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Wednesday, July 20, 2022

मिट के ही जायेंगे,गुमां मेरे -सतीश सक्सेना

समझ न पाओगे, बयां मेरे !
मिट के ही जाएंगे, गुमां मेरे !

कैसे दिल से मुझे हटा पाओ 
उसकी हर ईंट पे, निशां मेरे !

तुमने बे घर ,मुझे बनाया था,
कितने दिल में बने, मकां मेरे !

कैसे काबू रखूं , ख्यालों पर 
दिल के अरमान हैं, जवां मेरे !

गर कुरेदोगे, जल ही जाओगे
राख में हैं दबे , जहां  मेरे  !

Friday, July 24, 2020

न जाने क्यों कभी हमसे दिखावा ही नहीं होता -सतीश सक्सेना

जब से फ्री व्हाट्सप्प और कई तरह के मेसेंजर आये है तब से दोस्तों के, परिवार जनों के गुड मॉर्निंग, विभिन्न अवसर पर बधाई सन्देश इतने आने लगे हैं कि अगर सब संदेशों का जवाब दिया जाये तो रोज सुबह एक घंटा कम से कम लगता है ! सन्देश भेजने वाला दोस्त कॉपी पेस्ट कर उस सन्देश को २० मित्रों को एक साथ भेजता है और भूल जाता है , उसकी यह समझ है कि इससे मित्रता संबंधों में गर्माहट रहती है , जबकि सच्चाई यह है कि अगर नेट पर एक सन्देश भेजने की कीमत 5 रुपया कर दी जाए तो सारी गर्माहट और प्यार गायब हो जाएगा और एक भी सन्देश भेजना दूभर हो जाएगा !

अगर आपस में वास्तविक प्यार है तो वह वक्त पर अपनी पहचान भी करा देगा और अहसास भी , उसके लिए कृत्रिम शब्दों का प्रयोग बिलकुल आवश्यक नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्रा है अगर प्यार का दिखावा करना आवश्यक हो तभी इन संदेशों की उपयोगिता है अन्यथा यह हमारे चारो और एक मास्क आवरण का काम ही करते हैं जो वक्त पर कभी दिखाई नहीं पड़ेंगे !  

यह दिखावा शायद हमारे देश में सबसे अधिक होता है , हैरानी की बात यह है कि कुछ अच्छे और शानदार व्यक्तित्व भी इसे आवश्यक मानकर इतना आत्मसात कर चुके हैं कि वे इसे आवश्यक मानते हैं और दूसरी तरफ से यही उम्मीदें भी करते हैं ! स्नेह और प्यार का अहसास अब इन कृत्रिम बधाई और नमन संदेशों ने ले लिया है !

मैंने आजतक अपने परिवार और बेहद नजदीकी दोस्तों को कभी धन्यवाद् और शुभकामना सन्देश नहीं दिए , मैं जिनसे दिखावा नहीं करता उन्हें यह सन्देश कभी नहीं देता कि मुझे तुम्हारी चिंता है , और मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ ! मुझे लगता है कि प्यार की समझ जानवर को भी होती है , अगर मैं अपने लोगों से वास्तविक लगाव रखता हूँ तो उसे जताने की कोई जरूरत नहीं , वह देर सबेर उसे खुद अहसास हो जाएगा ! सो मुझे कई बार अपने बच्चों का जन्मदिन याद नहीं रहता और मेरा बेटा अक्सर फोन कर "पापा हैप्पी बर्थडे टू मी" कहता है तब मेरे मुंह से निकलता है ओके तो आज तुम्हारा जन्मदिन है , बताओ आज क्या चाहिए अपने सांताक्लाज से ? 

