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Friday, July 22, 2022

अगर परमात्मा, इन्सान होता -सतीश सक्सेना

गरीबों पर बड़ा अहसान होता 
अगर परमात्मा, इन्सान होता !

न जाने कब के हम आज़ाद होते,
भुलाना भी उसे , आसान होता !


पहुँचते उसके दरवाजे भिखारी ,
बगावत का, वहीं ऐलान होता !

दिखाते भूख से,  बच्चे तड़पते 
उसे कुछ भूल का अनुमान होता

नफ़रती अक्षरों को तब तो शायद !
सजा ए मौत का , फ़रमान होता !

Friday, May 31, 2019

हमारी सबसे यारी रे - सतीश सक्सेना

लगा सब धर्मों का मेला
भीड़ का है रेलम पेला

अजान में है खिचाव भारी
भजन में आत्मा दिल हारी
बैठना , गिरिजा में चाहें ,
आँख में जब आंसू आएं !
मुहब्बत करना सिखलायें 
कतारें,  लंगर की प्यारे !
सभी घर अपने से लागे, सब जगह वही प्यार इज़हार !
फ़क़ीरों का अल्हड संसार
हमारी सबसे यारी रे !

प्यार की, कष्टों में दरकार
मिले स्पर्श नेह इक साथ 
मुसीबत में शबरी का संग 
लगे परमेश्वर का  दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे 
हर भवन में , ईश्वर न्यारे !
पीठ पर है निर्भय अहसास 
आस्था के , वारे न्यारे !
हर जगह सम्मोहन भारी, भक्ति में कहाँ दुश्मनी यार !
सूफियों का विरक्त संसार 
हमारी दुनिया न्यारी रे !!

मिले शर्तों के बदले राह
बड़े बूढ़े अब रहे कराह !
खाय कसमें जीवनसाथी
रोज ही बदले जाते यार
भर गया पेट सरे बाजार
देख प्यारों का ऐसा हाल !
कटी उंगली पर मांगे धार
बताओ क्या देंगे सरकार
काश इंसान समझ पाये, जानवर से निश्छल अनुराग !
मानवों का लोभी संसार
यहाँ  सारे व्यापारी रे !!

शुरू से ऐसी ही ठानी
मिले, अंगारों से पानी
पियेंगे सागर तट से ही 
आंसुओं में डूबा पानी,
कौन आये देने विश्वास 
हमारी सांस आखिरी में
हंसाएंगे इन कष्टों को 
डुबायें दर्द, दीवानी में !
बहुत कुछ समझ नहीं पाये, इश्क़ न करें किसी से यार !
मानवों से ही डर लागे 
पागलों में ही, यारी रे !!

Sunday, August 13, 2017

अंगदान दिवस पर लम्बी रनिंग के बाद बेहतरीन न्यूट्रीशियस नाश्ता -सतीश सक्सेना

आज अंगदान दिवस है ,हाल में डॉ अमर नदीम की इच्छा अनुसार उनके निधन के बाद परिवार ने उनके शरीर का दान किया, यह एक सुखद एवं स्वागत योग्य कदम है ! बेहद अफ़सोस की बात है कि इतने बड़े देश में अब  तक देहदान के लिए  500 से भी कम लोग ही उपलब्ध हैं !

मैं लगभग 15 वर्ष पूर्व  अपोलो हॉस्पिटल में किसी मित्र को देखने गया था वहां देहदान की अपील देखकर तुरंत फॉर्म भरा और मरने के बाद अपनी देह एवं समस्त अंग सिर्फ इसलिए दान किये ताकि मेरा शरीर मरने के बाद भी किसी के काम आ सके मुझे याद है उस दिन मैं बेहद खुश था लगा कि आज का दिन सफल हुआ और उसीदिन मैंने हॉस्पिटल में रेगुलर ब्लड डोनर के रूप में भी अपना नाम लिखवा था जबसे अब तक हर बर्ष अनजान व्यक्तियों की कॉल पर भी खून देता रहा हूँ ! 

अपने जन्मदिन पर मैं हमेशा कुछ न कुछ दान करने की नियति से घर से निकलता हूँ कई बार अपनी हैसियत से अधिक भी अनजान लोगों या जरूरत मंदों को देता रहा हूँ और ऐसा करके हमेशा भूला हूँ , क्योंकि दान वही जो बदले की आशा में न दिया जाय अन्यथा उसका उद्देश्य ही निष्फल है !

