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Wednesday, January 4, 2023

अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना

अरे चीथड़ों कब जागोगे , 
लूट मची है , पछताओगे !
खद्दर धारी बाजीगर हैं ,
और तुम बने जमूरे रहना !
सपने , रैली , भाषण मीठे
जीवन भर तुम पीते रहना
छोड़ देखना , स्वप्न सुनहरे 
भाग सके तो भाग सभी संग 
दुनिया फ़ायदा उठा रही है 
सीख लगाना डुबकी, तू भी
लूट सके तो लूट देश को , नहीं तो पीछे रह जाओगे  !
लूट मची है, पछताओगे !

शपथ उठाए संविधान की 
खद्दर पहने , नेता लूटें !
नियम और क़ानून दिखायें 
दफ़्तर वाले, बाबू लूटें !
हाथ में झंडा ले छुटभैया, 
धमकी देकर चौथ वसूले   
सब्जी वाला तक डंडी के  
बल पर, बहिन बनाके लूटे
उल्लू मत बन, बनो जुगाड़ू  
आँख उठा ले, राष्ट्रभक्त बन 
झूठ को सत्य बनाना सीखो , वरना बेटा क्या खाओगे !
देश लुट रहा पछताओगे !

आँखें खोलो नंगों तुम भी 
बहती गंगा में मुँह धो लो
फेंक मजीरा, तबला, ढोलक  
हर हर गंगे अलख जगा ले ! 
जय श्री राम बोल नेता को 
जीत दिलाकर शोर मचा ले 
हाथ में आएगा, घंटा ही ,
चाहे जितना ज़ोर लगा ले 
त्याग पसीना, बनो हरामी 
बुद्धि के बल नोट कमाओ 
फेंक रज़ाई फटी, लूट ले , वरना पीछे रह जाओगे  !
तुम वन्दे मातरम गाओगे  !

तुमको धांसू न्यूज़ सुनाकर  
प्रेस मीडिया नोट कमाये !'
तुमको भरमाने की खातिर 
चोर को साहूकार बताये  ! 
टेलिविज़न बनाए उल्लू ,
मीठे मीठे स्वप्न दिखाये !
जो घर को ही, चले लूटने  
उनके जयजयकार लगाए 
समय बचा है अब भी बकरे 
मूर्ख़ बनाना सीखो भोंदू  ,
वरना जीवन भर तुम लल्लू , क्या ओढ़ोगे क्या बिछाओगे  !
हाथ में बस घंटा पाओगे !

#व्यंग्य 

Friday, July 24, 2020

न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना

जब से फ्री व्हाट्सप्प और कई तरह के मेसेंजर आये है तब से दोस्तों के, परिवार जनों के गुड मॉर्निंग, विभिन्न अवसर पर बधाई सन्देश इतने आने लगे हैं कि अगर सब संदेशों का जवाब दिया जाये तो रोज सुबह एक घंटा कम से कम लगता है ! सन्देश भेजने वाला दोस्त कॉपी पेस्ट कर उस सन्देश को २० मित्रों को एक साथ भेजता है और भूल जाता है , उसकी यह समझ है कि इससे मित्रता संबंधों में गर्माहट रहती है , जबकि सच्चाई यह है कि अगर नेट पर एक सन्देश भेजने की कीमत 5 रुपया कर दी जाए तो सारी गर्माहट और प्यार गायब हो जाएगा और एक भी सन्देश भेजना दूभर हो जाएगा !

अगर आपस में वास्तविक प्यार है तो वह वक्त पर अपनी पहचान भी करा देगा और अहसास भी , उसके लिए कृत्रिम शब्दों का प्रयोग बिलकुल आवश्यक नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्रा है अगर प्यार का दिखावा करना आवश्यक हो तभी इन संदेशों की उपयोगिता है अन्यथा यह हमारे चारो और एक मास्क आवरण का काम ही करते हैं जो वक्त पर कभी दिखाई नहीं पड़ेंगे !  