कुछ लोग मुझे कवि समझते हैं कुछ साहित्यकार जबकि यह सम्बोधन सुनकर मुझे चिढ होती है , 300 से अधिक कवितायें लिखी हैं
मैंने , जिनमें से एक भी कविता की दो पंक्तियाँ भी मुझे याद नहीं क्योंकि मैं उन्हें कही और कभी सुनाना पसंद नहीं करता , न अपने लिखे लेखों कविताओं को, सम्पादकों के पास छपने हेतु आवेदन करता ! मेरी कवितायें और लेख अक्सर अखबार खुद छाप देते हैं और मुझे पता भी नहीं चलता क्योंकि घर में हिंदी अखबार आते ही नहीं ! सरदार पाबला जी ने एक ब्लॉग बनाया था जो पिछले कई साल से बंद हो गया है , जिसमें वे ब्लॉगरों के छपती रचनाओं को बता दिया करते थे , जब से वह बंद हुआ मुझे अपनी एक भी रचना के छपने की खबर नहीं मिली और न मैं परवाह करता हूँ ! मुझे लगता है कि मैंने एक ईमानदार अभिव्यक्ति अपने मन को प्रसन्न करने के लिए लिखी है न कि साहित्य या समाज पर अहसान करने को , जिसे भी यह रचनाएं पसंद आएं वह इन्हें कहीं भी ले जाने , छापने को स्वतंत्र है , मेरी रचनाएं मुक्त हैं इनसे मुझे कोई फायदा नहीं चाहिए ! 

आज हिंदी साहित्यकार गिने चुने ही बचे हैं और जो वाकई साहित्यकार हैं उनमें से भी अधिकतर अपनी जयकार बोलते चेलों से घिरे रहते हैं तो मुझे लगता है कि ऐसे व्यक्तित्व सिर्फ अपने शिष्यों के बीच में ही साहित्यकार है , अभिव्यक्ति से इसका शायद ही कोई सरोकार हो और जिसकी भाषा ही सामान्य जन अभिव्यक्ति के किसी काम की न हो वह साहित्यकार हो ही नहीं सकता वह सिर्फ क्लिष्ट हिंदी शब्दों का उपयोग कर, अपनी विद्वता सिद्ध करने की कोशिश करता , एक तुच्छ जीव है जो गरीब हिंदी के ऊपर सवार होकर अपनी जयकार  बुलवाने में सफल रहा है !

प्रणाम आप सबको !!
    

Tuesday, May 7, 2019

क्या जानों सरकार हमारे बारे में -सतीश सक्सेना

कितने  शिष्टाचार , हमारे बारे में !
क्या समझे हो यार हमारे बारे में !

इसीलिये अब, तुमसे दूरी रखते हैं 
दिल न दुखे सरकार,हमारे बारे में !

हमको रोज परिंदे ही बतला जाते 
कितने हाहाकार  , हमारे बारे में !

जो वे चाहें करें फैसला,किस्मत का  
है उनका अधिकार, हमारे बारे में !

मरते दम तक तुम्हें नहीं समझायेंगे 
कितने गलत विचार हमारे बारे में !

Wednesday, May 16, 2018

उनसे कहिये,चलने का अंदाज़ बदल लें -सतीश सक्सेना

सुनी सुनाई खबरों पर,एतबार बदल लें !
झूठी खबरों के सस्ते अखबार बदल लें !

चलते, अहंकार की चाल,नज़र आती है !

उनसे कहिये,चलने का अंदाज बदल लें !

बच जाएगा, आया ऊँट पहाड़ के नीचे   
उंची गर्दन, नीची करके , चाल बदल ले !

तीखी उनकी धार , नहीं दरबार सहेगा !
चंवर बादशाही से ही,तलवार बदल लें  !

कोई मसालेदार खबर इन दिनों न आई 
उनको कहिये अपने गोतामार बदल लें !

Thursday, March 22, 2018

रिश्ते दिखावे के -सतीश सक्सेना

मैंने आज तक किसी को बेटी नहीं कहा क्योंकि मेरे पास अपने पापा को बेहद प्यार करने वाली बेटी पहले से ही मौजूद है, मैंने किसी को बहिन नहीं बनाया क्योँकि मेरी हर वक्त चिंता करने वाली दो बड़ी बहिनें पहले से ही हैं , बहनों और बेटी को जितना प्यार और समय मुझे देना चाहिए वह मैं इन्हें नहीं दे पाता और कहीं न कहीं अपने आपको इन दोनों रिश्तों के प्रति गुनाहगार मानता हूँ !


