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Friday, April 19, 2024

गढ़ दिया तुमने हमें अब, भाग्य अपना ख़ुद गढ़ेंगे -सतीश सक्सेना

आदरणीय रमाकान्त सिंह जी का अनुरोध पाकर, उनकी ही प्रथम पंक्तियों से, इस कविता की रचना हुई , आभार भाई  ! 

गढ़ दिया तुमने हमें अब, भाग्य अपना ख़ुद गढ़ेंगे !

धरा से सहनशीलता ले,
अग्नि का ताप सहा हमने 
पवन के ठन्डे झोंको संग 
सलिल से शीतलता पायी 
यही पर ज्ञान लिया तुमसे
परिश्रम की क्षमता आयी 
अब हुआ विश्वास सचमुच 
छू सकेंगे हम गगन ,अब 
ज्ञान पाकर शारदा से, 
भाग्य अपना खुद लिखेंगे !
गढ़ दिया तुमने हमें अब, भाग्य अपना खुद गढ़ेंगे !

अब हमें विश्वास अपना
रास्ता पाएंगे , हम भी  !
ज्ञान का आधार लेकर ,
विश्व को समझेंगे हम भी 
अपने विद्यालय से ही तो 
मिल सका है बोध हमको 
शक्तिशाली पंख पाकर 
छू सकेंगे चाँद हम ,अब 
प्रबल इच्छाशक्ति  लेकर, 
भाग्य अपना खुद बुनेंगे !
गढ़ दिया तुमने हमें अब , भाग्य अपना खुद गढ़ेंगे !

https://www.facebook.com/ramakant.singh.509

Thursday, June 30, 2022

मम्मा की सब बात मान ली और बताओ क्या करना है -सतीश सक्सेना

जूते, मोज़े ,वाटर बोतल
कपडे सारे पहन लिए हैं !
अब पापा खुश हो जाएंगे 
किंडर गार्डन , ले जाएंगे !
दादी की सब बात मानती और बताओ क्या करना है !

शोर मचाना नहीं यहाँ पर 
मम्मा ऑफिस में बैठी हैं !
मेरा इन्तिज़ार करने को , 
चिड़िया भी बाहर बैठी है !
पेपा साथ खेलने जाती और बताओ क्या करना है !

फर्श पे खाना, नहीं गिराऊं 
मुझसे कोई उदास न होगा !
दादी का मैं, अच्छा बच्चा
अब कोई भी बोर न होगा !
मैंने खाना ख़तम कर लिया और बताओ क्या करना है !

खम्मा घणी रोज करता है 
नानी नानू खुश हो जाते !
रोज सवेरे पहन के कपडे 
मम्मा के संग क्रिप्पे जाते 
बाबा की सब बात मानती और बताओ क्या करना है !

बुई प्यार करती है मुझको 
फुफ्फु ने गाना सिखलाये !
पायल कंगन चूड़ी के संग
कपडे और खिलौने लाये !
संग में चूंचूं गाना गाये और बताओ क्या करना है !

Friday, February 9, 2018

उम्मीदें कुछ कम कर बेटा -सतीश सक्सेना

अर्थ अनर्थ है,अक्सर बेटा !
शब्द अर्थ,रूपान्तर बेटा !


क्रूर, कुटिल, सूखे पत्थर में ,
धड़कन,न तलाश कर बेटा !

सूख गए , तालाब प्यार के
अब न रहे, पद्माकर बेटा !

इस निष्ठुर जंगल में तुमको
मिलें खूब , आडम्बर बेटा !

अच्छे दिन जुमले हैं केवल,
उम्मीदें कुछ कम कर बेटा !


Wednesday, January 21, 2015

शुभी -सतीश सक्सेना

                       यह बाल कविता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है अपने परिवार में , 24 -25 वर्ष पहले, अपने बड़ों को यह सबूत देने को कि मुझे वाकई कविता लिखनी आती है ,सामने खेलती हुई, नन्ही शुभी (कृति )को देख , उसके बचपन का चित्र खींचा था !!   

छोटी हैं, शैतान बड़ी पर,
सबक सिखाएं प्यार का ! 
हाल न जाने क्या होना है, शुभी की ससुराल का !