यह दिखावा शायद हमारे देश में सबसे अधिक होता है , हैरानी की बात यह है कि कुछ अच्छे और शानदार व्यक्तित्व भी इसे आवश्यक मानकर इतना आत्मसात कर चुके हैं कि वे इसे आवश्यक मानते हैं और दूसरी तरफ से यही उम्मीदें भी करते हैं ! स्नेह और प्यार का अहसास अब इन कृत्रिम बधाई और नमन संदेशों ने ले लिया है !

मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? 

कुछ लोग मुझे कवि समझते हैं कुछ साहित्यकार जबकि यह सम्बोधन सुनकर मुझे चिढ होती है , 300 से अधिक कवितायें लिखी हैं
मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए ! 

आज हिंदी साहित्यकार गिने चुने ही बचे हैं और जो वाकई साहित्यकार हैं उनमें से भी अधिकतर अपनी जयकार बोलते चेलों से घिरे रहते हैं तो मुझे लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व सिर्फ अपने शिष्यों के बीच में ही साहित्यकार है , अभिव्यक्ति से इसका शायद ही कोई सरोकार हो और जिसकी भाषा ही सामान्य जन अभिव्यक्ति के किसी काम की न हो वह साहित्यकार हो ही नहीं सकता वह सिर्फ क्लिष्ट हिंदी शब्दों का उपयोग कर, अपनी विद्वता सिद्ध करने की कोशिश करता , एक तुच्छ जीव है जो गरीब हिंदी के ऊपर सवार होकर अपनी जयकार  बुलवाने में सफल रहा है !

प्रणाम आप सबको !!
    

Monday, June 8, 2020

बस्ती के मुकद्दर को ही जान क्या करेंगे -सतीश सक्सेना


ये कौम ही मिटी, तो वरदान क्या करेंगे !
धूर्तों से मिल रहे, ये अनुदान क्या करेंगे ?

गुंडों के राज में भी, जीना लिखा के लाये
बस्ती के मुकद्दर को ही
  जान क्या करेंगे ?

आशीष कुबेरों का, लेकर बने हैं हाकिम  
लालाओं के बनाये दरबान, क्या करेंगे ?

घुटनों पे बैठ, पगड़ी पैरों में मालिकों के !
बोतल में बंद हैं ये, मतदान क्या करेंगे ?

बेशर्म जमूरे और सच को जमीं बिछाकर
हथियार मदारी के , आह्वान क्या करेंगे !

इक दिन छटे अँधेरा विश्वास की किरण है 
जनतंत्र की व्यथा हैं, व्यवधान क्या करेंगे !

Tuesday, March 31, 2020

शाही सलाम में कलम, क्या ख़ाक लिखेगी ? -सतीश सक्सेना

जयकार में उठी कलम, क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में, खतरनाक लिखेगी !

अवसाद में निराश कलम , ज्ञान लिखेगी ?
मन भाव ही कह न सकी, चार्वाक लिखेगी ?

बस्ती को उजड़ते हुए देखा है , मगर वो   
तकलीफ ए क़ौम को भी इत्तिफ़ाक़ लिखेगी !

किसने दिया था दर्द, वह बतला न सकेगी !
दरबार के खिलाफ ,क्यों  बेबाक लिखेगी ?

सुलतान की जय से ही, वो धनवान बनेगी !
एतराज ए हुक्मरान को , नापाक लिखेगी !