ऐसे में , मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ जब मैं मित्रों को आपस में , भाई या बहिन बनाते हुए राखी बांधते बंधवाते देखता हूँ जबकि उनके घर में अपने भाई बहिन पहले से ही मौजूद हैं जिनके साथ उनके रिश्ते तल्ख़ हैं या हजारों शिकायतें मन में लिए, मात्र दिखावे के लिए बातचीत है !

लोगों के, समाज के भय से हम उन्हें मित्र या दोस्त खुलकर न कह पाते हैं और न मित्रता के रिश्ते निभा पाते हैं मगर राखी बाँधने के बाद हमारा ज़ाहिल समाज उसे स्वीकार ही नहीं करता बल्कि घर में सम्मान भी दिलाता है ! समाज के बनाये पवित्र रिश्तों का चालाक दिमाग ने कितना बदसूरत उपयोग किया है !

स्वाभाविक है कि यह पवित्र रिश्तों का ढिंढोरा समाज को दिखाने के लिए बजाया जाता है जिससे लोग उनके रिश्तों पर शक न कर सकें और इस पाखण्ड की आड़ में उनकी मित्रता सुरक्षित रहे !

Wednesday, February 21, 2018

बूढ़े होते हताश मन को, बच्चों सा नचाने को दौड़ें -सतीश सक्सेना

रिश्तों  में होते झगडे का , अवसाद मिटाने को दौड़ें !
बूढ़े होते हताश मन को , बच्चों सा नचाने को दौड़ें !

कमजोर नजर जाने कब से , टकटकी लगाए दरवाजे 
असहाय अकेली अम्मा के,आंसू को सुखाने को दौड़ें ! 

उसने अपना पूरा जीवन, केवल तुम पर कुर्बान किया  
तेरा वैभव काम नहीं आया,ये ग्लानि मिटाने को दौड़ें !

जैसे ही दौलतमंद बने, मेहनत त्यागी, बेकार हुए  
बरसों से जकड़े घुटनों को , दमदार बनाने को दौड़ें !

आजाद देश में देशभक्त, उग आये कुकुरमुत्तों जैसे
खादी पहने इन धूर्तों की , पहचान कराने को दौड़ें !

Monday, August 7, 2017

अपना दर्द, उजागर करते, मूरख बनते मेरे गीत ! -सतीश सक्सेना

किसी कवि की रचना देखें,
दर्द छलकता,  दिखता है  !
प्यार, नेह दुर्लभ से लगते ,
शोक हर जगह मिलता है !
क्या शिक्षा विद्वानों को दें ,
रचनाओं  में , रोते गीत !
निज रचनाएँ , दर्पण मन का, दर्द समझते, मेरे गीत ! 

अपना दर्द किसे दिखलाते ?
सब हंसकर आनंद उठाते !
दर्द, वहीँ जाकर के बोलो ,
भूले जिनको, कसम उठाके !
स्वाभिमान का नाम न देना,
बस अभिमान सिखाती रीत ,
अपना दर्द, उजागर करते, मूरख  बनते  मेरे  गीत !

आत्म मुग्धता,  मानव की ,
कुछ काम न आये जीवन में !
गर्वित मन को समझा पाना ,
बड़ा कठिन, इस जीवन में !
जीवन की कड़वी बातों को, 
कहाँ भूल पाते हैं गीत !
हार और अपमान याद कर, क्रोध में आयें मेरे गीत !

