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Saturday, September 25, 2021

पता नहीं क्यों खाते पीते, ज्ञान की बातें, होती हैं -सतीश सक्सेना

डी पी एस ग्रेटर नॉएडा के, एक क्षात्र, रानू , जो कि, पढने लिखने में बहुत अच्छे होने के साथ साथ, खाने पीने में, भी मस्त हैं, के मन की बातें यहाँ दे रहा हूँ ! जब भी हम सब साथ साथ , खाने पर एक साथ बैठते तो बच्चों से उनके भविष्य की चर्चा तथा क्लास में उनकी पोजीशन की चर्चा जरूर होती ! स्वादिष्ट खाने के समय , पढाई की चर्चा , उनके मुहं का टेस्ट बदलने के लिए काफ़ी होती है ! 

मन को काबू कर अंग्रेजी 
ग्रामर लेकर , बैठा हूँ  !
जैसे तैसे रसगुल्लों से , 
ध्यान हटाए , बैठा हूँ !
मगर ध्यान में बार बार, 
ही आतिशबाजी होती है !
अलजब्रा के ही खिलाफ  
क्यों नारे बाजी होती है !
नाना,पापा की बातें सुन ,
नींद सी आने लगती है !
इतने बढ़िया मौसम में,एक्जाम की बातें,होती हैं !


समझ नहीं आते बच्चों के 
कष्ट , समस्याएं भारी !
पढ़ते, अक्षर नजर न आएं 
दिखे किचन की अलमारी ! 
टीवी पर कार्टून, यहाँ 
भूगोल की बाते होती हैं 
खाने पीने के मौसम मे, 
दुःख की बातें, होती हैं !
ग्रेट खली,इंग्लिश ग्रामर, 
में हर दम कुश्ती होती है !
जाने क्यों घर में हर मौके,क्लास की बातें होती हैं ?

फीस बढ़ा ले भले प्रिंसिपल 
पर बच्चों की क्लासों में !
चॉकलेट लडडू फ्री होंगे 
आने वाले , सालों में !
कठिन गणित का प्रश्न क्लास
में, मैडम जब समझाती हैं !
उसी समय क्यों याद हमारे,
मीठी बातें , आती हैं  !
बिना जलेबी और समोसा 
कैसे मन भी पढ़ पाए
सारे अक्षर गड्मड होते , खाली आंतें रोती  हैं !

हाथ में बल्ला लेकर जब मैं
याद सचिन को करता हूँ,
ध्यान लगा के उस हीरो का 
सीधा छक्का जड़ता हूँ !
मगर हमेशा अगले पल
ये खुशियां भी खो जाती हैं !
पता नहीं ,  जब  ध्यान 
हमारे कृष्णा मैडम आतीं हैं !
ऐसे मस्ती के मौके, क्यों  
याद सजा की आती है !
अक्सर घर में खाते पीते, ज्ञान  की बातें, होती हैं !

Sunday, July 26, 2020

पता नहीं मां ! सावन में यह आँखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते !
जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !

राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! अपने ही घर को  वह अपना नहीं कह पाती वह मायके में बदल जाता है ! !
नारी के इस दर्द का वर्णन बेहद दुखद है  .........

याद है उंगली पापा की 
जब चलना मैंने सीखा था ! 
पास लेटकर उनके मैंने 
चंदा मामा  जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद 
पापा की गोदी आती है  
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा 
मन , रोने को करता है !

बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज, 
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको

इकलापन सा इस जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ, लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठी ये 
आँखे झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ , 

मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या 
इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ 
भाई  की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,

खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की 
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग, छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए मुझको 

पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?

छीना सबने, आज मुझे 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग बिसरे, घर की यादें आती है !

Thursday, November 8, 2018

कल दिवाली मन चुकी है ,जाहिलों के शहर में -सतीश सक्सेना

खांसते दम ,फूलता है 
जैसे लगती जान जाए 
अस्थमा झकझोरता है, 
रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब  
यह धुआं गन्दी हवा में 
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने 
दीप आँखों में जले,अब 
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !

धूर्त, बाबा बन बताते 
स्वयं को ही राज्यशोषित 
और नेता कर रहे हैं ,  
स्वयं को अवतार घोषित 
चोर सब मिल गा रहे हैं 
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े 
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक 
देख ठट्ठा मारते, अब 
राम बंधक बन चुके हैं , जाहिलों के शहर में ! 