Thursday, February 28, 2019

निरंकुश मीडिया बर्बाद कर देगा इस शानदार देश को,समाज को -सतीश सक्सेना

आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक वृद्ध मां को उसका बेटा निर्दयता पूर्वक जमीन पर घसीटता हुआ ट्रेक्टर के आगे ले जा रहा है ताकि उसे कुचल कर मार सके और यह घटना महाराष्ट्र 21जून की है जहाँ राष्ट्र गौरव की बातें सबसे अधिक की जाती हैं !
पिछले कुछ वर्षों में , हमारे देश में नफरत की खेती खूब की गयी है और उसका नतीजा भी नजर आने लगा है, मेरे अपने सर्किल में कई सरल ह्रदय व्यक्तियों के व्यवहार में फर्क आया साफ़ महसूस हो रहा है , पडोसी देश के प्रति उत्पन्न की गयी यह नफरत अब मोहल्ले, घर और ट्रैफिक में भी नजर आ रही है , सोशल मीडिया पर जिनके विचार हमसे न मिलें उन्हें अमित्र करना आम है ! अफ़सोस यह है कि नफरत फ़ैलाने वाले अधिकतर भोले लोग, यहाँ तक कि छोटे बच्चों तक के मानस में , टीवी पर चीखते एंकरों की बाते, अमिट निशान छोड़ रही हैं !

सीधा साधे शांत देश को , जिसमें समस्त जाति ,कौम के लोग आराम से रह रहे थे, इन लोगों ने अपने घरों में भी बच्चों को  झाग उगलते हुए गाली देना सिखा दिया है जिसे सब जोश के साथ आसानी से आत्मसात भी कर रहे हैं , इन जाहिलों को यह नहीं मालुम की स्नेह और प्यार की जगह अनजाने में तुम अपने घर में जहर बो रहे हो जिसकी आग में सबसे पहले तुम्हारे बच्चे ही झुलसेंगे जिन्हें इस माहौल में ही पूरी उम्र जीना है ! मानव की मानव के प्रति बढती हुई गुस्सा इन्हें जानवर बना देने में सक्षम है और शीघ्र यह सड़कों पर नजर आयेगी ! 

मारो , सबक सिखा दो के नारे लगाते, इन बेवकूफों को यह भी नहीं मालुम कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों में युद्ध का अर्थ , घना अन्धेरा होगा जिसमें दोनों ओर कोई नाम लेवा नहीं बचेगा , भारत पाकिस्तान में ताकत की तुलना सिर्फ पारम्परिक युद्ध होने तक ही संभव है , परमाणुशक्ति संपन्न देशों में यह तुलना सिर्फ मूर्खता पूर्ण विचार है , दोनों अपार जीव संहार और मानवता विनाश में सक्षम हैं यहाँ एक पक्ष के धन और जनशक्ति  का कोई मूल्य नहीं , परमाणु युद्ध होने पर लाखों सैनिकों, भरपूर हथियारों , हवाई जहाजों , और अरबों डॉलर का रिज़र्व धन एक क्षण में नष्ट हो जाएगा  और दो जाहिल शासकों के मनहूस स्मारक  के रूप में ,आसमान की जगह सिर्फ घना अन्धेरा बचेगा , जो सैकड़ों बरसों तक मानव की मूर्खता का अवशेष होगा !

यही कारण था कि विश्व का सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका का राष्ट्रपति आज वियतनाम आकर एक गरीब देश नार्थ कोरिया के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने को विवश हो रहा है और यही समय की पुकार भी है कि परमाणुशक्ति संपन्न  देश आपस में युद्ध की सोंच भी न सकें ! 

आज मैंने अपने घर से ललकारने वाले समस्त चैनल विदा कर दिए , सौम्यता से बात करने वाले चैनल ही देखना है इस हेतु न्यूज़ चैनल कम से कम देखूंगा , देखना है कि इस युद्ध यूफोरिया पर लगाम लगाने के लिए हमारी सरकार कब कदम उठाती है ! दुआ करूंगा कि भारत पाकिस्तान नेपाल बंगलादेश एक साथ एक संघ राष्ट्र का निर्माण करें और हम ईद पर होली के उत्साह से ,गले मिलकर, नफरत की करवटें लेना छोड़, आराम की नींद सो सकें ! 

Wednesday, January 16, 2019

हे प्रभु ! मेरे देश में ढोरों से बदतर, लोग क्यों - सतीश सक्सेना

हे प्रभु ! इस देश में इतने निरक्षर , ढोर क्यों ?
जाहिलों को मुग्ध करने को निरंतर शोर क्यों !