जब भी कोई कलम उठाये 
अपनी व्यथा, सामने लाये ,
खूब छिपायें, जितना चाहें 
फिर भी दर्द नज़र आ जाये
मुरझाई यह हँसी, गा रही, 
चीख चीख, दर्दीले गीत !
अश्रु पोंछने तेरे, जग में, कहाँ मिलेंगे निश्छल गीत  ?

अहंकार की नाव में बैठे,

भूल गए  कर्तव्यों  को 
अच्छी मीठी ,यादें भूले , 
संचय कड़वे  कष्टों को
कितने चले गए रो रोकर, 
कौन सम्भाले बुरा अतीत !
सब झूठे ,आंसू पोंछेंगे , कौन सुनाये , मंगल गीत  ?

सभी सांत्वना, देते आकर 
जहाँ लेखनी , रोती पाए !
आहत मानस, भी घायल 
हो सच्चाई पहचान न पाए !
ऐसी जज़्बाती ग़ज़लों को ,
ढूंढें अवसरवादी गीत !
मौकों का फायदा उठाने, दरवाजे पर तत्पर गीत !

Tuesday, June 21, 2016

संगमरमरी फर्शों पर ही, पाँव फिसलते देखे हैं -सतीश सक्सेना

बड़े बड़ों के,सावन में अरमान मचलते देखे हैं 
सावन भादों की रातों, ईमान बहकते देखे हैं 

गर्वीले, अय्याश, नशे में रहें , मगर ये याद रहे  
संगमरमरी फर्शों पर ही, पाँव फिसलते देखे हैं 

कई बार मौसम भी, अपना रंग दिखा ही देता है
सावन की मदहोशी में, अंगार पिघलते देखे हैं 

झुग्गी से महलों के वादे, सदियों का दस्तूर रहा
राजमहल ने मोची के भी सिक्के चलते देखे हैं 

मूर्ख बना के कंगालों को, जश्न मनाते महलों ने
अक्सर ठट्ठा मार मारकर, जाम छलकते देखे हैं 

Friday, August 14, 2015

जब तुम पास नहीं हो मैंने, सब कुछ हारा सपने में -सतीश सक्सेना

ऐसा क्या करता है आखिर संग तुम्हारा सपने में
कितनी बार विजेता होकर तुमसे हारा सपने में !

पूरे जीवन हमने अक्सर  छल मुस्काते पाया है,
निश्छल मन ही रोते देखा, टूटा तारा सपने में !

सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !

कई बार हम बने महाजन कंगाली के मौसम में
कितनी बार हुई धनवर्षा,स्वर्ण बुहारा सपने में !

यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में !

Monday, March 30, 2015

कभी ऐसे भी मोड़ आते हैं -सतीश सक्सेना

कभी ऐसे भी  मोड़ आते हैं !
लोग मरघट में छोड़ जाते हैं !


जिसके हम दर्द में नहीं सोये 
कैसे वे सर भी फोड़ जाते हैं !

कैसे शमशान  में करें बातें,
जैसे आत्मा निचोड़ जाते हैं !

स्वप्न दुनियां से बचाये रहना
लोग चुप चाप तोड़ जाते हैं !

प्यार में दर्द भी बहुत होता   
श्याम बाहें, मरोड़ जाते हैं !

Sunday, September 21, 2014

मौत हर वक्त याद रखता हूँ ! - सतीश सक्सेना

सिर्फ इक बात याद रखता हूँ !
आखिरी रात , याद रखता हूँ !

मुझ पे प्यारों के,कर्ज बाकी हैं !
उनकी सौगात, याद रखता हूँ !

कौन जख्मों को सोंच कर रोये !
हर हसीं  रात,  याद रखता हूँ !

मौलवी और पंडितों को नहीं !
भले असरात , याद रखता हूँ !

जो कभी साथ ही न चल पाये
वे भी आघात, साथ रखता हूँ !





