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Saturday, April 25, 2015

किन्नर मन्नू महंत से बातचीत - सतीश सक्सेना

पिछले सप्ताह दिन में एक काल आयीं जिसमें अगर समय हो तो बात करने का अनुरोध था , दूसरी तरफ हरियाणा से मन्नू महंत
नामक किन्नर मुझसे अपने समाज के बारे में बात करना चाहते थे !उनसे बात करते समय यह लगभग साफ़ था कि वे अपनी बात कहने में बेहद गंभीर, व्यवस्थित और विद्वान थे और हरियाणा में अपनी गद्दी के प्रधान भी !  
इन्होने मेरा एक लेख पढ़कर ही मुझे फोन किया था , मेरे लेख एवं किन्नरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के प्रति धन्यवाद कहते हुए उन्होंने लगभग आधा घंटा बात की जिसमें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति समाज से शिकायत और बेहतर सम्मान की मांग शामिल थी  !
किन्नरों के प्रति समाज का रवैया न्याय पूर्ण नहीं है इसमें कोई संदेह नहीं , इन्हें समाज हमेशा शक की नज़र से ही देखता है व इनकी समस्याओं और स्थिति को जाने बिना , बदले में सिर्फ भय और नफरत ही देता है !
मानवता दया करुणा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करते हम लोग किन्नरों के प्रति जानवरों से भी खराब रवैया अख्तियार करते हैं , वे लोग सामान्य व्यक्तियों की भांति जीवन यापन करना चाहते हैं जो समाज करने नहीं देता ! 

किन्नर आदिकाल से पाये जाते हैं , पौराणिक काल में शिव के एक अवतार अर्धनारीश्वर की चर्चा है जिनका आधा
भाग नारी और आधा पुरुष का था , किन्नर शिव के इस रूप को पूजते हैं ! महाभारत में भी इनकी चर्चा है कि द्रुपद पुत्र शिखंडी, स्त्री स्वरूपा पैदा हुआ था, और उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर तीर चलाये थे , चूंकि भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किन्नरों पर , निहत्थों पर एवं स्त्री पर प्रहार नहीं करेंगे युद्ध भूमि में पिछले जन्म की अम्बा को शिखंडी रूप में पहचान, उन्होंने हथियार एक और रख दिए और किन्नर शिखंडी की आड़ से, अर्जुन को भीष्म पर घातक वार करने का मौका मिला !

इनके बारे में तमाम गलत धारणाएं समाज में फैलायी गयी हैं , जिन लोगों को इनसे कोई सहानुभूति नहीं वही इनके बारे में सबसे अधिक अनर्गल प्रचार करते हैं !वे नाच गा कर  भिक्षा यापन कर अपना गुज़ारा करते हैं , उनका यह भी दावा है कि वे यक्ष , गन्दर्भ, किन्नर समाज के लोग हैं और नाच गाना उनका पुरातन पेशा है , उन्हें अपनी स्थिति से कोई शिकायत नहीं  बल्कि उसे पसंद करते हैं , समाज से उन्हें एक ही शिकायत है कि अगर समाज उनका आदर न कर सके तो भी उसे उनके अपमान का कोई अधिकार नहीं ! वे सूफी संत सम्प्रदाय की राह पर चलने वाले लोग हैं और उनकी दुआओं में उतनी ही शक्ति है जितनी किसी और और वास्तविक संत में ! 
इनके साथ अपराध होने की स्थिति में टेलीविजन मीडिया अथवा अखबारों में इन्हें कोई महत्व अथवा प्रमुखता नहीं दी जाती बल्कि इन्हें हेय व अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता है !  वे अपने आपको किन्नर कहलाना पसंद करते है , हिजड़ा उर्फ़ छक्का शब्द एक गाली है जो इन्हें, निर्मम समाज की देन है , किन्नर हर धर्म का सम्मान करते व मानते  हैं , मृत्यु होने की दशा में किन्नरों को उनके धर्म  के आधार पर  दफनाया या जलाया जाता है !

इनको ट्रेन यात्रा अथवा बस यात्रा में कोई सीट नहीं देता चाहें यह बीमार ही क्यों न हों उनके साथ खाना पीना तो दूर लोग बैठना भी पसंद नहीं करते !
 अख़बारों के हिसाब से माने तो छत्तीस गढ़ में कोई कानून बनाने का प्रयत्न हो रहा है  जिसमें इन्हें ऑपरेशन द्वारा स्त्री या पुरुष बनाने की बात कही गयी है ? अगर यह सच है तो यह अमानवीय है ! उनका मानना है कि यह लोग अल्पमत में हैं और कम संख्या में हैं इनका सरंक्षण होना चाहिए न कि इन्हें समाप्त ही कर दिया जाये !

इनकी देवी का नाम  बहुचरा माता है जिनका मंदिर बलोल , संथाल , गुजरात में है !  मन्नू महंत का कहना है कि 

" चाहे इस्लाम हो या हिन्दू , हर धर्म में इन्हें सम्मान दिया गया है और इनकी चर्चा है ! वे आगे कहते हैं कि हाल में उन्होंने पढ़ा है कि किन्नरों को ऑपरेशन द्वारा महिला या पुरुष बना दिया जाएगा कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिस भारत देश में किन्नरों को साधू संत और असली फ़क़ीर माना जाता है उनके अगर सुबह दर्शन हो जाएँ तो माना जाता है कि सारे आज काम पूर्ण होंगे , जिन्हे अल्लाह , वाहे गुरु , यीशु मसीह , भगवान के बहुत करीब माना जाता है वही मालिक के बन्दे अपनी पहचान के लिए भी किसी सरकार या हुकूमत के आगे मज़बूर हैं क्या इनके हकों के लिए क़ानून बनाने से पहले इनसे पूंछना जरूरी नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि वे उन बेजुबान जानवरों में से नहीं जिनके बारे में कानून बनाने से पहले उनसे पूंछा भी नहीं जाता ? क्या आपको नहीं लगता कि कुदरत और प्रकृति से छेड़छाड़ करना गलत है ?
किन्नर अपनी जिन्दगी से बहुत खुश हैं वो सबको दुआएं देते हैं , सबका भला चाहते हैं , वे सूफी साधू संत हैं , भिक्षा यापन से गुज़ारा करते हैं  और ऐसे ही रहना चाहते हैं उन्हें नौकरी आदि कुछ नहीं चाहिए अगर समाज या सरकार उन्हें कुछ देना चाहती है तो उनके थोड़ी इज़्ज़त दे इस पंथ का अपमान न करे !"  
मन्नू महंत, गद्दी नशीन गुरु, गांव -भुन्ना ,तहसील - गुहला, जिला कैथल, हरियाणा -136034 
फोन - 9991789432 

