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Sunday, July 26, 2020

पता नहीं मां ! सावन में यह आँखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते !
जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !

राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! अपने ही घर को  वह अपना नहीं कह पाती वह मायके में बदल जाता है ! !
नारी के इस दर्द का वर्णन बेहद दुखद है  .........

याद है उंगली पापा की 
जब चलना मैंने सीखा था ! 
पास लेटकर उनके मैंने 
चंदा मामा  जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद 
पापा की गोदी आती है  
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा 
मन , रोने को करता है !

बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज, 
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको

इकलापन सा इस जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ, लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठी ये 
आँखे झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ , 

मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या 
इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ 
भाई  की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,

खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की 
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग, छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए मुझको 

पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?

छीना सबने, आज मुझे 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग बिसरे, घर की यादें आती है !

Friday, February 9, 2018

उम्मीदें कुछ कम कर बेटा -सतीश सक्सेना

अर्थ अनर्थ है,अक्सर बेटा !
शब्द अर्थ,रूपान्तर बेटा !


क्रूर, कुटिल, सूखे पत्थर में ,
धड़कन,न तलाश कर बेटा !

सूख गए , तालाब प्यार के
अब न रहे, पद्माकर बेटा !

इस निष्ठुर जंगल में तुमको
मिलें खूब , आडम्बर बेटा !

अच्छे दिन जुमले हैं केवल,
उम्मीदें कुछ कम कर बेटा !


Tuesday, October 21, 2014

कवि कैसे वर्णन कर पाए , इतना दर्द लिखाई में - सतीश सक्सेना

कहीं क्षितिज में देख रही है
जाने क्या क्या सोच रही है
किसको हंसी बेंच दी इसने
किस चिंतन में पड़ी हुई है

नारी व्यथा किसे समझाएं,
गीत और कविताई में !
कौन समझ पाया है उसको, तुलसी की चौपाई में !

उसे पता है, पुरुष बेचारा
पीड़ा नहीं समझ पायेगा
दीवारों में रहा सुरक्षित 
कैसे दर्द, समझ पायेगा
पौरुष कब से वर्णन करता, 
आयी मोच कलाई में !
जगजननी मुस्कान ढूंढती , पुरुषों की प्रभुताई में !

पीड़ा, व्यथा, वेदना कैसे
संग निभाएं बचपन का 
कैसे माली को समझाएं 
26 अक्टूबर जनवाणी

कष्ट, कटी शाखाओं का 
सबसे कोमल शाखा झुलसी,
अनजानी गहराई में !
कितना फूट फूट कर रोयी , इक बच्ची तनहाई  में !

बेघर के दुःख कौन सुनेगा ,
कैसे उसको समझ सकेगा ?
अपने रोने से फुरसत कब
जो नारी को समझ सकेगा ?
कैसे छिपा सके तकलीफें, 
इतनी साफ़ ललाई में !
भरा दूध आँचल में लायी, आंसू मुंह दिखलाई में !

कैसे सबने उसके घर को
सिर्फ, मायका बना दिया
और पराये घर को सबने 
उसका मंदिर बना दिया
कवि कैसे वर्णन कर पाए , 
इतना दर्द लिखाई में !
कैसी व्यथा लिखा के लायी ,अपनी मांगभराई में !

Monday, April 28, 2014

जाते जाते रुला गया है कोई - सतीश सक्सेना

our dear Goofy (31 Dec 2006 -27april 2014)
अपना घर त्याग,वो गया है कहीं ! 
थक के लगता है सो गया है कहीं !

बड़ी हिम्मत से , लड़ रहा था वह !
अपनी चौखट से,खो गया है कहीँ ! 

बड़े मज़बूत दिल का,  बच्चा था !
लड़ते लड़ते ही , तो गया है कहीं !

जाने किस कष्ट से, भिडा इकला !
मर के भी  प्यार,बो गया है कहीँ !

किसने छीना है,उसका घर यारोँ 
आज विश्वास , रो गया है  कहीं ! 