अनपढ़ गंवारू जान वे मजमा लगाने आ गए 
ये धूर्त, मेरे देश में , इतने बड़े शहज़ोर क्यों ?

साधु संतों के मुखौटे पहन कर , व्यापार में   
रख स्वदेशी नाम,सन्यासी मुनाफाखोर क्यों !

माल दिलवाएगा जो, डालेंगे अपना वोट सब 
देश का झंडा लिए सौ में, अठत्तर चोर क्यों !

आखिरी दिन काटने , वृद्धाएँ आश्रम जा रहीं !
बेटी बिलख रोई यहाँ,इस द्वार टूटी डोर क्यों !

Wednesday, May 16, 2018

उनसे कहिये,चलने का अंदाज़ बदल लें -सतीश सक्सेना

सुनी सुनाई खबरों पर,एतबार बदल लें !
झूठी खबरों के सस्ते अखबार बदल लें !

चलते, अहंकार की चाल,नज़र आती है !

उनसे कहिये,चलने का अंदाज बदल लें !

बच जाएगा, आया ऊँट पहाड़ के नीचे   
उंची गर्दन, नीची करके , चाल बदल ले !

तीखी उनकी धार , नहीं दरबार सहेगा !
चंवर बादशाही से ही,तलवार बदल लें  !

कोई मसालेदार खबर इन दिनों न आई 
उनको कहिये अपने गोतामार बदल लें !

Monday, January 8, 2018

करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !-सतीश सक्सेना


आग लगाई संस्कारों में 
सारी शिक्षा भुला गुरु की
दाढ़ी तिलक लगाये देखो  
महिमा गाते हैं कुबेर की !
डर की खेती करते,जीते 
नफरत फैला,निर्मम गीत !
करें दंडवत महलों जाकर,बड़े महत्वाकांक्षी गीत !

खद्दर पहने नेतागण अब
लेके चलते , भूखे खप्पर,
इन पर श्रद्धा कर के बैठे
जाने कब से टूटे छप्पर !
टुकुर टुकुर कर इनके मुंह 
को,रहे ताकते निर्बल गीत !
कौन उठाये  नज़रें अपनी , इनके टुकड़े खाते  गीत !

धन कुबेर और गुंडे पाले 
जितना बड़ा दबंग रहा है
अपने अपने कार्यक्षेत्र में 
उतना ही सिरमौर रहा है 
भेंड़ बकरियों जैसी जनता,
डरकर इन्हें दिलाती जीत !
पलक झपकते ही बन जाते सत्ताधारी, घटिया गीत !

जनता इनके पाँव  चूमती
रोज सुबह दरवाजे जाकर
किसमें दम है आँख मिलाये 
बाहुबली के सम्मुख आकर  
हर बस्ती के गुंडे आकर 
चारण बनकर ,गाते गीत !
हाथ लगाके इन पैरों को, जीवन धन्य बनाते गीत !

लोकतंत्र के , दरवाजे पर 
हर धनवान जीतकर आया
गुंडा राष्ट्र भक्त कहलाया 
राजनीति में जब पद पाया
अनपढ़ जन से वोट मांगने,
बोतल ले कर मिलते मीत !
बिका मीडिया हर दम गाये, अपने दाताओं के गीत !

खादी कुरता, गांधी टोपी,
में कितने दमदार बन गये  !
श्रद्धा और आस्था के बल 
मूर्खों के  सरदार बन गये !
वोट बटोरे झोली भर भर, 
देशभक्ति के बनें प्रतीक ! 
राष्ट्रप्रेम भावना बेंच कर, अरबपति बन जाएँ गीत !

Monday, August 7, 2017

एक मित्र को दी गयी सलाह - सतीश सक्सेना


अगर परिवार में कुछ समय से बिना कारण एक घातक लड़ाई का वातावरण तैयार हो चुका हो तो आपस में न लड़कर शांत मन से तलाश करें कि घर में कोई भेड़िया तो नहीं आ गया जिसे आपने कुत्ता समझकर घर की चौकीदारी ही सौंप दी हो !