Friday, July 1, 2016

आ जाएँ , बैठें पास मेरे , बतलायें, भारत कहां लिखूँ - सतीश सक्सेना

लो आज  कष्ट की स्याही से
संतप्त ह्रदय का गान लिखूं
धनपतियों से इफ़्तार दिला 
मैं निर्धन का रमजान लिखूं 
बतलाओ तुमको यार कहूँ ,
या केवल मित्र सुजान लिखूं !
अनुराग कहां सम्मानित हो
मनुहार  रचाये  चरणों में  !
आ जाएं कभी आनंदमयी, बतलायें  व्यथा मन कहां लिखूं ! 

नेताओं को कह देश भक्त ,
अधपके देश की शान लिखूं 
धन पर मरते, सन्यासी को  
दरवेशों का लोबान लिखूं !
या बरसों बाद मिले, जीवन 
में, भूखे का जलपान लिखूं 
धनपति बनने को राष्ट्रभक्त 
उग आये, रातों रात यहाँ !
कह जाएं किसी दिन रूपमयी , मन का वृन्दावन कहां लिखूं !

सूरज  को श्रद्धा नत होकर , 
मंत्री का स्वागत गान लिखूं !
या तिल तिल कर मरते, निर्जल 
इन वृक्षों को , उपहार लिखूं !
उम्मीदों में , बादलों  सहित, 
आती बारिश जलधार लिखूं !
कोसों तक प्यार नहीं दिखता 
नफ़रत फैलाती , दुनिया में !
पथ दिखलायें ,अनुरागमयी, बोलें  न , बुलावन कहां लिखूं !

संक्रमण काल में गीत बना
कर छंदों का अपमान लिखूं 
या धूर्त काल में गीतों की 
चोरी कर काव्य महान लिखूं
फिर महागुरु के चरण पकड़ 
कर, उनको दिव्य सुजान लिखूं 
कवितायें जन्म कहाँ लेंगी  ,
गुरु शिष्य बिकाऊ जिस घर में,
आ जाएं एक दिन दिव्यमयी, कह जाएं, स्तवन कहां लिखूं  !

बंगाल सिंध कश्मीर कटा, 
नफरत में, हिंदुस्तान लिखूं ,
जिसके रिश्ते, आधे उसमें 
उस घर को, पाकिस्तान लिखूं !
गांधार, पाणिनी आर्यक्षेत्र को 
अब अफ़ग़ानिस्तान लिखूं !
कुल, जाति, धर्म, फ़र्ज़ी गुरुर 
पाले, नफरत में  हांफ रहे !
आ जाएं किसी दिन करुणमयी , समझाएं तपोवन कहां लिखूं !


Friday, April 22, 2016

! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना

आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है  ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !

जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!

है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !

निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि 
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !

नमस्तुभ्यं  मां शारदे,  वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !

आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !

हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !

गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !

Wednesday, January 27, 2016

आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ? - सतीश सक्सेना

क्या हुआ, ये सोच में  डूबी खुमारी किसलिए ?
आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ?

तुम तो कहते थे, न सोओगे , न सोने दो मुझे
आज ऐसा क्या हुआ,इतनी उबासी किस लिए ?

ऐसी क्या अवमानना की मानिनी की, प्यार ने
चमक चेहरे की हुई है,अमलतासी किस लिए ?

लगता घायल से हुए हो, जख्म गहरे दिख रहे
पागलों के पास जाकर मुंह दिखायी किसलिए ? 

ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को
इक दीवाने के लिए भी जग हँसायी किसलिए ?

Tuesday, December 29, 2015

एक अजनबी जाने कैसा गीत सुनाकर चला गया -सतीश सक्सेना

सो न सकूंगी आसानी से 
याद  दिलाती  रातों में !
बंद न हो पाएं  दरवाजे
कुछ तो था उन बातों में !
ले कंगन मनिहार बेंचने 
आया इकदिन आँगन में,
जाने कैसे सम्मोहन में , 
छेड़छाड़ कर चला गया !
पहली बार मिला, जूड़े में फूल सजा के चला गया !

रोक न पायीं अनजाने को
मंत्रमुग्ध सा आवाहन था !
सागर जैसी व्याकुलता में 
लगता कैसा मनमोहन था !
हृदय जीत ले गया चितेरा 
चित्र बनाकर, चुटकी में, 
सदियों से थे ओठ कुंवारे, 
गीले करके , चला गया !
बैरन निंदिया ऐसी आयी, मांग सज़ा के चला गया !  

उसके हाथ सुगन्धित इतने
मैं मदहोशी में खोयी थी !
उसकी आहट से जागी थी
उसके जाने पर सोयी थी !
केशव जैसा आकर्षण ले 
वह निशब्द ही आया था  
जाने कब मेंहदी से दिल का, 
चिन्ह बनाकर, चला गया !
कितनी परतों में सोया था दिल, सहला कर चला गया !

