शपथ उठाए संविधान की
Wednesday, January 4, 2023
अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना
शपथ उठाए संविधान की
Friday, December 9, 2022
हम पाखंडी -सतीश सक्सेना
अगर लेखक हैं और आम लोगों में मशहूर होना है तो सबसे पहले नाम बदलिए , बेहतरीन सांस्कृतिक नाम रखिए, दाढ़ी बढ़ा लीजिए बड़े बाल कंधे तक बनाइए, खादी कुर्ता पजामा, चेहरे पर गंभीरता , और कुछ चेले लेकर चलना शुरू करें फिर देखिए जलवा !
सबसे बढ़िया धंधा करना हो तो बाबा बन जाइए, सतीश सक्सेना जैसे बकवास नाम की जगह सत्यानंद सरस्वती अधिक प्रभावशाली रहेगा, दाढ़ी और सर के बाल बढ़ाकर नारंगी रंग की धोती पहनिए, पैरों में खड़ाऊँ हों तो क्या कहने, राह चलते लोगों में पैर छूने की होड़ लग जाएगी , आशीर्वाद दो और धन बरसने लगेगा !
और अगर 69-70 की उम्र में आकर, टी शर्ट, शॉर्ट पहन लिया तब लोगों से यह सुनने को तैयार रहिए, चढ़ी जवानी बुड्ढे नू ! मन को मारना सीख ले, इस उम्र में यह रंग, सब लोग क्या कहेंगे !
अभी हमें मानसिक तौर पर विकसित होने में, कम से कम 100 साल लगेंगे !
Thursday, September 1, 2022
दिखावे की दुनियाँ में जीता एक कवि ह्रदय -सतीश सक्सेना
मैं जब भी किसी महिला से बात करता हूँ पहले उसमें माँ की तलाश अवश्य करता हूँ , और अधिकतर सफल भी रहता हूँ ! अनुलता नैयर जैसी छोटी लड़कियां , सुमन पाटिल जैसी हमउम्र अथवा पुष्पा तिवारी जैसी बड़ी , सुदेश आर्य को मैं अक्सर मां सम्बोधन देता हूँ और यह सम्बोधन उनके स्नेही स्वभाव के कारण ही होता है अन्यथा सुदेश मेरे लिए एक चंचल बच्ची से अधिक कुछ नहीं !
Tuesday, August 9, 2022
मानसिक अवरोध -सतीश सक्सेना
Friday, July 22, 2022
अगर परमात्मा, इन्सान होता -सतीश सक्सेना
भुलाना भी उसे , आसान होता !
पहुँचते उसके दरवाजे भिखारी ,
बगावत का, वहीं ऐलान होता !
दिखाते भूख से, बच्चे तड़पते
Friday, July 9, 2021
मैं धीमी आवाजों को अभिव्यक्ति दिलाने लिखता हूँ -सतीश सक्सेना
एक दोस्त ने , बढे हुए वजन को घटाने के लिए व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी के किसी ग्रेजुएट का बताया फार्मूला भेजा और पूंछा कि क्या इसे दो दिन कर लूँ ? उसे पढ़ने पर पता चला कि उसमें 17 तरीके के किचेन अवयव शामिल थे , जिनको तलाश करने और बनाने में ही वजन दो किलो घट जाएगा और उसका विवरण इतना जबरदस्त था कि पालन करने वाले को यह फार्मूला रामवाण ही लगेगा !
हमारे देश में ज्ञानियों की भरमार है , ज्ञान देने वाले और लेने वाले दोनों एक से हैं , उनकी हर बीमारी खाने से जुड़ी मानी जाती है और उनकी हर समस्या का निदान भी खाने में ही होता है बस शरीर को तकलीफ न देना पड़े और वजन घट जाए इसकी तलाश जीवन भर चलती रहती है ! जैसे तैसे जब वे 45 के होते हैं तब उन्हें लगता है कि शरीर बेडौल होने लगा है और वे इसका इलाज टहलना मानते हैं सो पड़ोस के किसी एक मित्र के साथ पार्क में आधा घंटा, ऑफिस में मारे हुए तीर उस दोस्त को सुनाते हुए, टहलना शुरू करते हैं जो ताउम्र चलता है बिना यह समझने का प्रयत्न किये कि इस क्रिया से एक किलो भी वजन हिला नहीं है ! उम्र बढ़ने के साथ स्वतः शारीरिक क्षरण के साथ बीमारियां बढ़ने लगती हैं जिनका इलाज वे सड़क छाप ज्ञानियों के दिए फार्मूलों से करते हैं ! इन फॉर्मूलों में अदरक , हल्दी , काली मिर्च , लौंग, दालचीनी , निम्बू , हरा धनिया, सेंधा नमक , जीरा , अजवायन , हींग और लहसुन अवश्य होता है जो हम बचपन से खाते रहे हैं !