Friday, June 20, 2014

विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना

जीवन की आपाधापी में ३६ साल की नौकरी कब पूरी हो गयी,पता ही नहीं चला ! घर की जिम्मेवारियों और बच्चों के लिए साधन जुटाने में, समय के साथ दौड़ते दौड़ते अपने लिए समय निकालना बहुत मुश्किल रहा ! कई बार लगा कि जवानी में जो समय अपने लिए देना चाहिए शायद वह कभी दे ही नहीं पाए ! अक्सर इसका कारण पूर्व नियोजित लक्ष्य,बच्चों के भविष्य,की आवश्यकता पूरा करते करते धन का अभाव रहा अथवा अपने मनोरंजन के लिए आवश्यक हिम्मत और समय ही नहीं जुटा पाए !
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !

पेरिस रेलवे स्टेशन 
गौरव अपनी कंपनी कार्य से, जब जब देश से बाहर गए हर बार उसका अनुरोध रहता कि पापा एक बार आप जरूर घूम कर आइये , विभिन्न देशों की संस्कृति, रहनसहन और खानपान  में  बदलाव आपको अच्छा लगेगा ! हर बार व्यस्तता और छुट्टी न मिलने का बहाना करते हुए मैं, उन्हें असली बात कभी नहीं बता पाता था !

मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
वेनिस की पानी से लबालब गलियां 
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा  टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! 
उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने  लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य  वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
मगर जब पहली बार, विदेश पंहुच गए तब जाकर पता लगा कि बेबुनियाद भय, आत्मविश्वास को किस कदर कम करता है ! अतः सोचा कि मित्रों में अपना अनुभव अवश्य बांटना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति और लोग न महसूस करें !
वियना ट्राम 
अधिकतर मेरे मित्र लगभग हर वर्ष देश भ्रमण पर खासा पैसा खर्च करते हैं मगर विदेश जाने के बारे में प्लानिंग की छोड़िये, अपने घर में इस विषय पर चर्चा भी नहीं करते हैं और यह सब आत्मविश्वास और जानकारी के अभाव के कारण ही होता है !  

स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया 
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि विदेश जाएँ या न जाएँ मगर हर परिवार के पास पासपोर्ट होना बहुत आवश्यक है, यह एक ऐसा डोक्युमेंट हैं जिसके जरिये भारत सरकार आपके बारे में, यह सर्टिफिकेट देती है कि पासपोर्ट धारक भारतीय नागरिक है तथा इस परिचयपत्र में आपके नाम और पते के अलावा जन्मतिथि,  तथा जन्मस्थान लिखा होता है ! किसी भी देश में प्रवेश करने  की परमीशन(वीसा) के लिए, इसका होना आवश्यक है ! यह कीमती डॉक्यूमेंट आपके घर के पते और जन्मतिथि के साथ आपके परिचय पत्र की तरह भी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है !

इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड
यह जानना आवश्यक है कि विदेश यात्रा हेतु , अगर दो माह पहले, किसी भी देश की फ्लाईट टिकिट बुक करायेंगे  तो लगभग आधी कीमत में मिल जाती है ! दिल्ली से पेरिस अथवा स्वित्ज़रलैंड जाने का सामान्य आने जाने का एक टिकट, लगभग ३५ हज़ार का पड़ता है जबकि यही टिकट तत्काल लेने पर ६० हज़ार का आएगा ! सामान्यता एक अच्छा टूरिस्ट होटल ३००० रूपये प्रति दिन में आराम से मिल सकता है !
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट  मिलकर ५००००-६०००० रुपया

में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में  ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !

जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा ! 
यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा
अक्सर हम मरते दम तक अपनी सिक्योरिटी के लिए धन जोड़ते रहते हैं ,और बुढापे में , महसूस होता है कि जीवन में , और भी बहुत कुछ देख सकते थे जो  कर ही नहीं पाये और इतनी जल्दी जीवन की रात हो गयी ! मेरा अपना सिद्धांत है कि बेहद उतार चढ़ाव युक्त जीवन को, जब तक जियेंगे, हँसते मुस्कराते जियेंगे ! एक बात हमेशा याद रखता हूँ कि
  
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
        
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!

