Showing posts with label भाषा. Show all posts
Showing posts with label भाषा. Show all posts

Friday, July 24, 2020

न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना

जब से फ्री व्हाट्सप्प और कई तरह के मेसेंजर आये है तब से दोस्तों के, परिवार जनों के गुड मॉर्निंग, विभिन्न अवसर पर बधाई सन्देश इतने आने लगे हैं कि अगर सब संदेशों का जवाब दिया जाये तो रोज सुबह एक घंटा कम से कम लगता है ! सन्देश भेजने वाला दोस्त कॉपी पेस्ट कर उस सन्देश को २० मित्रों को एक साथ भेजता है और भूल जाता है , उसकी यह समझ है कि इससे मित्रता संबंधों में गर्माहट रहती है , जबकि सच्चाई यह है कि अगर नेट पर एक सन्देश भेजने की कीमत 5 रुपया कर दी जाए तो सारी गर्माहट और प्यार गायब हो जाएगा और एक भी सन्देश भेजना दूभर हो जाएगा !

अगर आपस में वास्तविक प्यार है तो वह वक्त पर अपनी पहचान भी करा देगा और अहसास भी , उसके लिए कृत्रिम शब्दों का प्रयोग बिलकुल आवश्यक नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्रा है अगर प्यार का दिखावा करना आवश्यक हो तभी इन संदेशों की उपयोगिता है अन्यथा यह हमारे चारो और एक मास्क आवरण का काम ही करते हैं जो वक्त पर कभी दिखाई नहीं पड़ेंगे !  

यह दिखावा शायद हमारे देश में सबसे अधिक होता है , हैरानी की बात यह है कि कुछ अच्छे और शानदार व्यक्तित्व भी इसे आवश्यक मानकर इतना आत्मसात कर चुके हैं कि वे इसे आवश्यक मानते हैं और दूसरी तरफ से यही उम्मीदें भी करते हैं ! स्नेह और प्यार का अहसास अब इन कृत्रिम बधाई और नमन संदेशों ने ले लिया है !

मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? 

कुछ लोग मुझे कवि समझते हैं कुछ साहित्यकार जबकि यह सम्बोधन सुनकर मुझे चिढ होती है , 300 से अधिक कवितायें लिखी हैं
मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए ! 

आज हिंदी साहित्यकार गिने चुने ही बचे हैं और जो वाकई साहित्यकार हैं उनमें से भी अधिकतर अपनी जयकार बोलते चेलों से घिरे रहते हैं तो मुझे लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व सिर्फ अपने शिष्यों के बीच में ही साहित्यकार है , अभिव्यक्ति से इसका शायद ही कोई सरोकार हो और जिसकी भाषा ही सामान्य जन अभिव्यक्ति के किसी काम की न हो वह साहित्यकार हो ही नहीं सकता वह सिर्फ क्लिष्ट हिंदी शब्दों का उपयोग कर, अपनी विद्वता सिद्ध करने की कोशिश करता , एक तुच्छ जीव है जो गरीब हिंदी के ऊपर सवार होकर अपनी जयकार  बुलवाने में सफल रहा है !

प्रणाम आप सबको !!
    

Monday, October 29, 2018

कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना -सतीश सक्सेना

इस हिन्दुस्तान में रहते , अलग पहचान सा लिखना !
कहीं  गंगा किनारे  बैठ कर , रसखान सा लिखना !
 
दिखें यदि घाव धरती के, तो आँखों को झुका लिखना  
घरों में बंद, मां बहनों पे, कुछ आसान सा लिखना !

विदूषक बन गए मंचाधिकारी , उनके शिष्यों के ,
अनुग्रह पुरस्कारों के लिए, अपमान सा लिखना !

किसी के शब्द शैली को चुराये मंच कवियों औ ,
जुगाड़ू  गवैयों , के बीच कुछ प्रतिमान सा लिखना !

व्यथा लिखने चलो तब, तड़पते परिवार को लेकर
हजारों मील, पैदल चल रहे , इंसान पर लिखना !

तेरे मन की तड़प अभिव्यक्ति जब चीत्कार कर बैठे
बिना परवा किये तलवार की, सुलतान सा लिखना !

Monday, August 7, 2017

अपना दर्द, उजागर करते, मूरख बनते मेरे गीत ! -सतीश सक्सेना

किसी कवि की रचना देखें,
दर्द छलकता,  दिखता है  !
प्यार, नेह दुर्लभ से लगते ,
शोक हर जगह मिलता है !
क्या शिक्षा विद्वानों को दें ,
रचनाओं  में , रोते गीत !
निज रचनाएँ , दर्पण मन का, दर्द समझते, मेरे गीत ! 

अपना दर्द किसे दिखलाते ?
सब हंसकर आनंद उठाते !
दर्द, वहीँ जाकर के बोलो ,
भूले जिनको, कसम उठाके !
स्वाभिमान का नाम न देना,
बस अभिमान सिखाती रीत ,
अपना दर्द, उजागर करते, मूरख  बनते  मेरे  गीत !

