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Friday, June 20, 2014

विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना

जीवन की आपाधापी में ३६ साल की नौकरी कब पूरी हो गयी,पता ही नहीं चला ! घर की जिम्मेवारियों और बच्चों के लिए साधन जुटाने में, समय के साथ दौड़ते दौड़ते अपने लिए समय निकालना बहुत मुश्किल रहा ! कई बार लगा कि जवानी में जो समय अपने लिए देना चाहिए शायद वह कभी दे ही नहीं पाए ! अक्सर इसका कारण पूर्व नियोजित लक्ष्य,बच्चों के भविष्य,की आवश्यकता पूरा करते करते धन का अभाव रहा अथवा अपने मनोरंजन के लिए आवश्यक हिम्मत और समय ही नहीं जुटा पाए !
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !

पेरिस रेलवे स्टेशन 
गौरव अपनी कंपनी कार्य से, जब जब देश से बाहर गए हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर घूम कर आइये , विभिन्न देशों की संस्कृति, रहनसहन और खानपान  में  बदलाव आपको अच्छा लगेगा ! हर बार व्यस्तता और छुट्टी न मिलने का बहाना करते हुए मैं, उन्हें असली बात कभी नहीं बता पाता था !

मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
वेनिस की पानी से लबालब गलियां 
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा  टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! 
उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने  लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य  वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
मगर जब पहली बार, विदेश पंहुच गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि मित्रों में अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
वियना ट्राम 
अधिकतर मेरे मित्र लगभग हर वर्ष देश भ्रमण पर खासा पैसा खर्च करते हैं मगर विदेश जाने के बारे में प्लानिंग की छोड़िये, अपने घर में इस विषय पर चर्चा भी नहीं करते हैं और यह सब आत्मविश्वास और जानकारी के अभाव के कारण ही होता है !  

स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया 
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि विदेश जाएँ या न जाएँ मगर हर परिवार के पास पासपोर्ट होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश करने  की परमीशन(वीसा) के लिए, इसका होना आवश्यक है ! यह कीमती डॉक्यूमेंट आपके घर के पते और जन्मतिथि के साथ आपके परिचय पत्र की तरह भी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है !

इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड
यह जानना आवश्यक है कि विदेश यात्रा हेतु , अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३५ हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है !
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५००००-६०००० रुपया

में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !

जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! 
यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा
अक्सर हम मरते दम तक अपनी सिक्योरिटी के लिए धन जोड़ते रहते हैं ,और बुढापे में , महसूस होता है कि जीवन में , और भी बहुत कुछ देख सकते थे जो  कर ही नहीं पाये और इतनी जल्दी जीवन की रात हो गयी ! मेरा अपना सिद्धांत है कि बेहद उतार चढ़ाव युक्त जीवन को, जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि
  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
        
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!

Wednesday, January 12, 2011

कुछ अच्छी यादें , मित्रों से मिलने की-सतीश सक्सेना

समीर लाल के पुत्र अभिनव के विवाह उत्सव में कुछ यादें, यहाँ दिए कुछ नए फोटो मिलने से, ताजा हो गयीं ! खुशदिल समीर -साधना  के परिवार के साथ का यह ग्रुप फोटो, यकीनन एक स्नेही पति पत्नी की हमेशा याद दिलाती रहेगी ! समीर लाल से हम लोग पहले से ही, कहीं न कहीं जुडा महसूस करते रहे थे मगर साधना समीर लाल की आत्मीयता महसूस कर , समीर की किस्मत से कहीं न कहीं जलन सी लगी ! काश साधना भाभी की तरह  .........;-))  
दिगंबर नासवा को समीर भाई द्वारा बार बार पुकारना , इस विवाह उत्सव में उनकी व्यस्तता  और जिम्मेवारी बताने को काफी थी ! स्नेही दिगंबर के बिना रौनक में कोई न कोई कमीं अवश्य रह जाती ! 
दोनों पति पत्नी,  इस विवाह में शामिल होने के लिए,दुबई से यहाँ आकर मेहमानों के स्वागत सत्कार में लगातार व्यस्त रहे ! (साथ के फोटो में श्रीमती एवं श्री दिगंबर नासवा झुककर समीर लाल दम्पति के लिए फोटो में जगह बनाते हुए )