Monday, April 28, 2014

जाते जाते रुला गया है कोई - सतीश सक्सेना

our dear Goofy (31 Dec 2006 -27april 2014)
अपना घर त्याग,वो गया है कहीं ! 
थक के लगता है सो गया है कहीं !

बड़ी हिम्मत से , लड़ रहा था वह !
अपनी चौखट से,खो गया है कहीँ ! 

बड़े मज़बूत दिल का,  बच्चा था !
लड़ते लड़ते ही , तो गया है कहीं !

जाने किस कष्ट से, भिडा इकला !
मर के भी  प्यार,बो गया है कहीँ !

किसने छीना है,उसका घर यारोँ 
आज विश्वास , रो गया है  कहीं ! 

Wednesday, March 5, 2014

आज रात भी साथ बैठकर,कितनी देर स्वप्न देखे थे -सतीश सक्सेना

बरसों बीते, बिछुड़े तुमसे 
जाने कब से देख न पाया 
बार बार जाकर बस्ती में  
भी दरवाजे पहुँच न पाया
लेकिन फिर भी हार गए तुम,
ओ समाज के ठेकेदारों  !
आज रात भी साथ बैठकर, मनकों की माला पोए थे !

कौन छीन पायेगा हमसे
सपने जो मन में रहते हैं ! 
कौन रोक पायेगा आंसू  
जो हँसने, में भी बहते हैं !
तुम समझे थे हमें दूर कर, 
ये अनुराग ख़त्म कर दोगे !
लेकिन कितनी बार रात में, दोनों पास पास सोये थे !

दुनिया वाले हंस कर कहते 
दीवानों को अलग कर दिया
सारी शक्ति लगाकर अपनी
अरमानों  को दूर कर दिया ! 
जलने वालों की नज़रों में,
उजड़ी आंगन की फुलवारी ! 
मगर उसी दिन हम दोनों ने, वादे साथ साथ बोये थे !

उस दिन मेले में देखा था ,
आँखों आँखों बात हो गयी !
विरह व्यथा का वर्णन करते  
मन में ही बरसात हो गयी !
जब भी चाहें तब मिलते हैं,
क्या कर लेंगे बस्ती वाले !
दुनिया भर की, ऊँच नीच  के कपडे , आंसू से धोये थे !

मन मयूर के साथ हर समय 
रहने वाले  को क्या जानो !
अंतर्मन मंदिर की भाषा ,  
सप्त पदों को क्या पहचानो !
प्यार की भाषा सीख न पाये 
कैसे हम तुमको समझाएं !
पता नहीं कितने युग बीते, प्यार की दुनिया में खोये थे !

कैसे छीनोगे तुम हमसे
जो मेरे मन में रहती है !
कैसे छीनोगे वे यादें जो 
जन्मों से लिखी हुईं हैं  !
मरते दम तक साथ न छोड़ें,
जो मन में आये कर लेना !
इतने गहरे कष्ट याद कर, फफक फफक कर हम रोये थे !

Friday, November 29, 2013

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत - सतीश सक्सेना

"मेरे गीत " पर, २४ मई २००८ को पहली कविता "पापा मुझको लम्बा कर दो "  प्रकाशित की गयी थी, जिसकी  रचना ३०-१०-१९८९ को हुई जब मेरी ४ वर्षीया बेटी के मुंह के शब्द कविता बन गए ! इस कविता का एक एक शब्द उस नन्हें मुख की मनुहार का सच्चा वर्णन है जो उसने अपने पापा से कही थी ! यह बाल कविता स्वर्गीय राधेश्याम "प्रगल्भ" को समर्पित की गई थी, जो कि उस समय "बालमेला" नाम की पत्रिका का संपादन कर रहे थे !