दिखने में तो छोटी हैं ,
लेकिन बड़ी सयानी हैं ! 
कद काठी में भारी भरकम
माँ , की राज दुलारी हैं !
नखरे राजकुमारी जैसे 
इनकी मस्ती के क्या कहने 
एक पैर पापा के घर में 
एक पैर ननिहाल है !
दोनों परिवारों में यह,
अधिकार जमाये प्यार का !
हाल न जाने क्यों होना है, शुभी की ससुराल का !

चुगली करने में माहिर हैं 

झगडा  करना ठीक नहीं 
जब चाहें शिल्पी अन्नू को
पापा  से पिटवाती हैं  !
सेहत अपनी माँ जैसी है 
भारी भरकम बिल्ली जैसी 
जहाँ पै देखें दूध मलाई 
लार  वहीँ टपकाती हैं 
सुबह को हलवा,शाम को अंडा,
रात को पीना दूध का !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का  !

सारे हलवाई पहचाने 

मोटा गाहक इनको माने 
एक राज की बात बताऊँ 
इस सेहत का राज सुनाऊं 
सुबह शाम रबड़ी रसगुल्ला 
ढाई किलो दूध का पीना 
रबड़ी और मलाई ऊपर 
देसी  घी पी  जाती हैं !
नानी दुबली होती  जातीं ,  
देख के खर्चा दूध का  !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का !

आस पास के मामा नाना 

इनको गोद खिलाने आयें
बाते सुनने इनकी अक्सर  
अपने घर बुलवायीं जाए  
तभी भी शुभी प्यारी हैं 
सबकी राज दुलारी हैं !
मीठी मीठी बाते कहकर 
सबका मन बहलाती हैं !
खुशियों का अहसास दिलाये,
किस्सा राजकुमारी का ! 
हाल न जाने क्या होना है , शुभी  की ससुराल  का  ! 

Saturday, December 6, 2014

दर्द में भी , मुस्कराना चाहिए - सतीश सक्सेना

चाँद को माँ से, मिलाना चाहिए
नज़र का टीका लगाना चाहिए !

दर्द जब जब, आसमां छूने लगे,
गम भुलाकर मुस्कराना चाहिए !

आइये अब तो गले लग जाइये 
समय कम है, गीत गाना चाहिए !

कोई अपना रूठ जाए , भूल से, 
पास जा उसको मनाना चाहिए !

वक्त कम है काम बाकी है पड़े,   
नींद से, सबको जगाना चाहिए !

Thursday, November 20, 2014

बात करेंगे मेहनत की - सतीश सक्सेना

खूब लगेगी भूख अगर हम काम करेंगे जी भर के !

बात करेंगे मेहनत की
मन से हुई ,पढ़ाई की !
सबसे आगे , रहने की
अच्छे नंबर, लाने की !

क्लास रूम में सिर्फ पढ़ाई
की ही, केवल बात करेंगे !
टीचर जी को , ध्यान से सुनकर, ऐश करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
रिक्शे वाले भैया की !
बच्चों के आने जाने में 

बहते हुए, पसीने की !
अगर बिना घबराये हमने, 
संघर्षों की आदत डाली !   
तो हम भी मेहनत के बदले , मौज करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
बढ़िया खाना खाने की
होम वर्क करवाने की
बस से लाने जाने की !

उसी परिश्रम के फल से , 
हम खूब से पैसे पाएंगे !
मम्मी की मेहनत के बदले , मजे करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
अपने प्यारे पापा की
सबकी जिम्मेदारी की 
घर में सबसे भारी की
उनके इस भरपूर प्यार से,
मन ने ताकत पायी है !  
पापा की मेहनत के बदले, राज करेंगे जीभर के !

Wednesday, June 11, 2014

अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना

ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !

कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
प्रतिद्वंदी फुर्तीला होगा , लेकिन पाँव बढ़ाना सीख !

हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे 
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !

जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !

दुःख में कभी नहीं घबराना,अपने हाथ नहीं फैलाना
अगर याद ईश्वर की आये , माँ के पैर दबाना सीख !


Monday, June 9, 2014

इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का

इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !

गर्म  हवा के लगे, थपेड़े, 
वृक्ष न मिलते राही  को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल 
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के, 
सीना जलता जननी  का  ! 
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !

चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों   से !
पीने का जल,जहर बनाये   
मानव  अपने  हाथों  से  !
डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग
बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !

उसी वृक्ष को काटा हमने   
जिस आँचल में,  सोते थे ! 
पृथ्वी  के आभूषण, बेंचे 
जिनमें  आश्रय  पाते  थे !
मूर्ख मानवों की करनी से, 
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन,  बुझाने का !

जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले   
हमसे प्यार , चाहती  थी !
दर्द  से तडप रही मां घर में, 
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !

जल से  झरते, झरने सूखे 
नरम मुलायम पत्ते, रूखे 
कोयल की आवाज़ न आये 
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,  
है आवाहन  मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !

Thursday, February 20, 2014

आदतें पशुओं के जैसी, जानवर घबराएंगे ! - सतीश सक्सेना

मानवों की बस्तियों में , बेजुबां मर जाएंगे !
दूध के बदले उन्हें हम प्लास्टिक खिलवाएंगे

हम जहाँ होंगे ,वहीँ कुछ गंदगी बिखरायेंगे !
आदतें पशुओं के जैसी, जानवर  घबराएंगे !

हर मोहल्ले में,जिधर देखो, उधर कूड़ा पड़ा !
भिनभिनाती मख्खियों के साथ,बच्चे खायेंगे !

जाहिलों के द्वार, ये  आये हैं  खाना ढूंढते !

सडा खाना पन्नियों में डालकर खिलवाएंगे !

जूँठने , थैली में भरकर, घर के बाहर है रखी !

गाय देती दूध हमको, हम जहर खिलवाएंगे !

Saturday, December 14, 2013

क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे -सतीश सक्सेना

दुनिया तो चलती जायेगी 
केवल हम ही साथ न होंगे 
एक दिवस तो जाना ही है 
कुछ बरसों में यहाँ न होंगे 
सबका अंत समय आना है,
तब क्यों डर डर जलें बुझेंगे ! 
क्या होगा , यदि कल का सूरज, मेरे प्राण नहीं देखेंगे !

यदि भय से कमजोर पड़ेंगे
रंजिश वाले , राज करेंगे ! 
जो हमने सींचा मेहनत से 
उसको वे , बरबाद करेंगे !
अगर भीष्म संकल्प रहेगा 
दुर्जन भी भयभीत रहेंगे  !
जिस बंजर में वृक्ष उगाये , उनकी जड़ें नहीं खोदेंगे !

दुनियां भरी पड़ी ऐसों  से
अपना कद ही बड़ा मानते ,
जीवन बीता रोते रोते फिर 
भी अपनी अकड़ दिखाते
बुद्धि मिली राशन से इनको  
लेकिन ज्ञान, बहुत बांटेंगे !
लुटते बार बार जीवन में , नाम विक्रमादित्य रखेंगे !

ऐसे  कैसे  संगी  साथी 
अपनों को सम्मान न देते 
छोटी छोटी सी बातों पर 
अपना जीवन नर्क बनाते  
नीम के पौधे ,कड़वे लगते, 
गिरते दांतों  को रोयेंगे !
जुते  हुए  तांगे  में कब से , मरने तक ,  सीधे देखेंगे !

काश मानवों को बस्ती  में 
खुश होकर रहना आ जाये 
काश एक ही छत के नीचे
जीवन खुशबू दार बनाएँ !
थोड़े से दिन लेकर आये, 
मन का जमा अहम्  धोएंगे !
हँसते हँसते आँख बंद हों,पता नहीं किस दिन सोयेंगे !

Wednesday, October 30, 2013

अवहेलना जरूरी है ! - सतीश सक्सेना


मानव रूपी, कुत्तों से
रात में जगे, भेड़ियों से
राजनीति के दल्लों की  
खादी की, पोशाकों से
बदन के भूखे मालिक से, बेईमान  तराजू से !
अब संघर्ष जरूरी है !

साधू बने , डकैतों को
नफरत के हरकारों को
बेसिर की अफवाहों को
धर्म के धंधेबाज़ों को !
नक़ल मारते लड़कों को, जमाखोर गद्दारों को !
थप्पड़ एक जरूरी है !