पूरे विवाहोत्सव में जिस व्यक्ति से मिलने को मैं सबसे अधिक उत्सुक था , अफ़सोस रहा कि अंत तक उसकी झलक नहीं मिल सकी ! मुझे बताया गया था कि ताऊ रामपुरिया यहाँ अवश्य आयेंगे मगर वे अपने को प्रकट न करने पर कायम हैं ,अतः उनका परिचय नहीं हो पायेगा ! हिंदी ब्लॉग जगत में , हास्य व्यंग्य को नए आयाम देने वाले, इस ब्लागर को ढूँढने के प्रयत्न में ,मैं हर बन्दर नुमा मेहमान में, ताऊ को ढूँढता रहा ...:-(
खैर कभी तो मौका आएगा .....देख लेंगे ताऊ तुझे भी .....!

Friday, September 24, 2010

जैसलमेर में १८ करोड़ वर्ष पुराने पथरीले जंगल के अवशेष -सतीश सक्सेना

मुझे हमेशा से पहाड़ और घने जंगल आकर्षित करते रहे हैं ! हजारों साल पुराने खोये हुए अवशेष अगर किसी पहाड़ी पर मिल जाएँ तो मैं वहाँ अपने कैमरे के साथ, बिना खाए पिए अकेला पूरे दिन आराम से रह सकता हूँ !राजस्थान यात्रा से पहले मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि वहाँ मुझे इतिहास लिखे जाने से भी पहले का, बेशकीमत खज़ाना मिल जायेगा, जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था !
जैसलमेर से १७ किलोमीटर दूर जैसलमेर - बारमेड रोड पर, अकाल वुड फोसिल पार्क, जिसमें सैकड़ों की संख्या में फासिल भरे पड़े हैं, कौन विश्वास करेगा कि यहाँ १० स्कुआयर किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के पेंड, पत्थर बने हुए अपने अतीत की गवाही दे रहे हैं ! और यह पथरीले पेंड़ों  के तने ,यहाँ १८० मिलियन वर्ष पुराने जंगल होने के गवाह हैं !



समय और धरती में आये बदलाव के कारण, यह जंगल बाद में सागर  की तलहटी में समा गया और लगभग ३६ मिलियन वर्ष पहले जब सागर यहाँ से बापस लौटा तो पीछे पूरा पत्थर रुपी जंगल छोड़ गया !
सरकार द्वारा सुरक्षित घोषित इस फासिल पार्क में, जहाँ तहां पत्थर बन चुके, लकड़ी के तने बिखरे पड़े हैं ! पथरीले पहाड़ पर २५ तने नज़र आते हैं इनमें से १० पेंड के तने बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट दीखते हैं ! सबसे बड़ा तना 13मीटर लम्बा और डेढ़ मीटर चौड़ाई में है !इन विशाल पेंड़ों की उपस्थित यह बताती है कि कभी यहाँ की जलवायु घने जंगल के लिए अनुकूल रही होगी और समय के साथ, यह गिरे हुए पेंड, मिटटी में दबते चले गए और लाखों वर्षों से जमीनी दवाब और गर्मी के कारण पत्थर में बदल गए ! बाद में पानी के कटाव और मिटटी के क्षरण के साथ प्रकृति की यह दुर्लभ रचना जमीन के ऊपर आ गयी  ! आज सैकड़ों वर्ष पुराने समुद्री शैल ,सीप,शंख  इत्यादि के साथ पत्थर बने यह पेंड, रेगिस्तान में करोड़ों साल पहले समुद्र की उपस्थिति को, सबूत के साथ बयान करते हैं !
राजस्थान यात्रा में तमाम ऐतिहासिक खूबसूरत इमारतों और स्वादिष्ट भोजन के मध्य, मैं इस पथरीले जंगल को कभी नहीं भूल पाऊंगा !