अगर हम तुम्हें , बिन मुखौटे के पाते ! 
असल देखकर बस दहल ही तो जाते !

Thursday, June 22, 2017

ध्यान बटाने को मूर्खों का, राजा के सहयोगी आये ! - सतीश सक्सेना

भुला पीठसंकल्प कलियुगी आकर्षण में योगी आये,
वानप्रस्थ को त्याग,राजसुख लेने वन से,जोगी आये !

तड़प किसान खेत में मरते,ध्यान बटाने को भूखों का, 
योग सिखाने जोगी बनकर,राजनीति के ढोंगी आये !

महंगाई से त्रस्त,भूख बेहाल ग्राम,शमशान बना के,  
ध्यान बटाने को मूर्खों का, राजा के सहयोगी आये !

लालकिले तक पंहुचाने में जाने कितने पापड बेले,
अश्वमेध फल लेने अपना, भगवा पहने भोगी आये !

कष्ट दूर चुटकी में करने धूर्त,धर्म,भय चूरन लेकर,
रोगमुक्त करने माँ बहिनें,ये संपत्ति वियोगी आये !

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढ़ेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी लेट लेट कर 
सुरा सुंदरी, भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , 
हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं, कैसे कैसे लोभी गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी
कैसे  बनें यशस्वी गीत  ?
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना, पुरस्कार हथियाते गीत !


इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में 
साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिड़कें  दारु, मोहित होते मेरे गीत !

चारण, भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, 
खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Saturday, June 6, 2015

चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ! - सतीश सक्सेना

चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत को,वतन से मान मिलना चाहिए !

काम टेढ़ा कम नहीं पर जब भी नेताजी दिखें 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !

दांत तीखे हों,नज़र दुश्मन पे, मौक़ा ताड़ कर
मालिकों के दुश्मनों पर, वार करना चाहिए !

मालिकों की शान में जितने कसीदे हों, पढ़ें 
धूर्त को योगी , विरागी ही बताना चाहिए !

पार्टियों में सूट हो पर , जाहिलों के बीच में
राष्ट्रभक्तों को धवल खद्दर, पहनना चाहिए !

Wednesday, February 11, 2015

मफलर की आँखें - सतीश सक्सेना

अरविन्द का उदय , इस देश की भोले जनमानस में , ठंडी हवा के संचार का सूचक है ! जिस जनमानस पर अब तक सिर्फ श्वेतवस्त्र धारी राजनैतिक बदबूदार मदारियों का राज था वहां पर एक साधारण व्यक्ति के ईमानदार क़दमों की आहट पर आम जनता का विश्वास होना, एक सुखद सवेरे का आगमन जैसा लगता है !अरविन्द के आश्वासन पर, राजनैतिक लुटेरों और झंडों से बारबार धोखा खाए लोगों का विश्वास जगा है और उन्हें लगा है कि यह व्यक्ति बेईमान नहीं है !

 साधारण अशिक्षित ग्रामीण जनमानस, भारतीय गृहणियां, जो मनोरंजन  तथा ख़बरों के लिए सिर्फ लालची टेलीविजन  मीडिया पर निर्भर हैं तथा अपने कामों के लिए राजनीतिक धूर्तों और मदारियों के ऊपर भरोसा करने को मज़बूर हैं ! देश की ७० प्रतिशत से अधिक जनता शायद ही कभी किसी सरकारी दफ्तर में जाने की हिम्मत कर पायी होगी वे अपने कार्यों के लिए दलालों और इन राजनैतिक छुटभैयों की जान पहचान पर फख्र महसूस करते हैं और यह सोंचते हैं कि हमारे काम भी हो ही जाएंगे ! राशन कार्ड बनाने, बिजली वालों के सामने गिड़गिड़ाते, इन लोगों के
पास पैसे देकर , काम कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है !