आज सुबह कोच रविंदर की रनिंग Footloose Run में शामिल हुआ , वंडरफुल आयोजन था आज का , रजिस्ट्रेशन मनी 1700 थी मगर उसके बदले हर प्लेयर को मिजुनो रनिंग जूते ( MRP Rs 3999 /=) टाइमिंग चिप एवं बेहतरीन स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता दिया गया ! 
लम्बी दूरी के रनर्स को रनिंग के बाद , फिनिश पॉइंट पर पंहुचने के बाद बुरी तरह एक्सहॉस्टेड शरीर के लिए बेहतरीन और भरपूर नाश्ते की आवश्यकता रहती है और आज की रनिंग के बाद तो खिलाने का जबरदस्त   इंतज़ाम था , क्वैकर के बनाये गए हैल्थी फ़ूड उपमा ,दलिया ,खिचड़ी , साम्भर , इडली ,  के अलावा पाइन एप्पल और ब्लू बेरी योगहर्ट , जूस , एनर्जी ड्रिंक्स , बिस्किट , मेडिकल फैसिलिटी आदि बढ़िया क्वांटिटी में उपलब्द्ध थी ! लगता है इस बार आयोजकों ने दिल खोलकर पिछली सारी शिकायतें थोक में निपटाने का फैसला किया था !
Ref: http://notto.nic.in/

Monday, July 4, 2016

तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में - सतीश सक्सेना

हाल में ढाका हादसे पर अातंकवादियों और उनके रहनुमाओं के लिए ....

न हैं इस्लाम  खतरे मे, न है भगवान खतरे मे !
तुम्हारे शौक़ में, इंसानियत , इंसान खतरे में !

न हिंदुस्तान खतरे में न, पाकिस्तान खतरे में !
तेरी अय्याशियां औ महले आलीशान खतरे में 

न आयत ही कभी पढ़ पाए, न श्लोक गीता के, 
चाय का कांपता कप हाथ में,हैरान,खतरे में 

भले बच्चे हों पेशावर के, कत्लेआम ढाका हो ,
कहीं रोये तड़प कर माँ, इसी अनजान खतरे में 

बुरा हो तेरी मक्कारी औ अंदाज़े बयानी का !
तेरी इस बादशाहत में, मेरी मुस्कान खतरे में !

Tuesday, March 8, 2016

किसी की वेदना के साथ,मन में वेदना तो हो - सतीश सक्सेना

युवा आचार्य  विवेक जी  की कही दो पंक्तियाँ दिल में उतर गयीं , और एक काव्य अभिव्यक्ति ने जन्म ले लिया , आभार संत विवेक जी का , प्रणाम करते हुए यह रचना उन्हीं के सद्प्रयासों को समर्पित करता हूँ !

न हो यदि आस्था, श्रद्धा, मगर संवेदना तो हो !
किसी की वेदना के साथ, मन में वेदना तो हो !

भले विश्वास ईश्वर पर न हो, पर भावना तो हो !
वहां पर सर झुके या न झुके पर चेतना तो हो !

हजारों बार गप्पें मारते , शमशान हो  आये,
किसी का पुत्र कंधे पर हो, अंतर्वेदना तो हो !

सभी नज़रें झुका लेते , तेरे  दरबार में आकर ,
किसी गुस्ताख़ का नज़रें मिलाके छेड़ना तो हो !

ये गुस्सा, ये विरक्ति, ये नज़र नीचे हुई कैसे , 
हमीं खो जाएंगे, विश्वास की अवमानना तो हो ! 


Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस गाँव में,कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते औ ज्वार की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ चलाना भी इन गुलाबों को 
आज भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते हाक़िम  
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरसती है,जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,देश में  नाले देखे !

Sunday, May 10, 2015

कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !-सतीश सक्सेना

यह एक संपन्न भरेपूरे घर की वृद्धा का शब्द चित्र है , जो कहीं दूर से भटकती एक बरगद की छाँव में अकेली रहती हुई ,अंतिम दशा को प्राप्त  हुई ! भारतीय समाज के गिरते हुए मूल्य हमें क्या क्या दिन दिखलायेंगे ? 