-नई दिल्ली। भारतीय संसद के इतिहास में 40 साल बाद कोई निजी विधेयक कानून बनने की दहलीज पर खड़ा हुआ है जो किन्नरों को समाज में बराबरी के अधिकार देने की क्रांतिकारी नींव रखेगा।
राज्यसभा ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक पहल द्रमुक के तिरूचि शिवा की ओर से पेश किये गये इस गैर सरकारी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक अब लोकसभा के दरवाजे पहुंच गया है जहां यह तय होगा कि यह कानून का रूप ले पाता है या नहीं।
इसके बाद विधेयक सदन के नियमों के अनुसार विचार और पारित करने के लिए पेश किया जायेगा। किन्नरों के प्रति सहानुभूति देखते हुए सरकार लोकसभा में भी इस विधेयक के समर्थन में आ सकती है जहां सरकार का बहुमत है।
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इस संवेदनशील मुददे पर सदन बंटा हुआ नजर नहीं आना चाहिए। राज्यसभा में सख्याबल के आधार पर मजबूत स्थिति में खड़े विपक्ष ने इस गैर सरकारी विधेयक के पीछे अपनी ताकत झोंक दी जिसके सामने सरकार इसे ध्वनिमत से पारित कराने पर सहमत हो गई है।
- India, probably the world, will get its first transgender college principal when Manabi Bandopadhyay takes charge of Krishnagar Women's College in West Bengal


किन्नरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएँ !

Monday, August 18, 2014

बार बार क्यों मन को बदले, इतनी बार दिखावा क्यों - सतीश सक्सेना

इतनी बार बदलकर कपडे
कुछ तो रंग निखारा होगा 
इस निर्दोष सौम्य चेहरे से
सबको मूर्ख बनाया होगा !
पूरे जीवन लगा मुखौटे 
घर परिवार चलाते आये 
निर्मल मन को गंदा करके,
ड्राइंग रूम सजाना क्यों ?
धन के पीछे पागल होकर, दीपावली मनाना क्यों ?

चौंक चौक रह जाते कैसे,
कहीं झूठ तो बोला होगा 
कैसे नज़रें, छिपा रहे हो,
गौरय्या को मारा होगा !
मोहक वस्त्र पहन के कैसे  
असली रंग छिपाते आये 
मेहमानों के  आगे,नकली 
मुस्कानों को  लाना क्यों ?
अविश्वास का पर्दा मन में, रिश्तों को उलझाना क्यों ?

सद्भावना समझ न आये 
औरों से सम्मान चाहिए
जीवन भर बेअदबी करके
अपने घर में अदब चाहिए
दादी माँ वृद्धाश्रम पंहुचा,
कैसे अपनी व्यथा घटाई 
आग लगा अपने हाथों से 
दैविक दोष बताना क्यों ?
संस्कारों की व्याख्या रोकर,आज दर्द में करना क्यों ?

बरसों बीते, गाली देते
अहंकार को खूब पूजते 
अपने पूरे खानदान  में 
मानवता शर्मिंदा करते
कितनी बेईमानी करके 
सारे जग में नाम कमाए
अंत समय मन क्यों घबराये,
गैरों को अपनाना क्यों ?
ऐसा क्या जो,सुना सुना के,इतनी कसमें खाना क्यों ?

जिसको विदा करा के लाये 
उसको खूब रुलाया होगा,
वृद्धावस्था में  बूढ़े  को ,
रोकर रोज सुलाया होगा ! 
अपनी माँ को धक्का दे के   
माँ दुर्गा के पाठ कराये !
अब क्यों डरते हो दर्पण से, 
ऐसे भी शर्माना क्यों ?
कैसे किये गुनाह अकेले इतना भी घबराना क्यों ?

Wednesday, August 6, 2014

खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को - सतीश सक्सेना

किन्हीं गुरुजन के सम्मान में जवाब के कुछ अंश :
आप विद्वान् हैं , मैं विद्वान नहीं हूँ और न विद्वता खोजने निकला हूँ , साहित्य को आगे ले जाना मेरा लक्ष्य नहीं है भाई जी , मेरा लक्ष्य है समाज के पाखण्ड और अपने चेहरों पर लगे मुखौटे उतार कर , सिर्फ इंसान बन पाने की तमन्ना ! अपना कार्य कर रहा हूँ और बिना नाम चाहने की इच्छा के ! सो मुझे यश नहीं चाहिए हाँ सरल भाषा के जरिये अगर कुछ लोग भी इन्हें आत्मसात कर पाए तो लेखन सफल मानूंगा !
मुखौटे उतारने होंगे 
आज कवि और साहित्यकार भांड होकर रह गए हैं पुरस्कारों के लालच में , लोगों के पैर चाटते हुए कवि अब घर, समाज, परिवार सुधार पर नहीं लिखते , धन कमाने को लिखते हैं ! इन्हें समझाने के लिए नियमों में बिना बंधे, काम करना होगा, साहित्यकारों को बताना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनके भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः अनपढ़ और सामान्य जन से उनकी कविता बहुत दूर चली गयी है , अब उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने के लिए नहीं लिखी जातीं  वे सिर्फ आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
भाव अभिव्यक्ति के लिए कवि किसी शैली का दास नहीं हो सकता , कविता सोंच कर नहीं लिखी जाती उसका अपना प्रवाह है बड़े भाई , अगर उसमें बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! तुलसी और कबीर ने किस नियम का पालन किया था ! आज भी, कुछ उनके शिष्य हो सकते हैं !
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
जहाँ तक गद्य की बात है मैंने लगभग ४५० रचनाएं की हैं उनमें कविता और ग़ज़ल लगभग २०० होंगी बाकी सब लेख हैं जो समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं , आपसे बहुत छोटा हूँ मगर कोई धारणा बनाने से पूर्व हो सके तो इन्हें पढियेगा अगर बड़ों का आशीर्वाद मिल सका तो धन्य मानूंगा !!
बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में जाने वालों को !
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ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे ?
हानि लाभ का लेखा लिखते ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