जिस देश में अपने एमएलए और एमपी के पास जाने का मतलब ही  "काम " का हो जाना होता है , ९० % इन अनपढ़ों के बच्चों की नौकरियां, राजनीतिज्ञों के दलालों को पैसे देकर ही लगती हैं बशर्ते दलाल सही जगह ( साहब के पास ) पैसे पंहुचा दे !  राज्य सरकार की नगर पालिकाओं, सरकारी स्कूलों , लेखपालों , कंडक्टरों , ड्राइवरों, पुलिस में सिपाहियों और हवलदारों की भर्ती , रेलवे भर्ती बोर्ड  आदि की नौकरियों पर खद्दर धारियों की चेयरमैन शिप का कब्ज़ा है ! सरकारी नौकरियों में  हेराफेरी सबको पता है मगर कहीं कोई विद्रोह की आवाज नहीं सुनायीं पड़ती, सरकारी महकमों में बच्चों की नौकरी लगने की उम्मीद अखबारों के नुमाइंदों का मुंह भी बंद रखने में कामयाब है !

४५ वर्ष से ऊपर के लोग अधिकतर इस गुलाम विचारधारा को बढ़ाने के दोषी हैं , इन कमज़ोर और संकीर्ण दिमाग व्यक्तियों  का अपने घर में शक्तिशाली होने का अहसास होने के लिए , किसी नेता का पिट्ठू बनना आसान होता है उसके बाद यह चमचे अक्सर अपनी पीठ पर ताउम्र उस राजनैतिक पार्टी का नाम लिखाये फख्र महसूस करते घूमते रहते हैं ! इनका अपना कोई
व्यक्तित्व नहीं , यह सिर्फ अपने गुरुओं की विचारधारा के गुलाम हैं जो देश में नफरत फैलाने के दोषी हैं ! धर्म और आस्था के नाम पर , दूसरों के प्रति नफरत फैलाकर , भेंड़ बकरियों की भीड़ को अपनी पार्टी की तरफ हांकना और उन्हें सुरक्षा देने का वायदा दिलाने के कार्य, इस देश के पढेलिखे नवयुवक पहचानने लगे हैं और इसे रोकने के लिए कटिवद्ध हैं !
इस देश में सामान्य जन का विश्वास बेहद आहत हुआ है , त्रस्त और अशिक्षित जनता अपनी स्थिति में कुछ बदलाव लाने के लिए हर जगह जाने और सीखने के लिए तैयार रहती है , बाबा कामदेव , बापू विश्वासराम , साईं और साध्वियों  के समागमों के नाम पर लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी , आशान्वित आँखों से ताकते यह श्रद्धालु अपने बनाये हर गुरू द्वारा बुरी तरह लुटे और ठगे गए , इनके चढ़ावों से और आस्था स्वरुप हर गुरु ने हज़ारों लाखों करोड़ कमाए और देश की जनता को कालाधन बापस लाने का वायदा और राष्ट्रभक्त बनाने की ओजस्वी प्ररेणा दी  !

    
शुक्र है पढ़े लिखे नवजवानों की नयी पीढ़ी का कि वे लालची नहीं है वे मेहनत कर धन कमाने पर विश्वास रखते हैं, धर्म, कर्म, पाप, पुण्य , पाखण्ड दिखावे से बहुत दूर यह बच्चे एक सुखद संकेत हैं एवं अपने बड़ों की मानसिकता में परिवर्तन लाने को कटिवद्ध हैं !  
लगता है आने वाले समय में और इन लड़के लड़कियों में से बहुत सारे अरविन्द जन्म लेंगे, यह सुखद संकेत ,देश में नया बदलाव लाने में समर्थ होगा ! अब मफलर, दसलखा सूटों को पहचान चुका है इसीलिए बाकी काम अधिक आसान हो जाएगा ! निस्संदेह आने वाला समय,  इस देश की भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के लिए बेहद बुरा काल होगा, उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा मगर नवनेताओं को इन गिरगिटों से सावधान रहना होगा !