आत्म मुग्धता,  मानव की ,
कुछ काम न आये जीवन में !
गर्वित मन को समझा पाना ,
बड़ा कठिन, इस जीवन में !
जीवन की कड़वी बातों को, 
कहाँ भूल पाते हैं गीत !
हार और अपमान याद कर, क्रोध में आयें मेरे गीत !

जब भी कोई कलम उठाये 
अपनी व्यथा, सामने लाये ,
खूब छिपायें, जितना चाहें 
फिर भी दर्द नज़र आ जाये
मुरझाई यह हँसी, गा रही, 
चीख चीख, दर्दीले गीत !
अश्रु पोंछने तेरे, जग में, कहाँ मिलेंगे निश्छल गीत  ?

अहंकार की नाव में बैठे,

भूल गए  कर्तव्यों  को 
अच्छी मीठी ,यादें भूले , 
संचय कड़वे  कष्टों को
कितने चले गए रो रोकर, 
कौन सम्भाले बुरा अतीत !
सब झूठे ,आंसू पोंछेंगे , कौन सुनाये , मंगल गीत  ?

सभी सांत्वना, देते आकर 
जहाँ लेखनी , रोती पाए !
आहत मानस, भी घायल 
हो सच्चाई पहचान न पाए !
ऐसी जज़्बाती ग़ज़लों को ,
ढूंढें अवसरवादी गीत !
मौकों का फायदा उठाने, दरवाजे पर तत्पर गीत !

Monday, July 3, 2017

लेखन क्वालिटी -सतीश सक्सेना

ब्लॉग लेखन में कुछ सक्रियता तो आयी मगर आवश्यकता इस उत्साह को बनाये रखने की है ! हमें विस्तार से विगत का आकलन करना होगा अन्यथा कुछ दिनों में सब जोश ठंडा हो जाएगा !
फेसबुक के शुरू होने के साथ अधिकतर ने ब्लॉग लेखन बंद कर दिया इसके पीछे उन्हें कमेंट का न मिलना या कमेंट संख्या में भारी कमी थी, लोगों का अधिक ध्यान फेसबुक पर था जहाँ आसानी से लाइक और कमेंट मिल रहे थे और वे अधिक इंटरैक्टिव भी थे ! अपनी रचनाओं पर लोगों का ध्यान न देख कर निराशा और अपमान बोध जैसा महसूस हुआ और सबने अपना रुख फेसबुक की ओर कर लिया जहाँ अधिक पहचान मिलने की आशा थी !

मेरे ब्लॉग पर आने वाले कमेंट में 80 प्रतिशत की गिरावट आयी मगर मेरा लेखन इस कारण कभी कम न हुआ , ब्लॉग लेखन का उद्देश्य मेरे लेखन का संकलन मात्र रहा था मेरा विश्वास था कि इसे देर सबेर लोग पढ़ेंगे ज़रूर ,
इसमें बनावट से लोगों को प्रभावित करने की चेष्टा रंचमात्र भी नहीं थी !

मेरा अभी भी दृढ विश्वास है कि गूगल के दिए इस मुफ्त प्लेटफॉर्म से बेहतर और कोई प्लेटफॉर्म नहीं है जहाँ लोग अपनी रचनाये सदा के लिए सुरक्षित रख सकते हैं ! सो ब्लॉगर साथियों से अनुरोध है कि वे दिल से लिखें और क्वालिटी कंटेंट लिखें ताकि आज न सही कल आने वाली पीढ़ी उनकी अभिव्यक्ति समझे और पुरानी पीढ़ी को अपने साथ महसूस कर सके !

मंगलकामनाएं आपकी कलम को !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Saturday, July 1, 2017

रुकिए नहीं, दौड़ते रहें , रुकना अंत होगा अभिव्यक्ति का, जीवन दौड़ का -सतीश सक्सेना

मेरे लिए ब्लॉगिंग करना हमेशा स्फूर्तिदायक रहा है, ब्लॉगिंग मेरे लिए पहले दिन से लेकर आजतक मेरे विचारों का एकमात्र संकलन स्थल रहा है और इसकी उपयोगिता मेरे लिए कभी कम नहीं हुई भले ही लोग आएं या न आएं ! शुरू से लेकर अबतक लगभग ४ पोस्ट प्रति माह लिखता रहा हूँ जो लगातार जारी रही दुखद यह है कि लोगों ने लिखना बंद कर दिया शायद इसलिए कि अब कमेंट मिलने कम हो गए !
लेखन से आपको अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का अवसर मिलता है इसपर तालियों की आशा नहीं करनी चाहिए बल्कि हर नए लेख को और अधिक ईमानदारी से लिखने का प्रयास करते रहना है !

लेखन पर कमेंट न मिलना निराशा का कारण नहीं होना चाहिए बल्कि लेखन में निखार लाने के प्रति कृतसंकल्प होना चाहिए ,निश्चित ही सतत लेखन, आपकी अभिव्यक्ति में सुधार करने में सहायक होगा !

मेरा मानना है कि आप सकारात्मक लिखते रहिये अगर आपके विचारों में , रचनात्मकता है तो लोग एक दिन आपके लेखन को अवश्य पढ़ेंगे और उसे सम्मान भी मिलेगा !