इन भूखे मज़दूरों को 
नंगे पैर किसानो को 
चाय बेचने वालों को 
बिना सहारे वृद्धों को 
शिक्षक और स्कूलों को, घर की अनपढ़ माँओं को,
राहत बहुत जरूरी है!

वधूपक्ष को धमकी की 
धन अर्पण के रस्मों की
रिश्तेदार, लिफाफों की
बेमन जाती , भेंटों की
रिश्तों से उम्मीदों की , झूठे प्यार दिखावे की !
अवहेलना जरूरी है !

मास्क लगाए चेहरों से
मक्कारों के वादों से !

आस्था के व्यापारों से
कृपा रूप ,सम्मानों से
बिके मीडिया वालों से, नेताओं के वादों से !
प्रबल विरोध जरूरी है !

सत्ता के मक्कारों को
नेताओं के धन्धों को ,
देश बेचते, दल्लों को
निपट धूर्त सरदारों को
पुलिस में बेईमानों को, संसद के गद्दारों को !
सीधी जेल जरूरी है !

Monday, October 14, 2013

शायद तुमसे पहले जग में सूरज नहीं उगा करता था - सतीश सक्सेना


कितनी बार,करवटें लेकर, सारी  रात जगा करता था !
जो विश्वस्त बना जीवन में,अक्सर वही दगा करता था !

हम  तो यहाँ ठहर जाएंगे , मगर बुआ यह कहतीं थीं !
जो सराय महफूज़ लगी थी, राही वहीं ठगा करता था !

पता है बरसों से दुनिया को, तुम्हीं अकेले खींच रहे हो ! 
शायद तुमसे पहले जग में, सूरज नहीं उगा करता था !

वे भी क्या रिश्ते थे मन के, सारी दुनिया फीकी लगती !  
सारी रात जगाये मुझको, मन को कौन रंगा  करता था !

लगता जैसे अब यह बस्ती, रहने लायक नहीं रही है !
कितने बुरे बुरे  दिन देखे , ऐसा नहीं लगा करता था !

( यह रचना दैनिक जनवाणी के २० अक्टूबर २०१३ के रविवारीय परिशिष्ट में , गुनगुनाहट कालम में छपी है , यह सूचना डॉ मोनिका शर्मा ने दी है , उनका आभार ! )  

Thursday, October 10, 2013

जब से तालिबान जन्में हैं, विश्व में नफरत आई है - सतीश सक्सेना

तालिबानियों ने,गैरों से द्वेष की फितरत पायी है !
जहाँ गए ये,उठा किताबें, वहीँ हिकारत पायी है !

हैरत में हैं लोग,  इन्होने नफरत  , खूब उगायी है !
इनकी संगति में नन्हों ने ,खूब  अदावत पायी है !

लगता पिछली रात , चाँद ने , अंगारे बरसाए थे !
बहते पानी में भी हमने , आज  हरारत  पायी है ! 

हवा,नदी,मिटटी की खुशबू,कब्ज़ा कर के खायेंगे !  
अपनी मां के टुकड़े करने की भी हिम्मत पायी है !

घर के आँगन में ,बबूल के पौधे ,रोज़ सींचते हैं !
इन्हें देखकर बच्चे सहमें, ऎसी  सूरत  पायी है  !

Thursday, September 12, 2013

आसानी से क्यों होते हैं, मौत के चरचे दुनियां में -सतीश सक्सेना

ऐसा करें कि हाथ पकड़ना सीखें बच्चे दुनिया में ! 
रामू चाचा ,रहमत काका, दोनों सच्चे दुनिया में !

क्यों भड़काते हैं बच्चों को, इनको तो जी लेने दें  !
आसानी से क्यों होते हैं, मौत के चर्चे दुनिया में !

मंदिर मस्जिद की दीवारों को,साधारण रहने दें  !  
अंत समय में,क्यों करते हो,ऐसे खर्चे दुनिया में !

चोर डाकुओं के गिरोह से , गांव सुरक्षित रहने दें 
सुना है,बन्दर बाँट रहे हैं,जीत के पर्चे ,दुनिया में !

ज़हरी बातें, नहीं सिखाएं, इन्हें प्यार से जीने दें  !
हमें पता है,स्वर्ग के दावे,कितने कच्चे दुनिया में !