Wednesday, April 16, 2014

गीतकार की हर कविता के, जाने कितने माने होंगे -सतीश सक्सेना

घने कष्ट  और वीरानों में , तुम्हें गीत भी गाने होंगे !
कितनी बार अकेले बेमन,उत्सव तुम्हें मनाने होंगे !

सांस नहीं ले सके सुबह से,ऐसे कैसे शाम हो गयी,
बारिश के आने से पहले,उजड़े छप्पर छाने होंगे !

अंतिम क्षण तक टूट न पाएं , ऐसे हों ये रिश्ते नाते ,
आधी जान हमारी उस घर ,वे कैसे अनजाने होंगे !

अर्थ, समीक्षाकार लिखेंगे,कैसे उनकी बात बताऊँ ,
गीतकार की हर कविता के,जाने कितने माने होंगे !

स्वाद हमें कड़वे शब्दों का,बड़े सबेरे ही मिल जाता,

जलतरंग सी मीठी ध्वनि को, चूड़ी कंगन लाने होंगे !

गिनती के दिन चुकने आये,अपने सारे काम करा लें !
कौन जानता कल सतीश के जाने कहाँ ठिकाने होंगे !


Saturday, March 29, 2014

कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने -सतीश सक्सेना

कैसे प्यार छिना, पापा की 
गुड़िया , का दरवाजे से ,
कैसे जुदा हुई थी लाड़ो    
भारी गाजे बाजे  से  ! 
जब से विदा हुई है घर से ,
क्या कुछ बहा, हवाओं में !
कुछ तो दुनिया ने समझाया , कुछ अम्मा की बांहों ने !

किसने सीमाएं समझायी 
किसने गुड़िया छीनी थी !
किसने उसकी उम्र बतायी 
किसने तकिया छीनी थी !
कहाँ गए अधिकार पुराने, 
क्या सुन लिया दिशाओं में ! 
कुछ तो बहिनों ने बतलाया, कुछ कह दिया बुआओं ने !

कहाँ गया भाई से लड़ना

अपने उन , सम्मानों को  !
कहाँ गया अम्मा से भिड़ना 
अपने उन अधिकारों को !
कुछ तो डर ने समझाया था 
कुछ पढ़ लिया रिवाजों में  !
कुछ भाभी ने हंसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने !

पापा की जेबें, न जाने 
कब से राह , देखती हैं !
कौन तलाशी लेगा आके
किसकी चाह देखती हैं !
कुछ दूरी पर रहे लाड़ली, 
सुखद गांव की छावों में !
कुछ गुलमोहर ने समझाया, कुछ घर के सन्नाटों ने !

कैसे  बड़ी हो गयी मैना
कैसे उड़ना सीख लिया !
कैसे  ढूंढें, तिनके घर के ,
कैसे  जीना सीख लिया !
खेल, खिलौने खोये अपने, 
इन ससुराल की  राहों में !
कुछ तो आंसू ने समझाया , कुछ बाबुल की बाँहों ने !

Wednesday, February 26, 2014

प्राणायाम - सतीश सक्सेना

हाँ जिज्जी ( मेरी बेटी  ),  क्या कर रही है ?
पप्पा ! वाशरूम से बाहर निकला हूँ !
कितने गिलास पानी पिया  ?
३ गिलास आधा घंटे पहले पी चुकी हूँ , पापा मैं इससे अधिक नहीं पी सकती लगता है वोमिटिंग हो जायेगी , और ऑफिस भी जाना है !
ओके , अब क्या करना है ?
घर की बालकनी में बैठकर प्राणायाम करना है , जैसे अपने बताया है ..
वह तो क्रिया थी जो बतायी थी अब ध्यान से जो मैं कह रहा हूँ वह सुनों .... 
प्राणायाम का अर्थ प्राण ( सांस ) पर नियंत्रण होता है ! शरीर में अगर सांस नहीं तो कुछ नहीं बेटा  , गहरी सांस लेकर अपने फेफड़ों को पूरा फुलाना है , और निकालना है !पता है फेफड़ों को जब सांस से भर रही तो तो क्या होता है ?
 

