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Friday, October 18, 2013

हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है -सतीश सक्सेना

हमेशा ही अभावों में सभी ने व्यस्त पाया है ! 
मुसीबत में सदा सबने हमें आश्वस्त पाया है !

हमें कुछ भी नहीं उम्मीद, ऐसे वक्त में तुमसे  !
ज़रुरत में, हमेशा ही तुम्हें, ऋणग्रस्त पाया है !


जरा सी चोट में कैसे ये आंसू छलछला उठे 
हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

अभी तो कोशिशें करते हैं, सबसे दूर रहने की !
भरोसा ही सदा हमने,यहाँ क्षतिग्रस्त पाया है !


मुफलिसी में भी,मेरे द्वार से खाली न जाओगे
हमें लोगों ने खस्ता हाल में विश्वस्त पाया है !

Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 

Saturday, February 14, 2009

ढाई आखर प्रेम का ..

चिटठा चर्चा पर आज मुझे तरुण का लेख , ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय पढ़ कर पाश्चात्य प्यार के इस अवसर पर सुदामा और केशव का प्यार याद आ गया और मुंह से निकल पड़ीं नरोत्तमदास रचित कुछ पंक्तियाँ !

पत्नी के द्वारा बार बार कहने पर महागरीब सुदामा, भेंट के लिए, पड़ोस से मांगे कुछ मुट्ठी चावल की पोटली लेकर, अपने बालसखा द्वारकाधीश से मिलने पंहुचे तो द्वारपाल के ये शब्द ....

"सीस पगा न झगा तन पै प्रभु जाने को आहि बसै केहि गामा
धोती फटी सी लटी दुपटी औ पायं उपानह को नहि सामा,
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को नाम , बतावत आपनो नाम सुदामा ,

सुदामा पांडे का नाम सुनते ही, कन्हैया सारे राजकाज छोड़, हाथ जोड़ भाग पड़े अपने उस बालसखा से मिलने दरवाजे पर ! द्वार पर अपने मित्र की दुर्दशा देख करूणानिधि रो पड़े ...

"ऐसे बेहाल बिवाइन से पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ,
हाय महादुख पाय सखा तुम आए इतै ना कितै दिन खोये
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिके करुणा निधि रोये
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल से पग धोये !"

कांख में दबी पोटली को छिपाने का प्रयास करते देख , मुस्कराते केशव ने सुदामा से कहा जैसे बचपन में गुरुमाता के दिए चने तुम अकेले खा जाते थे वैसे ही भाभी के भेजे ये मीठे चावल भी तुम छिपा रहे हो, चोरी की तुम्हारी आदत अभी भी नही गयी , कहकर द्वारकानाथ, वे चावल लेकर खाने लगे ! प्यार का यह स्वरुप वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं !इतने में ही प्रभु ने जो देना था अपने मित्र को दे चुके थे .....

खाली हाथ दरवाजे से विदा लेकर दुखी मन, कुढ़ते हुए सुदामा जब अपने गाँव पहुंचे तो अपने महल नुमा घर और पत्नी को पहचान भी नही पाए ......
प्यार का यह स्वरुप आज कहीं सुनने को भी नही मिलता .....शायद आज यह शब्द ही बेमानी है जिसकी किसी को आवश्यकता ही नही ...
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