Paper/Magzine/adv_3.pdf
न्यूज़ ट्रैक इंडिया : http://www.newstrackindia.com/photogallery/images/view/1708-MERE-GEET---Book-Release.html

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