सस्नेह मंगलकामनाएं कि आपकी कलम सुनहरी हो !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Wednesday, September 14, 2016

हिंदी पुरस्कार शॉर्टकट - सतीश सक्सेना

हिंदी दिवस पर गुरुघंटालों, चमचों और बेचारे पाठकों को बधाई कि आज हिंदी, साहित्य चमचों के हाथ, जबरदस्त तरीके से फल फूल रही है, बड़े बड़े पुरस्कार पाने के शॉर्टकट तरीके निकाल कर लोग पन्त , निराला से भी बड़े पुरस्कार हासिल कर पाने में समर्थ हो पा रहे हैं !

ज्ञात हो कि हिंदी के तथाकथित मशहूर विद्वान, जो भारत सरकार , राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कृत हैं, सब के सब किसी न किसी आशीर्वाद के जरिये ही वहां तक पहुँच पाए हैं और इसमें उनके घटिया चोरी किये लेखों, रचनाओं का कोई हाथ नहीं !

अधिकतर हिंदी मंचों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष राजनीतिज्ञों की विरुदावली खुश होकर गाते हैं एवं उनके सामने कमर झुका कर खड़े रहने को मजबूर हैं अगर उन्हें आगामी पद्म पुरस्कारों एवं विदेश यात्राओं में अपना नाम चाहिए !

इस सबके लिए कोई नेताओं के बच्चों के विवाह में काव्य पत्र अर्पित कर अपनी जगह बनाता है तो कोई नेता जी का अभिभाषण लेखन पर अपना हस्त कौशल दिखाता है ! नेताजी के खुश होने का नतीजा हिंदी के अगले वर्ष बंटने वाले पुरस्कार समारोह में पुरस्कृत होकर मिलता है ! एक बार मंच पर चढ़ने का आशीर्वाद पाकर यह हिंदी मार्तण्ड पूरे जीवन हर दूसरे वर्ष कोई न कोई कृपापूर्वक बड़ा पुरस्कार प्राप्त करते रहते हैं एवं मूर्ख मीडिया जिसको भाषा की कोई समझ नहीं इन्हें ही हिंदी का सिरमौर समझ, बार बार टीवी गोष्ठियों में बुलाकर, हिंदी कविराज, विद्वान की उपाधि से नवाज, इनके प्रभा मंडल में इज़ाफ़ा करती रहती है !
हाल में दिए एक विख्यात सरकारी हिंदी मंच की पुरस्कार लिस्ट देख कर हँसी आ गयी, इस एक ही लिस्ट में परमगुरु, महागुरु , गुरु , शिष्य और परम शिष्यों को सम्मान दिया जाना है इन पुराने भांड गवैय्यों को छोड़ एक भी स्वाभिमानी  हिंदी लेखक/कवि  इनकी नजर में पुरस्कृत होने योग्य नहीं है ...

जब तक इन चप्पल उठाने वाले धुरंधरों से छुटकारा नहीं मिलता तबतक हिंदी उपहास का पात्र ही रहेगी !
हिंदी पाठकों को मंगलकामनाएं हिंदी दिवस की !

Thursday, August 11, 2016

इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ - सतीश सक्सेना

बरसाती कवियों के युग में
नवगीतों के, सूखेपन में 
कुछ शब्दों में हेरफेर कर 
चौर्य कलाओं के छपने से
अधिपतियों के समर युद्ध में
खूब पुरस्कृत सेवक होते ,
शिष्यों की गिनती बढ़वाते 
मंच गवैयों , के इस युग में ,
कविता की बंजर धरती पर, 
करने इक प्रयास आया हूँ !
मानवता को अर्ध्य चढ़ाने , निश्छल जलधारा लाया हूँ !

सरस्वती की धार, न जाने
कब से धरती छोड़ गयी थी !

माँ शारदा, ऋचाएँ देकर 
कब से, रिश्ते तोड़ गयी थीं !
ध्यान,ज्ञान,गुरु मर्यादा का
शिष्यों ने रिश्ता ही तोड़ा !
कलियुग सर पे नाच नाच के

तोड़ रहा, हर युग का जोड़ा !
कविता के संक्रमण काल में , 
चेतन ध्रुवतारा लाया हूँ !
जनमानस को झंकृत करने अभिनव इकतारा लाया हूँ !

हिंदी जर्जर, भूखी प्यासी
निर्बल गर्दन में फंदा है !
कोई नहीं पालता इसको
कचरा खा खाकर ज़िंदा है !
कर्णधार हिंदी के, कब से
मदिरा की मस्ती में भूले !
साक़ी औ स्कॉच संग ले 

शुभ्र सुभाषित माँ को भूले
इन डगमग चरणों के सम्मुख, 
विद्रोही नारा लाया हूँ !
भूखी प्यासी सिसक रही, 
अभिव्यक्ति को चारा लाया हूँ !

राजनीति के पैर दबाकर
बड़े बड़े पदभार मिल गए !
गा बिरुदावलि महाबली की
हिंदी के,सरदार बन  गए !
लालकिले से भांड गवैय्ये
भी भाषा की शान बन गए
श्रीफल, अंगवस्त्र, धन से
सम्मान विदेशों में करवाते,
धूर्त शिष्य, मक्कार गुरू के 
द्वारे, नक्कारा लाया हूँ !
दम तोड़ते काव्य सागर में, जल सहस्त्र धारा लाया हूँ !