-शुद्ध ऑक्सीजन जीवन का आधार है, ब्लड वैसेल ( रक्त वहितकाओं ) के जरिये यह हमारे शरीर के हर अंग को जीवित रखने में मददगार है ! शुद्ध ऑक्सीजन हवा के साथ हमारे फेफड़ों में जाकर, रक्त में मिलकर उसे शुद्ध और हल्का बनाती है और यही रक्त शरीर के दूर दूर तक के अंगों को फुर्तीला और मज़बूत बनाता है !  

-शुद्ध ऑक्सीजन अंदर फेफड़ों में भर कर उन्हें फुला रही है , उससे फेफड़ों के बंद चेम्बर जो इस व्यायाम को न करने के कारण बंद हो गए थे, वे खुलेंगे और अधिक शक्तिशाली बन पाएंगे !

सांस बाहर छोड़ते समय विचार करो कि शुद्ध ऑक्सीजन अंदर खींचकर फेफड़ों के बंद चेंबर खोल रही हो उस समय सीना बाहर आएगा क्योंकि फेफड़े फूल हुए हैं कुछ देर सांस रोक कर रखो और पेट के ढीले ढाले हिस्से को अंदर खिंच कर पीठ से मिलाने का प्रयास करो !  प्राणायाम की इस क्रिया से फेफड़े और पेट के अन्य अवयवों जैसे किडनी , लीवर आदि का व्यायाम भी हो रहा है !
- जैसे जैसे हमारी बॉडी ऑक्सीजन का उपयोग करेगी उसमें से वेस्ट प्रोडक्ट के रूप में कार्बन डाई ऑक्साइड का निर्माण होगा जिसे हमारा शरीर सांस के जरिये बाहर निकाल देगा !
-सुबह की स्वच्छ हवा में मिली ऑक्सीजन का भरपूर सदुपयोग, पूरा जीवन ,निरोग रखने में सहायक होगा !  

-इंसान को जीने के लिए हवा, पानी और भोजन आवश्यक है !  
-शरीर को मोटापा रहित बनाने के लिए १२ - १५ गिलास जल रोज पीना होगा !
-सुबह वृक्ष के नीचे बैठकर आधा घंटे प्राणायाम करना होगा ! 
-हज़ारो साल पहले जंगलों में रहते इंसान के पास प्राकृतिक तौर पर भोजन के लिए पत्तियां और फल उपलब्ध थे ! सो हमेशा खूब सारी पत्तियां और अपने आप टूट कर गिरे पके फल ही हमारा भोजन होना चाहिए !
ध्यान रहे समोसा , परांठा , पकौड़े, गुलाबजामुन , जलेबी जंगलों में नहीं उगते थे यह हमने कंक्रीट के जंगलों में खुद बनाये थे सो इन्हें खाना छोड़ना है ! 
-चीनी और चीनी कि कोई भी बनायी गयी  मिठाई जैसे खीर ,सिवइयां और तली हुई भोजन सामग्री शरीर में सबसे हानिप्रद है इसका उपयोग किसी भी रूप में बंद करना होगा !
आशा है आज का यह सबक मेरे बच्चे याद रखेंगे  ! 
स्वस्थ और हँसते लम्बे जीवन की कामनाओं के साथ !
पापा  

Tuesday, October 15, 2013

मुझसे मिलने सकुचाता सा , बच्चा इक प्यारा आया था -सतीश सक्सेना

                 आज मेरे दूसरे बेटे ( दामाद ) इशान का जन्मदिन है, यह और गरिमा दोनों ही एक मशहूर अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं , बेहद हंसमुख इशान,जब से मेरे परिवार में शामिल हुए हैं , घर की रौनक में चार चाँद लग गए हैं !  

मेरे  परिवार के अम्बर में , ईशान सा  तारा कौन हुआ ,
मेरी लाड़ली जिसको प्यार करे,ऐसा बंजारा कौन हुआ ?

