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Saturday, July 9, 2022

सहज मुस्कान , मुक्त हंसी, ही जीवन हैं -सतीश सक्सेना

फेसबुक पर मेरे तमाम दोस्त अपनी 10 वर्ष पुरानी फोटो लगाए रहते हैं , कई मित्र यह जानबूझकर नहीं करते बल्कि उन्हें ऐसा करना अच्छा लगता है सो वे अपने मित्रों को अपना वही आकर्षक रूप दिखाना चाहते हैं जो उनका बेहतरीन था ! मुझे लगता है कि समय के बदलाव चाहे वह समाज में आये अथवा चेहरे पर उन्हें स्वीकार करना चाहिए , अधिक उम्र लोग भी कई बार बेहद आकर्षक लगते हैं , मेरे कई हमउम्र 
महिला एवं पुरुष  फेसबुक मित्र , मुझे बहुत आकर्षक एवं गरिमामय लगते हैं  इतने कि उनकी तारीफ करने का मन करता है !

मेरा विश्वास है कि आकर्षक लगने के लिए चेहरा मोहरा कोई ख़ास रोल नहीं निभाता बल्कि उस चेहरे पर आये भाव , वस्त्र एवं बैकग्राउंड का रोल उतना ही महत्वपूर्ण रहता है ! चेहरे पर आयी उस व्यक्ति की एक सहज और गैर बनावटी मुस्कान किसी का भी दिल जीतने के लिए पर्याप्त है , चेहरे का रंग और बनावट चाहे कुछ भी क्यों न हो अफ़सोस यह है कि मुस्कान में सहजता आजकल दुर्लभ हो गयी है , अपने आसपास के तमाम तनाव के कारण लोग उन्मुक्त हंसी छोड़िये मुस्कराना भी भूल गए हैं !

मैं मूलतः एक कवि व्यक्तित्व हूँ , फोटोग्राफर होने के कारण हँसते खिले चेहरे बहुत अच्छे लगते हैं और खुद भी अपनी हंसी और मुस्कान को कभी थकने नहीं देता जबकि समय के साथ कई मित्रों की मुस्कान फीकी हो गयी या गायब हो चुकी है ! 

अक्सर लोगों की विपरीत परिस्थितियां उनके चेहरे पर आयी उदासी का कारण होती हैं जबकि उन्हें यह तथ्य आत्मसात कर लेना चाहिए कि खुशियां उत्पन्न करने की क्षमता उनके अपने शरीर में हमेशा होती है केवल उस वक्त की सोच हंसती हुई होनी चाहिए कष्ट खुद ब खुद भाग जाएंगे क्योंकि वह एक अस्थायी मानसिक अवस्था है ! अफ़सोस कि हम बहुत कम समय इस पर देते हैं !

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि आप 67+ उम्र में दौड़ कैसे पाते हो , मेरा जवाब संक्षिप्त है क्यों कि मेरा दौड़ने का दृढ़ निश्चय , मेरी प्रफुल्ल मानसिक अवस्था लेती है और इस अवस्था को मैं हमेशा ज़िंदा रखता हूँ !
मेरा अनुरोध है कि अपनी बच्चों जैसी हंसी वापस लाइए और बीमारियां भगाइये !

Saturday, September 25, 2021

पता नहीं क्यों खाते पीते, ज्ञान की बातें, होती हैं -सतीश सक्सेना

डी पी एस ग्रेटर नॉएडा के, एक क्षात्र, रानू , जो कि, पढने लिखने में बहुत अच्छे होने के साथ साथ, खाने पीने में, भी मस्त हैं, के मन की बातें यहाँ दे रहा हूँ ! जब भी हम सब साथ साथ , खाने पर एक साथ बैठते तो बच्चों से उनके भविष्य की चर्चा तथा क्लास में उनकी पोजीशन की चर्चा जरूर होती ! स्वादिष्ट खाने के समय , पढाई की चर्चा , उनके मुहं का टेस्ट बदलने के लिए काफ़ी होती है ! 

मन को काबू कर अंग्रेजी 
ग्रामर लेकर , बैठा हूँ  !
जैसे तैसे रसगुल्लों से , 
ध्यान हटाए , बैठा हूँ !
मगर ध्यान में बार बार, 
ही आतिशबाजी होती है !
अलजब्रा के ही खिलाफ  
क्यों नारे बाजी होती है !
नाना,पापा की बातें सुन ,
नींद सी आने लगती है !
इतने बढ़िया मौसम में,एक्जाम की बातें,होती हैं !


समझ नहीं आते बच्चों के 
कष्ट , समस्याएं भारी !
पढ़ते, अक्षर नजर न आएं 
दिखे किचन की अलमारी ! 
टीवी पर कार्टून, यहाँ 
भूगोल की बाते होती हैं 
खाने पीने के मौसम मे, 
दुःख की बातें, होती हैं !
ग्रेट खली,इंग्लिश ग्रामर, 
में हर दम कुश्ती होती है !
जाने क्यों घर में हर मौके,क्लास की बातें होती हैं ?

फीस बढ़ा ले भले प्रिंसिपल 
पर बच्चों की क्लासों में !
चॉकलेट लडडू फ्री होंगे 
आने वाले , सालों में !
कठिन गणित का प्रश्न क्लास
में, मैडम जब समझाती हैं !
उसी समय क्यों याद हमारे,
मीठी बातें , आती हैं  !
बिना जलेबी और समोसा 
कैसे मन भी पढ़ पाए
सारे अक्षर गड्मड होते , खाली आंतें रोती  हैं !

हाथ में बल्ला लेकर जब मैं
याद सचिन को करता हूँ,
ध्यान लगा के उस हीरो का 
सीधा छक्का जड़ता हूँ !
मगर हमेशा अगले पल
ये खुशियां भी खो जाती हैं !
पता नहीं ,  जब  ध्यान 
हमारे कृष्णा मैडम आतीं हैं !
ऐसे मस्ती के मौके, क्यों  
याद सजा की आती है !
अक्सर घर में खाते पीते, ज्ञान  की बातें, होती हैं !