और आज ४०० प्रविष्टियों एवं १६२०६ टिप्पणियों एवं १,९६,३७२ पेज व्यू के साथ "मेरे गीत" को, अलेक्सा ट्रैफिक रैंक के अनुसार  भारत में १८६२६ एवं विश्व में १८१०३७ रैंक पर पाकर , खासा संतोष अनुभव कर रहा हूँ !

 शुरुआत में लेखन पर अधिक जोर था , मेरे एक पाठक ने उस समय लिखा था कि मेरे गीत पर गीत कम होते हैं , कहीं दिल को छू गया  और कविता ,पद्य लेखन शुरू किया और अब जब मैं गीत ग़ज़ल अधिक लिख रहा हूँ तो कुछ लोग मुझे कवि भी कहने लगे हैं !

आजकल लेखन में अक्सर मौलिकता की कमी पायी जाती है , मेरी कोशिश रही है कि किसी अन्य मशहूर कवि का प्रभाव मेरी रचनाओं में न आ सके जो कुछ निकले प्रभावी अथवा अप्रभावी मेरे दिल से निकले चाहे लोग पसंद करें या न करें , और शायद मैं इसमें कामयाब रहा हूँ ! इस पूरे रचना काल में मैंने कभी व्याकरण और शिल्प के सुधार की  आवश्यकता के कारण अपनी रचना को नहीं बदला ! मुझे लगता है , ईमानदार भाव अभिव्यक्ति, मौलिक और विशिष्ट होनी चाहिए न कि उसे पुरानी एवं खूब बखानी गयी शैली में बाँध दिया जाय !

कुछ ऐसा राग रचें मिलकर,
सुनकर उल्लास उठे मन से !
कुछ ऐसी लय संगीत  बजे 
सब बाहर आयें ,घरोंदों  से !
गीतों में यदि झंकार न हो,तो व्यर्थ रहे महफ़िल सारी !
रचना के मूल्यांकन में है  , इन  शब्दों की जिम्मेदारी  !


ब्लॉग जगत में सब लेखक हैं अतः पाठकों का अभाव रहता है , बहुत कम लोग ऐसे हैं जो मित्रों को ध्यान से पढ़ते हैं शायद इतना समय ही नहीं है अतः अक्सर बेहद उत्कृष्ट ब्लॉग लेखकों को भी, लोग पढ़ने से वंचित रह जाते हैं ! अफ़सोस है कि नवोदित लेखकों को, जो प्रोत्साहन हम सबसे मिलना चाहिए नहीं मिल पाता ! मेरा विचार है कि बड़े लेखकों द्वारा प्रोत्साहन के अभाव एवं विपरीत माहौल में और उत्कृष्ट लिखना चाहिए, मुझे विश्वास है आज नहीं तो कल कलम अपनी पहचान करा देगी ! 

ज़ख़्मी दिल का दर्द,तुम्हारे  
शोधग्रंथ , कैसे समझेंगे  ?
हानि लाभ का लेखा लिखते  ,
कवि का मन कैसे जानेंगे ?
ह्रदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूंगा !
तुम कितने भी अंक घटाओ,अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूंगा !

हमने हाथ में,  नहीं उठायी ,
तख्ती कभी क्लास जाने को !
कभी न बस्ता, बाँधा हमने,
घर से, गुरुकुल को जाने को !
काव्यशिल्प, को फेंक किनारे,मैं आँचल के गीत लिखूंगा !
प्रथम परीक्षा के,पहले दिन,निष्काषित का दर्द लिखूंगा !

शब्द अर्थ ही जान न पाए ,
विद्वानों  का वेश बनाए ! 
क्या भावना समझ पाओगे
धन संचय के लक्ष्य बनाए !
माँ की दवा, को चोरी करते, बच्चे की वेदना लिखूंगा ! 
श्रद्धा तुम पहचान न पाए,एकलव्य की व्यथा लिखूंगा ! 