जिसके आने से महफ़िल में,चेहरों पर रौनक आ जाए ,
रिमझिम सी,आवाजों वाला,ये नीर फुहारा कौन हुआ ?

जो अपनी चिंता भुला,सभी को खूब हंसाये खुश होकर !
लोगों को हंसना सिखलाये,ईशान से प्यारा कौन हुआ !

मुझसे मिलने,संकोच लिये,बच्चा इक प्यारा आया था !

लगता सदियों से जान रहे, इस तरह हमारा कौन हुआ !

इस मीठे स्वर के जादू ने, तकलीफ मिटाई गलियों से !
जो अपने कष्ट कभी न कहे, इस तरह सहारा कौन हुआ !
 

Monday, September 9, 2013

नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे ! - सतीश सक्सेना !

गुडिया की विदाई के बाद , पहली बार उसका बचपन याद आ गया , फलस्वरूप कुछ पंक्तिया उसके बचपन की याद करते हुए ...
 मेरी गुड़िया अपनी गुड़िया के साथ 

अपने सीने पर, चिपकाकर, इन्हें सुलाया करते थे ! 
इनकी चमकीली आँखों में, हम खो जाया करते थे !

कोई जीव  न भूखा जाये , गुडिया के दरवाजे से !
कुत्ते, बिल्ली, और कबूतर, इन्हें लुभाया करते थे !

गले में झूलें हाथ डालकर, मीठी पुच्ची याद रही !
इनकी मीठी मनुहारों में ,हम खो जाया करते थे !

दफ्तर से आने पर  छिपतीं ,पापा  आकर  ढूंढेंगे !
पूरे घर में इन्हें ढूंढ कर, हम थक जाया करते थे !

पायल,चूड़ी ,लहंगा, टीका,बिंदी, मेंहदी विदा हुईं !
नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे !


Monday, August 19, 2013

अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे हैं -सतीश सक्सेना

ऐसे ही एक भावुक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....
बेटी की विदाई के साथ ही , उसका घर, मायके में बदल जाता है , हर लड़की के लिए और उसके भाई के लिए, एक कमी सी घर में हर समय कसकती है कि कहाँ चला गया इस घर का सबसे सुंदर टुकड़ा ...फिर एक मुस्कान कि हमारी लाडो अपने घर में बहुत खुश है ...  

हम दोनों जन्मे इस घर में 
औ साथ खेल कर बड़े हुए
अपने इस घर के आंगन में  
घुटनों बल, चलकर खड़े हुए
तू विदा हुई शादी करके 
पर इतना याद इसे रखना 
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं रक्षक हूँ , तेरे घर का  !
अब रक्षा बंधन के दिन पर , घर के दरवाजे , बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था !
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घरद्वार सजाया जाता था !
होली औ दिवाली उत्सव 
में, पकवान बनाये थे हमने 
लेकिन तेरे घर से जाते ही 
सारी रौनक ही चली गयी 
राखी के प्रति , अनुराग लिए , उम्मीद लगाए बैठे हैं  ! 

पहले इस घर के आंगन में

संगीत , सुनाई पड़ता था  !
मुझको घर वापस आने पर ,
ये घर रोशन सा लगता था !
झंकार वायलिन की सुनकर
मेरे घर में उत्सव लगता था 
जब से तू जिज्जी विदा हुई 
झाँझर पायल भी रूठ गयीं  
आहट  पैरों  की, सुनने  को, हम  कान  लगाए  बैठे  हैं  !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी !
चीं चीं करती, अपनी  बातें 
सब मुझे सुनाया करती थी !
तेरे जाते ही चिड़ियों सी 
चहकार न जाने कहां गयी !
जबसे तू विदा हुई घर से , 
हम लुटे हुए से , बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं !

पहले घर के,  हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
पापा की लाई चीजों पर 
हर बात पे झगड़ा करती थी 
जबसे गुड्डे, संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए  से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
हम सब उसके आगे पीछे 
वो खूब लाडली होती थी  
तब राजमहल सा घर लगता
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी, आना छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए , उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

Tuesday, August 6, 2013

ये लड़कियां -सतीश सक्सेना


सावन में, हरियाली तीजों का त्यौहार,लड़कियों के लिए बहुत महत्व रखता है  ! हरियाली तीज अथवा कजली पर विवाहित लड़कियों को घर (जो विवाह बाद ही समाज द्वारा, मायके में बदल दिया जाता है ) बुलाने का रिवाज़ है , और बेटियों को भेंट आदि दी जाती हैं !
विवाह के बाद, पूरे जीवन ये स्नेही बेटियाँ अपने पिता और भाई की तरफ आशा भरी नज़र से देखती हैं कि सावन में, उसके घर से  पिता अथवा  भाई ,उसे अपने घर ले जाने ,उसकी ससुराल आएगा !

आज के माहौल में, अधिकतर घरों में लड़कियों को वह स्नेह नहीं मिल पाता, जिसकी वे हकदार होती हैं , इसके पीछे अक्सर ननद भाभी के मध्य उत्पन्न कडवाहट ही अधिक होती है ! दुखद है कि माँ बाप के कमज़ोर होते होते, यह तेजतर्रार लड़कियां, धीरे धीरे अपने घर (मायके)  से बिलकुल कट सी जाती हैं !

अक्सर लड़कियां,अपने आपको, अपने भाई का सबसे बड़ा हितचिन्तक समझती हैं , नतीजा अनजाने में , बहू के प्रति, माँ और बेटी की आपस में खुसुर पुसुर शुरू हो जाती है, यही कडवाहट की पहली वज़ह होती है ! कोई भी लड़की यह नहीं चाहती कि उसके परिवार में ननद की दखलंदाजी हो, नतीजा एक रस्साकशी की बुनियाद, पहले दिन से ही, उनके घर में रख जाती है , और भुक्त भोगी होता है पति, जो बेचारा यह तय ही नहीं कर पाता कि वह क्या करे !

लड़कियों को चाहिए कि शादी के बाद वे,अपनी भाभी को, भाई से अधिक सम्मान , दिल से दें, मायके में अनाधिकार हस्तक्षेप न करके, अपने नए घर की परवाह करें और उसे संवारने में अपना समय लगाएं न कि पूरे जीवन के लिए अपनी  भाभी के घर में लड़ाई की नींव रखें , ऐसा होने पर यकीन करें, भाभी इस कष्ट को कभी भुला न पायेगी !याद रखने की आवश्यकता है कि कोई लड़की अपने ऊपर हर समय नज़र रखा जाना पसंद नहीं करेगी ! 

                  यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नयी बहू, को अधिक देर तक उसके हको से वंचित नहीं किया जा सकता और समझदार माता पिता कभी भी , आने वाली बच्ची पर अपनी इच्छाएं नहीं लादते बल्कि अपनी बेटी से अधिक उसे पहले दिन से प्यार करते हैं ! 

                  और आज जब मैं किसी बहिन को, अपने ही घर के ड्राइंग रूम में, मेहमान की तरह बैठे देखता हूँ तब मुझे बेहद तकलीफ होती है  !

अगर यह विषय अच्छा लगा हो तो यह भी पढ़ें ...क्लिक  करें  

Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 
घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए , सब गाएंगे  इसके गीत ! 

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !

Saturday, November 17, 2012

गुडिया की रंगोली -सतीश सक्सेना


यह खूबसूरत रंगोली मेरी बेटी हर वर्ष अपने घर के आंगन में बनाती रही है ! इस वर्ष से उसका अपना घर , मायके में बदल जाएगा अतः उसकी यह अंतिम रंगोली है जिसे उसने अपनी भाभी विधि के साथ बनाया है ! संयोग से विधि की, अपने घर में, यह पहली रंगोली है !