Tuesday, February 16, 2021

45 वर्ष की उम्र में नीरसता क्यों -सतीश सक्सेना

उम्र बढ़ने के साथ नीरसता आनी ही है, मैं ऐसा नहीं मानता !  नीरसता की शुरुआत, जीवन में नयी रुचियों और अपनी इच्छाओं का गला घोटने से होती है और इसके पीछे के कारणों में प्रमुख , बढ़ी उम्र में सामाजिक वर्जनाएं , खुल कर हंसने में भय, अकेलेपन के
कारण आये आलस्य जनित बीमारियों द्वारा शरीर का अशक्त होना अधिक है ! हमारे समाज में, "सब लोग क्या कहेंगे" के दबाव से निकलना, डरपोक और भयभीत लोगों के लिए असम्भव बन जाता है ! 

समाज की नजर में, उम्र अधिक होने का अर्थ चुस्त और जीवंत डिज़ाइन के कपडे, मस्त उन्मुक्त हंसी, मनचाहे मित्रों और शौक को त्यागना होता है , उनके हिसाब से अधिक उम्र में ऐसा करना बेहूदगी होता है और अधेड़ अवस्था में तो यह अशोभनीय,  खासतौर पर तब यह और भी आवश्यक हो जाता है जब उनके बच्चे विवाह योग्य हो जाते हों ! सामाजिक परिवेश उन्हें मजबूर करता है कि वे बढ़ती उम्र में चुस्त दुरुस्त कपडे छोड़कर ढीले वाले कपडे , चप्पल और मोटा चश्मा लगाकर अखबार पढ़ें और पैरों पर हाथ लगाने वालों को हाथ उठाकर , धीमी आवाज में आशीर्वाद और वरदान देना शुरू करें और सबके मध्य ज्यादा बात न करें !

अधिकतर हमारे यहाँ जवान बच्चों की माँ और बहू /दामाद वाले पुरुषों को बूढ़ा मान लिया जाता है और इस नाते 45 वर्ष की भरपूर जवानी में औरतों को शालीन और 55 पार मजबूत पुरुषों को भी पापा जी बनना पड़ता है ! हर प्रकार की मित्रता चाहे वह कितनी शुद्ध और आवश्यक क्यों न हो , उनके लिए अशोभनीय बन जाती है ! उन्मुक्त हँसी का असमय छिन जाना उनके शरीर को असमय क्षरण की गारंटी देने में सहायक सिद्ध होता है !  

महिलाओं का और भी बुरा हाल है , उनकी युवावस्था पापा मम्मी की तीक्ष्ण नज़रों में कटती है और विवाह पश्चात पतिदेव की वर्जनाओं और सुरक्षा में, 40-45 होते होते बच्चे समझाने लगते हैं कि माँ किस साड़ी में अधिक ग्रेसफुल दिखती हैं उनके लिए माँ का चहकना ,हंसना अजीब लगने लगता है , खुलकर हंसने के लिए यह वयस्क लड़कियां जीवन भर तरसती हैं उनके पास एक ही जगह होती है जहाँ वे ठठ्ठा मारकर स्कूली दिनों जैसा हंस पाए जिस जगह उनके परिवार का कोई व्यक्ति दूर दूर तक न हो और वे ऐसा ही करती भी हैं बशर्ते वह क्षण किसी को पता नहीं चलने चाहिए !

हर घर में अपनी भूलों या गलतियों को छिपाना सबसे पहले सिखाया जाता है , बच्चों को कहा जाता है कि अपने घर की यह बात किसी और को नहीं बतानी है ! कोई भी रुका काम कराने का तरीका रिश्वत देना है चाहे वह सरकारी काम हो अथवा मंदिर , भगवान के दर्शन करने को गरीबों और रईसों के रास्ते अलग है , अधिक पैसा दो और साईं बाबा के दर्शन करें अधिक चढ़ावा देंगे तो फल भी

अधिक मिलेगा , दयनीय हाल बना दिया है हमने अपने समाज का और इसके जिम्मेदार हम अधेड़ावस्था के लोग ही हैं जो भुक्तभोगी होने के बावजूद, अपने ज़िंदा रहते, व्यवस्था परिवर्तन की कोशिश करते, युवाओं का मजाक बनाते हैं और उन्हें चोरी करने पर मजबूर करते हैं सो झूठ और चोरी करना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन गया है हम एक बीमार अपराधी समाज का अंग बन कर रह रहे हैं और ऐसे ही मरना हमारी नियति है !

विश्व में विकसित देशों के मुकाबले हम कहीं नहीं ठहरते, वहां क्राइम और भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं है , वे ईमानदार हैं , उम्रदराज हैं उनमें बीमारियों से कराहते लोग न के बराबर हैं , उनका वातावरण, हवा, शुद्ध और पीने के लिए बहती नदियों में स्वच्छ पानी उपलब्ध है उनके पास बड़ी खुली सड़कें और पक्की बस्तियां सैकड़ों वर्षों से हैं ,उनके यहाँ सामाजिक वर्जनाएं न के बराबर हैं , वहां राह चलती लड़कियों को कोई नहीं घूरता , अपने अभिन्न मित्रों के साथ , उन्मुक्त रूप से हंसने के लिए वे परिवार की और से भी मुक्त हैं और वे भरपूर खुशहाल जिंदगी गुजारते हैं ! यूरोपीय देशों में मैंने वाइन / बियर खरीदते अक्सर वृद्धाओं को देखा है वहीँ हमारे देश में ऐसा देखना पाप या अजूबा होता है और भीड़ लग जायेगी उनका चेहरा देखने के लिए ! 