उपरोक्त फार्मूला में नाटकीयता की भरमार है ताकि गुरु के प्रति आदर भावना और अधिक हो , जबकि सप्ताह में दो दिन अगर रोटी आदि नियमित भोजन बंद कर पहले दिन केवल सब्जियां उबालकर अथवा कच्ची सलाद और दुसरे दिन केवल फलों का सेवन, भरपूर पानी पीते हुए करें तब वजन डेढ़ से ढाई किलो घट जाता है और अगर साथ में रोज ब्रिस्क वाकिंग या रनिंग करें तब यह वजन कभी शरीर पर कब्ज़ा नहीं कर सकता !
आज सुबह दौड़ते हुए मेरे पास से एक नौजवान आगे निकला गया उसके हावभाव से लग रहा है कि वह दौड़ने में नौसिखिया है , नतीजा थोड़ी देर बाद ही वह हांफने लगा और वाक करने लगा ! तब मैंने उसे समझाया कि हांफते हुए दौड़ना जान ले सकता है , हांफने का मतलब तुम्हें सही पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही अतः हृदय पर अधिक दवाब पड़ रहा है ! मेरे साथ दौड़ो और दौड़ते हुए मेरी तरह साँस लो , हर गिरते उठते कदम पर सांस खींचना और छोड़ना शामिल होना चाहिए जिस दिन कदम ताल के साथ सांस लेना और छोड़ना सीख गए उस दिन तुम कितनी ही दूरी दौड़ोगे , थकोगे नहीं !
सो अगर अपने बीमार हृदय, पेन्क्रियास और मोटापे से पीछा छुटाना है तो दौड़ना सीखना शुरू करें ! आप हर उम्र में खुश रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे !
Friday, January 1, 2021
हो सकें तो उन्मुक्त होकर हंसना सीखें , आप उम्रदराज़ होंगे -सतीश सक्सेना
हमने तो दोस्ती में जान देना सीखा है और वह भी बिना कहे बिना अहसान , अहसास दिलाये , ऐसे लोग हमें नहीं मिले ! खैर अब आगे दोस्ती ही नहीं करना सिर्फ हेलो कैसे हैं , से आगे नहीं जाना, यही संकल्प है अगले कुछ दिन या वर्षों के लिए , जो भी हाथ में हों !
आप सब से ऐसी शुभकामनायें चाहिए कि अगले साल "हमें समझ जाने वाले" और "हमारी असलियत जानने वाले" समझदार, कम से कम टकरायें :-)), और कुछ भले और ईमानदार लोगों से भेंट हो तो इन लेखों का लिखना सार्थक हो ! सबसे अंत में ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे पास इतना धन और शक्ति जरूर बचाए रखे कि वक्त आने पर, मेरे दरवाजे से , कोई मायूस होकर, वापस न लौट जाए !किसी का एक आंसू , बिना उस पर अहसान किये, पोंछ सका, तो अगले वर्ष, अपना मन संतुष्ट मान लूँगा ...
आप सब, नववर्ष पर उन्मुक्त नजरें मिलाकर, खुलकर हंसें और हंसाएं , यही कामना है !
Saturday, December 26, 2020
तो फिर मेरी चाल देख ले -सतीश सक्सेना
शायद यह अकेला समाज है जहाँ ऊपरी दिखावे को सम्मान देना सिखाया जाता है ! अगर सामने से कोई गेरुआ वस्त्र धारी और पैर में खड़ाऊं पहने आ रहा है तो पक्का उस महात्मा के चरणों में झुकना होगा और आशीर्वाद मांगना ही है चाहे वह बुड्ढा पूरे जीवन डाके डालकर दाढ़ी बढ़ाकर छिपने के लिए बाबा क्यों न बना हो और किसी गए गुजरे का आशीर्वाद पाने के योग्य भी न हो !
Friday, November 13, 2020
दरी बिछाकर फटी तेरे , दरवाजे आके नाचेंगे -सतीश सक्सेना
Sunday, September 13, 2020
कवितायें बिकाऊ हैं , बग़ावत नहीं रही -सतीश सक्सेना
सुन भी लें तो भी ,मन में इबादत नहीं रही !
इक वक्त था जब कवि थे देश में गिने चुने
माँ से मिली ज़ुबान , कब के भूल चुके हैं !
गीतों से कोई ख़त ओ क़िताबत नहीं रही !
संस्कार माँ बहिन की गालियों में ,खो गए
Friday, July 24, 2020
न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना
मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए !
Friday, June 26, 2020
पंहुचेंगे कहीं तक तो प्यारे,ये कपोत दिलेर,हमारे भी -सतीश सक्सेना
खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी ! सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !
पढ़ने लिखने का काम नहीं बेईमानों की बस्ती में !
बाबा-गुंडों में स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !
चोट्टे बेईमान यहाँ आकर बाबा बन घर को लूट रहे
जनता को समझाते हांफे, पुख्ता शमशेर हमारे भी !
जाने क्यों वेद लिखे हमने, हँसते हैं हम अपने ऊपर
भैंसे भी, कहाँ से समझेंगे, यह गोबर ढेर, हमारे भी !