जाते जाते, काव्यजगत में
कुछ तो रस बरसा जाऊंगा
संवेदना ,प्रीति से भरकर
निर्मल मधुघट, दे जाऊंगा !

कविता झरती रहे निरन्तर 
चेतन,मानवयुग कहलाये
कला,संस्कृति,त्याग धूर्तता 
मानव मन श्रृंगार बनाएं !
सुप्त ह्रदय स्पंदित करने, 
काव्यसुधा प्याला लाया हूँ !
पीकर नफरत त्याग , हँसे मन , वह अमृतधारा लाया हूँ !

मुझे पता है शक्की युग में
चोरों का सरदार कहोगे !
ज्ञात मुझे है, चढ़े मुखौटों
में, इक तीरंदाज़ कहोगे !
बेईमानों की दुनिया में हम
बदकिस्मत जन्म लिए हैं !
इसीलिए कर्तव्य मानकर
मरते दम तक शपथ लिए हैं

हिंदी की दयनीय दशा का,
मातम दिखलाने आया हूँ !
जिसको तुम संभाल न पाए, अक्षयजल खारा लाया हूँ !

Monday, January 4, 2016

शायर बनकर यहाँ गवैये आये हैं - सतीश सक्सेना

काव्यमंच पर आज मसखरे छाये हैं !
शायर बनकर यहाँ , गवैये आये हैं !

पैर दबा, कवि मंचों के अध्यक्ष बने,
आँख नचाके,काव्य सुनाने आये हैं !

रजवाड़ों से,आत्मकथाओं के बदले 
डॉक्ट्रेट , मालिश पुराण में पाये हैं !

पूंछ हिलायी लेट लेट के,तब जाकर 
कितने जोकर, पद्म श्री कहलाये हैं !

अदब, मान मर्यादा जाने कहाँ गयी,
ग़ज़ल मंच पर,लहरा लहरा गाये हैं !

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढ़ेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी लेट लेट कर 
सुरा सुंदरी, भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , 
हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं, कैसे कैसे लोभी गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी
कैसे  बनें यशस्वी गीत  ?
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना, पुरस्कार हथियाते गीत !


इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में 
साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिड़कें  दारु, मोहित होते मेरे गीत !

चारण, भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, 
खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Sunday, August 16, 2015

बेशर्म गज़ल - सतीश सक्सेना

आजकल हिंदी में चोरों की बहुतायत है और अधिकतर चोर हैं जो दूसरों की शैली और रदीफ़ बेशर्मी के साथ कापी करते हैं ! मज़ेदार बात यह है कि उनका विरोध करने कोई आगे नहीं आ पाता क्योंकि ऐसा उन्होंने भी किया है अतः उनके पास इसे सही ठहराने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता ! सो हिंदी में ग़ज़ल लिखने वालों की धूम है ,और तालियां बजाने वालों की कोई कमी नहीं ! सो सोंचा आज हम भी हाथ फिरा लें दुष्यंत कुमार पर  …। 

माल बढ़िया लगे तो मुफ्त उड़ा लो यारो 
कौन मेहनत करे,हराम की खा लो यारो !

इसे लिख के कोई दुष्यंत मर गया यारो  !
उसकी शैली से ज़रा नाम कमा लो यारो ! 

बड़े बड़ों ने इस रदीफ़ का उपयोग किया
सबको अपनी ही तरह चोर बता लो यारो !

ग़ज़ल रदीफ़ तो , सब ने ही बनाये ऐसे ,
मीर ग़ालिब पे भी इलज़ाम लगा लो यारो ! 

बुज़दिलों जाहिलों में नाम कमाओ जमके 
बेहया आँख से , इक  बूँद गिरा लो यारो !