मेरी गुडिया ने, विवाह से पूर्व, इस घर के प्रति अपनी  जिम्मेवारियां, विधि को सौंपने की शुरुआत, इस रंगोली से कर दी, और विधि ने अपने घर में पहली रंगोली बनायी !
                                            चार्ज देने और लेने की परम्परा,  सुख से अधिक दुखदायी है ...मोह छोड़ा नही जाता , बेटी से बिछड़ना, बेहद कष्ट कारक है , मगर हकीकत स्वीकारनी होगी !

इस मौके पर, विश्वयात्री एडम परवेज़  ने भी जमकर, इन दोनों की मदद की ! एडम बेटी के विवाह में शामिल होने के लिए, आजकल हमारे मेहमान है ! विश्व भ्रमण पर निकला यह अमेरिकन ४६५ दिन से, अपने घर से बाहर है और हमारा देश, इस यात्रा में उसका ६५ वां देश है ! दिवाली के दिन इस रंगोली पर एडम ने लगभग ४ घंटे काम किया ! हिन्दुस्तानी कल्चर में यह विदेशी योगदान भुलाया नहीं जाएगा !

Friday, May 4, 2012

आओ बच्चो मिल कर के ये कसम उठानी है - सतीश सक्सेना

कल ज्योतिपर्व प्रकाशन के डिज़ाईनर अबनीश ने मेरे गीत पर काम करते करते , मुझे बताया कि उन्हें गीतों का गहरा शौक है ,एक बार पिता के कहने पर उन्होंने चार लाइने लिख कर एक मंच पर सुनाई थी , पहली लाइन "शीर्षक " सुनकर, अवनीश के अनुरोध पर यह रचना की गयी , आओ बच्चो मिलकर के इक कसम उठानी है " पर लिखी इस रचना को महसूस करें !

एक रंग है सबके अन्दर  
एक   सा  भोजन  पायें  !  
एक पिता है सबके अंदर
तब क्यों नज़र झुकाएं  !
फिर क्यों  ऊँच नीच 
समझाती,राम कहानी है !
आदि ग्रन्थ बदले स्वारथबस , यही कहानी है  !

कमजोरों को प्यार करेंगे 
साथ बैठकर  बात करेंगे 
कष्ट दूसरों का समझेंगे  !
एक  साथ खाना खायेंगे  !
और आक्रमणकारी  को  
इक  सीख  सिखानी है 
आओ बच्चो मिलकर के, इक कसम उठानी है !

अपनी माँ  की इज्ज़त जैसी 
महिलाओं की  इज्ज़त होगी 
जैसी अपनी बहिन सुरक्षित 
और सभी की करनी होगी  !
प्रथम सुरक्षा  उनकी , 
जिनकी भीत पुरानी है !
आओ बच्चों मिलकर के ,एक प्रीत जगानी है !  

थके चरण कमजोर पड़े हैं !
हम बच्चों के लिए चले हैं ,
हाथ थक गए मेहनत करते 
हमको मंजिल पर पंहुचाते  
कसम तुम्हे इन छालों की,
बस आस जगानी है !
नेह दिया, मृदु बाती  से , एक ज्योति जगानी है  !