Sunday, July 11, 2010

सड़क के किनारे का यूरोप, मेरे कैमरे की नज़र से -सतीश सक्सेना

जब भी मैं चित्रों में यूरोप के खींचे हुए फोटो देखता हूँ , मशहूर स्मारकों  के खींचे गए फोटो ही नज़र आते हैं  , मैंने कोशिश की है कि सड़क किनारे का आम माहौल ,रहनसहन और वहां की संस्कृति की झलक आप को दिखा सकूं  ! 
लेफ्ट साइड में, रोम में हमारा अमेरिकेन गाइड ,माइकेल जब  भारतीय तिरंगा हाथ में लेकर, अपनी प्रभावशाली आवाज़ में रोमन साम्राज्य और संस्कृति के बारे में समझाता था तो हम लोग मंत्रमुग्ध से उसकी गहरी आवाज के साथ रोम साम्राज्य में खो जाते थे ! दाहिनी ओर का चित्र रोमन सिपाही के कपडे पहने, पैसे लेकर फोटो खिंचवाने का प्रयत्न करते, इस रोम वासी को देख, मुझे अपने यहाँ के मदारी याद आ गए  !
   
 
बायीं तरफ रोम का मशहूर कोलीज़ियम है , जो रोमन लोगों की उत्कृष्ट  भवन एवं वास्तुकला  की, सैकड़ों सालों बाद आज भी याद दिलाता है ! विश्वप्रसिद्द ग्लेदिएतर लड़ाके यहीं अपने जौहर दिखाते थे ! दीवारों से चोरों द्वारा उखाड़े गए, कॉपरपिन होल, इन विश्व धरोहरों की बर्वादी के सबूत के रूप में , हमारे देश की तरह यहाँ भी  उपस्थित थे  !
"दिल खुश हुआ मस्जिदे वीरान देख कर 
  मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है "
रास्ते में कोच में बैठे हुए घरों के फोटो खींचने का लोभ नहीं रोक पाया मैं !अपने घर के लान में खेलते ये बच्चों को देखना बहुत मन भावन था ! आसपास सूखते कपडे , और घर का फालतू समान कुछ कुछ अपने घर जैसा ही लगा  !
काफी हद तक इटली अपने देश जैसी  नज़र आई ! घरों में बंधे डोरी पर सूखते कपडे, पूरे यूरोप में सिर्फ यही देखने को मिले !
 दिल्ली के जनपथ मार्केट की तरह फूटपाथ पर सामान बेचते लोग, हमारे यहाँ के मुकाबले अधिक सभ्य नज़र आये !
कोई खींचा तानी या सामान बेचने की आपाधापी  नहीं दिखी  दुकान में खड़े होते ही हमारा मुस्कान के साथ स्वागत अवश्य किया जाता था !
 इटालियन पत्थर पूरे विश्व में अपनी सुन्दरता के लिए मशहूर रहा है ! जगह जगह रोड साइड पर लगी हुई इटालियन ग्रेनाईट की फैक्ट्रियां , और कटी हुई पत्थर की सिल्लियाँ , भवन निर्मातों की मांग बता रही थीं ! इटालियन ओनेक्स अपने कलर और खूबसूरती के लिए धनवानों के घर में अक्सर शोभा बढाता आया है ! परन्तु यह महंगा होने के कारण आम आदमी की पंहुच से बाहर है !


इटली में करारा नामक जगह का महत्व वही है जो भारत में मकराना का ! ऊपर दिया गया फोटो उसी स्थान का है ! मगर पहाड़ों का बेतरतीब खनन, हमने वहाँ भी बहुतायत में देखा, जैसा हमारे देश में है ! प्रकृति का दोहन, मानव  बहुत क्रूरता से करता रहा है , इसके दूरगामी परिणामों , के बारे में हम सोचने का प्रयत्न ही नहीं करते  ! करारा  (तस्किनी ), में जगह जगह,  बेदर्दी से काटे गए नंगे पहाड़, अपनी दुर्दशा सुना रहे थे !