Saturday, June 27, 2015

डूबती हिंदी बिचारी और हम बेबस खड़े - सतीश सक्सेना

भाषा सहोदरी पत्रिका के लिए हिंदी पर लिखने का अनुरोध पाकर उलझन में हूँ,  मैं हिंदी विद्वान नहीं हूँ और न इस कष्टकारक और नीरस विषय पर लिखने में सिद्धहस्त मगर आपका अनुरोध टाला भी नहीं जा सकता अतः एक कवि होने के नाते हिंदी की दुर्दशा और कारणों का विश्लेषण अपनी अल्प बुद्धि अनुसार करना चाहूँगा !
आज कवि और साहित्यकार धन ,नाम और पुरस्कारों के लालच में भांड होकर रह गए हैं , प्रभावी लोगों के पैर चाटते हुए कवि और लेखक अब प्यार ,स्नेह,समाज सुधार पर नहीं लिखते, बल्कि धन कमाने के लिए बेहद आवश्यक अपने प्रभामंडल विस्तार के लिए, अख़बारों पत्रिकाओं में छपने के लिए लिखते हैं ! 
आज के समय में साहित्यकारों को समझना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनकी  भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः सामान्य जन से उनकी रचना बहुत दूर चली गयी है , आज उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ हैं और वे सिर्फ महत्वपूर्ण पदों पर बैठे, हिंदी के मशहूर टटपूंजी ठाकुरों के, आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
प्रभावी भाव अभिव्यक्ति के लिए रचनाकार की ईमानदारी व मधुर कोमल भावनाएं सर्वाधिक प्रभावी भूमिका निभाती हैं , जो बनावटी रचनाकारों में दूर दूर तक नहीं मिलतीं अतः उनके सृजन में व्यावसायिक छाप और नीरसता नज़र आना निश्चित है ! हिंदी के ज़रिये नाम व धन कमाने की होड़ में आगे पंहुचने का संक्षिप्त रास्ता, सिर्फ हिंदी मठाधीशों और अधिकारियों  के घर से होकर जाता है और  चाटुकारिता कर्म आसानी से उसकी समझ में आ जाता है !  उसके बाद शुरू होता है, जोड़तोड़ और पैर दबा कर उच्च पद पर बैठे एक सड़ियल व्यक्ति के साहित्य कर्म की तारीफों का पुल बाँधना, इस क्रम में  उसे हिंदी साहित्य सम्राट की पदवी देने वालों की लाइन लग जाती है ! विडम्बना यह है कि इन मठाधीशों के दरवाजे पर कुछ सम्मानित हिंदी विद्वान भी शर्म से सर झुकाये, बेमन ही सही पर घुटनों के बल बैठे नज़र आते हैं !
चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !
काम इतना सा है यारों,जब भी नेताजी दिखें, 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !
कवियों का हाल और भी बुरा है,बेचारे हिंदी रचनाकारों की भीड़ में अपनी पहचान के लिए अपने नाम से पहले कवि लिख कर मंचों पर भावभंगिमाओं और फूहड़ चुटकुलों के साथ घटिया दर्शकों से तालियां बजवाकर अपने आप को कवि बनाये रखने की आवश्यक मानसिक खुराक पाता रहता है ! किसी गंभीर किस्म के व्यक्ति को आजकल के कवि मंचों को झेलना आसान नहीं ये सिर्फ शराबी  रिक्शे वालों और नौटंकी देखने वाली मानसिकता का सस्ता मनोरंजन मात्र रह गए हैं ! 
इंटरनेट ने लेखन को बेहद आसान और सस्ता बना दिया है , मगर इसके दुर्गुण भी कम नहीं ! हिंदी के धुरंधर विद्वान भी दूसरों की रचनाओं में भाव और शैली खोजते रहते हैं , इन उस्ताद विद्वानों के लिए, कम प्रसिद्द मगर प्रभावीशाली रचनाकारों की शैली , शब्दों और संवेदनशील अभिव्यक्ति की चोरी करना बेहद आसान है, सिर्फ थोड़ा सा बदलाव कर बड़ी आसानी से प्रभावशाली रचना बन जाती है और इनके मशहूर नाम के साथ यह बेईमान रचना बहुत सारे अखबार और पत्रिकाओं में आसानी से स्थान पा 
जाती है !  वास्तविक लेखक को पता चल जाने पर भी वह इस उस्ताद का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और न कोई आसानी से उस पर भरोसा करता है , थोड़ा रोने पीटने के बाद वह बेचारा चुप बैठ जाता है और हिंदी उस्तादों का कार्य, इस बेधड़क चौर्यकर्म के साथ चलता रहता है !
सहज रचनाकार किसी की शैली का दास नहीं हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि रचना सोंच कर नहीं की जाती उसका अपना प्रवाह है जो भावनाओं में डूबने पर अपने आप बहता है, अगर उसमें अतिरिक्त बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! 
तुलसी,मीरा,रसखान,  कालिदास और कबीर ने किसी नियम का पालन नहीं किया था और न उसके पीछे कोई लालसा थी  ! आज भी, उनके कुछ संवेदनशील शिष्य यहाँ वहां बिखरे हैं जिनको कोई नहीं जानता हाँ उनकी यह रचनाएं, खादी पहने मोटी तोंदों वाले प्रभावशाली हिंदी गिद्धों की दृष्टि की शिकार अक्सर होती रहती है ! और हिंदी इन चुराई हुई मिश्रित रचनाओं से फल फूल रही है यह और बात है कि इन गिद्धों के नोचने से नए प्रभावशाली रचनाकार उभर नहीं पा रहे ! 
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
अंत में यही कि भाषा बेहद मधुर है बशर्ते वह सही सृजन के माध्यम से निकले , वर्तमान में हिंदी की दशा बेहद दयनीय है , अनाथ हिंदी को जब तक एक माई बाप नहीं मिलता यह समाज का सम्मान नहीं ले पायेगी ! इसकी मधुरता तभी तक है जब तक हिंदी को प्यार करने वाले रचनाकार उसे सहारा देते रहेंगे !
कड़वाहट कैसे कर पाए, अनुवाद गीत भाषाओँ का  !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम  भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या समझे जीवन स्नेहिल रंगों को,
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने   
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,आचरण सरल भाषाओं का !
सिर्फ एक आशा है कि इंटरनेट ने बहुत सारे लेखकों को सुविधा दी है लिखने की , मुझे उम्मीद है कि इन रचनाकारों में से कई बेहद प्रभावी सिद्ध होंगे हाँ हिंदी धुरंधरों के कारण उनकी पहचान में भले बरसों लगे क्योंकि लेखन अमर है, सो वह कभी न कभी पढ़ा अवश्य जाएगा बस यह समाज के लिए हितकारी रहे यही दुआ है !
जहाँ तक मेरी बात है मैंने लगभग ५०० रचनाएं की हैं उनमें कविता और हिंदी ग़ज़ल लगभग २५० होंगी बाकी सब लेख हैं जिनमें अधिकतर समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं ! 
भारत सरकार से अवकाश प्राप्त अधिकारी , नॉएडा में निवास 
http://satish-saxena.blogspot.com/
http://satishsaxena.blogspot.com
satish1954@gmail.com