Friday, June 21, 2013

हिमालय, को समझते,उम्र गुज़र जायेगी - सतीश सक्सेना

                   यह नहीं समझ आया, कि इंसानियत भूलों से, पहाड़ के नुक्सान को पूरा करने को , इस ग़ज़ल में ऐसा क्या लिखें   कि अर्थ पूरा हो ???
                   हमारी बेवकूफियों से पहाड़ रो रहे हैं , नदियाँ क्रोधित हैं , अगर नहीं सुधरे तो अभी बहुत कुछ सहना बाकी है  ! Ref: 16 june 2013, केदार घाटी 

लगता भूलों में ही यह, उम्र गुज़र जायेगी !
हिमालय को समझते, उम्र गुज़र जायेगी ! 

आज सब दब गए, इस दर्द के, पहाड़ तले
अब तो लगता है रोते, उम्र गुज़र जायेगी !

किसको मालूम था, उस रात उफनती, वह 
नदी, देखते देखते ऊपर से, गुज़र जायेगी !

कैसे मिल पाएंगे ?जो लोग, खो गए घर से,
मां को, समझाने में ही, उम्र गुज़र जायेंगी !

बहुत गुमान था, नदियों को बांधते, मानव 
केदार ऐ खौफ में ही, उम्र, गुज़र जायेगी  !

Tuesday, June 11, 2013

लोगों का क्या,चलते फिरते, सूरज पर थूका करते हैं -सतीश सक्सेना

लोगों का क्या,चलते फिरते,सूरज गरिआया करते हैं !
रोशनी भूलकर गरमी पर , कोहराम मचाया करते  हैं  !

गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों जान गवाँया करते हैं !

जीवन भर, जोड़ घटाने में, न मदद किसी की कर पाए !

अब बिखरे सब रिश्ते नाते,फिर क्यों पछताया करते हैं !

जब शक्ति बहुत थी भूल गए अपने ही संगी साथी को !
अब घर में बैठ, जवानी  के, यश गान सुनाया करते हैं ! 

अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें ! 
मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत जगाया करते हैं !

Tuesday, April 2, 2013

रिक्शे वाले ... -सतीश सक्सेना

कुछ पंक्तियाँ, एक कमेन्ट के रूप में श्री गिरधारी खंकरियाल की " ये बेचारे -रिक्शे वाले " शीर्षक वाली रचना पर लिखी गयी हैं ! शीर्षक के शब्द उन्ही के हैं , आभार सहित ,  ...

कौन समझना, चाहे इनको
काम बहुत, क्या देखें इनको
वजन खींचते, बोझा ढोते
दर्द न जाने दुनिया वाले
ये बेचारे रिक्शे वाले !!

भूख न जाने क्या करवाये 
बहे पसीना नज़र न आये
पशुओं जैसा काम कराएं 
बातें करते, दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले

हड्डी हड्डी बता रही है  
नज़रें सामने, मन है घर में
बीमारी का खर्चा, उस पे 
कष्ट न समझें दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले

यह गरीब भी पुत्र किसी की 
दवा के पैसे जुटा रहा है,
अम्मा का दुःख बेटा जाने     
कैसे जानें दुनिया वाले, 
ये बेचारे रिक्शे वाले !

माँ की दवा, बहन की शादी
जाड़ा गर्मी हो या पानी
कुछ अनजानी चिंता इनकी 
समझ न पाएं दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले !!

Friday, May 4, 2012

आओ बच्चो मिल कर के ये कसम उठानी है - सतीश सक्सेना

कल ज्योतिपर्व प्रकाशन के डिज़ाईनर अबनीश ने मेरे गीत पर काम करते करते , मुझे बताया कि उन्हें गीतों का गहरा शौक है ,एक बार पिता के कहने पर उन्होंने चार लाइने लिख कर एक मंच पर सुनाई थी , पहली लाइन "शीर्षक " सुनकर, अवनीश के अनुरोध पर यह रचना की गयी , आओ बच्चो मिलकर के इक कसम उठानी है " पर लिखी इस रचना को महसूस करें !