उसके सारे काम, हमारी
जगती आँखों मध्य हुए थे !
जाने कैसी बेसुध थी मैं ,
अस्तव्यस्त से वस्त्र हुए थे !
सखि ये सबके बीच हुआ
था, भरी दुपहरी आँगन में ,

पास बैठकर हौले हौले ,
लट सहला के चला गया !
एक अजनबी जाने कैसा, गीत सुनाकर चला गया !


Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस गाँव में,कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते औ ज्वार की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ चलाना भी इन गुलाबों को 
आज भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते हाक़िम  
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरसती है,जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,देश में  नाले देखे !

Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाओ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
क्या जरूरत जंगली से, प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




Monday, May 4, 2015

घनघोर घटायें बन जातीं,बंजारिन अखियाँ शाम ढले ! - सतीश सक्सेना

कड़वे तानें दरवाजे पर , दे जाएँ सखियाँ  शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले  !

मेरे आँगन में इक जोड़ा , 
बरसों से चीं चीं करता है !
जाने क्यों आता देख मुझे,
कुछ गुमसुम हो जाता है !
कसमें, वादे, सपने जैसे 
हँसते रोते , ही बड़े हुए  !
जाने किन पश्चातापों से, 
भर आईं अँखियाँ शाम ढले  !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले  !

शहनाई की धुन में अक्सर 
मंज़र , बाराती हो जाए !
ढोलक मृदंग के साथ सभी
चौखटें ,गुलाबी हो जाएँ !
ये स्मृति चिन्ह न जाने कब
से प्रश्न चिन्ह बन खड़े हुए !
जाने क्यों नज़र झुकाएं हैं,
चूड़ी की कनियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले !

सावन भादो तेरी यादों के 
दुनिया से छिपाए रहता हूँ !
ऐसे भी दिखाएँ क्यों आंसू 
बारिश में, चलते रोता हूँ !
कितने सपने रो पड़े बिना  
फूटी किस्मत से, लड़े हुए !
घनघोर घटायें बन जातीं,
बंजारिन अँखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले !

क्यों जाम उठाने से पहले 
आँखें भी छलके जाती हैं
मदिरालय में, मेरे आते ही 
साकी भी छल के जाती है
मैं आता दर्द भूलने को ,
पर जैसे  भाले गड़े हुए  !
हर बार शराबी प्याले में, 
रंजीदा अँखियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले !

कोई भी उदासी का फोटो,
तेरी नज़रें, दिल दहलाएं !
मुस्कान किसी चेहरे पे हो 
तू बार बार सम्मुख आये !
वे ख्वाब सुनहरे भी टूटे 
जो नवरत्नों से जड़े हुए  !
दिन जैसे तैसे कट जाता, 
लहराती रतियाँ शाम ढले !
तुमने ही भुलाये थे वादे, बतलायें चिड़ियाँ शाम ढले  !

Thursday, March 26, 2015

व्यास का स्मरण कर ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ - सतीश सक्सेना

सहज निर्मल मुस्कराहट से धरा गुलज़ार लिख दूँ !
भव्य मंगल दायिनी को, ईश का आभार लिख दूँ !

एक दिन उन्मुक्त मन से पास आकर बैठ जाओ
और बोलो नाम तेरे, स्वर्ग का अधिकार लिख दूँ !

काव्य अंतर्मन हिला दे, शुष्क मानव भावना में ,
समर्पण संभावना को प्यार का उपहार लिख दूँ !

मुक्त निर्झर सी हंसी पर, गर्व पौरुष का मिटा दूँ ,
तुम कहो तो मानिनी, अतृप्त की मनुहार लिख दूँ !

यदि तुम्हें  विश्वास हो, अनुराग की गहराइयों का !
व्यास का स्मरण कर, ऋग्वेद का विस्तार लिख दूँ !

Friday, February 27, 2015

बिना जिगर ही जिंदा हैं, हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं - सतीश सक्सेना

बिना जिगर हम जिंदा हैं पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !
कितनी बार मरे हैं , लेकिन यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

किससे वादे ,जीवन भर के ,
किसके हाथों में हाथ दिया !
किसके संग कसमें खायीं थी  
किसके जीवन में साथ दिया !
आंसू,मनुहार,सिसकियों का,
अपमान हमारे, हाथ हुआ !
अब  सब जग के आंसू पोंछें, पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

उस घोर अँधेरे जंगल में, 
कैसे मनुहारें सिसकी थीं
किसके सपनें बर्वाद हुए
कैसी दर्दीली हिचकी थीं 
तब किसने माँगा साथ मेरा,
उस समय कदम न उठ पाये !
अब सारी दुनियां जीत चुके, पर यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितने सपने कितने वादे  
बिन आँखे खोले टूट गए !
कितने गाने कितनी गज़लें 
गाये बिन, हमसे रूठ गए !
मुंह खोल नहीं पाये थे हम, 
सारे जीवन,घुट घुट के जिए !
चलना जब था तब चल न सके, अब यार बड़े शर्मिंदा हैं !