Thursday, March 26, 2015

व्यास का स्मरण कर ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ - सतीश सक्सेना

सहज निर्मल मुस्कराहट से धरा गुलज़ार लिख दूँ !
भव्य मंगल दायिनी को, ईश का आभार लिख दूँ !

एक दिन उन्मुक्त मन से पास आकर बैठ जाओ
और बोलो नाम तेरे, स्वर्ग का अधिकार लिख दूँ !

काव्य अंतर्मन हिला दे, शुष्क मानव भावना में ,
समर्पण संभावना को प्यार का उपहार लिख दूँ !

मुक्त निर्झर सी हंसी पर, गर्व पौरुष का मिटा दूँ ,
तुम कहो तो मानिनी, अतृप्त की मनुहार लिख दूँ !

यदि तुम्हें  विश्वास हो, अनुराग की गहराइयों का !
व्यास का स्मरण कर, ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ !

Sunday, March 1, 2015

आओ छींटें मारे, रंग के, बुरा न मानो होली है ! - सतीश सक्सेना

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !

राजनीति के '
मक्कारों ने,
डट कर खेली 
होली है ! 
आओ छींटें मारे रंग के ,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 
चेला शक्कर
गुरु के गुरु  
पटाये जाकर  !
गुरुभाई से 
राज पूंछकर , 
गुरु की गैया,
दुह ली है !
जहाँ मिला मौका देवर ने जम के खेली होली है ! 

घूंघट हटा के 
पैग बनाती ! 
हिंदी खुश हो
नाम कमाती !
पंत मैथिली 
सम्मुख इसके, 
अक्सर भरते 
पानी है !
व्हिस्की और कबाब ने कैसे,हंसके खेली होली है !

जितना  चाहे 
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो

एक पंक्ति में,
दो शब्दों की, 
माला लगती 
सोणी है !
कवि बैठे हैं माथा पकडे , कविता कैसी होली  है !


कापी कर ले ,
जुगत भिडाले !  
लेखक बनकर   
नाम कमा  ले !

हिंदी में 
हाइकू   
लिख मारा,
शिकी की 
गागर फोड़ी है !
गीत छंद की बात भी अब तो,बड़ी पुरानी होली है !  

अधर्म करके  
धर्म सिखाते  
धन पाने के 

कर्म सिखाते 
नज़र बचाके,
कैसे उसने,
दूध में गोली, 
घोली है !
खद्दर पहन के नेताओं ने, देश में खेली होली है !

ब्लू लेवल, 

की बोतल आयी !
नई कार ,
बीबी को भायी !
बाबू जी का

 टूटा चश्मा,
माँ  की चप्पल 
आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू देखे , कैसी गीली होली है !


Thursday, February 5, 2015

हिन्दु मुसलमानों से , अंशदान चाहिए - सतीश सक्सेना

समस्त राजनीति, स्व 
समृद्धि हेतु बिक चुकी 
समस्त बुद्धि भीड़ में 
दिवालिया सी हो चुकी
देश विपत काल में 
प्रवंचकों से मुक्ति हेतु 
हिन्दु मुसलमानों से , 
अंशदान  चाहिए !
शुद्ध, सत्यनिष्ठ, मुक्त  आसमान चाहिए !

चाटुकार भांड यहाँ 
राष्ट्र भक्त बन गए !
देश के दलाल सब 
खैरख्वाह बन गए !
चोर बेईमान सब, 
ध्वजा उठा के चल पड़े !
तालिबानी  देश को , 
कबीर  ज्ञान चाहिए !
अपाहिजों के देश में, कोचवान  चाहिए !

चेतना कहाँ से आये 
जातियों के, देश में 
बुरी तरह से बंट  चुके 
विभाजितों के देश में 
प्यार की जगह, जमीं 
पै नफरतों को पालते !
भूखे पेट वोटरों को 
आत्मज्ञान चाहिए  !
सड़ी गली परम्परा में , अग्निदान चाहिए !

अकर्मण्य बस्तियां 
शराब के प्रभाव में !
खनखनातीं थैलियां 
चुनाव के प्रवाह में ! 
बस्तियों के जोश में,
उमंग नयी आ गयी !
शिथिल प्रसुप्त देश को 
नयी अज़ान चाहिए !
मानसिक अपंग देश , बोध ज्ञान चाहिए !