अच्छा है बुढ़िया चली गयी,थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएं लेकर, निर्जल, निशक्त, कजली  जैसी !

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी !
धीमे धीमे बड़बड़ करते,भूखी प्यासी कुम्हलायी सी !   

कुछ  बातें करती रहती थी, सिन्दूर,महावर, बिंदी से  
इक टूटा सा विश्वास लिए,रहती कुछ दर्द भरी जैसी !

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए,दिखती थी अभिमानी जैसी ! 

कहती थी, उसके मैके से,कोई लेने,आने वाला है ! 
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें,करती थीं महारानी जैसी !

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोयीं सन्नाटे में  
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े,बहती ही रही पानी जैसी !

कल रात हवा की ठंडक में,कांपती रहीं वे आवाजें !
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे,आंसू से भरी बदली जैसी !

Thursday, May 7, 2015

कुछ तो बातें, ख़ास रही हैं चेले में - सतीश सक्सेना

कैसे यह सरदार गिर गया खेले में,
कुछ तो गहरी बात, रही है चेले में !

कैसे बादल फटे,अभी तो फेंका था   
इतनी ताकत कहाँ लगी थी,ढेले में !

गाली देकर,इनके ही सारथियों ने  
रथ के पीछे, बाँध घसीटा मेले में !

ऐसे ही शुभ लाभ  चाहने वालों से  !
लालाजी बिक गए नकासे,धेले में !

पुनर्जन्म लंकेश का हुआ रघुकुल में
अबकी राम लड़ेंगे, युद्ध अकेले में !


Monday, April 27, 2015

इतना देकर दुःख वे भी थक जाती होंगीं -सतीश सक्सेना

इतना दुःख देकर,वे भी थक जातीं होंगीं
करवट ले ले खुद को,खूब जगातीं होंगीं !

दिन तो कटता जैसे तैसे , मगर रात भर,
स्वयं लगाए ज़ख्मों को , सहलातीं होंगीं !

शब्द सहानुभूति के विदा हुए , कब के !
अब सखियों में बेचारी, कहलातीं होंगीं !

जीवन भर का संग लिखा कर लायीं  हैं , 
फूटी किस्मत पा कितना पछतातीं होंगीं !

जाने कितनी बार तसल्ली खुद को देकर , 
अभिमानों को स्वाभिमान,बतलातीं होंगीं !

Saturday, April 25, 2015

किन्नर मन्नू महंत से बातचीत - सतीश सक्सेना

पिछले सप्ताह दिन में एक काल आयीं जिसमें अगर समय हो तो बात करने का अनुरोध था , दूसरी तरफ हरियाणा से मन्नू महंत
नामक किन्नर मुझसे अपने समाज के बारे में बात करना चाहते थे !उनसे बात करते समय यह लगभग साफ़ था कि वे अपनी बात कहने में बेहद गंभीर, व्यवस्थित और विद्वान थे और हरियाणा में अपनी गद्दी के प्रधान भी !  
इन्होने मेरा एक लेख पढ़कर ही मुझे फोन किया था , मेरे लेख एवं किन्नरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण के प्रति धन्यवाद कहते हुए उन्होंने लगभग आधा घंटा बात की जिसमें अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति समाज से शिकायत और बेहतर सम्मान की मांग शामिल थी  !
किन्नरों के प्रति समाज का रवैया न्याय पूर्ण नहीं है इसमें कोई संदेह नहीं , इन्हें समाज हमेशा शक की नज़र से ही देखता है व इनकी समस्याओं और स्थिति को जाने बिना , बदले में सिर्फ भय और नफरत ही देता है !
मानवता दया करुणा के नाम पर बड़ी बड़ी बातें करते हम लोग किन्नरों के प्रति जानवरों से भी खराब रवैया अख्तियार करते हैं , वे लोग सामान्य व्यक्तियों की भांति जीवन यापन करना चाहते हैं जो समाज करने नहीं देता ! 