Wednesday, November 6, 2013

घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे,सारे सबक जवानी के -सतीश सक्सेना

कितने मीठे से लगते थे,किस्से अपनी नानी के 
राजा रानी ही रहते थे, नायक सदा कहानी के !

किसे बताएं किस्से अपने बचपन की नादानी के
घुटने तुड़ा तुड़ा के सीखे, सारे सबक जवानी के !

कैसे तब हम,हुक्म अदूली, करते थानेदारों की !
सुनाके यारों को हँसते हैं,वे किस्से निगरानी के !

कैसे कैसे काम किये थे, हमने अपने बचपन में
टूटी चूड़ी, फटी चिट्ठियां,टुकड़े बचे निशानी के !

होते आये, युगों युगों से, अत्याचार स्त्रियों पर !
सुने तो हैं ,हमने भी किस्से, देवों की हैवानी के !

रात्रि जागरण,माँ की सेवा से ही,खर्चे चलते है ! 
दारू पीकर,नाच नाचकर,गाते भजन,भवानी के!

कितने नखरे महिलाओं के,अभी झेलने बाकी हैं !
गुस्सा होना,धमकी देना, थोड़े लफ्ज़ गुमानी के !

Thursday, September 19, 2013

श्वेत दुशाला,सुंदर पगड़ी,पर होते बलिहारी लोग -सतीश सक्सेना

निपट जाहिलों को भरमाते
अज्ञानी  को मूर्ख बनाते !
पैसे दे दे कर लोगों से ,
अपनी तारीफें , करवाते !

घरों में बैठे, सीधे साधे ,
सम्मोहित हो जाते लोग !
श्वेत दुशाला, सुंदर पगड़ी, पर होते बलिहारी लोग !


भोली जनता इज्ज़त देती 
वेश देख , बनवासी को !
घर में लाकर उन्हें सुलाए
भोजन दे , सन्यासी  को !
अलख निरंजन गायें, डोलें,

मुफ्त की खाएं डाकू लोग !
पाखंडी को, गुरू मान कर , पैर दबाएं मूरख लोग !

अनपढ़,अज्ञानी दुनियां में 
गुरु ढूँढने, घर से निकले !
वेद, पुराणों में लिखा है
गुरु ही तेरे , कष्ट मिटायें !
टीवी पर जयकार धूर्त की,

खुश हो जाते भोले लोग !
सौम्य समाज, प्रदूषित करके, पैसा खूब बनाते लोग !


पहले चोर, उचक्के, डाकू,
जंगल गुफा, ढूंढने जाते ! 
बाल बढाये,राख लगाए  
जैसे तैसे,शकल छिपाते !
असली संत ठगे से बैठे , 
नकली प्रवचन सुनते लोग !
गंदे चरणामृत को पीकर , जीवन सफल बनाएं लोग !

Friday, June 14, 2013

कसम अल्लाह की उस रोज़ ग़ज़ल बनती है -सतीश सक्सेना

अगर बरसात जाड़ों में ,तो हज़ल बनती है !
गर्म लपटों पे बरसती, तो ग़ज़ल बनती है !

अगर यह, गुन गुनायी जाए , तेरे होठो से !
तभी पूजा पे,चढाने को ग़ज़ल बनती है !

अगर गैरों के लिए,आँख से,आंसू छलकें !
किसी पे मेहरबान हो तो ग़ज़ल बनती है !

अगर क़दमों पे कदम,रख के चल सकें साथी
तुम अगर हाथ पकड़ लो तो ग़ज़ल बनती है !

अगर भूखा मुझे पाकर,न तुमको नींद आये !
हाथ से जब खिला जाओ,तो ग़ज़ल बनती है !

Friday, May 3, 2013

कुछ लिखने का मन नहीं करता -सतीश सक्सेना

मेरा लिखने को मन नहीं करता जब ...

  • कोई अपना,अपने मन की बात चाहते हुए भी न कह पाए.. 
  • किसी विधवा माँ का खाली बटुआ,बच्चों को नज़र नहीं आये ...
  • विवाह के बाद विदा होने के बाद, भाई को बरसों, अपनी बहन की याद नहीं  आये .....
  • जब बेटे बहू को, बाहर डिनर पर जाते समय ,दरवाजा बंद करने आती, माँ के आंसू नज़र नहीं आयें  .. 
  • बेहद नजदीकी रिश्तों में भी धन को महत्व दिया जाए.. 
  • दूसरों का नुकसान करके भी,अपना फायदा देखा जाये .....
  • धनवान,अपने बच्चों से भी धन पाने की आशा करे...
  • सम्मान लालचियों का भी सम्मान किया जाए ..
  • साधुओं को भुला दिया जाये... 

Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 

Monday, May 7, 2012

मदारी बुद्धि -सतीश सक्सेना

                   विलक्षण बुद्धि मदारी के लिए ,मन्त्रमुग्ध होकर सुनने वाली भीड़ जुटानी आसान है !और अक्सर मदारी अपना उद्देश्य तय कर चुके होते हैं !उसे पता है कि सीधे साधे  श्रद्धानत होकर सुनने वाले लोगों से फायदा उठाना आसान है !

                  ऐसे मजमें, हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी लगते देखे गए हैं !अक्सर कुछ समय बाद, सीधा साधा इंसान अपने आपको ठगा महसूस करता है ! इन्सान को भावनात्मक तौर पर ठगा जाना ,शायद सबसे आसान है सदियों से शैतान, और अब दुशाला ओढ़े, इंसान रूप में शैतान,रोज इसका फायदा उठाते देखे जा सकते हैं !आज हमारे देश में ऐसे स्वामियों की भीड़ है और हम लोग विवश होकर देखने सुनने को मजबूर हैं !

पहन फकीरों जैसे कपडे
परम ज्ञान की बात करें
वेद क़ुरान,उपनिषद ऊपर 
रोज नए व्याख्यान करें,
गिरगिट को शर्मिंदा करते हुनर मिला चतुराई का !
बड़ी भयानक शक्ल छिपाए रचते ढोंग फकीरी   का !

                 विश्व में सर्वाधिक अशैक्षिक लोगों के इस देश में, आज भी 90% लोग ग्रेजुएट डिग्री नहीं ले पाए हैं ! बचपन से पुरातन पुस्तकें पढ़कर, गुरु का सम्मान करना सीखे हम लोग, गुरुओं की पहचान भूल गए हैं ! आज हमें सौम्य मुद्रा में कुरता पायजामा, और धवल दुपट्टा डाले, मधुर आवाज में बोलता हर व्यक्ति, गुरु श्रद्धा के लायक लगता है !
                           सीधे साधे और अनपढ़ लोगों की श्रद्धा के साथ मज़ाक का, विश्व में सबसे बड़ा उदाहरण है जिसको हमारे देश में जम कर भुनाया जा रहा है ! "गुरु बिन मोक्ष नहीं " में भरोसा करने वाले हम लोग ,गुरु की तलाश में टीवी पर आसानी से अपनी पसंद के गुरु को चुन सकते हैं !लगभग हर न्यूज़ चैनल पर चलते प्रवचन श्रद्धा के साथ ग्रहण किये जाते हैं !सुबह सुबह किसी भी चैनल पर यह मनोहर गुरुजन शिष्यों से समस्याओं से मुक्ति के उपाय बताते मिलते हैं जिन्हें हमारे प्रथम गुरु (माताएं) बड़े लगन से ग्रहण करती हैं! बिना किसी विशेष शिक्षा और परिश्रम के, गुरु बनकर लोगों के दिल दिमाग पर छा जाना बेतहाशा फायदे का सौदा है !
                             अभी हाल में मेरे एक परममित्र जो भारत सरकार में कार्यरत हैं , ज्योतिष का एक कोर्स करने के बाद से टीवी पर आने में सफल रहे हैं और वे अब नौकरी छोड़ने की सोंच रहे हैं !
                           श्रद्धा और धर्म से जुड़े इन व्यवसाओं में सीधे साधे धर्म भीरु लोग न फंसे इसका कोई उपाय नहीं दिखता , शिक्षा और समझ का प्रसार इतना आसान नहीं हैं ! लोकतंत्र का दुरुपयोग और सरकारी तंत्र का बड़े फैसले करने का साहस न कर पाना, देश को आगे बढ़ने से रोकने में कामयाब होगा !

                       मैं निराश हूँ कि शायद ही मैं अपने जीवन काल में एक स्वस्थ लोकतंत्र देख पाऊंगा , लंगड़े लोकतंत्र जिसमें सही को सही कहने का साहस न हो , को सहना हमारी नियति रहेगी !

Friday, May 4, 2012

आओ बच्चो मिल कर के ये कसम उठानी है - सतीश सक्सेना

कल ज्योतिपर्व प्रकाशन के डिज़ाईनर अबनीश ने मेरे गीत पर काम करते करते , मुझे बताया कि उन्हें गीतों का गहरा शौक है ,एक बार पिता के कहने पर उन्होंने चार लाइने लिख कर एक मंच पर सुनाई थी , पहली लाइन "शीर्षक " सुनकर, अवनीश के अनुरोध पर यह रचना की गयी , आओ बच्चो मिलकर के इक कसम उठानी है " पर लिखी इस रचना को महसूस करें !

एक रंग है सबके अन्दर  
एक   सा  भोजन  पायें  !  
एक पिता है सबके अंदर
तब क्यों नज़र झुकाएं  !
फिर क्यों  ऊँच नीच 
समझाती,राम कहानी है !
आदि ग्रन्थ बदले स्वारथबस , यही कहानी है  !

कमजोरों को प्यार करेंगे 
साथ बैठकर  बात करेंगे 
कष्ट दूसरों का समझेंगे  !
एक  साथ खाना खायेंगे  !
और आक्रमणकारी  को  
इक  सीख  सिखानी है 
आओ बच्चो मिलकर के, इक कसम उठानी है !

अपनी माँ  की इज्ज़त जैसी 
महिलाओं की  इज्ज़त होगी 
जैसी अपनी बहिन सुरक्षित 
और सभी की करनी होगी  !
प्रथम सुरक्षा  उनकी , 
जिनकी भीत पुरानी है !
आओ बच्चों मिलकर के ,एक प्रीत जगानी है !  

थके चरण कमजोर पड़े हैं !
हम बच्चों के लिए चले हैं ,
हाथ थक गए मेहनत करते 
हमको मंजिल पर पंहुचाते  
कसम तुम्हे इन छालों की,
बस आस जगानी है !
नेह दिया, मृदु बाती  से , एक ज्योति जगानी है  !