अधिकतर महिलाएं और पुरुष बढ़ती हुई अवस्था में इसे घुटन से मुक्ति चाहते हैं , मगर उनकी हिम्मत नहीं है कि वे किसी को अपनी मित्रता का अहसास दिलाएं , मेरी कुछ महिला मित्रों ने इसे स्वीकार भी किया है, वे हंसना चाहती हैं मगर उनकी हिम्मत नहीं कि वे बेड़ियाँ तोड़ सकें यहाँ तक कि शुद्ध मित्रता आवाहन को स्वीकार कर सकें , उनके लिए पारिवारिक संबंधों से इतर, विपरीत सेक्स मित्रता स्वीकारना और हंसना मना है  चाहे वह मित्रता कितनी ही सहज और निश्छल क्यों न हो भयभीत महिलायें ऐसा सोंच भी नहीं सकतीं कि उनकी मित्रता परिवार से इतर हो अन्यथा बदनाम होने की गारंटी पक्की है !


चूँकि अधिकतर अविकसित देशों में, सत्ता पर बैठने वाले पुरानी मानसिकता में डूबे हुए अधेड़ या वृद्ध बैठे हैं जिन्होंने वर्जनाओं की भरमार पूरी उम्र झेली है और वे मानसिक तौर पर इसको तोड़ने में नाकामयाब रहे , नयी पीढ़ी के लिए वे अपने पुराने उसूलों की कानूनी जामा पहनाने में देर नहीं लगाते हैं और भयभीत युवा उन्हें तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते इसी कारण पूरा विश्व दो भागों में विभक्त हो चुका है , अविकसित देश वाले समाज को, विकसित मस्तिष्क वाला समाज बनने में सैकड़ों वर्ष और तकलीफ भरा रास्ता तय करना होगा , पीढ़िया बीत जाएंगी खुलकर हंसना सीखने में , भयमुक्त समाज का नारा लगाएंगे मगर अर्थ समझने में उम्र गुजर जायेगी !
स्वस्थ शरीर को बनाने के लिए उन्मुक्त एवं बनावट मुक्त हंसना बेहद आवश्यक है , और फलस्वरूप स्वस्थ मस्तिष्क का मालिक , हमेशा जवान रह सकता है !

अंत में कुछ पंक्तियाँ पढ़ें ..

सज़ा मिले मानवता का , उपहास बनाने वालों को,
कुछ तो शिक्षा मिले काश, कानून बनाने वालों को !

अगर यकीं होता , मौलाना मरते भरी जवानी में ,
हूरें और शराब मिलेगी , ज़न्नत जाने वालों को !
 


Friday, May 31, 2019

हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना

लगा सब धर्मों का मेला
भीड़ का है रेलम पेला

अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें 
कतारें,  लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !

प्यार की, कष्टों में दरकार
मिले स्पर्श नेह इक साथ 
मुसीबत में शबरी का संग 
लगे परमेश्वर का  दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे 
हर भवन में , ईश्वर न्यारे !
पीठ पर है निर्भय अहसास 
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !
सूफियों का विरक्त संसार 
हमारी दुनिया न्यारी रे !!

मिले शर्तों के बदले राह
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
यहाँ  सारे व्यापारी रे !!

शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पियेंगे सागर तट से ही 
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आये देने विश्वास 
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को 
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे 
पागलों में ही, यारी रे !!

Tuesday, May 7, 2019

क्या जानों सरकार हमारे बारे में -सतीश सक्सेना

कितने  शिष्टाचार , हमारे बारे में !
क्या समझे हो यार हमारे बारे में !

इसीलिये अब, तुमसे दूरी रखते हैं 
दिल न दुखे सरकार,हमारे बारे में !

हमको रोज परिंदे ही बतला जाते 
कितने हाहाकार  , हमारे बारे में !

जो वे चाहें करें फैसला,किस्मत का  
है उनका अधिकार, हमारे बारे में !

मरते दम तक तुम्हें नहीं समझायेंगे 
कितने गलत विचार हमारे बारे में !

Friday, September 14, 2018

जर्मनी से स्पेन, भोजन एवं स्वाद -सतीश सक्सेना

जर्मन लोगों को मैंने अक्सर ट्रेन या बस में शाम ६ बजे के आसपास नेपकिन में दबाये सैंडविच खाते देखा है , और वे यह बेहिचक करते हैं ! वे अक्सर अपना मुख्य भोजन दिन में खाना पसंद करते हैं उनके भोजन में  साबुत अनाज की ब्रेड , चीज़ ,योगर्ट , भुने मीट के स्लाइस एवं ब्रैटवुस्ट नामक पोर्क या बीफ या टर्की के बने सॉसेज होते हैं ! साथ में सलाद टमाटर एवं अचार (gherkins) एक्स्ट्रा स्वाद देते हैं !

यहाँ लोग नाश्ते में यह लोग अधिकतर ब्रेड टोस्ट , ब्रेड रोल जिसमें शहद, मार्मलेड , अंडे एवं हैम, सलामी एवं सॉसेज लेना पसंद करते हैं , जिसके बाद गर्म कॉफी, कोको या चाय पीते हैं ! कॉफी यहाँ चाय से अधिक लोकप्रिय है !

यूरोप में अधिकतर लोग मीट प्रोडक्ट पर निर्भर होते हैं इनके भोजन में किसी न किसी रूप में मीट, उपलब्ध अवश्य होगा सो हमवेजीटेरियन लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है ! जल्दबाजी में ख़रीदे, रेडीमेड पास्ता एवं टू मिनट नूडल्स पहला  चम्मच खाने के बाद ही फेंकने पड़े !


मगर यूरोप में हम वेजिटेरियन लोगों का सहारा, पीता ब्रेड ( ग्रीक रोटी ) होती है जो अकसर यूरोपियन स्टोर में उपलब्ध रहती है , इसे खरीद कर बटर का उपयोग कर अपना देशी परांठा बनाया जा सकता है ! साथ में आलू उबालकर सूखी सब्जी बनाना अधिक मुश्किल काम नहीं , सहारे के लिए स्टोर्स में तरह तरह के योगर्ट ( दही ) उपलब्ध होता है ! 