किन्नर आदिकाल से पाये जाते हैं , पौराणिक काल में शिव के एक अवतार अर्धनारीश्वर की चर्चा है जिनका आधा
भाग नारी और आधा पुरुष का था , किन्नर शिव के इस रूप को पूजते हैं ! महाभारत में भी इनकी चर्चा है कि द्रुपद पुत्र शिखंडी, स्त्री स्वरूपा पैदा हुआ था, और उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर तीर चलाये थे , चूंकि भीष्म की प्रतिज्ञा थी कि वे किन्नरों पर , निहत्थों पर एवं स्त्री पर प्रहार नहीं करेंगे युद्ध भूमि में पिछले जन्म की अम्बा को शिखंडी रूप में पहचान, उन्होंने हथियार एक और रख दिए और किन्नर शिखंडी की आड़ से, अर्जुन को भीष्म पर घातक वार करने का मौका मिला !

इनके बारे में तमाम गलत धारणाएं समाज में फैलायी गयी हैं , जिन लोगों को इनसे कोई सहानुभूति नहीं वही इनके बारे में सबसे अधिक अनर्गल प्रचार करते हैं !वे नाच गा कर  भिक्षा यापन कर अपना गुज़ारा करते हैं , उनका यह भी दावा है कि वे यक्ष , गन्दर्भ, किन्नर समाज के लोग हैं और नाच गाना उनका पुरातन पेशा है , उन्हें अपनी स्थिति से कोई शिकायत नहीं  बल्कि उसे पसंद करते हैं , समाज से उन्हें एक ही शिकायत है कि अगर समाज उनका आदर न कर सके तो भी उसे उनके अपमान का कोई अधिकार नहीं ! वे सूफी संत सम्प्रदाय की राह पर चलने वाले लोग हैं और उनकी दुआओं में उतनी ही शक्ति है जितनी किसी और और वास्तविक संत में ! 
इनके साथ अपराध होने की स्थिति में टेलीविजन मीडिया अथवा अखबारों में इन्हें कोई महत्व अथवा प्रमुखता नहीं दी जाती बल्कि इन्हें हेय व अपमानजनक दृष्टि से देखा जाता है !  वे अपने आपको किन्नर कहलाना पसंद करते है , हिजड़ा उर्फ़ छक्का शब्द एक गाली है जो इन्हें, निर्मम समाज की देन है , किन्नर हर धर्म का सम्मान करते व मानते  हैं , मृत्यु होने की दशा में किन्नरों को उनके धर्म  के आधार पर  दफनाया या जलाया जाता है !

इनको ट्रेन यात्रा अथवा बस यात्रा में कोई सीट नहीं देता चाहें यह बीमार ही क्यों न हों उनके साथ खाना पीना तो दूर लोग बैठना भी पसंद नहीं करते !
 अख़बारों के हिसाब से माने तो छत्तीस गढ़ में कोई कानून बनाने का प्रयत्न हो रहा है  जिसमें इन्हें ऑपरेशन द्वारा स्त्री या पुरुष बनाने की बात कही गयी है ? अगर यह सच है तो यह अमानवीय है ! उनका मानना है कि यह लोग अल्पमत में हैं और कम संख्या में हैं इनका सरंक्षण होना चाहिए न कि इन्हें समाप्त ही कर दिया जाये !

इनकी देवी का नाम  बहुचरा माता है जिनका मंदिर बलोल , संथाल , गुजरात में है !  मन्नू महंत का कहना है कि 

" चाहे इस्लाम हो या हिन्दू , हर धर्म में इन्हें सम्मान दिया गया है और इनकी चर्चा है ! वे आगे कहते हैं कि हाल में उन्होंने पढ़ा है कि किन्नरों को ऑपरेशन द्वारा महिला या पुरुष बना दिया जाएगा कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिस भारत देश में किन्नरों को साधू संत और असली फ़क़ीर माना जाता है उनके अगर सुबह दर्शन हो जाएँ तो माना जाता है कि सारे आज काम पूर्ण होंगे , जिन्हे अल्लाह , वाहे गुरु , यीशु मसीह , भगवान के बहुत करीब माना जाता है वही मालिक के बन्दे अपनी पहचान के लिए भी किसी सरकार या हुकूमत के आगे मज़बूर हैं क्या इनके हकों के लिए क़ानून बनाने से पहले इनसे पूंछना जरूरी नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि वे उन बेजुबान जानवरों में से नहीं जिनके बारे में कानून बनाने से पहले उनसे पूंछा भी नहीं जाता ? क्या आपको नहीं लगता कि कुदरत और प्रकृति से छेड़छाड़ करना गलत है ?
किन्नर अपनी जिन्दगी से बहुत खुश हैं वो सबको दुआएं देते हैं , सबका भला चाहते हैं , वे सूफी साधू संत हैं , भिक्षा यापन से गुज़ारा करते हैं  और ऐसे ही रहना चाहते हैं उन्हें नौकरी आदि कुछ नहीं चाहिए अगर समाज या सरकार उन्हें कुछ देना चाहती है तो उनके थोड़ी इज़्ज़त दे इस पंथ का अपमान न करे !"  
मन्नू महंत, गद्दी नशीन गुरु, गांव -भुन्ना ,तहसील - गुहला, जिला कैथल, हरियाणा -136034 
फोन - 9991789432 