Thursday, July 8, 2010

शोर प्रदूषण और यूरोप - सतीश सक्सेना

पेरिस से जिनेवा तक का सफ़र हम लोगों ने, विश्व की सबसे तेज रफ़्तार ट्रेन टीजीवी, जिसकी स्पीड ३२० कम प्रति घंटा तक जाती थी, से तय किया था ! इस ट्रेन की यात्रा का हमें बहुत इंतज़ार था ! पेरिस स्टेशन ( पेरिस ल्योन ) पंहुचने पर एक कतार में खड़ीं कई सुपरफास्ट ट्रेन दिखाई दीं ! बीच में एक ऐतिहासिक स्टेशन बेलग्रेड पड़ा जिसकी जीर्ण हालत देख हमें ख़ुशी हुई ! बेलग्रेड हिटलर की एक बदनाम जेल के लिए मशहूर रहा है , जहाँ गेस्टापो का एक महत्वपूर्ण अड्डा था !
ट्रेन में  हम भारतीयों को छोड़, अन्य लोग शांत थे , हम लोगों ने बैठते ही अपना अपना ग्रुप बना लिया और अपनी अपनी कहानियां सुनाने में भूल गए कि यहाँ के लोग तेज आवाज में सुनने के आदी नहीं हैं ! यहाँ तक कि  हाई स्पीड टीजीवी के चलने पर, कुछ भी नहीं महसूस हो रहा था ! पटरियों की धडधड आदि सब गायब , इतनी शांत कि गति भी पता न चले , लगा कि कुछ मज़ा ही नहीं आ रहा  !      
थोड़ी देर में लगभग ७५ वर्षीय एक बुजुर्ग महिला अपनी सीट से उठ कर, मेरे  सामने बैठे, मित्र के पास जाकर बेहद गुस्से में बोली आप इतनी जोर से क्यों चीख रहे हैं !  आपकी तेज आवाज ने मेरे कानों में दर्द कर दिया है ! मेरी तबियत खराब हो रही है ...क्या आपको पब्लिक प्लेस में बोलना नहीं आता है ! 
हमारे भारतीय मित्र , जो एक उच्च अधिकारी रह चुके थे ,अचानक हुए इस हमले को बिलकुल तैयार नहीं थे !  बार बार सॉरी  माँ , कहकर अपनी जान छुटाई ! यह पहला मौका था जब हमारी ख़राब आदत, हमें खुद को महसूस हुई !
दूसरा मौका स्वित्ज़रलैंड में विलार्स नामक बेहद खूबसूरत  जगह  होटल  "ले ब्रिस्टल "  लॉबी का था जहाँ एक काफी बड़ा बोर्ड  लगा हुआ था कि कृपया साइलेंस बनाए रखें !
एक अन्य कोच से  उतरे, एक भारतीय, लॉबी  में  इतनी जोर जोर से बोल रहे थे कि मुझे तक असहनीय हो रहा था  ! इतने में एक होटल अधिकारी ने आकर उन सज्जन को बुला कर यह नोटिस बोर्ड दिखाया उसके बाद ही वे देसी सज्जन खामोश हो पाए !

साधारण शिष्टाचार और अपने देश के सम्मान का ख़याल हमारे जन मानस में , कैसे आएगा ? खास तौर पर तब जबकि शोर को हम प्रदूषण मानते ही नहीं ,उसके खतरों से आगाह होने की चिंता तो तब होगी जब हमें उसके बारे में पता हो !