म्यूनिख बवेरिया स्टेट की राजधानी है जो अपने बियर गार्डन के लिए मशहूर है , जहाँ खुले में बड़े मैदान में अथवा गार्डन में हजारों लोगों के बैठने की व्यवस्था होती है और फ्रेश बियर सर्व की जाती है , देखने में यह एक ऐसा खुला रेस्टॉरेंट लगता है जहाँ लोग इकट्ठे होकर किसी राष्ट्रीय त्यौहार पर एक साथ बियर पीकर, ख़ुशी मना रहे हों ! कुछ मायनों में हमारे देश के एक बड़े ढाबे जैसा माहौल होता है मगर एक विशेषता लिए होता है कि हजारों लोगों में से एक भी इंसान जोर से न बोलता है और न झूमता है !

आप किसी भी जर्मन मार्किट में चले जाएँ सड़क किनारे रेस्टुरेंट के फुटपाथ पर कुर्सियों पर बैठे लोग बियर पीते मिलेंगे मगर एक शालीनता और सभ्यता के साथ बिना किसी शोर शराबे के ! मैंने यहाँ हार्ड ड्रिंक्स, शराब, स्कॉच आदि बहुत
कम लोगों को पीते देखी , 80 प्रतिशत लोग बियर और बचे लोग वाइन का सेवन करते देखे हैं ! अगर आप एक दो दिन को यहाँ आएंगे तो जहाँ नजर डालें फुटपाथ पर पड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों के हाथ में बियर का ग्लास देखेंगे मगर एक भी आदमी शराबी व्यवहार करते नहीं दिखेगा !

हाँ, हम जैसे देसी वेजिटेरियन लोग भी मिलेंगे जिन्हें वहां बियर के साथ, उबले अंडे या नमकीन तो मिलने से रही सो विकल्प के रूप में वेज ब्रेड, ऑलिव्स और चीज़ की तलाश करते हैं ! जर्मन बेकरी सबसे अधिक व्यस्त दुकाने हैं जहाँ विभिन्न स्वाद की देश विदेश की नमकीन एवं मीठे ब्रेड , बिस्किट एवं केक उपलब्ध हैं जिनको खाने से मन नहीं भरता !
एक दिन बेहद भूख लगने पर मैंने बाजार से दो शहद की बिस्कुट जिनका वजन ५० ग्राम होगा फिलाडेल्फिया चीज के साथ खायीं तो भूख ऐसे गायब हुई जैसे भरपूर लंच लिया हो ! लाजवाब क्वालिटी के ऐसे फ़ूड प्रोडक्ट हमारे देश में दुर्लभ हैं , इन प्रोडक्ट के साथ अक्सर लोग सूप, कोकोकोला पीना पसंद करते हैं जिन्हें हमारे देश में देशी व्यापारियों ने त्याज्य घोषित कर दिया गया है !
Swimming in Sea  

कैटालोनिया कोस्ट पर बसे बार्सिलोना का नाम, यूरोप के उन बेहद खूबसूरत शहरों में शामिल होता है जो विश्व के टूरिस्ट नक़्शे में विख्यात हैं ! यह शहर नार्थ स्पेन रीजन में, मेडिटेरेनियन समुद्र तट पर , बसा है तथा अपने विशेष कैटलॉन संस्कृति, गौरव तथा व्यक्तित्व के लिए, एक अलग पहचान रखता है !

कल म्यूनिख से बार्सिलोना, स्पेन पंहुचे थे , एयरपोर्ट से ही 5 दिन का होला बार्सिलोना अनलिमिटेड पास (हेलो बार्सिलोना) ले लिया था, अन्यथा टैक्सी से एयरपोर्ट से शहर अपने अपार्टमेंट तक पंहुचने में ही लगभग 5000 रूपये पड़ जाता ! यह
बार्सिलोना टूरिस्ट  पास दो लोगों का 5000 रूपये का पड़ा और इसके द्वारा मैं पांच दिन तक किसी भी वाहन मेट्रो, ट्रेन , बस और ट्राम से पूरे शहर में कितनी ही यात्रायें करने को स्वतंत्र था ! 

मैं , रुकने के लिए होटल न लेकर, पुराने शहर के बीच प्राइवेट अपार्टमेंट लेना पसंद करता हूँ , इनका रेट लगभग होटल जितना ही पड़ता है मगर , अपना ताला चाबी, प्रायवेसी, अधिक जगह, अपना खुद का किचेन , बाथरूम , और बालकोनी का महत्व इस नयी जगह, संस्कृति के लोगों के बीच रहने की सुविधा मिलने के कारण, इनका महत्व अधिक होता है ! बार्सिलोना में यह अपार्टमेंट एयर बीएनबी के जरिये ऑनलाइन लिया था ! अधिकतर अपार्टमेंट पर पूरा पेमेंट पहले ही देना होता है ! वे इसके बाद आपको दरवाजे के इलेक्ट्रॉनिक बॉक्स का कोड भेजते हैं जिसे द्वार पर डॉयल करने पर बॉक्स ओपन हो जाता है और अंदर आपको चाबी मिलती है जिसके जरिये आप मेन डोर खोल सकते हैं ! 

अंदर आकर सबसे पहले बाथरूम , किचेन एवं बैडरूम का निरीक्षण किया तो पाया टॉवल्स सेट , सोप , चादर , ब्लैंकेट , वाशिंग मशीन , फ्रिज , ओवन , माइक्रोवेव , हॉट प्लेट , कॉफी मशीन, इलेक्ट्रिक प्रेस,  आवश्यक बर्तन आदि के अलावा पांच दिन के लिए, चाय कॉफी के लिए आवश्यक सामान , वर्जिन ओलिव आयल, जूस आदि उपलब्ध था ! सो अन्य मन
मुताबिक सामग्री जुटाने के लिए पहला काम, बाहर मोहल्ले के स्टोर पर जाना और अपनी मन मर्जी की आवश्यक सामान खरीद कर फ्रिज में रखना था !

जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली, स्विट्ज़रलैंड , फ्रांस, स्पेन  सब जगह शहरी सप्लाई का पानी, पीने योग्य माना जाता है मगर स्वाद मीठा नहीं होता, हम भारतीयों को म्युनिसिपल सप्लाई वाटर में, नाले का पानी, मुफ्त में मिक्स होकर मिलने के कारण, हर घर में आर ओ ( रिवर्स ओसमोसिस )लगाना ही पड़ता है जोकि पीने में मीठा होता है मगर यूरोप के घरों में आर ओ कहीं नहीं देखा !  बाजार में बिकने वाला पानी मिनरल वाटर के रूप में उपलब्ध है जो बेहद मंहगा पड़ता है ! RO का नुकसान एक ही है कि वह पीने के पानी से, मानव शरीर के लिए आवश्यक मिनरल्स जैसे कैल्सियम, मैग्निसियम को भी नष्ट कर देता है जो कि हमारे लिए बेहद आवश्यक हैं शुक्र है कि हमारा शरीर यह मिनरल्स भोज्य सामग्री से आसानी से जुटा लेता है ! दूध, बियर और जूस से अधिक महंगा , आधा लीटर पानी का भाव भी ढाई यूरो है सो अक्सर पानी की जगह बियर से काम चलाने  के लिए तैयार रहना होगा !
बहरहाल यूँ देखने में यूरोप महंगा लगेगा मगर यहाँ कम पैसों में भी आराम से घूमा जा सकता , पूरे दिन का भोजन के लिए 6 से 10 यूरो में काम चल सकता है मगर यदि रेस्टॉरेंट में लंच और डिनर लेना है तो यही खर्चा 40 यूरो तक बैठेगा ! 

Monday, December 5, 2016

मेरे जाने पर मेरी आँख, गुर्दे, ह्रदय, लीवर जलाना नहीं - सतीश सक्सेना

जिन मित्रों को मेरी उम्र पता चल जाती है वे मेरे नाम के साथ आदरणीय लगाना शुरू कर मुझे अपने से दूर कर देते हैं, मुझे लगता है आदर देने की जगह अपनापन और उन्मुक्त व्यवहार मिलता तो अधिक अच्छा था , उसमें मुझे अधिक फायदा होता ! अक्सर अधिक उम्र वालों को आदर देकर हम अपने से दूर रखने में सफल होते हैं जबकि उन्हें इस आदर से अधिक मित्रता की आवश्यकता अधिक होती है !
मेरे यहाँ कई मित्र हैं जिन्हें मैं बुड्ढा कहता हूँ , अपनी बेटी को नसीहत देते समय, बुढ़िया, और कई महिला मित्रों को उनके जबरदस्त स्नेही स्वभाव और अपनापन के कारण अम्मा कहने में आनंद आता है ! पूरे जीवन हम अपने आपको ढंके रहते हैं , घर परिवार , यहाँ तक कि बच्चों तक से औपचारिक व्यव्हार करने के आदि हो गए हैं ! आदर हो या स्नेह , खुल कर करें , यही ईमानदारी है ! अपनापन को दिखावा क्यों ?

बरसों से खूनदान के लिए कई हॉस्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि वे मुझे खून की कमी के वक्त बुला सकते हैं ! मरते दम तक किसी के काम आ जाएँ तो जीवन सफल हो इस इच्छा को निभाते हुए , बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में अपने शरीर के सारे अंग और शरीर दान कर चुका हूँ !

यह लिख रहा हु ताकि सनद रहे और मित्र मेरी मृत्यु पर परिवार को मेरा संकल्प याद दिलाएं कि यह ऑंखें , गुर्दे, ह्रदय और लीवर किसी को जीवनदान देने में सक्षम हैं !