Friday, March 16, 2012

बेटी या बहू ? - सतीश सक्सेना

हमारी बेटी 
आज गुरदीप सिंह, अपनी सोफ्टवेयर इंजीनियर बेटी को लेकर घर आये थे , वे अपनी बेटी को गौरव और विधि से मिलवाना चाहते थे जिससे उनकी बेटी को भविष्य में अपने कैरियर को, लेकर उचित मार्गदर्शन मिल सके !
हाथ में टेनिस रैकिट और शर्ट पाजामा पहने विधि ने दरवाजा खोलकर उनका स्वागत किया ! चाय आने पर गुरदीप ने मेरी बहू के बारे में पूंछा कि वह कहाँ है तो हम सब अकस्मात् हंस पड़े कि वे विधि को पहचान ही नहीं पाए कि साधारण घर की बेटी लग रही, इस घर की नव विवाहिता बहू भी वही है !
और मुझे बहुत अच्छा लगा कि मैं अपनी इच्छा पूरी करने में कामयाब रहा ....

लोग नयी बहू पर, अपने ऊपर भुगती, देखी, बहुत सारी अपेक्षाएं, आदेश लाद देते हैं और न चाहते हुए भी, आने वाले समय में, घर की सबसे शक्तिशाली लड़की को, अपने से, बहुत दूर कर देते हैं !

किसी और घर के अलग सामाजिक वातावरण में पली लड़की को  , उसकी इच्छा के विपरीत दिए गए आदेशों के कारण, हमेशा के लिए उस बच्ची के दिल में अपने लिए कडवाहट घोलते, सास ससुर यह समझने में बहुत देर लगाते हैं कि वे गलत क्या कर रहे हैं  ?

अपनी बहू को,आदर्श बहू बनाने के विचार लिए, अपने से कई गुना समझदार और पढ़ी लिखी लड़की को होम वर्क कराने की कोशिश में, लगे यह लोग, जल्द ही सब कुछ खोते देखे जा सकते हैं ! 


घर से बाहर प्रतिष्ठित देशी विदेशी कंपनियों में काम कर रहीं, ये  पढ़ी लिखीं, तेज तर्रार लड़कियां, अपने सास ससुर की आँखों में स्नेह और प्यार की जगह, एक प्रिंसिपल और अध्यापिका का रौब पाकर, उनके प्रति शायद ही कोई स्नेह अनुभूति, बनाये रख पाती हैं ! 


समय के साथ इन बच्चों की यही भावना सास ससुर के प्रति, उनकी आवश्यकता के दिनों ( वृद्धावस्था ) में  उपेक्षा बन जाती है जबकि उस समय, उन्हें अपने इन समर्थ बच्चों से,  मदद की सख्त जरूरत होती है , और यही वह कारण है जब आप ,वृद्ध अवस्था में अक्सर बहू बेटे द्वारा माता पिता  के प्रति उपेक्षा और दुर्व्यवहार की शिकायतें अखबारों में सुनने को मिलती हैं !

अक्सर हम अपने कमजोर समय ( वृद्धावस्था )में बेटे बहू को भला बुरा कहते नज़र आते हैं, मगर हम भूल जाते हैं कि बहू की नज़र में सास -ननद, अक्सर विलेन का रूप लिए होती है , जिन्होंने उनके हंसने  के दिनों में (विवाह के तुरंत बाद ), उसे प्यार न देकर वे दिन तकलीफदेह  बना दिए और वह यह सब, न चाहते हुए भी भुला नहीं पाती !

शादी के पहले दिन से, जब लड़की नए उत्साह से, अपने नए घर को स्वर्ग बनाने में स्वप्नवद्ध होती है तब हम उसे डांट ,डपट और नीचा दिखा कर, अपने घर का सारा भविष्य नष्ट करने की, बुनियाद रख रहे होते हैं !

मेरे कुछ संकल्प :

-मुझे ख़ुशी है कि मैं अपनी बहू को यह अहसास दिलाने में कामयाब रहा हूँ कि वह ही घर की वास्तविक मालकिन है, इस घर में वह अपने फैसले ले सकने के लिए पूरी तरह से मुक्त है ! उसको मैंने पारिवारिक रीतिरिवाज़ और बड़ों को सम्मान देने की दिखावा करतीं, घटिया प्रथाओं आदि से, पहले दिन से, मुक्त रखा है !

-विधि ज्ञानी ,  विधि सक्सेना और गौरव सक्सेना , गौरव ज्ञानी का कर्तव्य पूरा करें और यह सिर्फ कास्मेटिक दिखावा न होकर, इसे ईमानदारी एवं विश्वास के साथ अमल में लाया जाए !

-विधि के आते ही, मेरा इच्छा उसका लासिक आपरेशन करवा कर, बचपन से लगाये ,  भारी भरकम चश्मे को उतरवाना था जो उसने हँसते हुए मान लिया , १३ मार्च को डॉ अमित गुप्ता द्वारा किये गए  इस शानदार आपरेशन का परिणाम देखकर ,हम सब आश्चर्य चकित रह गए थे ! विधि की माँ (विमला जी ) की  शिकायत थी  कि पिछले पांच साल से उनका किया ,अनुरोध इसने कभी  नहीं माना था तो विधि का जवाब था कि पापा (मैंने ) ने मुझसे अनुरोध नहीं किया वह तो आदेश था और मैं मना, कैसे कर सकती थी ?

-विधि के माता पिता को कभी यह अहसास न हो सके कि गौरव उनका अपना पुत्र  नहीं है , उनके स्वास्थ्य और हर समस्या का ध्यान रखना, विधि के कहने से पहले, गौरव की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए !

- राजकुमार ज्ञानी ( समधी )से मैंने वायदा किया है कि विधि सक्सेना के घर में उनका उतना ही अधिकार होगा जितना कि सतीश सक्सेना का और वे इसे मेरा वचन माने जिसे मैं मरते दम तक निभाऊंगा !

