Tuesday, February 16, 2021

45 वर्ष की उम्र में नीरसता क्यों -सतीश सक्सेना

उम्र बढ़ने के साथ नीरसता आनी ही है, मैं ऐसा नहीं मानता !  नीरसता की शुरुआत, जीवन में नयी रुचियों और अपनी इच्छाओं का गला घोटने से होती है और इसके पीछे के कारणों में प्रमुख , बढ़ी उम्र में सामाजिक वर्जनाएं , खुल कर हंसने में भय, अकेलेपन के
कारण आये आलस्य जनित बीमारियों द्वारा शरीर का अशक्त होना अधिक है ! हमारे समाज में, "सब लोग क्या कहेंगे" के दबाव से निकलना, डरपोक और भयभीत लोगों के लिए असम्भव बन जाता है ! 

समाज की नजर में, उम्र अधिक होने का अर्थ चुस्त और जीवंत डिज़ाइन के कपडे, मस्त उन्मुक्त हंसी, मनचाहे मित्रों और शौक को त्यागना होता है , उनके हिसाब से अधिक उम्र में ऐसा करना बेहूदगी होता है और अधेड़ अवस्था में तो यह अशोभनीय,  खासतौर पर तब यह और भी आवश्यक हो जाता है जब उनके बच्चे विवाह योग्य हो जाते हों ! सामाजिक परिवेश उन्हें मजबूर करता है कि वे बढ़ती उम्र में चुस्त दुरुस्त कपडे छोड़कर ढीले वाले कपडे , चप्पल और मोटा चश्मा लगाकर अखबार पढ़ें और पैरों पर हाथ लगाने वालों को हाथ उठाकर , धीमी आवाज में आशीर्वाद और वरदान देना शुरू करें और सबके मध्य ज्यादा बात न करें !

अधिकतर हमारे यहाँ जवान बच्चों की माँ और बहू /दामाद वाले पुरुषों को बूढ़ा मान लिया जाता है और इस नाते 45 वर्ष की भरपूर जवानी में औरतों को शालीन और 55 पार मजबूत पुरुषों को भी पापा जी बनना पड़ता है ! हर प्रकार की मित्रता चाहे वह कितनी शुद्ध और आवश्यक क्यों न हो , उनके लिए अशोभनीय बन जाती है ! उन्मुक्त हँसी का असमय छिन जाना उनके शरीर को असमय क्षरण की गारंटी देने में सहायक सिद्ध होता है !  

महिलाओं का और भी बुरा हाल है , उनकी युवावस्था पापा मम्मी की तीक्ष्ण नज़रों में कटती है और विवाह पश्चात पतिदेव की वर्जनाओं और सुरक्षा में, 40-45 होते होते बच्चे समझाने लगते हैं कि माँ किस साड़ी में अधिक ग्रेसफुल दिखती हैं उनके लिए माँ का चहकना ,हंसना अजीब लगने लगता है , खुलकर हंसने के लिए यह वयस्क लड़कियां जीवन भर तरसती हैं उनके पास एक ही जगह होती है जहाँ वे ठठ्ठा मारकर स्कूली दिनों जैसा हंस पाए जिस जगह उनके परिवार का कोई व्यक्ति दूर दूर तक न हो और वे ऐसा ही करती भी हैं बशर्ते वह क्षण किसी को पता नहीं चलने चाहिए !

हर घर में अपनी भूलों या गलतियों को छिपाना सबसे पहले सिखाया जाता है , बच्चों को कहा जाता है कि अपने घर की यह बात किसी और को नहीं बतानी है ! कोई भी रुका काम कराने का तरीका रिश्वत देना है चाहे वह सरकारी काम हो अथवा मंदिर , भगवान के दर्शन करने को गरीबों और रईसों के रास्ते अलग है , अधिक पैसा दो और साईं बाबा के दर्शन करें अधिक चढ़ावा देंगे तो फल भी

अधिक मिलेगा , दयनीय हाल बना दिया है हमने अपने समाज का और इसके जिम्मेदार हम अधेड़ावस्था के लोग ही हैं जो भुक्तभोगी होने के बावजूद, अपने ज़िंदा रहते, व्यवस्था परिवर्तन की कोशिश करते, युवाओं का मजाक बनाते हैं और उन्हें चोरी करने पर मजबूर करते हैं सो झूठ और चोरी करना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन गया है हम एक बीमार अपराधी समाज का अंग बन कर रह रहे हैं और ऐसे ही मरना हमारी नियति है !