कितना अच्छा होता यदि हम 
मिलते ही नहीं इस बस्ती में !
कितना अच्छा होता यदि हम  
हँसते ही नहीं, उस मस्ती में !
उस राह दिखाने वाले को,
हमने ही अकेला छोड़ दिया !
खुद ही घायल कर अपने को,हम यार बड़े शर्मिन्दा हैं !

कितनी नदियां धीरे धीरे 
कैसे नालों में बदल गयीं !
जलधाराएं मीठे जल की  
कैसे खारों में बदल गयीं !
अपने घर आग लगा हँसते,
मानव जीवन का सुख लेते
कहने को यूँ हम जिन्दा हैं , पर यार बड़े शर्मिंदा हैं !

Wednesday, January 21, 2015

शुभी -सतीश सक्सेना

                       यह बाल कविता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है अपने परिवार में , 24 -25 वर्ष पहले, अपने बड़ों को यह सबूत देने को कि मुझे वाकई कविता लिखनी आती है ,सामने खेलती हुई, नन्ही शुभी (कृति )को देख , उसके बचपन का चित्र खींचा था !!   

छोटी हैं, शैतान बड़ी पर,
सबक सिखाएं प्यार का ! 
हाल न जाने क्या होना है, शुभी की ससुराल का !

दिखने में तो छोटी हैं ,
लेकिन बड़ी सयानी हैं ! 
कद काठी में भारी भरकम
माँ , की राज दुलारी हैं !
नखरे राजकुमारी जैसे 
इनकी मस्ती के क्या कहने 
एक पैर पापा के घर में 
एक पैर ननिहाल है !
दोनों परिवारों में यह,
अधिकार जमाये प्यार का !
हाल न जाने क्यों होना है, शुभी की ससुराल का !

चुगली करने में माहिर हैं 

झगडा  करना ठीक नहीं 
जब चाहें शिल्पी अन्नू को
पापा  से पिटवाती हैं  !
सेहत अपनी माँ जैसी है 
भारी भरकम बिल्ली जैसी 
जहाँ पै देखें दूध मलाई 
लार  वहीँ टपकाती हैं 
सुबह को हलवा,शाम को अंडा,
रात को पीना दूध का !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का  !

सारे हलवाई पहचाने 

मोटा गाहक इनको माने 
एक राज की बात बताऊँ 
इस सेहत का राज सुनाऊं 
सुबह शाम रबड़ी रसगुल्ला 
ढाई किलो दूध का पीना 
रबड़ी और मलाई ऊपर 
देसी  घी पी  जाती हैं !
नानी दुबली होती  जातीं ,  
देख के खर्चा दूध का  !
हाल न जाने क्यों होना है , शुभी की ससुराल का !

आस पास के मामा नाना 

इनको गोद खिलाने आयें
बाते सुनने इनकी अक्सर  
अपने घर बुलवायीं जाए  
तभी भी शुभी प्यारी हैं 
सबकी राज दुलारी हैं !
मीठी मीठी बाते कहकर 
सबका मन बहलाती हैं !
खुशियों का अहसास दिलाये,
किस्सा राजकुमारी का ! 
हाल न जाने क्या होना है , शुभी  की ससुराल  का  ! 

Thursday, November 20, 2014

बात करेंगे मेहनत की - सतीश सक्सेना

खूब लगेगी भूख अगर हम काम करेंगे जी भर के !

बात करेंगे मेहनत की
मन से हुई ,पढ़ाई की !
सबसे आगे , रहने की
अच्छे नंबर, लाने की !

क्लास रूम में सिर्फ पढ़ाई
की ही, केवल बात करेंगे !
टीचर जी को , ध्यान से सुनकर, ऐश करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
रिक्शे वाले भैया की !
बच्चों के आने जाने में 

बहते हुए, पसीने की !
अगर बिना घबराये हमने, 
संघर्षों की आदत डाली !   
तो हम भी मेहनत के बदले , मौज करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
बढ़िया खाना खाने की
होम वर्क करवाने की
बस से लाने जाने की !