एक रंग है सबके अन्दर  
एक   सा  भोजन  पायें  !  
एक पिता है सबके अंदर
तब क्यों नज़र झुकाएं  !
फिर क्यों  ऊँच नीच 
समझाती,राम कहानी है !
आदि ग्रन्थ बदले स्वारथबस , यही कहानी है  !

कमजोरों को प्यार करेंगे 
साथ बैठकर  बात करेंगे 
कष्ट दूसरों का समझेंगे  !
एक  साथ खाना खायेंगे  !
और आक्रमणकारी  को  
इक  सीख  सिखानी है 
आओ बच्चो मिलकर के, इक कसम उठानी है !

अपनी माँ  की इज्ज़त जैसी 
महिलाओं की  इज्ज़त होगी 
जैसी अपनी बहिन सुरक्षित 
और सभी की करनी होगी  !
प्रथम सुरक्षा  उनकी , 
जिनकी भीत पुरानी है !
आओ बच्चों मिलकर के ,एक प्रीत जगानी है !  

थके चरण कमजोर पड़े हैं !
हम बच्चों के लिए चले हैं ,
हाथ थक गए मेहनत करते 
हमको मंजिल पर पंहुचाते  
कसम तुम्हे इन छालों की,
बस आस जगानी है !
नेह दिया, मृदु बाती  से , एक ज्योति जगानी है  !

Tuesday, April 17, 2012

हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

कुछ रंग नहीं, कुछ माल नहीं
कुछ मस्ती वाली बात नही,
कुछ खर्च करो, कुछ ऐश करो
कुछ डांस करें, कुछ हो जाए !
यदि मौज नहीं कोई धूम नहीं,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


क्या कहते हो ? क्या करते हो
है ध्यान कहाँ ?कुछ पता नहीं
ना टाफी है, ना चाकलेट ,
ना रसगुल्ला, ना बर्गर है !
हम मस्त कलंदर धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


रंगीन हैं हम, दमदार हैं हम
मस्ती में नम्बरदार, हैं हम
यह समय बताएगा सबको
पढने में तीरंदाज़ हैं हम ,
हम नौनिहाल इस धरती के, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम धूम धाम, तुम टाँय टाँय
हम बम गोले,तुम कांय कांय
हम नयी उमर की नयी फसल
तुम घिसी पिटी भाषण बाजी
हम आसमान के पंछी हैं , हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


ना गुलछर्रे, ना हो हल्ला,
हम धूमधाम,तुम सन्नाटा
हम छक्के हैं तेंदुलकर के ,
तुम वही पुराना नजराना 
हम रंग जमा दें दुनिया में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


हम लड्डू हैं तुम हरा साग ,
हम चाकलेट तुम भिन्डी हो
हम मक्खन हैं,तुम घासलेट 
हम रंग रुपहले,तुम कालिख 
हम मस्ती मारें इस जग में, हम बात तुम्हारी क्यों माने ?

Monday, April 26, 2010

आभूषण रहित धरा को कर क्यों लोग मनाते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

कितने कवियों ने मौसम की
गाथा गायी कविताओं में !
अब मौसम पर कविता लिखते
लेखनी ठहर क्यों जाती है !
बरसों बीते , दिखती न कहीं 

हर ओर छा रही हरियाली !
अब धुआं भरे इस मौसम में क्यों लोग मनाते दीवाली ?


धरती की छाती से निकली 
सहमी सहमी कोंपलें दिखे
काला गहराता धुआं देख
कलियों में वह मुस्कान नहीं
जलवायु प्रकृति को दूषित कर 

धरती लगती खाली खाली
विध्वंस हाथ से अपना कर , क्यों लोग मनाते  दीवाली  ?

प्रकृति का चक्र बदलने को 
काटते पेड़ निर्दयता से  !
बरसात घटी बादल न दिखे
ठंडी जलधार बहे कैसे  !
कर रहीं नष्ट ख़ुद ही समाज,  

कालिदासों की संताने !
आभूषण रहित धरा को कर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अब नहीं नाचता मोर कहीं
घनघोर मेघ का नाम नहीं !
अब नहीं दीखता इन्द्रधनुष 
सतरंगी आभा साथ लिए !
कर उपवन स्वयं तवाह अरे 

क्यों फूल ढूँढता है माली ?
जहरीली सांसे लेकर अब,  क्यों लोग मनाते दीवाली ? 
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