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Tuesday, August 2, 2016

मालिक ये हाथ रखें नीचे,हम हाथ उठाना सीख गए - सतीश सक्सेना

डमरू तबला कसते कसते,हम धनक उठाना सीख गये,
तेरा गंद उठाकर सदियों से, तेरा आबोदाना सीख गये !


हमसे ही अस्मिता भारत की, परिहास बनाना बंद करें
सदियों से पिटते पिटते ही, तलवार चलाना सीख गए !

मालिक गुस्ताखी माफ़ करें,घरबार हिफाज़त से रखना
बस्ती के बाहर भी रहकर, हम आग जलाना सीख गये !

बेपर्दा घर, जूता, गाली, मजदूरी कर हम  बड़े हुए !
जाने कब, ऊंचे महलों की दीवार गिराना सीख गए ! 

तेरे जैसा ही जीवन पाकर, पशुओं जैसा बर्ताव मिला,
मालिक ये हाथ रखें नीचे, हम हाथ उठाना सीख गए !

Wednesday, September 4, 2013

अदब क़ायदा और सिखादें,शेख मोहल्ले वालों को ! -सतीश सक्सेना

सज़ा मिले मानवता का,उपहास बनाने वालों को,
कुछ तो शिक्षा मिले काश,कानून बनाने वालों को !

अरसे बाद, पड़ोसी दोनों , साथ में रहना सीखे हैं !
अदबक़ायदा और सिखा दें शेख,मोहल्ले वालों को !

अगर यकीं होता, मौलाना मरते भरी जवानी में ,
हूरें और शराब मिलेगी, ज़न्नत जाने वालों को !

सोना चांदी गिरवी रखकर, झोपड़ बस्ती सोयी है ,
धन चिंता में नींद न आये, अक्सर पैसे वालों को ! 

मैली बस्ती से कुछ हटकर, नगरी अलग बसाई है    
कंगालों से खौफ रहा है ,उजले कपडे वालों को !

बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में  जाने वालों को !



Sunday, June 15, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( चौथा भाग ) - सतीश सक्सेना


इस पृष्ठ पर लिखी अधिकांश पंक्तियाँ, मेरे १३ वर्षीय , किशोर विद्यार्थी बेटे के उलझन भरे प्रश्नों के उत्तर तथा एक पिता के सुझाव हैं ! ज्ञात हो की यह कविता १९९३ में लिखी गई थी !
समाज की बुराईयों तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने की एक अतिरिक्त इच्छा मेरे अन्दर शुरू से थी, उस दर्द की परिणिति इन रचनाओं के माध्यम से हुई! मगर कभी प्रसिद्धि की इच्छा नही थी इसलिए यह कवितायें डायरी में बंद रहीं ! गूगल  ट्रांसलिटरेशन एवं ब्लोगिंग के कारण यह सम्भव हुआ ! और वो कवितायें आपके सम्मुख आ पा रहीं हैं, अगर पसंद आयें तो लेखन सफल मानूंगा  !


सदियों का खोया स्वाभिमान
वापस दिलवाना है इनको ,

हम  लोगों द्वारा ही बोये  
काँटों से मुक्ति मिले इनको 
ठुकराए गए भाइयों का
अधिकार दिलाने आ आगे ,
अधिकार किसी का छीन अरे,क्यों लोग मनाते दीवाली?

कुछ कार्य नया करने आओ
आओ नवयुग की संतानों

अपने समाज में व्याप्त रहीं  
इन बुरी रीतियों को जानों  
हो शादी विवाह मानवों में,

जाति बन्धन का नाम मिटे ,
रूढ़ि  बन्धन में बंधे बंधे , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?

बच्चों मानवकुल ने अपने
कुछ लोग निकाले घर से हैं !

बस्ती के बाहर ! जंगल में ,
कुछ और लोग भी रहते हैं !
निर्बल भाई को बहुमत से , 

घर बाहर फेका है हमने !
आचरण बालि के जैसा कर क्यों लोग 
मनाते दीवाली?

घर के आँगन में लगे हुए
कुछ वृक्ष बबूल देखते हो !
हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,

कांटे राहों में, देखते हो !
काटो बिन मायामोह लिए,

इन काँटों से दुःख पाओगे
घर में जहरीले वृक्ष लिए , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

आओ हम शक्ति आजमाएं 
उन दुर्योधनों  से लड़ते हैं !
जो निर्बल, बाल ,ब्रद्ध, नारी
कुल को अपमानित करते हैं
रक्षित बन इनके जीवन में , 

तुम पुण्य कमाओगे भारी
शक्ति का करके दुरुपयोग , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?
......क्रमश







Friday, June 13, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( तीसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

मुझे एक मित्र ने कहा कि आज स्थिति , ऐसी नहीं जैसी अपने वर्णित की है ! जो लोग शहरों में रहते हैं , उन्हें शायद वस्तुस्थिति का ज्ञान नही है, मूल भारत में आज भी स्थिति वैसी ही है ! मेरा यह मानना है कि सच्चाई को सामने आना ही चाहिए चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो !

छाया प्रकरण से भी आगे 

कुछ महा धर्म ज्ञानी आये 
पदचिन्ह मिटे पैदल चलते 
पैरों में झाड़ीं, बांधी थी !
पशुओं से भी बदतर जीवन,

कर दिया धर्म रखवालों ने !
मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

पानी पीने को पनघट पर
कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
छू जाए , महा अपराधी है
प्यासा गरीब जल के बदले,

पिटता है वस्त्र रहित होकर !
मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

अधिकार नाम से दिया नहीं
कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
धन अर्जित संचित करने का
अधिकार लिया रखवालों ने
जूठन एकत्रित कर खाओ, 

धन का तुम को कुछ काम नहीं !
तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

वंचित रखा पीढियों इन्हें
बाज़ार ,हाट, दुकानों से !
सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
मीठा, खरीद कर खाने से !
हर जगह सामने आता था, 

अभिमान सवर्णों का आगे !
मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें !
संस्कृत का,क ख ग न पढ़ा,

व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं !
ऐसे पंडित कुलगुरु बना , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?