-नई दिल्ली। भारतीय संसद के इतिहास में 40 साल बाद कोई निजी विधेयक कानून बनने की दहलीज पर खड़ा हुआ है जो किन्नरों को समाज में बराबरी के अधिकार देने की क्रांतिकारी नींव रखेगा।
राज्यसभा ने शुक्रवार को यह ऐतिहासिक पहल द्रमुक के तिरूचि शिवा की ओर से पेश किये गये इस गैर सरकारी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। यह विधेयक अब लोकसभा के दरवाजे पहुंच गया है जहां यह तय होगा कि यह कानून का रूप ले पाता है या नहीं।
इसके बाद विधेयक सदन के नियमों के अनुसार विचार और पारित करने के लिए पेश किया जायेगा। किन्नरों के प्रति सहानुभूति देखते हुए सरकार लोकसभा में भी इस विधेयक के समर्थन में आ सकती है जहां सरकार का बहुमत है।
राज्यसभा में सदन के नेता अरूण जेटली का कहना था कि इस संवेदनशील मुददे पर सदन बंटा हुआ नजर नहीं आना चाहिए। राज्यसभा में सख्याबल के आधार पर मजबूत स्थिति में खड़े विपक्ष ने इस गैर सरकारी विधेयक के पीछे अपनी ताकत झोंक दी जिसके सामने सरकार इसे ध्वनिमत से पारित कराने पर सहमत हो गई है।
- India, probably the world, will get its first transgender college principal when Manabi Bandopadhyay takes charge of Krishnagar Women's College in West Bengal


किन्नरों के बारे में अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएँ !

Thursday, April 2, 2015

जागो देशवासियों अब भी समय बचा - सतीश सक्सेना

चलो गांव की ओर, व्यथाएँ  बांटेंगे, 
इकले नहीं किसान यकीन दिलाएंगे 

कसमें खाकर घर से पैदल आये हैं 
भूखे नहीं किसान कभी सो पाएंगे !

अन्न उगाने वाले क्यों कमजोर रहें 
आत्मचेतना,बोध,विवेक जगायेंगे !

हो आनंद  हमेशा इनके आँगन में 
इन चौपालों में,सौभाग्य जगायेंगे !

जागो देशवासियों ! वरना भारत में
खद्दरधारी दीमक , जश्न मनाएंगे !

कृषिप्रधान देश की खेती चाट गए
अब गरीब की रोटी,चट कर जाएंगे ! 

हिम्मत हारें नहीं,समय वह आएगा
खलिहानों में जीवनदीप जलायेंगे !

(यवतमाळ पदयात्रा 15 से  19 april के अवसर पर )

Thursday, March 19, 2015

राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का -सतीश सक्सेना

बुरे हाल मे  साथ न छोड़ें, देंगे साथ किसानों का !
यवतमाळ में पैदल जाकर जानें दर्द किसानों का !

जुड़ा हमारा जीवन गहरा ,भोजन के रखवालों से !
किसी हाल में साथ न छोड़ें,देंगे साथ किसानों का

इन्द्र देव  की पूजा करके, भूख मिटायें मानव की  
राजनीति के अंधे कैसे समझें कष्ट किसानों का !

यदि आभारी नहीं रहेंगे मेहनत और श्रमजीवी के     
मूल्य समझ पाएंगे कैसे इन बिखरे अरमानों का !