उसी परिश्रम के फल से , 
हम खूब से पैसे पाएंगे !
मम्मी की मेहनत के बदले , मजे करेंगे जीभर के !

बात करेंगे मेहनत की
अपने प्यारे पापा की
सबकी जिम्मेदारी की 
घर में सबसे भारी की
उनके इस भरपूर प्यार से,
मन ने ताकत पायी है !  
पापा की मेहनत के बदले, राज करेंगे जीभर के !

Thursday, October 23, 2014

दीपोत्सव मंगलमय हो -सतीश सक्सेना

दीपोत्सव मंगलमय सबको 
गज  आनन,गौरी पूजा से !

दुष्ट प्रवृतियों से , लड़ने को 
अस्त्र मिले,खुद चतुर्भुजा से 

बुरी शक्तियां पास न आएं 
शक्ति मिले अर्जुनध्वजा से

हो सम्मानित, गौरव  तेरा 
तीक्ष्ण बुद्धि,अक्षय ऊर्जा से

सदा रहें , अनुकूल शारदा ,  
गृह रक्षित हो,अष्टभुजा से !



Sunday, September 21, 2014

मौत हर वक्त याद रखता हूँ ! - सतीश सक्सेना

सिर्फ इक बात याद रखता हूँ !
आखिरी रात , याद रखता हूँ !

मुझ पे प्यारों के,कर्ज बाकी हैं !
उनकी सौगात, याद रखता हूँ !

कौन जख्मों को सोंच कर रोये !
हर हसीं  रात,  याद रखता हूँ !

मौलवी और पंडितों को नहीं !
भले असरात , याद रखता हूँ !

जो कभी साथ ही न चल पाये
वे भी आघात, साथ रखता हूँ !





Wednesday, July 16, 2014

अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना

जाने से पहले दुनियां को,कुछ गीत सुनाकर जाऊंगा !
अनुराग समर्पण निष्ठा का सम्मान बढ़ाकर जाऊंगा ! 

श्री हीन हुए स्वर,गीतों के , झंकार उठाकर जाऊंगा !   
अनजाने कवियों के पथ में,ये फूल चढ़ाकर जाऊंगा !

निष्कपट आस्था श्रद्धा का अपमान न हों,बाबाओं से  
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखलाकर जाऊँगा !

लाचार वृद्ध,अंधे,गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिलाकर जाऊँगा !

कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा !

Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

धूर्त काल के अन्धकार में ,  
हम प्रकाश ले आने वाले 

तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब तुम उस्तादों की 
जीवन में परवाह,  रही है !
रचनाएं, कवियों की जग में, इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, सांसें भूल गये हो !
चंद दिनों की मस्ती में ही ,
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को पाठ पढ़ाने 
चेष्टा बड़ी , अदाह रही है !
तुम पर कलम उठाने , अपनी इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्म विभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, 
कोई मीरा, रंगदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे, हुक्का भरकर 
तितली फूल फूल इठलाकर  
करती खूब धमाल रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ की ? दुनिया में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , 
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित, चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बल पर 
खुद को कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों 
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने कर ली, उतनी ही तनख्वाह रही है !

Monday, June 16, 2014

उनको द्वारे पे ही अल्लाह याद आएंगे -सतीश सक्सेना


आज हम मुद्दतों के बाद , वहाँ जाएंगे !
ये तो तय है ,वे मुझे देख के घबराएंगे !

एक अर्से के बाद,दर पे उनके आया हूँ !
सामने पा ,उन्हें अल्लाह  याद आएंगे !

काश उस वक़्त,सहारे के लिए हो कोई !
वे मुझे  देख के हर हाल, लडख़ड़ायेंगे !

वे तो शायद मुझे, पहचान ही नहीं पाएं !
जवां आँखों से छिने ख्वाब याद आएंगे !

यादें उनको तो वहीँ छोड़ के आना होगा !
वरना मिलने पे तो , वे होंठ थरथराएँगे !

Sunday, June 15, 2014

अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना

ओठों पर आ जाए जो उस गीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उस संगीत की बातें करते हैं !

अम्मा दादी नानी बाबा से  हम चलना सीखे हैं ,
स्नेही आँचल में कटे , अतीत की बातें करते हैं !

जीवन भर तस्वीर संजोये , लेकिन ढूंढ न पाए हैं,
अपने सपनों में आये उस मीत की बातें करते हैं !

हमको कौन शाबाशी देगा , सन्नाटों में रहते  हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से, प्रीत की बातें करते हैं !

कंगूरों से  रही लड़ाई ,  इंसानों से प्यार किया !
ऐसे बुरे समय में भी हम, जीत की बातें करते हैं ! 
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