फिर भी कुछ ढेले फेंक रहे ,शायद ये नींदें खुल जाएँ !
Monday, June 8, 2020
बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे -सतीश सक्सेना
बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे ?
बेशर्म जमूरे और सच को जमीं बिछाकर
हथियार मदारी के , आह्वान क्या करेंगे !
जनतंत्र की व्यथा हैं, व्यवधान क्या करेंगे !
Monday, January 20, 2020
थोड़े से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी -सतीश सक्सेना
मुर्दा हुए शरीर को , जीना सिखाइये !मरते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !
इतने से दर्द में ही , क्यूँ ऑंखें छलक उठी
गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये !
सरकार,शाही खौफ से, डरना सिखाइये !
नज़रें उठायीं तख़्त पे दिलदार, तो खुद को ,
सरकार के डंडों को भी,सहना सिखाइये !
Friday, May 31, 2019
हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना
भीड़ का है रेलम पेला
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
मिले स्पर्श नेह इक साथ
मुसीबत में शबरी का संग
लगे परमेश्वर का दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे
पीठ पर है निर्भय अहसास
सूफियों का विरक्त संसार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
कौन आये देने विश्वास
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को
डुबायें दर्द, दीवानी में !
Thursday, February 7, 2019
तू अमरलता, निष्ठुर कितनी -सतीश सक्सेना
सोंचा था मदद करूँ तेरी
धीरे धीरे रस चूस लिया,
खुद ही संकट को आश्रय दें
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !
Wednesday, January 16, 2019
हे प्रभु ! मेरे देश में ढोरों से बदतर, लोग क्यों - सतीश सक्सेना
जाहिलों को मुग्ध करने को निरंतर शोर क्यों !
अनपढ़ गंवारू जान वे मजमा लगाने आ गए
ये धूर्त, मेरे देश में , इतने बड़े शहज़ोर क्यों ?
साधु संतों के मुखौटे पहन कर , व्यापार में
रख स्वदेशी नाम,सन्यासी मुनाफाखोर क्यों !
माल दिलवाएगा जो, डालेंगे अपना वोट सब
देश का झंडा लिए सौ में, अठत्तर चोर क्यों !
आखिरी दिन काटने , वृद्धाएँ आश्रम जा रहीं !
बेटी बिलख रोई यहाँ,इस द्वार टूटी डोर क्यों !
Saturday, January 5, 2019
अब एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में -सतीश सक्सेना
जैसे लगती जान जाए
अस्थमा झकझोरता है,
रात भर हम सो न पाए
धुआँ पहले खूब था अब
यह धुआँ गन्दी हवा में
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने
दीप आँखों में जले,अब
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !
धूर्त,बाबा बन बताते
स्वयं को ही राज्यशोषित
और नेता कर रहे नेतृत्व
को अवतार घोषित !
चोर सब मिल गा रहे हैं
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक
देख ठट्ठा मारते, अब
राम बंधक बन चुके हैं , कातिलों के शहर में !
सुगन्धित खुशबू बिखेरें
फूल दिखते ही नहीं हैं
जाने कब भागीरथी भी
मोक्षदायिनि सी रहीं हैं
कृष्ण की अठखेलियाँ भी
थीं, कभी कृष्णा किनारे
उस जगह रोती हैं गायें ,
अपने केशव को पुकारें
किस गली खोये स्वर्ण
अवशेष मेरे देश के ?
हाँ , एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में !
Thursday, November 8, 2018
कल दिवाली मन चुकी है ,जाहिलों के शहर में -सतीश सक्सेना
जैसे लगती जान जाए
अस्थमा झकझोरता है, रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब
यह धुआं गन्दी हवा में
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने
दीप आँखों में जले,अब
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !
धूर्त, बाबा बन बताते
स्वयं को ही राज्यशोषित
और नेता कर रहे हैं ,
स्वयं को अवतार घोषित
चोर सब मिल गा रहे हैं
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक
देख ठट्ठा मारते, अब
राम बंधक बन चुके हैं , जाहिलों के शहर में !
Monday, October 29, 2018
कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना -सतीश सक्सेना
दिखें यदि घाव धरती के, तो आँखों को झुका लिखना
घरों में बंद, मां बहनों पे, कुछ आसान सा लिखना !
विदूषक बन गए मंचाधिकारी , उनके शिष्यों के ,
अनुग्रह पुरस्कारों के लिए, अपमान सा लिखना !
किसी के शब्द शैली को चुराये मंच कवियों औ ,
जुगाड़ू गवैयों , के बीच कुछ प्रतिमान सा लिखना !
व्यथा लिखने चलो तब, तड़पते परिवार को लेकर
हजारों मील, पैदल चल रहे , इंसान पर लिखना !
तेरे मन की तड़प अभिव्यक्ति जब चीत्कार कर बैठे
बिना परवा किये तलवार की, सुलतान सा लिखना !