-मुझे ख़ुशी है कि दिव्या ने बहू को बेटा समझ प्यार करने में मेरा पूरा साथ दिया और अब चार बेटों ( बेटा बहू और पुत्री दामाद )वाले इस घर में हर समय ठहाके गूंजते सुनाई पड़ रहे हैं  जिसके लिए मैं परम पिता परमात्मा और अपने मित्रों की शुभकामनाओं के प्रति आभारी हूँ !
अन्य घरों की प्यारी बच्चियों  (अपनी बहुओं ) के साथ मैं 
उपरोक्त व्यक्तिगत पोस्ट लिख दी ताकि सनद रहे ...

Sunday, October 24, 2010

श्री बाल्मीकि - सतीश सक्सेना

मत भूलो रचनाकार प्रथम
श्री रामचरित रामायण के
थे महापुरुष श्री बाल्मीकि
ऋषि,ज्ञानमूर्ति,रामायण के
हो शूद्र कुलोदभव फिर भी जगजननी को पुत्री सा समझा
उनके वंशज अपमानित कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ? 

Saturday, October 23, 2010

क्यों लोग मनाते दीवाली ? -सतीश सक्सेना

मानव कुल में ले जन्म, बाँट ,
क्यों रहे अरे अपने कुल को,
कर वर्ण व्यवस्था नष्ट,संगठित
कर पहले अपने कुल को !
हो एक महामानव विशाल ! त्यागो यह भेदभाव भारी !
तुलसी की विह्वलता में बंध, क्यों लोग मनाते दीवाली ?  

Wednesday, August 25, 2010

तलाश एक लडकी की -सतीश सक्सेना

आजकल अपने पुत्र के लिए एक योग्य पत्नी ढूंढ रहा हूँ  !
-तलाश एक ऐसी बहू की जो मेरी डांट खा सके और मुझे अक्सर डांटने की हिम्मत भी रखे क्योंकि अपनी बेटी गरिमा की डांट खाते खाते लगता है कि मैं ही अधिक गलती करता हूँ !
-मैं विरोध करता हूँ ऐसे दहेज़ न लेने वालों का ,जो अपने होने वाली बहू के माता पिता से  यह कहते हैं कि हमें दहेज़ नहीं चाहिए हाँ आपके द्वारा, अपनी बेटी को जो कुछ देने की इच्छा हो उन पैसों को हमारे अनुसार ही खर्च करें ! और नवोदित बच्ची के घर आने से पहले ही, उसके घर बालों को निचोड़ कर, यह उम्मीद करते हैं कि यह बच्ची हमारे घर को स्वर्ग बनाने  में पूरा योग देगी !
-मैं विरोध करता हूँ ऐसे माँ बाप का , जो अपने ही बच्चों की खुलकर आर्थिक मदद नहीं करते हैं और अपनी सामर्थ्य और पैसा अपने भविष्य के लिए उनसे छिपाकर रखते हैं !
- मैं विरोध करता हूँ ऐसे माँ बापों का , जो अपने बेटे को बी टेक और अन्य प्रोफेशनल डिग्री दिलाने के लिए हर जगह डोनेशन देने के लिए भागते दौड़ते देखे जाते हैं वही अपनी पुत्री को सामान्य डिग्री दिलवा कर अधिक से अधिक पैसा बचाते हैं !
- मुझे आनंद आता है जब मुसीबत में, अपने समर्थ पुत्र को मदद न करते देख, भला बुरा कहते समय लोगों को देखकर , उस समय केवल बेटी ही इनके पास मदद के लिए बैठी दिखाई देती है !
- मुझे अफ़सोस है ऐसी बुद्धि और दुहरी मानसिकता पर जो जीवन भर ,अपनी करनी को दोष न देकर, प्रारब्ध और बच्चों  में दोष निकाल कर रोना रोते हैं !
"   बोया पेड़ बबूल का  आम कहाँ से होय "

Sunday, April 18, 2010

कुरआन शरीफ पर कुछ भी लिखने को मेरी कलम नहीं चलती -सतीश सक्सेना

                             विधर्मियों के लिए, हज़ारों वर्ष पूर्व की परिस्थितियों में लिखी गयीं , अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें पढ़कर, उनकी मज़ाक बनाना बेहद आसान हो जाता है , और आजकल यह कुछ तथाकथित विद्वानों की मेहनत के कारण और भी आम होता जा रहा है !
                             मैंने जब ब्लागिंग शुरू की थी तो सोचा इस देश के दोनों बच्चों  को  मिलाने का प्रयत्न करूंगा ! बहुसंख्यक होने के नाते यह हमारा फ़र्ज़ है कि अल्पसंख्यक समुदाय को किसी भी हालत में असुरक्षित महसूस न होने दें अतः हम बड़े भाई का फ़र्ज़  अदा करने का पूरा प्रयत्न करें ! 
                                अभी कुछ समय से लगता है कि यहाँ किसी को समझाने की आवश्यकता नहीं है यहाँ तो कमर कस रखी है कि दूसरे धर्मों की कमियां लिख लिख कर बताई जायेंगी ! ५ वक्त की नमाज़ पढने वाले, गीता पढ़ाने का प्रयत्न कर रहे हैं ! और विद्वान् पंडित नमाजियों को नमाज़  सिखा रहे हैं !
                                 नफ़रत की आग में जलते इन लोगों को न कुरआन के सम्मान का ख़याल है और ना शास्त्रों  का ! भगवान् न करे कोई अनहोनी घटे सबसे पहले यही कायर बिलों में जा घुसेंगे और हमारे बच्चों को इस आग में जलते देखने का आनंद लेंगे ! 
                                हे  ईश्वर ! अपने घर में, अपने ही बच्चों को खाने की कोशिश करते , इन विषैले  नागों को सदबुद्धि दे ! 