Friday, June 18, 2010

पानी में डूबे वेनिस को महसूस करें - सतीश सक्सेना

११७ छोटे छोटे द्वीपों से बने शहर वेनिस या वेनेज़िया को देखने की तमन्ना बचपन से ही थी , जो मेरे योग्य
बच्चों ने समय से पहले ही पूरी कर दी ! काफी लोगों का अनुरोध था कि मैं कुछ चित्र प्रकाशित करुँ ! सो पानी में डूबे इस बिचित्र शहर वेनिस की कुछ झलकियाँ देखिये ! मुझे उम्मीद है इसे देख कर आपको ऐसा लगेगा जैसे हम अपने यहाँ के किसी बाढ़ग्रस्त शहर में बचाव कार्य कर रहे हैं !
इस खूबसूरत शहर को घूमने की तमन्ना थी जहाँ सड़कों की जगह पानी और टेक्सी ट्रेन की जगह सिर्फ नाव थीं ! जहां पर किसी तरह के प्रदूषण का नाम नहीं ! मेन लैंड से कटा यह द्वीप समूह    स्वप्न में आयी कोई जगह लग रही थी ! गंडोला राइड  के नाम से मशहूर गलियों में घुमाने वाली नाव के चार्जेस १०० यूरो  आधा घंटे के लिए ( ६ आदमियों के लिए )देकर यह अनुभव बहुत सुखद रहा ! लोग बहुत मिलनसार और हंसमुख थे,हालांकि हमें बताया गया था कि यहाँ पर अपने सामान की सावधानी रखें ! पूरे यूरोप में सिर्फ इटली आकर ही यह चेतावनी कुछ बिचित्र अवश्य लगी ! एक और बात में कुछ हमारे यहाँ का सा माहौल लगा और वह थी  वहां की अस्तव्यस्तता , कुछ कुछ हमारे नगर निगम से मिलता जुलता हाल या कुछ बेहतर ! कुछ संतोष हुआ :-), ऐसे भी बुरे नहीं हैं हम ! पूरे यूरोप में जहाँ अन्य देश और नगर बेहद साफ़ सुथरे लगे वहीं इटली में आकर गंदे खुले नाले, इटालियन     पत्थरों की फैक्ट्री , रोड साइड में झाड़ियाँ आदि देख अपने  जैसा जाना पहचाना माहौल लगा ! :-) 
कई प्रश्न ,समय की कमी के कारण मन में रह गए कि यहाँ के लोगों का आपस में मिलना जुलना, बिना खुली जगह और मैदानों के कैसे होता होगा !पडुआ -वेनिस पास पास एक ही प्रशासन में आते हैं ,हमारा होटल पडुआ में था , सुबह ग्रुप के साथ गए भारतीय कुक के कारण , शुद्ध भारतीय शाकाहारी नाश्ता करके , अपनी इंग्लिश कोच में, वेनिस के लिए रवाना हुए थे ! हमें बताया गया था कि कोच वेनिस शहर में नहीं जा सकती अतः कोच को पोर्ट पर, पार्क कर आगे हमें स्टीमर से वेनिस शहर के दरवाजे पंहुचना  था ! सेंट मार्क्स
स्कुआयर, वेनिस में सबसे मशहूर स्थल है,पंहुचने में हमें लगभग २० मिनट लगे होंगे ! और विश्व में सर्वाधिक आश्चर्यचकित करने वाली जगह हमारे सामने थी ! वेनिस शहर में जाती गहरी गलियाँ ,लबालब समुद्री पानी में, दरवाजों तक डूबी हमारे सामने थीं !              
वेनिस के लोग बहुत सम्रद्ध थे और आज भी माने जाते हैं !सबसे बड़ा आश्चर्य वेनिस में मकान बनने की कला है , लकड़ी की गहरी पाइल्स गहरे पानी में ठोकी जाती हैं जब तक ठोस जमीन  न छू ले ! गहरे पानी में लकड़ी का क्षरण नहीं होता और यह पत्थर जैसी मजबूत नीव का काम करती हैं !सैकड़ों बरसों से समुद्र के गहरे पानी में , लकड़ी की नीव पर बने पत्थरों और ईंटों के यह कई मंजिला भवन, अच्छे अच्छे सिविल इंजिनियर को विस्मय में डालने के लिए काफी हैं ! एक इंजिनियर के नाते मेरे लिए यह समझना और साक्षात् देखना बहुत विस्मयकारी और सुखद रहा ! वेनिस के स्ट्रक्चर को समझना आसान नहीं है जिस प्रकार वेनिस वासियों ने इस शहर को बनाने में मेन लैंड की नदियों को मोड़ा और समुद्री ज्वार भाटा से बचाव किया है वह किसी भी अभियंता के लिए सीखने और रिसर्च का विषय है ! और हाँ वेनिस में कोई सीवर सिस्टम नहीं है , घरों का वेस्ट सीधा कैनाल में बहाया जाता है , पूरे शहर में मुश्किल से २० प्लंबर हैं ! 
बहरहाल वेनिस पोर्ट पर अपने ग्रुप लीडर नानू सेठना के सौजन्य से ,बीयर के साथ इटालियन पीज़ा  के टुकड़े खाना शायद ही कभी भूल पायें ! वहाँ पोर्ट के किनारे किनारे ,लगी सजी हुईं दुकाने दिल्ली के जनपथ या मुंबई के चौपाटी की  रंगीनियाँ बिखेरती लग रहीं थी ! 
  