अंत में सब मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने जब तब मेरे ब्लॉग का ज़िक्र कर मेरा उत्साह वर्धन किया निस्संदेह उनका उपकार है मेरे ऊपर , इसके बिना शायद कलम में वह ताकत नहीं होती जिसके कारण मैं आत्मसंतुष्टि महसूस करता हूँ , मैं अपने मित्रों के इस उत्साह वर्धन को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार मानता हूँ  ! 

अपने मित्रों के स्नेह के, आभारी हैं मेरे गीत !!

Wednesday, November 13, 2013

तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते -सतीश सक्सेना

अगर हम ऐसी वैसी धमकियों से, डर गए होते !
अभी तक दोस्तों के हाथ, कब के मर गए होते !

तेरे जज़्बात की हम को , अगर चिंता नहीं होती ,
तो हम होली दिवाली,माँ से मिलने घर गए होते !

अगर हम वाकई मन में ,यह शैतानी लिए होते !
तुम्हारे दिल  के , अंदेशे भी , पूरे कर गए होते !

अगर हमने भी डर के ऐसे, समझौते किये होते !
तो बरसों की मेरी मेहनत, कबूतर चर गए होते !

अगर हम  दोस्तों में ऐसे , कद्दावर नहीं  होते !
हमारे घर की दीवारें , वे काली कर गए होते !

Friday, October 18, 2013

हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है -सतीश सक्सेना

हमेशा ही अभावों में सभी ने व्यस्त पाया है ! 
मुसीबत में सदा सबने हमें आश्वस्त पाया है !

हमें कुछ भी नहीं उम्मीद, ऐसे वक्त में तुमसे  !
ज़रुरत में, हमेशा ही तुम्हें, ऋणग्रस्त पाया है !


जरा सी चोट में कैसे ये आंसू छलछला उठे 
हमें लोगों ने गहरे दर्द, का अभ्यस्त पाया है !

अभी तो कोशिशें करते हैं, सबसे दूर रहने की !
भरोसा ही सदा हमने,यहाँ क्षतिग्रस्त पाया है !


मुफलिसी में भी,मेरे द्वार से खाली न जाओगे
हमें लोगों ने खस्ता हाल में विश्वस्त पाया है !

Saturday, September 14, 2013

वह कौन सी फिरदौस थी,जिसने हमें चाहा नहीं ! -सतीश सक्सेना

कुछ घर सरीखे हैं यहाँ, जिनमें कोई चूल्हा नहीं, 
इंसान ही कहते इन्हें , रोने को भी कन्धा नहीं ! 

देखा जिसे भी प्यार से, इकरार ही हमको मिला !
वह कौन सी फिरदौस थी, जिसने हमें चाहा नहीं !
  

हमने जीवन में कभी, कुछ भी, कहीं माँगा नहीं !
वह कौन साझी दार था, जिसने हमें समझा नहीं !

कुछ दिन गुज़ारे थे यहीं , नरभक्षियों के गाँव में

शायद ही कोई था बचा जिसने हमें खाया नहीं !

इक दरिंदे ने आंत खींची थी, तड़पते ख्वाब की 
ये कौन सा इंसान था, जिसने ज़िबह देखा नहीं !

Wednesday, July 17, 2013

मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी -सतीश सक्सेना

मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी !  
हमने भी ग़ज़ल के दरवाजे,कुछ दिन पल्लेदारी की थी !

हैरान हुए, हर बार मिली,जब भी देखी, गागर खाली ! 
उसने ही,छेद किया यारो, जिसने चौकीदारी  की थी !

लगता है तुम्हारे आने पर , हर  घर में दीवाली  होगी !
कलरात,तुम्हारी गलियों में,लोगों ने खरीदारी की थी !

जाने  अनजाने, वे  भूलें , कुछ पछताए, कुछ रोये थे !
हमने ही ,नज़रें फेरीं थीं, उसने तो, वफादारी की थी !

अब तो शायद,इस नगरी में,कोई न हमें,पहचान सके !
कुछ रोज,तुम्हारी बस्ती में,हमने भी सरदारी  की थी !



Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 
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