Tuesday, November 22, 2011

आपका स्नेहाशीर्वाद चाहिए -सतीश सक्सेना



"सतीश जी ने इस बीच दो बहुत बड़ी खुशखबरी सुनाई...पंजाबी टच वाली इन खुशखबरियों का राज़ मैं यहां नहीं खोलने जा रहा..उम्मीद करता हूं कि सतीश जी खुद ही किसी पोस्ट में ये जानकारी देंगे..."
             उपरोक्त लाइनें, भाई  खुशदीप सहगल ( वरिष्ठ प्रोडयूसर जी न्यूज़ और मशहूर ब्लाग लेखक) की हैं, जिनके स्नेह ने मजबूर कर दिया कि मैं अपनी व्यक्तिगत खुशियों से  ब्लोगर साथियों को अवगत कराऊँ !
बेटी गरिमा की, उसके जन्मस्थान से, विदा की तैयारी की शुरुआत हो चुकी है , एक राजकुमार मिल चुका है, जिसने मेरी  लाडली को  खुश रखने का वायदा किया है,  बड़ा  ही प्यारा कोलगेट स्माइली बच्चा है !:-)
अमेरिकन एक्सप्रेस में, साथ साथ काम करते इन दोनों बच्चों ने एक साथ जीवनसूत्र में बंधने का फैसला किया है जिसको हम दोनों परिवारों ने सहर्ष मंज़ूर कर लिया है ! खुशकिस्मत महसूस करता हूँ कि  इशान  के माता पिता सुभाषिनी - जितेन्द्र कुमार , बहुत ही प्यारी शख्शियत के मालिक हैं और नॉएडा में ही रहते हैं !
१७ नवम्बर को नॉएडा गोल्फ क्लब में हुए सगाई समारोह में, इन दोनों बच्चों ने एक दूसरे को अंगूठी पहनाकर , समस्त परिजनों के सामने , साथ साथ, हँसते हुए जीवन बिताने का वचन  लिया है ! 


        यह स्वर्णिम क्षण, मेरे जीवन के अनमोल क्षणों में से एक रहेगा , मेरी कामना है कि हमारे दोनों परिवार एक दूसरे के प्रति वह स्नेह और अपनापन दे सकें जो आजकल के व्यस्त समय में अन्यन्त्र दुर्लभ लगने लगा है !
            आजकल विवाह के बाद, अक्सर बच्चों के परिवारों के मध्य केवल दिखावे का स्नेह मिलता है जो त्योहारों अथवा परिवारों में शुभवसरों पर ही मुखर होता है ! मेरी कामना है कि हमारे दोनों परिवार परस्पर स्नेह और अपनापन का एक उदाहरण कायम कर सकें !
              इशान -गरिमा  के लिए आपका स्नेहाशीर्वाद, उनके लिए मज़बूत घरौंदे की बुनियाद रखेगा !

Tuesday, October 11, 2011

लड़कियों का घर ? - सतीश सक्सेना

गरिमा, पिता के साथ  
पहले इस नंदन कानन में 
एक राजकुमारी  रहती थी 
घर राजमहल सा लगता था 
हर रोज दिवाली होती थी ! 
तेरे जाने के साथ साथ,चिड़ियों ने भी आना छोड़ा ! 

                  मैंने इस गीत द्वारा, घर से बेटी की विदाई के बाद, भाई और पिता की  स्थिति का, एक शब्द चित्र खींचने का प्रयास किया था  ! इस मार्मिक गीत को, लिखने के बाद, छलछलाती आँखों के कारण , मैं आज तक पूरा नहीं पढ़ नहीं पाया ! विवाह योग्य पुत्री की विदाई की कल्पना भी, दारुण दुःख देती है , पता नहीं उसकी विदाई कैसे झेल पाऊंगा !


पूर्वा राय द्विवेदी 
इस रचना को पढ़कर , एक और प्यारी बेटी के पिता दिनेश राय द्विवेदी , के  आँखों में आंसू छलछला उठे ! डबडबाई  आँखों से, उनके द्वारा मेरे लेख पर लिखी गयी एक लाइन की यह टिप्पणी, मुझे भाव विह्वल करने को काफी है ! अपनी पुत्री की विदाई की याद करके ही दिनेश राय द्विवेदी जैसे प्रख्यात एडवोकेट तक रो पड़ते हैं .... 
"बहुत बहुत रुलाते हैं, तेरे ये गीत ! सच में बहुत रुलाते हैं"

उनकी इस टिप्पणी के साथ, इस गीत  को लिखने का उद्देश्य पूरा हुआ ! पुत्री को अपना घर छोड़ना ही होता है  और एक नए माहौल , नए लोगों के साथ मिलकर , नए घोसले का निर्माण करना  होता है ! ऐसे विषद संक्रमण काल में, उसे अक्सर भारी मानसिक तनाव और  कष्ट से गुजरना होता है !इस समय में, अक्सर इस लड़की को,अपने पिता और भाई से, हर समय जुड़े महसूस रहने का अहसास ही , इसकी राह आसान बनाने को, काफी होता हैं !