Saturday, June 12, 2010

एक विश्वास यह भी - सतीश सक्सेना

डिस्नेलैंड  पेरिस के अन्दर ही एक होटल ,मैजिक सर्कस में ठहरना हुआ था , नाश्ते के समय साथ एक यूरोपियन दम्पति भी अपने लगभग डेढ़ साल के बच्चे के साथ नाश्ता कर रहे थे  ! नाश्ते के दौरान माँ ने अपने बच्चे की कोई मदद नहीं की और मैं अपना नाश्ता भूल उस नन्हे स्मार्ट का नाश्ता करते हुए देखता रहा ! वाकायदा चाकू छुरी  का समुचित उपयोग करते , इस आत्मविश्वासी शिशु  का यह फोटो  मुझे डिस्ने लैंड की हमेशा याद दिलाएगा !


          मुझे आपने परिवार में, इसी की हमउम्र टिन्नी की याद आ गयी जो हम सबकी लाडली और अधिक केयर रखने की बदौलत  आज भी शायद  इस प्रकार खाना नहीं सीख पायी है !
          क्या अधिक संरक्षण और अपने बच्चे की बुद्धि पर भरोसा न करते हुए हम लोग, उसका आत्मविश्वास  तोड़ने के अपराधी नहीं हैं  ?

Monday, June 7, 2010

यूरोप ट्रिप,दिल्ली -फ्रेंकफर्ट -विएंना -सतीश सक्सेना

                गौरव और गरिमा दोनों में होड़ रही कि पापा मेरे एड ऑन कार्ड  ( गौरव का अमेक्स प्लेटिनम और गरिमा का अमेक्स गोल्ड कार्ड ) से ही खर्चा करें ! मेरे इन इंटरनॅशनल कार्ड्स को शीघ्र बनवाने में ,मेरी बेटी द्वारा किये गए प्रयत्नों के फलस्वरूप ,यात्रा से ठीक पहले मेरे दोनों बच्चों के द्वारा दिए गए एड ऑन कार्ड्स मेरे हाथ में थे  !
              शायद यह पहला मौका था जब कभी शांत न बैठने वाला मैं हर तरह से खाली था ! फ्रेंकफर्ट एअरपोर्ट पर रूल  को न जानने की सजा उतरते ही मिली जब कस्टम पर,स्कॉच बोतल जो कि फ्लाईट के दौरान खरीदी गयी थी , जब्त कर ली गयी ! कारण बताया गया कि इस बोतल को सर्टिफिकेट के साथ प्लास्टिक बेग में सील्ड कर के लाना था जो कि एयर स्टाफ ने नहीं किया और पहला नुक्सान हमारा सफ़र में ही हुआ ! शुरुआत में ही शकुन अशकुन से आशंकित भारतीय मन कहीं न कहीं बेचैन हो गया था !
फ्रैंकफर्ट से वियना जाते समय प्लेन से खींची एक फोटो दे रहा हूँ , झील नगरी जैसा सुंदर, यह स्थल बेहद मनोहारी लगा !  यह कौन सी जगह है ? शायद राज भाटिया जी इस पर कुछ प्रकाश डाल सकें !
फ्लाईट में यूरोपियन स्टीवर्ड द्वारा सर्व की गयी मुफ्त रेड वाइन की चुस्कियां लेते  समय कब बीत गया पता ही नहीं चला  ! और प्लेन विएंना में उतरने की तैयारी कर रहा था ! प्रीपेड टेक्सी सर्विस बूथ ने एक लम्बे चौड़े यूरोपियन को हमारा सामान उठाने का निर्देश देते हुए बताया कि यही हमारा ड्राईवर होगा ! ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम युक्त, इस एस यू वी के ड्राईवर को हमारे दिए हुए पते पर पंहुचने के लिए, सिर्फ जीपीएस डिवाइस में इस पते को फीड भर करना था ! हर मोड़ पर मशीन में लगा तीर ड्राईवर को बता रहा था कि अगला मोड़ कितनी दूर और किस दिशा में होगा ! और कुछ ही देर में यह गाड़ी अपने फ्लेट के सामने इंतज़ार करते नवीन के सामने जाकर रुक गयी ! ज्वालामुखी राख से आशंकित, हमें अब जाकर विश्वास हुआ कि अब हम यूरोप पहुँच चुके हैं !