Thursday, April 8, 2010

कहाँ हैं आप सब ? समस्त बड़े छोटों से विनम्र अपील - सतीश सक्सेना

         कहाँ हैं आप सब ? क्यों नहीं बोल रहे अपने ही घर में हो रहे इस अघोषित शीतयुद्ध पर ?
           उस घर में कभी शांति नहीं हो सकती जब तक बच्चों के वैमनस्य पर बड़े खामोश बैठे रहें  ! यहाँ पर बड़ों से तात्पर्य उम्रदराज होने से नहीं बल्कि समझ और परिपक्वता से है ! आपस में एक दूसरे को बुरा भला कहते हम लोग, एक दूसरे की आस्थाओं ,मान्यताओं पर जम कर गालीगलौज करते हमारे देश वासी,नफरत के सैलाब की और बढ़ रहे हैं यह कोई शुभ शकुन नहीं है फिर आपकी खामोशी का क्या मतलब है ! मुझे नहीं लगता जहरीले  माहौल पर न बोलना या उस समय उदासीन होना माहौल को शांत कर देगा !

                              ये बबूल के  बीज घर में डाले जा रहे हैं और समझदार लोग भी रोते हुए इन्हें सींच रहे हैं ! अपमान के कष्ट में रोते हुए इन विद्वान्, मगर कम उम्र जिद्दी बच्चों को, समझाने की शक्ति, किसी एक के बस की नहीं है अगर हम सबके हाथ नहीं मिले तो यह सुगन्धित दिया बुझ जाएगा जिसे जलाए रखने का प्रयत्न हम जैसे कुछ लोग कर रहे हैं  !
                            अतः आप सबसे प्रार्थना है कि एक ही घर के दो बच्चों में, बढती वैमनस्यता की खाई पाटने में मदद करने आगे आयें जिससे कि हँसते हुए, साथ बैठने उठने  का जज्बा पैदा हो ! मुझे पूरा विश्वास है कि देश का जनमानस इस अपील पर अवश्य ध्यान देगा ! अविश्वास के माहौल में कम से कम एक बात मान जाएँ  !
"जिस बात से हमारा दिल दुखता है वही हम दूसरों से न कहें "

Wednesday, July 29, 2009

एक पुत्री की तलाश -सतीश सक्सेना

अपने घर के लिए भावी मालकिन और स्वयं के लिए पुत्री का विकल्प खोजते हुए जहाँ बहुत अच्छे अच्छे लोगों से भेंट और बातचीत हुई वहीं कई स्थानों पर कष्टदायक अनुभव भी कम नहीं थे ! अधिकतर लोगों ने "बढ़िया शादी" का वायदा , "हमारे यहाँ कोई कमी नहीं है " आपकी कोई इच्छा हो तो खुल के कहें हमें कोई समस्या नहीं है " आदि वाक्य सामान्यतयः प्रयुक्त किये और मैं हर बार अपना स्पष्टीकरण देने पर मजबूर होता फिर भी संदेह भरी आँखें बता देतीं कि उन्हें इसपर विश्वास नहीं हो पा रहा है !

किसी की मदद करने के बदले धन की चाह और अपना काम कराने के लिए धन का लालच देने का प्रयत्न करना दोनों ही मानव अवगुण सदियों से चले आ रहे हैं, मगर धन से जीवन भर के लिए प्यार और भावी पीढियों के लिए सम्मानित भविष्य खरीदना संभव है ? ऐसा विश्वास रखने वालों के लिए क्या कहा जाये ! रिश्ते खरीदने का यह प्रयत्न हमारे समाज को बर्बाद करने के लिए काफी होगा, ऐसा मेरा मानना है !

Monday, June 29, 2009

हम लोग -सतीश सक्सेना

हम लोग, एक बड़े देश के निवासी "अनेकता में एकता " का नारा अक्सर सुनते आये हैं, और लगता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब लोग एक जुट हैं, मगर हाल में एक उत्तर पूर्वीय प्रान्त के मुख्यमंत्री का यह कथन कि मेरे देशवासी मुझे अक्सर नेपाली समझते हैं , और इस कारण अक्सर मुझे कहना पड़ता है कि मैं आपकी तरह भारतीय हूँ किसी अन्य देश का नहीं ! अपने ही देशवासियों के समक्ष एक देश भक्त का यह स्पष्टीकरण उन्हें खुद कितना कष्टदायक लगता होगा यह तो मैं नहीं जानता, मगर व्यक्तिगत तौर पर मुझे वेहद नागवार लगता है, एक आवेश सा आता है कि कितनी अज्ञानता है मेरे देश में, ऐसी धारणाओं के कारण हम अपनी समझ की, बाहर वालों से कितनी मजाक बनवाते हैं ?

हम लोग इस विशाल देश की सीमाओं तथा विविधिताओं से अनजान रहते हुए, खुद अपनी समझ पर इतराते हुए, बिहारी, पञ्जाबी, मद्रासी एवं पुरबियों की मज़ाक बनाते समय इसके दूरगामी परिणामों के बारे में नहीं सोचते !

कब विकसित होगी हम लोगों की समझ ??

Saturday, June 20, 2009

मांगलिक अवधारणा एवं ज्योतिष शास्त्र !

कुछ समय से अपने लिए पुत्रवधू की तलाश में हूँ, जो कि आने वाले समय में मेरी बेटी का रिक्त स्थान भर सके, इस जटिल मानसिक काम को करने में कुछ नए नए अनुभव हुए, कुछ सुखद तो कुछ कष्टदायक ! एक सादा तथा बेहद विनम्र पिता से बात हुई, उन्होंने अपनी पुत्री के स्वभाव के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन कर लगा कि शायद खोज पूरी हो गयी, शायद ऐसी ही बेटी की तलाश थी मुझे !

वास्तव में उस विदुषी मगर सामान्य वस्त्र पहने लडकी के फोटो ने मुझे काफी प्रभावित किया ! मगर रात में उस बच्ची के पिता का फ़ोन आया कि साहब आपका बेटा जन्मपत्री के हिसाब से मांगलिक है, यह तो आपने बताया ही नही ?