ये नेता रहे तो , वतन  बेंच देंगे !
ये पुरखों के सारे जतन बेंच देंगे

कुबेरों का कर्जा लिए शीश पर ये 
अगर बस चले तो सदन बेंच देंगे

नए राज भक्तों की इन तालियों
के,नशे में ये भारतरतन बेंच देंगे

मान्यवर बने हैं करोड़ों लुटाकर
उगाही में, सारा वतन बेंच देंगे ! - सतीश सक्सेना 

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

धूर्त काल के अन्धकार में ,  
हम प्रकाश ले आने वाले 

तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब तुम उस्तादों की 
जीवन में परवाह,  रही है !
रचनाएं, कवियों की जग में, इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, सांसें भूल गये हो !
चंद दिनों की मस्ती में ही ,
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को पाठ पढ़ाने 
चेष्टा बड़ी , अदाह रही है !
तुम पर कलम उठाने , अपनी इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्म विभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, 
कोई मीरा, रंगदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे, हुक्का भरकर 
तितली फूल फूल इठलाकर  
करती खूब धमाल रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ की ? दुनिया में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , 
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित, चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बल पर 
खुद को कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों 
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने कर ली, उतनी ही तनख्वाह रही है !

Thursday, May 22, 2014

अब दुमदार,दलाल मीडिया - सतीश सक्सेना

पहले था , दिग्पाल मीडिया !
अब दुमदार,दलाल मीडिया !

जबसे मुंह में , खून लगा है !
तब से  है,कव्वाल मीडिया !

राजनीति  से,  बकरे  आये  ! 
करता खूब हलाल मीडिया !

एक इलेक्शन, के आने पर ! 
जम के मालामाल मीडिया !

मूरख जनता  को , भरमाये !
रोज बजाये  गाल  मीडिया !

Tuesday, May 6, 2014

दुम को हिलाते रहिये -सतीश सक्सेना

अपने अरमानों के ये दीप , जलाते रहिये !
हर सड़े फूल को , फ़िरदौस बताते रहिये !

हाथ जोड़े , नज़र  मुस्तैद , दिखाये  रहिये ! 
आँख नीची रखें और दुम को हिलाते रहिये 

कौन जाने वे आज ,घर से लड़ के आएं हो 
उनके हमदर्द बन ,आँखों को भिगाते रहिये 

जब कभी आग लगी पाओ तो सब लोगों को 
आँख भर ख़ुद की ही तकलीफ़ दिखाते रहिए !

क्या पता कौन दिन, उम्मीद नज़र आ जाये 
हर इक महताब को, आदाब बजाते रहिये !

Saturday, March 15, 2014

कैसे कैसे लोग यहाँ, इंसान बताये जाते हैं -सतीश सक्सेना

माथे लंबा तिलक लगाये  
रूप धुरंधर बना लिया !
एक हाथ में रामायण 
दूसरे में डंडा उठा लिया !
वोट मांगते द्वार द्वार  ,
कुलवान बताये जाते हैं !
राजनीति में हैं जब से , गुणवान बताये जाते  हैं !

देश भक्ति के गाने गाकर 
सारे जग को मूर्ख बनाकर
भरे तिजोरी अपनी जाकर 
धर्म,देश गुणगान सुनाके 
सेवा कर मेवा खाओ, 
गुरुवाण बताये जाते हैं ! 
लिए तमंचा चाकू, ये हनुमान बताये जाते हैं !

नैतिक सामाजिक मूल्यों 
में बड़ी बनावट आयी है, 
राजाओं के आचरणों में 
बड़ी गिरावट, आयी है  ! 
चोर, उचक्के , राजा के , 
दीवान , बताये जाते हैं !
करें दलाली फिर भी, सेवादार बताये जाते हैं !

नोट करोड़ों पड़ें दिखायी 
कीर्तन करते राजगुरु का !
इंतज़ार मे बस चुनाव के 
वंदन गाते महाबली का ! 
सारे शहर में भोंपू से , 
कुलवान  बताये जाते हैं !
धन के बल पर बस्ती में,बलवान बताये जाते हैं !