इस पोस्ट का शीर्षक, दिनेश राय द्विवेदी की मेधावी पुत्री पूर्वा राय द्विवेदी , द्वारा लिखी एक पोस्ट "लड़कियों का घर कहाँ है ? " की देन है, जिसमें पूर्वा के कहे शब्दों ने, मुझे इस पोस्ट को लिखने को प्रेरित किया ! मैथमैटिकल साइंस में एम् एस सी, कुमारी पूर्वा, जनस्वास्थ्य से जुडी एक परियोजना में शोध अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं !



विवाह के बाद लड़की इतना क्यों रोती है ? इस प्रश्न के जवाब में पूर्वा ने कहा था कि शादी के बाद उसका घर छीन लिया जाता है और उसका घर, मायका बन जाता है और नया घर, ससुराल  ! अपने घर को छिन जाने के कारण वह रोती है कि कोई बताये लड़कियों का घर कहाँ होता है ??

                      कहते हैं लड़की ही, घर में सबसे कमजोर होती है और मगर यह समाज, सुरक्षा देने की जगह ,उससे उसका "घर "छीन कर उसे मायका और ससुराल उपहार में दे देते हैं ! और यह काम दोनों ही पक्ष के लोग धूमधाम से करते हैं !
                       पुत्री को हमें  यह अहसास दिलाना होगा कि वह इस परिवार में बेटे की हैसियत रखती है और अपने भाई के समान  अधिकार और सम्मान की हकदार है और  हमेशा रहेगी ! यही बात, वह बहू बनकर नए घर में भी याद रखे कि उस घर की पुत्री का भी घर में समान अधिकार है और हमेशा रहेगा !
                        नए घर के निर्माण में, जो थकान होती है, उसे दूर करने को, अपने परिवार द्वारा बोले स्नेह के दो शब्द काफी हैं ! अपने मज़बूत पिता और भाई की समीपता का अहसास ही, हमारे परिवार वृक्ष की इस खुबसूरत डाली को, हमेशा तरोताजा रखने के लिए काफी होता है !

Saturday, August 20, 2011

कौवे की बोली सुनने को, हम कान लगाये बैठे हैं - सतीश सक्सेना

शुरू से ही पुत्री के प्रति, अधिक संवेदनशील रहा हूँ , दिन प्रति दिन, बड़ी होती पुत्री की विदाई याद कर, आँखों के किनारे नम हो जाते हैं !स्नेही पुत्री के घर में न होने की कल्पना ही, दिल को झकझोरने के लिए काफी है !  
ऐसे ही एक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....  

जन्मे दोनों इस घर में हम 
और साथ खेल कर बड़े हुए

इस घर के आंगन में दोनों 
घुटनों बल चलकर खड़े हुए
घर में पहले अधिकार तेरा, 
हम रक्षक है तेरे घर के !
अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था,
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घर द्वार सजाया जाता था
तेरे जाने के साथ साथ,
घर की रौनक भी चली गयी !
राखी के प्रति, अनुराग लिए, कुछ याद दिलाने बैठे हैं  !

पहले इस घर के आंगन में
संगीत , सुनाई पड़ता था  !
झंकार वायलिन की सुनकर 
घर में उत्सव सा लगता था
जब से जिज्जी तू विदा हुई,
झाँझर पायल भी रूठ गयीं ,
छम छम पायल की सुनने को, हम आस लगाए बैठे  हैं !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी
चीं चीं करती,  मीठी  बातें
सब मुझे सुनाया करती थी
जबसे तू  विदा हुई घर से,
हम लुटे हुए से बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं ! 

पहले घर के हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
जबसे गुड्डे संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
घर राजमहल सा लगता था
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी आना  छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए, उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

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