Tuesday, May 11, 2010

गोपाल विनायक गोडसे (Gopal Godse ) के साथ एक दिन - सतीश सक्सेना

                              अपने कैमरे के साथ की यादें लिखते समय ,आदरणीय गोपाल गोडसे की याद आ गयी ! वह जब भी दिल्ली आते थे मुझे अपना दोस्त कहते हुए, मिलना न भूलते !महात्मा गांधी की हत्या में शामिल,  इस  शख्शियत से पहली मुलाकात  ११-३-१९९१ में दिल्ली में हुई थी ! पहली मुलाकात में ही लगभग 73 वर्षीय,मगर मजबूत इच्छा शक्ति का यह वृद्ध व्यक्ति, मुझे अपनी विलक्षण विद्वता से आसानी से, प्रभावित कर लेगा, यह सोचा भी न था ! मुझे सिविल इंजिनियर जान कर उनका पहला प्रश्न था कि क्या आप इस देश के पहले इंजिनियर का नाम बताएँगे ? 
                         एम् विश्वेसरैया  ...विश्वकर्मा.... आदि सोचने के बाद जब मैंने मय दानव का नाम लिया तब उन्होंने बड़ी गर्म जोशी से हाथ मिलाया और मेरी तारीफ़ करते हुए कहा कि आपका सामान्य ज्ञान बढ़िया है ! अब बताइए मयासुर की लिखी कोई पुस्तक का नाम, जिसमें किलों के निर्माण , प्लानिंग  और उनकी  नींव कि डिजाइन के बारे में वर्णन हो ! मुझे निरुत्तर जानकर उन्होंने बताया कि पुणे की लाइब्रेरी में यह पुरातन किताब उपलब्ध है जिसकी एक प्रति उनके पास भी है ! इसका नाम "मय मतम  "है और पुरातन भारत की, पौराणिक काल में भवन अभियांत्रिकी पर लिखी गयी यह पहली और संभवतः सर्वाधिक दुर्लभ किताबों में से एक है  ! 
                           वह उन दिनों दिल्ली के ऐतिहासिक भवनों के ऊपर रिसर्च कर रहे थे , फोटोग्राफी और इतिहास में मेरी रूचि देख उन्होंने मुझे दिल्ली में इस विषय पर, जब भी मेरा अवकाश हो , अपना साथ देने का अनुरोध किया ! अपने विषय और रूचि को देख मैंने दिल्ली की क़ुतुब मीनार और लालकिला ,और ताजमहल उनके साथ साथ भ्रमण किया और उनके लिए फोटोग्राफ्स लिए !
                         १९९१ में लगभग 73 वर्ष के इस जवान ( अब दिवंगत )के साथ, इतिहास की छिपी परतों का उनका मूल्यांकन और शुद्ध हिन्दी का उच्चारण और देशभक्ति आज भी नहीं भुला पाया हूँ !  


Monday, May 10, 2010

निकोन डी -९० की निगाह में, मैं और मेरी गर्ल फ्रेंड -सतीश सक्सेना

                 फुर्सत का समय ,जो बहुत कम ही मिल पाता है , अक्सर  कैमरे के साथ बिताना पसंद करता हूँ !  जीवंत फोटो देखकर लगता है इतनी सुंदर फोटो के लिए जो समय लगा वह व्यर्थ नहीं गया !
              
                  साथ का फोटो टिन्नी के साथ का है ! हम दोनों में उम्र का फर्क सिर्फ ५३ साल का है ! मगर फिर भी हम अच्छे दोस्त हैं, दोनों एक दूसरे का साथ बहुत पसंद करते हैं ! दिल करता है कि एक दूसरे की ऊँगली पकडे सारे दिन मॉल से बाहर ही न निकलें मगर सामान भी क्या क्या घर ले जाएँ ...?? हर चीज पर मन ललचाता है ....अगर सब कुछ ले लिया  तो घर जाकर हर  हालत में डांट तो पड़नी ही है ! 
                