चलो किसानों के संग बैठे, जग चेतना जगायेंगे 
सारा देश समझना चाहे कष्ट कीमती जानों का !

(यवतमाळ पदयात्रा १५-१९ अप्रैल २०१५ के अवसर पर )

Saturday, March 7, 2015

इन दर्दीली आँखों ने ही थका दिया -सतीश सक्सेना

आज तुम्हारी आँखों ने ही थका दिया
इतनी गहरी आँखों,ने ही थका दिया !

इतनी बात पुरानी, कब तक भूलोगे
इन दर्दीली आँखों ने ही थका दिया !

सदियाँ बीतीं  इंतज़ार  में  केशव के ,   
इन पथरायी आँखों ने ही थका दिया !

पता नहीं मन  कहाँ  तुम्हारा रहता है ,
खोयी खोयी आँखों ने ही थका दिया

छलके आंसू, ऐसे छिपा न पाओगे,
भीगी भीगी आँखों ने ही थका दिया !

Monday, January 5, 2015

संदिग्ध नज़र,जाने कैसे ,माधुर्य सहज भाषाओं का - सतीश सक्सेना

कड़वाहट कैसे कर पाए, अनुवाद गीत भाषाओं  का ! 
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम भाषाओं का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें, जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

ईर्ष्यालु समझ पाएगा क्या, जीवन स्नेहिल रंगों को 
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनिया को कुटिलों ने
अनुभूति समर्पण न जाने अभिमान, हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावना शून्य कैसे समझें, आचरण सरल भाषाओं का !

Wednesday, December 24, 2014

सनम सुलाने तुम्हें, हमारे गीत ढूंढते आएंगे - सतीश सक्सेना

आदरणीय ध्रुव गुप्त की दो पंक्तियाँ इस रचना के लिए प्रेरणा बनी हैं , उनको प्रणाम करते हुए ……  

यदि रूठोगे कहीं तुम्हें हम , रोज मनाने आएंगे,
चाहा सिर्फ तुम्हीं को हमने, ये बतलाने आएंगे !

भूल न जाना मुझको वरना, हौले हौले रातों के 
अनचाहे सपनों में, अक्सर खूब सताने आएंगे !

सुना, चाँदनी रातों में तुम भूखे ही सो जाते हो 
थाली मीठी यादों की ले संग खिलाने आएंगे !

खूब सताएं दुनियाँ वाले, वादे छीन न पाएंगे
जितना काटें बांस, हरे हो, नए सामने आएंगे !

कैसे निंदिया खो बैठे हो, अवसादों के घेरों में
सनम सुलाने  तुम्हें , हमारे गीत  ढूंढते आएंगे !

Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

लाशों पे नाचते तुम्हें,  यमजात कहेंगे !
शायर और गीतकार भी बदजात कहेंगे !

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे, इन्हें  दाग़ कहेंगे !

इन्सान के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,हम आघात कहेंगे !

दुनियां का धर्म पर से, भरोसा ही जाएगा !
हम दूध मुंहों के रक्त से,खिलवाड़ कहेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम, अमिट हो गए 
हर  ज़ुल्म ए तालिबान,  ज़हरबाद कहेंगे !

जब भी निशान ऐ खून,हमें याद आएंगे 
इंसानियत के नाम , एक गुनाह कहेंगे !

Ref : https://www.theguardian.com/world/2014/dec/16/taliban-attack-army-public-school-pakistan-peshawar

Friday, July 4, 2014

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना

अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !


माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो ! 


इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे  अदा  करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !


रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !


मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ पे रखना
तेरा अता किया  , ये ईमान मुबारक हो !

Monday, April 28, 2014

जाते जाते रुला गया है कोई - सतीश सक्सेना

our dear Goofy (31 Dec 2006 -27april 2014)
अपना घर त्याग,वो गया है कहीं ! 
थक के लगता है सो गया है कहीं !

बड़ी हिम्मत से , लड़ रहा था वह !
अपनी चौखट से,खो गया है कहीँ ! 

बड़े मज़बूत दिल का,  बच्चा था !
लड़ते लड़ते ही , तो गया है कहीं !

जाने किस कष्ट से, भिडा इकला !
मर के भी  प्यार,बो गया है कहीँ !

किसने छीना है,उसका घर यारोँ 
आज विश्वास , रो गया है  कहीं ! 

