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Sunday, March 1, 2015

आओ छींटें मारे, रंग के, बुरा न मानो होली है ! - सतीश सक्सेना

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !

राजनीति के '
मक्कारों ने,
डट कर खेली 
होली है ! 
आओ छींटें मारे रंग के ,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 
चेला शक्कर
गुरु के गुरु  
पटाये जाकर  !
गुरुभाई से 
राज पूंछकर , 
गुरु की गैया,
दुह ली है !
जहाँ मिला मौका देवर ने जम के खेली होली है ! 

घूंघट हटा के 
पैग बनाती ! 
हिंदी खुश हो
नाम कमाती !
पंत मैथिली 
सम्मुख इसके
अक्सर भरते 
पानी है !
व्हिस्की और कबाब ने कैसे,हंसके खेली होली है !

जितना  चाहे 
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो

एक पंक्ति में,
दो शब्दों की, 
माला लगती 
सोणी है !
कवि बैठे हैं माथा पकडे , कविता कैसी होली  है !


कापी कर ले ,
जुगत भिडाले !  
लेखक बनकर   
नाम कमा  ले !

हिंदी में 
हाइकू   
लिख मारा,
शिकी की 
गागर फोड़ी है !
गीत छंद की बात भी अब तो,बड़ी पुरानी होली है !  

अधर्म करके  
धर्म सिखाते  
धन पाने के 

कर्म सिखाते 
नज़र बचाके,
कैसे उसने,
दूध में गोली, 
घोली है !
खद्दर पहन के नेताओं ने, देश में खेली होली है !

ब्लू लेवल, 

की बोतल आयी !
नई कार ,
बीबी को भायी !
बाबू जी का

 टूटा चश्मा,
माँ  की चप्पल 
आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू देखे , कैसी गीली होली है !


Wednesday, March 16, 2011

इस होली पर क्यों न साथियो,आओ रंग गुलाल लगा लें ? -सतीश सक्सेना

इस उत्सव में ,रंगों में डूब कर, वसंत का स्वागत करते हैं हम लोग ! पूरा परिवार ही रंगों में सराबोर होकर कुछ समय के लिए जैसे मस्ती में डूब जाता है  ! इस ख़ूबसूरत मौसम में  लगभग हर इंसान की,गैरों से भी गले मिलने की इच्छा पैदा हो जाती है ! एक बार अपने अन्दर झांक कर देखने से ,एक आवाज आती है ...


अपने घर में ही आँखों पर 
कैसी पट्टी , बाँध रखी है  ! 
इन  लोगों ने जाने कब से ,
मन में रंजिश पाल रखी है !
इस होली पर क्यों न सुलगते,
दिल के ये अंगार बुझा दें !
मुट्ठी भर कुछ रंग,फागुन में, अपने घर में भी, बिखरा दें 

मानव जीवन पाकर कैसे , 
बुद्धि गयी है,बिलकुल मारी ! 
खनक चूड़ियों की सुनते ही 
शंख ध्वनि से, लगन हटायी !
अपनों की वाणी सुनने की,
क्यों न आज से चाह जगा लें !
इस होली पर माँ पापा की ,चरण धूल को शीश लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई
ईर्ष्या  ने ,फैलाये  बाजू ,
रोते  गाते,हम लोगों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियों,
आओ रंग गुलाल लगा लें ?
भूलें उन कडवी बातों को, आओ  अब  घर द्वार सजा लें !!

कितना दर्द दिया अपनों को 
जिनसे हमने चलना सीखा  !
कितनी चोट लगाई उनको 
जिनसे हमने,हँसना सीखा  !
स्नेहिल आँखों  के  आंसू , 
कभी नहीं जग को दिख पायें !
इस होली पर,घर में आकर,कुछ गुलाब के फूल चढ़ा लें !

जब से घर से दूर  गए हो ,
ढोल नगाड़े , बेसुर लगते !
बिन प्यारों के,मीठी गुझिया,
उड़ते रंग, सब फीके लगते !
मुट्ठी भर गुलाल फागुन में, 
फीके चेहरों को महका  दें !
सबके संग ठहाका लेकर,अपने घर को स्वर्ग  बना लें !

Friday, February 26, 2010

आओ तुमको गले लगा लें - सतीश सक्सेना

इस उत्सव में ,रंगों में डूब कर वसंत का स्वागत करते हैं हम लोग ! पूरा परिवार ही रंगों में सराबोर होकर कुछ समय के लिए जैसे मस्ती में डूब जाता है  ! इस ख़ूबसूरत मौके पर लगभग हर इंसान का, दुश्मनों से भी गले मिलने की इच्छा पैदा हो जाती है ! एक बार अपने अन्दर झांक कर देखो ,दिल टटोल कर देखो एक आवाज आती है ...


भूले -भटके उन  अपनों  के , 
कैसे  दरवाजे ,   खुलवाएं ?
मन में रंजिश पाल के बैठे 
कैसे अब उनको समझाएं ?
इस होली पर क्यों न सुलगते 
दिल के, ये अंगार बुझा दें !
बचपन के दिन याद करें,और आयें हंसकर गले लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई 
ईर्ष्या के पौधे उग आये !
रोते  गाते , हम दोनों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियो 
आओ रंग गुलाल लगा लें !
भूलें उन कडवी बातों को , अपना भी घर -बार सजा लें !

बरसों बीते  तांडव  करते  ,
कितनी रात जागते काटी
भूल गए साँसे गिनती  की ,
सारी उम्र गुजरती जाती ! 
क्यों न नयी उम्मीदें लेकर,
फिर से घर को स्वर्ग बनालें !
इस होली पर  रंग विरंगे,मिलकर वन्दनवार  लगा लें !

कितने  वर्षों से , शीशे  के ,
सम्मुख आकर मुग्ध हुए हैं 
कितनी बार मस्त होकर के
अपने यश पर मस्त हुए हैं ! 
इस होली पर नशा भुलाके,
इन चरणों में शीश झुकालें !
प्यार और मस्ती  में  डूबें, दिल से  अहंकार  जला दें  !

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