पढ़े नहीं पर करें दलाली  
राजनीति से, नोट कमाए
बच्चों बच्चों ने देखा है ,
भोलेजन को मूर्ख बनाए 
बटमारों  की टोली  में , 
इंसान  बताये जाते हैं ! 
गलियों में  तस्वीर लगा, भगवान् बताये जाते हैं !

घर के बूढ़े मार लालची 
अश्वमेध को निकले हैं !
और पुलिंदे हत्यारों  के 
शोधपत्र में , बदले हैं !
हाथ खून से रंगे देश की 
आन बताये जाते हैं !
चोर उचक्के शंकर का, वरदान बताये जाते हैं !

लगता अपना धर्म इन्हीं 
के बल पर चलता आया है ! 
इन्ही के बल पर लगता
जैसे देश सुरक्षित पाया है !
लम्बा चोगा पहनाकर,
अफगान बताये जाते हैं ! 
चिथड़े हैं, पर रेशम का ,ये थान बताये जाते हैं !

चुनाव धुलाई मशीन : आभार काजल कुमार 


Saturday, January 18, 2014

बिन जाने तथ्यों की हंसी,उड़ाएंगे उल्लू के पट्ठे ! - सतीश सक्सेना

अक्सर हिंदी अधिपतियों के खिलाफ लिखने की, लेखकों की हिम्मत नहीं होती क्योंकि ऐसा करने वालों को न पुरस्कार मिलेगा, न मंच और उसकी कविता को सबसे बेकार रचना घोषित कर दिया जाएगा, किसकी हिम्मत है जो गुरु के खिलाफ लिखने वाले को छापे ! 
मंच पर परफ्यूम लगाए, हिंदी के मधुरिम आंगन में बदबू करते इन साहित्यकारों ने अपने चेहरे  की भावभंगिमा,फूहड़ हास्य, और हुक्का भरने की क्षमता की बदौलत, हर जगह अध्यक्ष पद हथिया रखे हैं  और इस माहौल में टेलीविजन कैमरों के ऑपरेटर , जिन्हें कविता व साहित्य की समझ ही नहीं, इन्हें साहित्य सम्राट मानकर, चमकाए जा रहे हैं ! 
फूहड़ रचनाओं के धनी, हिंदी अधिपतियों,कवियों, नेताओं एवं उन सबको यह रचना आदर सहित भेंट, जिन्होंने हिन्दी को कंगाल कर दिया !


भारत में, तथ्यों की हंसी , उड़ायेंगे उल्लू के पट्ठे !
बिना पढ़े सबको इतिहास पढ़ायेंगे उल्लू के पट्ठे !

निपट झूठ को आसानी से, सत्य बनाए चुटकी में,
निराधार को बार बार दोहराएंगे , उल्लू के पट्ठे !

दल्लागीरी के सपनों में, नेताजी के पैर चाटते ,
गंगू तेली को ही भोज बताएँगे , उल्लू के पट्ठे !

रंगमंच से भाषण देते, नेताजी की बात बात पर 
बड़ी देर तक ताली खूब बजायेंगे उल्लू के पट्ठे !

चोर उचक्के धूर्त सभी अब राम भक्त बनना चाहें
राजाओं के गीत जोर से गाएंगे , उल्लू के पट्ठे !

Saturday, November 2, 2013

बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं -सतीश सक्सेना

करवाचौथ मना के अब, बालाएं बाहर निकली हैं !
कैसे कैसे लल्लू  ले , महिलायें बाहर निकली हैं !

आज खरींदे, सोना चांदी,धन की वारिश होनी है !
धनतेरस पर उल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !


कितने लोग आज भी ऐसे , जो  बंधने को बैठे हैं !
बड़े मनोहर पल्लू ले , महिलायें बाहर निकली हैं !


जीवन इनका राजनीति में, पूंछ हिलाते बीता है ! 
गोरे रंग का कल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

पूंछ हिलाते देख इन्ही को , कुत्ते बस्ती छोड़ गए !
अपने अपने पिल्लू ले, महिलायें बाहर निकली हैं !

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