सही समय दुरुस्त पा  
निरक्षरों को लूटते !
विदेशियों से जो बचा 
ये राजभक्त लूटते !
दाढ़ियों को मंत्रमुग्ध , 
मूर्ख तंत्र, सुन रहा !
समग्र मूर्खशक्ति को, 
विचारवान चाहिए !
निपट गुलाम देश को, चैतन्यवान चाहिए !

Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कड़वाहट कैसे कर पाए, अनुवाद गीत भाषाओं  का ! 
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम भाषाओं का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें, जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

ईर्ष्यालु समझ पाएगा क्या, जीवन स्नेहिल रंगों को 
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनिया को कुटिलों ने
अनुभूति समर्पण न जाने अभिमान, हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावना शून्य कैसे समझें, आचरण सरल भाषाओं का !

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

धूर्त काल के अन्धकार में ,  
हम प्रकाश ले आने वाले 

तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब तुम उस्तादों की 
जीवन में परवाह,  रही है !
रचनाएं, कवियों की जग में, इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, सांसें भूल गये हो !
चंद दिनों की मस्ती में ही ,
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को पाठ पढ़ाने 
चेष्टा बड़ी , अदाह रही है !
तुम पर कलम उठाने , अपनी इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्म विभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, 
कोई मीरा, रंगदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे, हुक्का भरकर 
तितली फूल फूल इठलाकर  
करती खूब धमाल रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ की ? दुनिया में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , 
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित, चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बल पर 
खुद को कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों 
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने कर ली, उतनी ही तनख्वाह रही है !

Sunday, June 15, 2014

अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना

ओठों पर आ जाए जो उस गीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उस संगीत की बातें करते हैं !

अम्मा दादी नानी बाबा से  हम चलना सीखे हैं ,
स्नेही आँचल में कटे , अतीत की बातें करते हैं !

जीवन भर तस्वीर संजोये , लेकिन ढूंढ न पाए हैं,
अपने सपनों में आये उस मीत की बातें करते हैं !

हमको कौन शाबाशी देगा , सन्नाटों में रहते  हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से, प्रीत की बातें करते हैं !

कंगूरों से  रही लड़ाई ,  इंसानों से प्यार किया !
ऐसे बुरे समय में भी हम, जीत की बातें करते हैं ! 

Thursday, March 13, 2014

सोने जैसे दिल वाले ही कविता सुनने आयेंगे -सतीश सक्सेना

बेतुल में विवेक जी के आवाहन पर , पहली बार कविमंच पर गया था एवं यह जानकार अभिभूत था कि विवेक जी को यह भरोसा था कि कवि और कविता समाज को बदलने की सामर्थ्य रखती है अतः आवश्यकता है कि कवि की मर्यादा को वह सम्मान दिया जाए जिसके वह योग्य है ! 

इस रचना के प्रेरणा श्रोत विवेक जी हैं अतः यह रचना उनकी  विचारधारा आनंद ही आनंद को समर्पित है …. 

निर्मल औ निष्कपट संत ही कविता सुनने आएंगे  
प्रेमी, ज्ञानवान, अनुरागी, कवि से मिलने आएंगे !

निष्ठुर मन वाले गीतों के साथ बैठ क्या पाएंगे !
केवल शुद्ध विचारों वाले, प्रीति सीखने आएंगे !

सरस्वती का ऋण कवियों पर,गीतदान दे जाएंगे
आस्था और श्रद्धा का घर से अर्थ सीखने आएंगे !

भुला व्यथा,प्रतिबंध,समय को संवेदना सिखायेंगे !
गीतों के माध्यम से मानव ,प्यार सीखने आएंगे !

बहुत शीघ्र कविमंच देश में,खोया गौरव पायेंगे !
व्याकुल मानव,राहत पाने, गीत खोजने आएंगे !

Tuesday, March 11, 2014

कवि दिवस ( ९ मार्च ) और विवेक जी के संकल्प - सतीश सक्सेना

बेतुल में कविदिवस 
मैं ८० के दशक से कवितायें लिख रहा हूँ मगर आज तक उन्हें किसी मंच , कवि गोष्ठी अथवा मित्रों के समूह में कभी नहीं सुनाया ! १९७७ से ट्रेड यूनियन मूवमेंट लीडर शिप में रहा हूँ तथा मंच से सैकड़ों बार भीड़ में, भाषण देने के कारण, पब्लिक सम्बोधन में कभी कोई झिझक नहीं रही ! मेरे लिए यह एक सामान्य बात कहने की, प्रक्रिया भर है फिर भी मैं आत्म प्रचार से चिढ़ता रहा हूँ , परिणाम स्वरुप मेरे साथ बरसों काम करने वाले मित्र भी यह नहीं जानते कि मैं कविता लेखन करता हूँ ! ब्लॉग जगत में मेरे आने का कारण, यश अर्जन न होकर मेरी कविताओं और लेखों को एक जगह कलमबद्ध करना मात्र रहा है ताकि भविष्य में, समाज के लिए उपयोगी मानी जाएँ तो वे लोगों के काम आ जाएँ !