Monday, September 5, 2016

चुनौती खुद को - सतीश सक्सेना

भारत सरकार में 37 वर्ष सेवा करने के उपरान्त, आखिरकार 31 दिसंबर 2014 को रिटायर हुआ जिसमें मुझे साथी अधिकारियों द्वारा पूरे सम्मान के साथ, आखिरी विदाई समारोह आयोजित कर, सरकारी कार में घर तक पंहुचाया गया था !
पूरे जीवन एक कमी हमेशा रही कि विद्यार्थी जीवन से लेकर अब तक शारीरिक एक्सरसाइज पर कभी ध्यान नहीं दिया, सो भारतीय समाज में अभिशप्त रिटायरमेंट के बाद फैसला किया कि ढीले ढाले शरीर का कायाकल्प करूँगा ! बच्चों और परिवार जनों के सामने अपनी बीमारी में कराहते , लुंजपुंज, असहाय व्यक्तित्व मुझे सिर्फ दया के पात्र लगते थे ऐसे लोग अपने परिवार अथवा समाज को अपने विशद अनुभव से कोई भी दिशा देने में पूरी तौर पर असमर्थ थे , जिनके साथ शामिल होने को, मेरा मानस कभी तैयार न था !
अतः सबसे पहले अपना ही कायाकल्प करने का फैसला किया, और यह फैसला उस समय किया जब मैं मॉल में अथवा बाज़ार में घूमने को, सुबह का टहलना मान लिया करता था ! उन दिनों १ किलोमीटर अथवा आधा घंटा टहलने में कमर में दर्द हो जाता था ! दो दिन के मनन के बाद फैसला किया कि 
  • मीठा, आइसक्रीम और शुगर मोटापा बढ़ाने में सबसे अधिक रोल निभाती है अतः इसे बंद करना होगा !
  • पकौड़े, पापड , कश्मीरी दम आलू , पंजाबी दाल फ्राई , जीरा और प्याज परांठा , के साथ साथ हर प्रकार की शोरबे की मसालेदार मुगलई सब्जी छोड़नी होगी !
  • शराब और बियर का शौक़ीन नहीं था मगर परहेज भी नहीं करता था अगर अच्छी कंपनी हो तो दो पैग ड्रिंक्स या गर्मी के दिनों में एक बियर पीना हमेशा आनंददायक लगता था , इसके साथ काजू अथवा पनीर कहकर आसानी से भारी भरकम कैलोरी मिलती थी , उसे बेहद कम करना होगा !
  • दूध की चाय और साथ में नमकीन कुरकुरे नमकपारे , तली नमकीन मूंगफली तुरंत बंद करनी होगी !
  • रात का डिनर बेहद हल्का एवं सात बजे से पहले खाना होगा !
  • बचपन से छोड़ी हुई हरी सब्जियां एवं अंकुरित सलाद के साथ कम से कम एक फल रोज अवश्य खाना होगा 
  •  जमीन पर उकड़ू बैठकर चलना, एवं रोज पांच मंजिल सीढिया चढ़ना सीखना होगा !
  • पार्क में सुबह ५ बजे उठकर , हलकी एकसार गति से , हांफना शुरू होने तक धीमे धीमे दौड़ना होगा 
यह सब करना मेरे जैसे आलसी और बढ़िया खाने के शौक़ीन व्यक्ति के लिए एक सज़ा से कम न था मगर सवाल 61 वर्ष की उम्र में कायाकल्प का संकल्प लेने का था और हार जाना स्वीकार कभी नहीं था सो यह संकल्प लिया कि इसे अपने ऊपर लागू कर अपने परिवार के बच्चों के लिए एक नयी दिशा छोड़ने में कामयाब रहूंगा !
बुढापे में आकर नए सिरे से 35 वर्षीय जवान बनने की क्रिया आसान नहीं थी , शुरुआत से ही आलसी मन ने अड़चने डालनी शुरू कर दी , पैरों में दर्द रोज होता था , मन हमेशा सलाह देता रहता था कि घुटने बर्बाद कर लोगे बुड्ढे , दौड़ना बिलकुल बेकार है आदि आदि  ... 
कुछ दिनों में ही समझ में आ गया कि यह मन जीतने नहीं देगा और मज़ाक बन जायेगी इस संकल्प की , सो दो माह बाद होने वाले हाफ मैराथन ( 21 km ) रनिंग का फार्म भर दिया और परिवार व् नज़दीक मित्रों में घोषणा कर दी !
और इज़्ज़त बचाने के लिए हांफते हांफते भी हाफ मैराथन दौड़ना ही पड़ा और  जब मैंने यह असंभव जैसा कार्य कर लिया तब आत्मविश्वास से सराबोर अगले ४ माह में ही , 3 हाफ मैराथन सहित दसियो मैडल आसानी से हासिल किये ! 
और मैं जीत गया अपने संकल्प में, सिर्फ ८ माह की मेहनत में..... 
जीवन भर पसीने से चिढ़ने वाले व्यक्ति ने , लगातार 3 घंटे दौड़ने के साथ, शरीर से ३ लीटर पसीने के साथ साथ जमा चर्बी बहने का सुख भी महसूस कर लिया था ! 
काया कल्प इतना आसान था, ये पता होता तो बहुत पहले कर लिया होता !

Monday, April 25, 2016

रिटायरमेंट के बाद रनिंग, जिसने जीवन ही बदल दिया - सतीश सक्सेना

वाह !!
मशहूर रनर तनवीर काज़मी का लगातार 100 दिन दौड़ने का न्योता मिला है ! नियमों के अनुसार 30 अप्रैल को पहले रन से , जो कम से कम 2 km का होगा, शुरू करके 7 अगस्त तक हर हालात में चाहे भयंकर वारिश हो अथवा बीमार हों,अथवा सफर में हों, बिना नागा दौड़ना होगा ! इसमें बंदिश 2 किलोमीटर की रहेगी, अगर आप बारिश या सफर में हैं तब छोटे छोटे टुकड़ों में ही सही पर दो किलोमीटर दूरी तय करना अनिवार्य होगी इसमें इनडोर अथवा ऑफिस में होने की स्थिति में ट्रेडमिल रनिंग भी शामिल है , जिसे आप अपने मोबाइल अथवा जी पी एस सिस्टम पर रिकॉर्ड कर सकते हैं !

मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी घर पर अथवा ऑफिस में शारीरिक मेहनत या एक्सरसाइज नहीं की, उसके लिए इस उम्र में अपने शरीर और शक्ति को फिट रखने के लिए अपने नाकारा पैरों से दौड़ना निस्संदेह हिम्मत वाला फैसला रहा है ! अब जैसे जैसे मैं झिझक छोड़कर इन इवेंट्स में हिस्सा ले रहा हूँ वैसे वैसे हर एक नए रन के साथ, अपरिमित मानवीय शक्ति  को महसूस करके, आत्मविश्वास से सराबोर हो रहा हूँ इन इवेंट्स में जब मैं अपने से अधिक कमजोर और उम्रदराज लोगों का रनिंग स्पीड और रिकॉर्ड देखता हूँ तब आँखे खुली रह जाती है और दिल करता है कि जब ये लोग कर सकते हैं तब मैं क्यों नहीं ?
और यह न समझना कि यह रनर, पहलवान टाइप लोग हैं, सुबह सुबह अँधेरे में यह दौड़ने वाले बेहतरीन रिकॉर्ड होल्डर प्रबुद्ध लोगों में से अधिकतर लोग अपने जीवन के उच्चतम शिखर पर हैं , इनमें विदेशी कंपनियों में कार्यरत उच्च पदस्थ अधिकारी , डॉक्टर, सी ई ओ, डायरेक्टर ,जी एम आदि जैसी बड़ी पोस्ट पर कार्यरत लोग शामिल हैं !
बहरहाल पिछले कुछ माह में ही सिर्फ रनिंग के बदौलत लटकी हुई थुलथुल तोंद 90 प्रतिशत गायब हो गयी है , 74 kg वजन पिछले ७ माह में घटकर 66 किलो रह गया है , बीपी आदि बीमारियां कहाँ गईं पता ही नहीं चला ! जिस पसीने से कभी चिढ थी, उसी पसीने से दौड़ने के बाद सुबह सुबह पूरे कपडे लथपथ हो जाते हैं , अब गीले कपड़ों को देख अपनी मेहनत और शक्ति पर प्यार आता है ! बुढ़ापे के लटके हुए मसल्स आश्चर्य जनक रूप मजबूत हो गए हैं और शीशे में खुद को बार बार देखने का मन करता है !
६० वर्ष से पहले, जो व्यक्ति कभी पूरे जीवन में 50 मीटर न दौड़ा हो वह पिछले 7 माह में  102 रनों के जरिये 885 km दौड़ चुका है और इन दिनों मेरा प्रति सप्ताह रनिंग एवरेज 32 km है ! यह आश्चर्यजनक है , मैं जीवन में कभी एथलीट नहीं रहा और मात्र 7 माह पहले मैं अपने इस कारनामे के बारे में सोंच भी नहीं सकता था !
सबसे आश्चर्यजनक बदलाव अपने मानसिक व्यवहार में आया है , गाडी ड्राइव करने का दिल ही नहीं करता , एक दिन 12 बजे धूप में 2 km दूर एक मॉल तक आराम आराम से दौड़ता पंहुच गया था और बहुत अच्छा लगा था ! इससे पहले मैं, जीवन में कभी सलाद अथवा फल नहीं खाता था अब मनपसंद शोरवे की सब्ज़ी, दम आलू ,परांठे, जलेबी रबड़ी अथवा लेट नाईट डिनर अच्छे ही नहीं लगते ! 
रन मशीन तनवीर काज़मी केडेन्स डिज़ाइन सिस्टम में कंसलटेंट हैं , उनका आवाहन ठुकराया नहीं जा सकता और यह बेहद चैलेंजिंग है , अब आज से पांच दिन के बाद लगातार सौ दिन तक रोज दौड़ना होगा , मुझे यकीन है सौ दिन बाद , आग में तपकर एक नया सतीश बाहर आयेगा ! 
इस आवाहन के लिए धन्यवाद तनवीर काज़मी !! 