Wednesday, March 5, 2014

आज रात भी साथ बैठकर,कितनी देर स्वप्न देखे थे -सतीश सक्सेना

बरसों बीते, बिछुड़े तुमसे 
जाने कब से देख न पाया 
बार बार जाकर बस्ती में  
भी दरवाजे पहुँच न पाया
लेकिन फिर भी हार गए तुम,
ओ समाज के ठेकेदारों  !
आज रात भी साथ बैठकर, मनकों की माला पोए थे !

कौन छीन पायेगा हमसे
सपने जो मन में रहते हैं ! 
कौन रोक पायेगा आंसू  
जो हँसने, में भी बहते हैं !
तुम समझे थे हमें दूर कर, 
ये अनुराग ख़त्म कर दोगे !
लेकिन कितनी बार रात में, दोनों पास पास सोये थे !

दुनिया वाले हंस कर कहते 
दीवानों को अलग कर दिया
सारी शक्ति लगाकर अपनी
अरमानों  को दूर कर दिया ! 
जलने वालों की नज़रों में,
उजड़ी आंगन की फुलवारी ! 
मगर उसी दिन हम दोनों ने, वादे साथ साथ बोये थे !

उस दिन मेले में देखा था ,
आँखों आँखों बात हो गयी !
विरह व्यथा का वर्णन करते  
मन में ही बरसात हो गयी !
जब भी चाहें तब मिलते हैं,
क्या कर लेंगे बस्ती वाले !
दुनिया भर की, ऊँच नीच  के कपडे , आंसू से धोये थे !

मन मयूर के साथ हर समय 
रहने वाले  को क्या जानो !
अंतर्मन मंदिर की भाषा ,  
सप्त पदों को क्या पहचानो !
प्यार की भाषा सीख न पाये 
कैसे हम तुमको समझाएं !
पता नहीं कितने युग बीते, प्यार की दुनिया में खोये थे !

कैसे छीनोगे तुम हमसे
जो मेरे मन में रहती है !
कैसे छीनोगे वे यादें जो 
जन्मों से लिखी हुईं हैं  !
मरते दम तक साथ न छोड़ें,
जो मन में आये कर लेना !
इतने गहरे कष्ट याद कर, फफक फफक कर हम रोये थे !

Saturday, February 1, 2014

लानत है, इस संकीर्ण सोंच के लिए - सतीश सक्सेना

कल इसी देश के एक बच्चे को पीट पीट कर राजधानी में मार दिया गया जबकि वह अपना प्रान्त और भाषा छोड़ कर सबसे विकसित शहर दिल्ली में शिक्षा लेने आया था ! सुदूर उत्तर पूर्व क्षेत्र के, हमारे यह सीधे साधे देशवासी, भारत वासी होने का क्या अभिमान करें ?

जाति, धर्म, भाषा और प्रांतीयता में आकंठ डूबे, विद्वता का दम भरते, हम संकीर्ण भारतीय, मरते दम तक अपने अपने झंडे उठाये, आपस में एक दुसरे को भला बुरा कहते रहेंगे बस यही हमारी पहचान है ! इस पूरे देश को, १९४७ से पूर्व ३०० - ४०० राज्यों में बाँट देना चाहिए और हम उसी छुद्र अभिमान के योग्य हैं !     

हमारी संकुचित अशिक्षित मनस्थिति, हज़ारों किलोमीटर दूर फैले, हमारे ही विभिन्न रीतिरिवाज और संस्कृतियों को अपनाने में बुरी तरह फेल हुई है ! बिहारी, मराठी, गुजराती, मद्रासी मानसिकता में साँसे भरते हम संकीर्ण देसी लोग, विश्व में कहीं रहने योग्य नहीं हैं !       

यह देश अब एक विकलांग सोंच  का मालिक है जहाँ औरों से घृणा के अलावा और कुछ नहीं है  हम भारतीयों  के पास, शायद विश्व के सबसे संकीर्णमना देशों में से एक हैं हम !

यह देश सभ्य लोगों के रहने योग्य नहीं !
Ref : http://indianexpress.com/article/cities/delhi/delhi-arunachal-boy-beaten-to-death-by-shopkeepers-in-lajpat-nagar-say-reports/
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