मगर जब विवेक जी के विचारों के लिए बने संगठन, आनंद ही आनंद, के मध्य भारत के संयोजक विश्वास जी ने जब मुझे बेतुल आने का निमंत्रण दिया तो मैं प्रारम्भिक झिझक के बाद भी, मना नहीं कर सका , आश्चर्य हुआ
महात्मा विवेक जी 
कि वे मेरी अधिकाँश कवितायें पहले ही ब्लॉग के माध्यम से पढ़ चुके थे ! सामजिक पृष्ठभूमि पर लिखी कविताओं के कारण ही, वे तथा आनंद ही आनंद से जुड़े लोग, मुझसे परिचित थे ! बेतुल के कविसम्मेलन में मुझे प्रभावशाली  कवि मदन मोहन समर,मनवीर मधुर,ज्योति खरे,संतोष त्रिवेदी,शरद जैसवाल ,दीपक अग्रवाल, शुभम शर्मा के साथ मंच पर बैठने का मान मिला ! 

बहुत कम लोग जानते होंगे, स्वयं प्रचार के अभाव में, साधारण से दिखने वाले इस युवक ( विवेक जी ) ने, अपनी उच्च शिक्षा एवं अन्तराष्ट्रीय जीविका को त्याग कर , इस देश की संस्कृति पुनरुत्थान का , जो संकल्प लिया है , वह अद्वितीय है ! त्याग की इस अनुपम मिसाल युक्त आकर्षक व्यक्तित्व की वाणी जब जब मैंने सुनी तब तब उस सौम्य व् मीठी वाणी  में मुझे विवेक जी नहीं साक्षात विवेकानंद सुनाई पड़ रहे थे ! आकर्षक एवं मोहक व्यक्तित्व के मालिक विवेक से जब मैंने उनके विवाह के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था कि विवाह तो हो चुका इन संकल्पों से ! 


कवियों और कविता के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है कि बरसों से सुप्त पड़ी कविता भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में एक नयी रोशनी ला सकती है सो कवियों को जगाना होगा एवं इस कार्य का आगाज़ पूरे देश में पहली बार कवि दिवस ( ९ मार्च ) की उद्घोषणा करते हुए किया है ! भविष्य में विवेक जी की योजना इन कवि सम्मेलनों को देश के अन्य हिस्सों तथा विदेशों में ले जाने की है !

उनके द्वारा किया गए कार्यों में से, मुझे सबसे अधिक आकर्षित, वृद्ध सहायता कार्यक्रम ने किया है जिसमें वे देश में वृद्धों के लिए एक डाटा बैंक बनवा रहे हैं तथा उन लोगों की मदद के लिए एक लोकल सर्कल होगा जो हर क्षण वृद्धों की सहायता में  तत्पर रहेगा !

परिवार , एवं समस्त भौतिक सुखों का त्याग इतनी कम उम्र में आसान नहीं होता ! इस अशिक्षित देश में, एक नयी अध्यात्मिक सांस्कृतिक लौ प्रज्ज्वलन का प्रयत्न करते, इस महात्मा का मैं अभिवादन करता हूँ !

Saturday, February 1, 2014

लानत है, इस संकीर्ण सोंच के लिए - सतीश सक्सेना

कल इसी देश के एक बच्चे को पीट पीट कर राजधानी में मार दिया गया जबकि वह अपना प्रान्त और भाषा छोड़ कर सबसे विकसित शहर दिल्ली में शिक्षा लेने आया था ! सुदूर उत्तर पूर्व क्षेत्र के, हमारे यह सीधे साधे देशवासी, भारत वासी होने का क्या अभिमान करें ?

जाति, धर्म, भाषा और प्रांतीयता में आकंठ डूबे, विद्वता का दम भरते, हम संकीर्ण भारतीय, मरते दम तक अपने अपने झंडे उठाये, आपस में एक दुसरे को भला बुरा कहते रहेंगे बस यही हमारी पहचान है ! इस पूरे देश को, १९४७ से पूर्व ३०० - ४०० राज्यों में बाँट देना चाहिए और हम उसी छुद्र अभिमान के योग्य हैं !     

हमारी संकुचित अशिक्षित मनस्थिति, हज़ारों किलोमीटर दूर फैले, हमारे ही विभिन्न रीतिरिवाज और संस्कृतियों को अपनाने में बुरी तरह फेल हुई है ! बिहारी, मराठी, गुजराती, मद्रासी मानसिकता में साँसे भरते हम संकीर्ण देसी लोग, विश्व में कहीं रहने योग्य नहीं हैं !       

यह देश अब एक विकलांग सोंच  का मालिक है जहाँ औरों से घृणा के अलावा और कुछ नहीं है  हम भारतीयों  के पास, शायद विश्व के सबसे संकीर्णमना देशों में से एक हैं हम !

यह देश सभ्य लोगों के रहने योग्य नहीं !
Ref : http://indianexpress.com/article/cities/delhi/delhi-arunachal-boy-beaten-to-death-by-shopkeepers-in-lajpat-nagar-say-reports/
Related Posts Plugin for Blogger,