(http://navsancharsamachar.com/100-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A5%9C%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B6/#respond)

Tuesday, March 8, 2016

किसी की वेदना के साथ,मन में वेदना तो हो - सतीश सक्सेना

युवा आचार्य  विवेक जी  की कही दो पंक्तियाँ दिल में उतर गयीं , और एक काव्य अभिव्यक्ति ने जन्म ले लिया , आभार संत विवेक जी का , प्रणाम करते हुए यह रचना उन्हीं के सद्प्रयासों को समर्पित करता हूँ !

न हो यदि आस्था, श्रद्धा, मगर संवेदना तो हो !
किसी की वेदना के साथ, मन में वेदना तो हो !

भले विश्वास ईश्वर पर न हो, पर भावना तो हो !
वहां पर सर झुके या न झुके पर चेतना तो हो !

हजारों बार गप्पें मारते , शमशान हो  आये,
किसी का पुत्र कंधे पर हो, अंतर्वेदना तो हो !

सभी नज़रें झुका लेते , तेरे  दरबार में आकर ,
किसी गुस्ताख़ का नज़रें मिलाके छेड़ना तो हो !

ये गुस्सा, ये विरक्ति, ये नज़र नीचे हुई कैसे , 
हमीं खो जाएंगे, विश्वास की अवमानना तो हो ! 


Saturday, December 26, 2015

कौन गुस्ताख़ छेड़ता है हमें - सतीश सक्सेना

कौन छिप छिप के देखता है हमें ,
जैसे जनमों से , जानता है हमें !

जिसने आवाज दी, यहाँ आये 
कौन ग़ुस्ताख़ , छेड़ता है हमें ?

वह बे मिसाल हौसला, लेकर  
गहरी मांदों में खोजता है हमें ! 

नासमझ आशिक़ी सलामत है 
इतनी शिद्दत, से चाहता है हमें !

इश्क़ ने दर्द , बेहिसाब  दिया ,
कौन सपनों में , हंसाता है हमें ! 

Wednesday, May 27, 2015

जिस दिन पहली बार मिलोगे, गाओगे - सतीश सक्सेना

पहली  बार मिलोगे तो शरमाओगे !
सब  देखीं तस्वीरें , फीकी पाओगे !

जब जब तुमको याद हमारी आएगी
बिना बात ही घर बैठे , मुस्काओगे !

गीत हमारे खुद मुंह पर आ जाएंगे
जब भी नाम सुनोगे, गाना गाओगे !

आसमान की राहें, आसां कहाँ रहीं
सूर्यवंशियों की , ठकुराहट पाओगे ! 

बार बार समझाया, चाँद सितारों ने
मीठे गीत न गाओ तुम फंस जाओगे !




Tuesday, May 19, 2015

कभी मुस्काएं गैरों पर, किसी दिन राह में थम कर - सतीश सक्सेना

आस्था का सहारा लेकर धन कमाने में व्यस्त ये जालसाज :
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आस्था बेच के देखें, कि छप्पर फाड़ आता क्या !
बड़ा रूतबा है दाढ़ी में,मनीषी क्या विधाता क्या !

यहाँ इक झोपडी में छिपके रहता इक भगोड़ा था 
निरक्षर सोंचता था मैं , वीरानों  में ये करता क्या !

तिराहे पर पुलिस के हाथ जोड़ा करता बरसों से,
मैं मूरख सोंचता था, इन मज़ारों से ये खाता क्या ! 

कमाई आधी रिश्वत में  निछावर कर, बना मंदिर !
शहर अंधों का उमड़ा ले चढ़ावा और पाता क्या !

अब इस प्राचीन मंदिर में दया बरसाई है प्रभु ने 
खड़ी है कार होंडा भवन में, तंगी से नाता क्या ! 

कभी मुस्काएं गैरों पर,किसी दिन राह में थमकर
बेचारा भूल के गम अपने सोचेगा,यह रिश्ता क्या !

Monday, April 27, 2015

इतना देकर दुःख वे भी थक जाती होंगीं -सतीश सक्सेना

इतना दुःख देकर,वे भी थक जातीं होंगीं
करवट ले ले खुद को,खूब जगातीं होंगीं !