भोजन में लेते मांस और 
मदिरा पीते जल के बदले
पूजा में बैठ आचरण पर
वेदों की ऋचा सुनाते हैं
ऐसे ज्ञानी पुरोहितों से है  
त्राहि त्राहि माँ  सरस्वती  !
अधकचरा ज्ञान धर्म का ले क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ईश्वर समक्ष अपने को रख
बनियों को अर्थ हेतु माना
क्षत्रिय को सौंपी निज रक्षा
खुद पूज्य बने सारे युग के
सेवा करने को निम्न कोटि,
शूद्रों को जन चाकर माना ,
करवा संशोधित,आदि ग्रन्थ क्यों लोग मानते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो ,
जो नष्ट वर्ण संकट करदे !
अपने अपने कर्मानुसार
मानव,समाज का काम करे !
मिल बैठें आपस में सारे 
व्राह्मण और शूद्र साथ होकर
औरों के लिए घृणा लेकर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Thursday, June 12, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (दूसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

जिन्हें सीने से लगाना चाहिए , उन्हें आज भी इस देश में अछूत कहा जाता है ! इस दुर्भाग्य से निकलने हेतु मेरा यह प्रयास है और आशा है कि काश एक दिन यह कलंक दूर हो सके ! और हम अपने को सभ्य कहलाने लायक बन सकें !


बीसवीं सदी में पले बड़े
कंगूरों  के ठेकेदारो  !
मन्दिर के द्वारे खड़े हुए ,

मासूमों के चेहरे देखो ! 
बचपन से इनको गाली दे , 

क्या बीज डालते हो भारी !
इन फूलों को अपमानित कर,क्यों लोग मनाते दीवाली !

तीसरा भाग जनसंख्या का
शूद्रों के हिस्से में आया !

हँसते समाज के साथ जियें 
ऐसा अधिकार नहीं पाया ! 
मन्दिर प्रवेश वर्जित करते, 

कैसे ब्राह्मण ? अपराधी हैं !
परमेश्वर के कर द्वार बंद , क्यों लोग मनाते दीवाली  !

आरक्षण का विरोध करने
वालो कुछ सहकर तो देखो

सदियों से तड़पाया जैसा   
अहसास दर्द सह कर देखो 
कितने प्यासों ने जाने दी थीं,
तड़प तड़प कर बिन पानी ,
पीने का पानी वर्जित कर , क्यों लोग मनाते दीवाली !

आरक्षण अगर मिटाना है
तो शुरू करो ब्राह्मण कुल से

अनपढ़ वामन रक्षित होकर  
सम्मानित होता समाज से ! 
अनपढ़ वामन पंडित होता,
शिक्षित अछूत को हेय मान
इस महाज्ञान को धर्म मान, क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

वे भी हम जैसे इंसान थे   
कैसे अपमान झेलते थे !
छाया शूद्रों की पड़ने पर
कोढे लगवाए जाते थे !
यों धर्म नष्ट हो जाने पर , 

करते थे  प्रायश्चित्त, महा
गंगा में धोकर महापाप ! क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?


Friday, June 6, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (पहला भाग) - सतीश सक्सेना


निम्न कविता की रचना इस देश से कुरीतियाँ व अस्पृश्यता   मिटाने के प्रयास में शामिल होने हेतु लिखी गई थी (1992-93)! निस्संदेह यह मेरी सर्वोत्तम कविताओं में से एक है ! इसे स्वान्तः सुखाय ही लिखा था ! बहुत लंबा गीत है , कुछ लाइने निम्नलिखित हैं !


मानव कुल में ले जन्म, बाँट
क्यों रहे, अरे अपने कुल को ?
कर वर्ण व्यवस्था नष्ट,संगठित
कर पहले अपने कुल को ,
हो एक महामानव विशाल ! 

त्यागो यह भेदभाव भारी !
तुलसी की विह्वलता में बंध, क्यों लोग मनाते दीवाली !

हरिजन को सेवा करने के
बदले में नफरत देते हो   ?
यह तो कुल में लक्ष्मण जैसा
क्यों पास नहीं बैठाते हो  ?
सेवा सम्मानित कर न सके,

उपहास घृणा का पात्र बना ,
लक्ष्मण का सेवा भाव भूल , क्यों लोग मनाते दीवाली ?

मत भूलो रचनाकार प्रथम
श्री रामचरित रामायण के,
थे महापुरुष श्री बाल्मीकि
ऋषि,ज्ञानमूर्ति,रामायण के
हो शूद्र कुलोदभव,फिर भी 

जगजननी को पुत्री सा समझा
उनके वंशज , अपमानित कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?


बचपन से ही कक्षाओं में 
गुणगान देश का सुनता था
गौतम,गाँधी से महापुरुष
अपनी शिक्षा में पढता था
गौतम ने छोड़ा राजपाट, 

क्या यही न्याय दिलवाने को ,
अंगुलिमालों का हार पहन, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

गाँधी ने अपने जीवन में ,
कुछ माँगा देशवासियों  से
चाहा दिलवाना हरिजन को
सामाजिक न्याय हिन्दुओं से
माँगा इस लज्जाजनक रूप से,

मुक्ति मिले इन दलितों को
बापू इच्छा को रौंद तले , क्यों  लोग  मनाते  दीवाली  ?
.....क्रमश
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