विश्व में विकसित देशों के मुकाबले हम कहीं नहीं ठहरते, वहां क्राइम और भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं है , वे ईमानदार हैं , उम्रदराज हैं उनमें बीमारियों से कराहते लोग न के बराबर हैं , उनका वातावरण, हवा, शुद्ध और पीने के लिए बहती नदियों में स्वच्छ पानी उपलब्ध है उनके पास बड़ी खुली सड़कें और पक्की बस्तियां सैकड़ों वर्षों से हैं ,उनके यहाँ सामाजिक वर्जनाएं न के बराबर हैं , वहां राह चलती लड़कियों को कोई नहीं घूरता , अपने अभिन्न मित्रों के साथ , उन्मुक्त रूप से हंसने के लिए वे परिवार की और से भी मुक्त हैं और वे भरपूर खुशहाल जिंदगी गुजारते हैं ! यूरोपीय देशों में मैंने वाइन / बियर खरीदते अक्सर वृद्धाओं को देखा है वहीँ हमारे देश में ऐसा देखना पाप या अजूबा होता है और भीड़ लग जायेगी उनका चेहरा देखने के लिए ! 

अधिकतर महिलाएं और पुरुष बढ़ती हुई अवस्था में इसे घुटन से मुक्ति चाहते हैं , मगर उनकी हिम्मत नहीं है कि वे किसी को अपनी मित्रता का अहसास दिलाएं , मेरी कुछ महिला मित्रों ने इसे स्वीकार भी किया है, वे हंसना चाहती हैं मगर उनकी हिम्मत नहीं कि वे बेड़ियाँ तोड़ सकें यहाँ तक कि शुद्ध मित्रता आवाहन को स्वीकार कर सकें , उनके लिए पारिवारिक संबंधों से इतर, विपरीत सेक्स मित्रता स्वीकारना और हंसना मना है  चाहे वह मित्रता कितनी ही सहज और निश्छल क्यों न हो भयभीत महिलायें ऐसा सोंच भी नहीं सकतीं कि उनकी मित्रता परिवार से इतर हो अन्यथा बदनाम होने की गारंटी पक्की है !


चूँकि अधिकतर अविकसित देशों में, सत्ता पर बैठने वाले पुरानी मानसिकता में डूबे हुए अधेड़ या वृद्ध बैठे हैं जिन्होंने वर्जनाओं की भरमार पूरी उम्र झेली है और वे मानसिक तौर पर इसको तोड़ने में नाकामयाब रहे , नयी पीढ़ी के लिए वे अपने पुराने उसूलों की कानूनी जामा पहनाने में देर नहीं लगाते हैं और भयभीत युवा उन्हें तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते इसी कारण पूरा विश्व दो भागों में विभक्त हो चुका है , अविकसित देश वाले समाज को, विकसित मस्तिष्क वाला समाज बनने में सैकड़ों वर्ष और तकलीफ भरा रास्ता तय करना होगा , पीढ़िया बीत जाएंगी खुलकर हंसना सीखने में , भयमुक्त समाज का नारा लगाएंगे मगर अर्थ समझने में उम्र गुजर जायेगी !
स्वस्थ शरीर को बनाने के लिए उन्मुक्त एवं बनावट मुक्त हंसना बेहद आवश्यक है , और फलस्वरूप स्वस्थ मस्तिष्क का मालिक , हमेशा जवान रह सकता है !

अंत में कुछ पंक्तियाँ पढ़ें ..

सज़ा मिले मानवता का , उपहास बनाने वालों को,
कुछ तो शिक्षा मिले काश, कानून बनाने वालों को !

अगर यकीं होता , मौलाना मरते भरी जवानी में ,
हूरें और शराब मिलेगी , ज़न्नत जाने वालों को !
 


8 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति..

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  2. "स्वस्थ शरीर को बनाने के लिए उन्मुक्त एवं बनावट मुक्त हंसना बेहद आवश्यक है , और फलस्वरूप स्वस्थ मस्तिष्क का मालिक , हमेशा जवान रह सकता है !"

    सार्थक लेखन, सुंदर संदेश !

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  3. खुलकर हँसना, खुलकर जीना भला कौन नहीं चाहता, लेकिन मैंने अपने आसपास महसूस किया है कि पुरुष स्वयं ही गंभीरता का लबादा ओढ़े रहते हैं ताकि पत्नियों को भी गंभीर रहने पर मजबूर कर सकें। आशा है आपका यह लेख पढ़कर 45 के ऊपर वाले पुरुषों के विचार और जीवनशैली बदलेगी। जिस घर के पुरुष स्वयं ही जिंदादिल और आजादखयाल नहीं हों, वहाँ स्त्रियों का जिंदादिल और आजादखयाल होना तो पूरा गुनाह हो जाता है, चरित्रहीनता तक का पर्याय हो जाता है।

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  4. बहुत सार्थक लेख है सतीश जी। हालांकि सभी लोगों को एक तराजू से तोलना सही नही है। बहुधा महिलाओं और पुरुषों को पूर्वाग्रहों के साथ जीना ही अच्छा लगता है। पर धीरे धीरे वर्जनाये खंडित हो रही हैं।

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  5. बहुत सार्थक सटीक लेख

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- सतीश सक्सेना

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