दिन तो कटता जैसे तैसे , मगर रात भर,
स्वयं लगाए ज़ख्मों को , सहलातीं होंगीं !

शब्द सहानुभूति के विदा हुए , कब के !
अब सखियों में बेचारी, कहलातीं होंगीं !

जीवन भर का संग लिखा कर लायीं  हैं , 
फूटी किस्मत पा कितना पछतातीं होंगीं !

जाने कितनी बार तसल्ली खुद को देकर , 
अभिमानों को स्वाभिमान,बतलातीं होंगीं !

Thursday, March 26, 2015

व्यास का स्मरण कर ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ - सतीश सक्सेना

सहज निर्मल मुस्कराहट से धरा गुलज़ार लिख दूँ !
भव्य मंगल दायिनी को, ईश का आभार लिख दूँ !

एक दिन उन्मुक्त मन से पास आकर बैठ जाओ
और बोलो नाम तेरे, स्वर्ग का अधिकार लिख दूँ !

काव्य अंतर्मन हिला दे, शुष्क मानव भावना में ,
समर्पण संभावना को प्यार का उपहार लिख दूँ !

मुक्त निर्झर सी हंसी पर, गर्व पौरुष का मिटा दूँ ,
तुम कहो तो मानिनी, अतृप्त की मनुहार लिख दूँ !

यदि तुम्हें  विश्वास हो, अनुराग की गहराइयों का !
व्यास का स्मरण कर, ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ !

Thursday, January 15, 2015

साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है - सतीश सक्सेना

राजनीति में वोट बनानें,गाय की महिमा गानी है !
अम्मा खाय पडोसी के घर,गौ माता अपनानी है !

गृह समाज बच्चे बूढों में,कौन समय बरबाद करे ! 
अपने नेता के गुण गाने ,अपनी कलम उठानी है !

अपने अपने रिश्ते सबके, अपनी नज़रें बदली हैं 
पापा की वे ससुरी लगती,अपनी प्यारी नानीं हैं !

सुख,दुःख सिक्के के पहलू हैं,दोनों संग निभाएंगे
जीयें  भोगेंगे तब तक ही,जब तक दाना पानी है !

धर्म के झंडे लिए घूमते, झाग निकलते ओंठों से,
साधू सबक सिखाने निकले, यही बड़ी हैरानी है !

Tuesday, December 23, 2014

कर न पायीं बातें ग़ज़लें , हंसने और हंसाने की - सतीश सक्सेना

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये , जीने और जिलाने की !
कफ़न आ गया बाजारों में, बातें सबक सिखाने की 

अम्बर चाँद सितारे हम पर, नज़र लगाए रहते हैं,
कैसे नज़र इनायत होगी साक़ी औ मयखाने की !

सुबह सवेरे तौबा करते , अब न हाथ लगाएंगे !
रोज शाम आवाजें आतीं पीने और पिलाने की !

रंज भुलाकर साथ बैठकर हंसना खाना पीना है 
यहाँ न ऐसी बातें करिए , रोने और रुलाने की !

इश्क़, बेरुखी, रोने धोने, से भी कुछ आगे आयें  
कर न पायीं बातें ग़ज़लें, हंसने और हंसाने की !

Friday, August 22, 2014

आज तुम्हारे दरवाजे भी लगते खूब बुहारे से - सतीश सक्सेना

मुक्त हंसी के कारण चिंतित रहते, यार हमारे से !
अब तो इनके दरवाजे भी, लगते खूब बुहारे से !

कितनी झुकी झुकी ही रहतीं, नज़रें शर्म के मारे से 
कब आएगी रात, पूछती अक्सर साँझ, सकारे से !

बीमारी में सो न सकोगे , इंसानों  की बस्ती में !
लोग जागरण  के चंदे को , फिरते मारे मारे से !

उठो नींद से, होश में रहना बस्ती नज़र आ रही है
गहरे सागर से बच आये , खतरा रहे किनारे से !

दर्द दगा और धोखे ने भी, यारों जैसा संग दिया     
हमने सारा जीवन अपना, काटा इसी सहारे से !

Monday, February 10, 2014

नीची नज़रों वाले अक्सर, तीखी चोटें करते हैं - सतीश सक्सेना

चंदा, सूरज, बादल ,कितना काम हमारा करते हैं !
कुदरत की ताकत बतलाने, सिर्फ इशारा करते हैं !

खुशी हमारी देख हमेशा, जलते हैं दुनिया वाले !
नज़र लगाने वाले अक्सर, नज़र उतारा करते हैं !

लड़के अक्सर ही लुट जाते चूड़ी, सुरमा, लाली से  
संवेदना, समर्पण पाकर, दिल को हारा करते हैं !

करुणा दया से रिश्ता कैसा, पथरीली चट्टानों से 
डूबते दिल को, बैठे साहिल सिर्फ निहारा करते हैं 

नज़र बचा के चलने वालों, से रहना चौकन्ने ही   
नीची नज़रों वाले , तीखी चोटें , मारा करते हैं !

Monday, December 2, 2013

घर की इज्जत बेंच,किसी के घर का पानी भरते हैं -सतीश सक्सेना


कैसे, कैसे लोग राष्ट्र की ध्वजा उठाये चलते हैं !
राजनीति के मक्कारों के, चंवर उठाये चलते हैं !

नोट कमाने,राष्ट्रभक्त बन,खद्दर पहन के आये हैं !
पीठ पे नाम लिखाये उनका,पूंछ उठाये चलते हैं !

मंत्री का विश्वास मिला तो वारे न्यारे हो जाएंगे !
दल्लागीरी करते , मन में लड्डू खाये, चलते हैं !

नेता के मंत्री बनते ही, नोट कमाएंगे जी भर के,  
जोश जोश में दुश्मन के, कंगूरे ढाये चलते हैं !

खुद पार्टी के ड्रमर बन गए,बच्चे ढोल बजायेंगे,
धन पाने को राष्ट्रभक्ति के,रंग लगाये चलते हैं !
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