मुझे लगा जैसे एक अपराध बोध से घिर गया मैं ! लगा कि जैसे मैंने " मेरा पुत्र मांगलिक या आंशिक मांगलिक है" यह बात मुझे शादी की चर्चा में सबसे पहले बतानी चाहिए, चाहे मुझे इस मिथक धारणा पर विश्वास हो या न हो !मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ की मैं इस घटना का दोष उन्हें दूं अथवा अपने आपको को !

पल भर को ऐसा लगने लगा कि एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत और विश्व की आधुनिकतम टेक्नालोजी में एक्सपर्ट मेरा बेटा हिन्दू धर्म के एक बड़े वर्ग के हिसाब से हर किसी लड़की से विवाह करने योग्य नहीं है, अब उसका विवाह सिर्फ मांगलिक लडकी से ही होगा ! जो पुत्र अपने परिवार तथा मित्रों में अपने सद्गुणों से हमेशा सम्मान पता रहा है, जिसके स्वभाव एवं चरित्र पर आजतक किसी ने ऊँगली नहीं उठाई, ज्योतिष के लिहाज़ से वह क्रूर तथा झगडालू हो सकता है ! मेरे लिए यह तथाकथित धार्मिक तथ्य बेहद कष्टदायक लायक लगा !

जन्मकुण्डली के 1,4,7,8, एंव 12वें भाव में मंगल के होने से जातक/जातिका मांगलिक कहलाते हैं ! बड़ी संख्या में (१२ में से ५ स्थानों पर) मंगल देख वर और वधु को तुंरत मंगली घोषित कर देना कहाँ तक ठीक है ? अगर यह सच है तो लगभग हर तीसरा इन्सान मांगलिक होगा एवं वह तामसी गुणों से युक्त होगा, इस धारणा को अगर बल दिया जाये तो हिन्दू समाज में शादी विवाह सामान्यतः हो पाएंगे इसमें संदेह है !

Monday, October 6, 2008

हिन्दी ब्लाग लेखन इन दिनों -सतीश सक्सेना

              ब्लॉग लेखन शुरू करते समय मन में बड़ा उत्साह था कि मैं यहाँ अच्छे लेखन से जुड़ कर अपने ज्ञान में कुछ योगदान कर पाऊंगा, और उन महा नायकों से रूबरू होने का मौका भी मिलेगा जिनको अखबारों में पढ़ कर धन्य मानता रहा ! मगर मुझे लगता है कि अनपढ़ आदमी के ज्ञान की तरह मेरे ज्ञान की सीमा भी कुएं के मेढक जितनी ही थी ! आज जब इस मैदान ( ब्लागर जगत ) में आया तो लगता है कि मैं लेखकों के मध्य नही, पहलवानों के मध्य कार्य कर रहा हूँ !

             हिन्दी ब्लाग की प्रमुख कमजोरी, उपयुक्त और प्रभावशाली लेखन की कमी के अलावा, ख़राब माहौल है शायद इसी कारण महिला और साहित्यिक लेखन की वेहद कमी है ! यहाँ हर लेखन पर प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, अच्छे लेखन पर अपरिपक्व कमेंट्स, समाज की कमियों वाले लेखों पर, बुद्धि से लगभग पैदल लोगों के गाली गलौज युक्त कमेंट्स, बेहद एक्टिव महिला ब्लागरों के साथ, व्यक्तिगत तौर पर अश्लील कमेंट्स, किसी भी अच्छे लेखक के मन में वित्रश्ना भरने के लिए काफी हैं !

               अधिकतर लोग अपने नीरस लेखन से दुखी होकर किसी भी चर्चित ब्लाग पर जाकर भद्दी व घटिया टिप्पणी ,यहाँ तक कि गालियाँ भी देते हैं,जिससे उनकी प्रतिक्रिया चर्चा का विषय बन सके और उनको लोग जान जाए,अधिकतर ऐसे लोग महिला और संवेदनशील लेखकों को मानसिक चोट पहुंचाने में सफल भी रहते हैं,और उनका उद्देश्य जाने बिना,लोग प्रतिक्रियाओं के माध्यम से,अनचाहे ही,उन्हें कामयाब हीरो बना देते हैं! ऐसे लोगों के नाम और उनके ब्लाग को एक ब्लैक बोर्ड पर प्रर्दशित कर लोगों को आगाह किया जा सकता है !

               प्रोत्साहन में बड़ी शक्ति होती है,बहुत शक्तिशाली कलम भी शुरू में लड़खडाने लगती है, प्रोत्साहन के कमी और बदकिस्मती से अगर शुरुआत में ही इन्हे कुछ लोग हूट करदें तो बड़े बड़े ईमानदार और शक्तिशाली वैचारिक प्रतिभा के धनी लोग भी चुटकियों में दम तोड़ देंगे,और इस निष्ठुर ब्लॉग जगत में कोई उसकी कब्र पर दो फूल अर्पित करने आयेगा इसमे मुझे संदेह है !

               जहाँ एक तरफ़ अच्छे एवं उचित लेखों के लिए पाठकों की प्रतिक्रियाएं वातावरण में एक सौहार्दपूर्ण मिठास घोलने का कार्य करेंगी ! वहीं नाज़ुक विषयों पर अनजाने तथा बिना सोचे समझे की गयी प्रतिक्रियाएं समाज का सत्यानाश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं !

               और इसी प्रकार तात्कालिक जोश में,एक सामान्य उत्साही ब्लागर की ग़लत तारीफ मिलने पर,विद्वान मगर पथभ्रष्ट,और अति उत्साहित लेखनी,समाज का वह विनाश करेगी जिसकी कोई कल्पना भी न कर सके! आज आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर,प्रतिक्रिया देते समय,निष्पक्षता व ईमानदारी का ध्यान रखें !
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