 निकोन  D-90 मशीन और सिगमा 50mm F-1.४ EX लेंस कम्बीनेशन में अपर्चर १.४,शटर स्पीड १/१५ सेकंड ,कलर टेम्प्रेचर ५००० केल्विन ,के कारण ,साधारण टयूब लाइट के प्रकाश में खिंचा यह फोटो ( ऊपर }अच्छा बन पड़ा है !

Thursday, May 6, 2010

मेरी नयी फोटो मशीन Nikon SLR - D90 -सतीश सक्सेना

बहुत वर्षों के बाद एक अच्छे कैमरे से फोटो खींचना  एक सुखद अनुभव रहा  ! बचपन से पापा की फोटोग्राफी से प्रभावित ,गौरव  ने जब यह कैमरा ख़रीदा तो चेहरे से खुशी और उत्तेजना साफ़ झलक रही थी  ! निकोन डिजिटल सिंगल लेंस रिफ्लेक्स  कैमरा D-90 , 50mm ऍफ़  १.४ लैंस , निकोन  १८-२०० mm  जूम लैंस के साथ यह कैमरा किसी भी फोटोग्राफर के लिए गर्व का कारण हो सकता है !
1970-72 के वे दिन जब मैंने पहला कैमरा ख़रीदा था ! एग्फा -III कैमरा उन दिनों लगभग ८० रूपये में मिला था ! बदायूं  में शायद पूरे मोहल्ले में, सिर्फ मैं ही कैमरा मालिक था और खास मौकों पर फिल्म डलवा , खटिया पर बैठाकर ,गुडिया और नीलू  के फोटो खींच , फिल्म को धुलवाने बाज़ार भागना और अपने खींचे फोटो लेकर देखने और सबको दिखाना ही मेरी सबसे बड़ी हाबी थी !
 कुछ समय बाद बाज़ार में आया आइसोली -I , खरीदना एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था क्योंकि यह नवीनतम कैमरा क्लिक III से लगभग दूना महंगा था ! 
जिज्जी से लड़ झगड़ कर उन दिनों १५० रुपया निकलवाना आसान नहीं था मगर मेरे लिए वे बडबडाती हुईं , आखिर दे ही देतीं थी ! इस कैमरे को लेकर बदायूं के पुराने किले नुमा खंडहरों , टूटी पडी बावडियों और गाँव में बाग़ , नदी के फोटो मेरे विद्यार्थी जीवन की  सुखद यादों में से एक हैं ! फिक्स शटर क्लिक III के मुकाबले , इस कैमरे से अपने हाथ से फोकस करने में गर्व महसूस होता था !
         साइंस की बेहतरीन ईजादों में से एक , कैमरा  उन दिनों सबकी पंहुच में नहीं था  ! इसी कमी की वजह से आज भी ,मैं अपने आपको उन बदकिस्मत लोगों में से एक गिनता हूँ जिनके पास अपने माता पिता का कोई फोटो नहीं है ! शायद इस अभाव को बड़ी से बड़ी उपलब्धि भी न भर पाए !
बचपन कभी आपको यह नहीं कह पाता कि उसे क्या चाहिए , अक्सर मैं आज भी छोटे बच्चों के फोटो खूब खींचता हूँ , आपको नहीं लगता कि ये मासूम मुस्कराहटें,  इनके बड़े होने के बाद आपको कभी नहीं दिखेंगी ! क्यों न इन्हें हमेशा के लिए कैमरे में कैद करके रखा जाए !  यकीन मानिए यह आपको कुछ समय बाद बहुत सुकून देंगी ! और शायद हमारे बाद, परिवार के सदस्य , इन यादों को  हमारे छोड़े निशान माने ! 
काश मेरे घर में कोई मेरा जैसा होता जो मेरे बचपन में मेरे माता पिता के फोटो खींचता !  इसी दुखद अहसास के चलते मैंने अपने शौक के दिनों में भी अपने बड़े बूढों के फोटो खूब खींचे  ! और आज उनके न होने पर कहीं न कहीं मुझे यह संतोष रहता है कि फोटो के रूप में इन लोगों की यादें तो मेरे पास हैं ही ! 

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