आदरणीय रमाकान्त सिंह जी का अनुरोध पाकर, उनकी ही प्रथम पंक्तियों से, इस कविता की रचना हुई , आभार भाई !
गढ़ दिया तुमने हमें अब, भाग्य अपना ख़ुद गढ़ेंगे !
धरा से सहनशीलता ले,सलिल से शीतलता पायी
माँ की दवा,को चोरी करते,बच्चे की वेदना लिखूंगा !
आदरणीय रमाकान्त सिंह जी का अनुरोध पाकर, उनकी ही प्रथम पंक्तियों से, इस कविता की रचना हुई , आभार भाई !
गढ़ दिया तुमने हमें अब, भाग्य अपना ख़ुद गढ़ेंगे !
धरा से सहनशीलता ले,अधिकतर घुटने का ऑपरेशन , लंबे समय से चले आ रहे दर्द से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है , मगर अक्सर घुटना बदलने के बाद भी यह दर्द बरकरार रहता है बल्कि कई बार पहले से भी अधिक होता है , ऑपरेशन के दो चार साल बाद मरीज़ पहले से अधिक दर्द की शिकायत करते पाये जाते है ! अगर घुटने का दर्द स्पाइनल नर्व या कमरदर्द से जुड़ा है तो यह दर्द घुटना बदलने से भी नहीं जाता है , मगर अक्सर मूल कारण जाने बिना घुटने को रिप्लेस करते हैं और इसे मानवीय त्रुटि कहा जाता है एवं मेडिकल डॉक्टर इस मानवीय भूल में किसी भी सजा के हक़दार नहीं होते !
घुटने बदलने के विज्ञापन या वीडियो देखेंगे तो पता चलता है कि घुटना बदलने के बाद समुद्री बीच पर लोग खेल या दौड़ रहे हैं मगर यह वास्तविकता से कोसों दूर है , हक़ीक़त में 20 में 1 आदमी ही इतनी नार्मल दौड़ भाग कर पाता है जो लोग ऑपरेशन के बाद जोश में घुटनों पर अधिक ज़ोर देते हैं उनके सीमेंटेड जोड़ पाँच साल में ही हिलने लगते हैं और दुबारा घुटना निकाल कर ऑपरेशन करना पड़ता है ! इसके अतिरिक्त नये जॉइंट के घिसने पर, सेरेमिक , प्लास्टिक और मेटल के माइक्रोस्कोपिक टुकड़े खून में मिलकर अलग तरह की ख़तरनाक समस्याएँ पैदा करते हैं !
जब आप घुटने के जॉइंट को शरीर से अलग कराते हैं तब उस उससे उत्पन्न आघात के कारण , बोन मैरो स्पेस और रक्त वाहिनियों में असहनीय तनाव से ब्लड क्लॉट्स उत्पन्न होते हैं , एक रिसर्च के अनुसार 60 वर्ष से अधिक व्यक्तियों के लिए , ऑपरेशन के अगले दो सप्ताह में ह्रदय आघात का ख़तरा, ३१ गुना अधिक होता है और यह सुनकर ही घबराहट होती है कि उस दर्द से मुक्ति पाने का यह तरीक़ा निस्संदेह अधिक ख़तरनाक है इससे बेहतर होता कि उसी दर्द में जिया जाये !
कोशिश करनी चाहिये कि हम अन्य तरीक़ों से घुटने का दर्द ठीक करने का प्रयत्न करें न कि मेडिकल व्यवसायों के विज्ञापनों और डॉक्टरों की बातों से डर कर , ऑपरेशन थियेटर में भर्ती होकर अपने शरीर की दुर्दशा न करवायें और न इस ग़लत तरीक़े पर अपना धन खर्च करें ! विश्व विशाल है और वहाँ अलग अलग तरह के इलाज विकसित हुए थे और वे बेहद सफल भी रहे हैं , मगर एलोपैथिक सिस्टम के दवा व्यापारियों ने इसे बेहद धनवान व्यवसाय में परिवर्तित कर दिया है और अन्य वैकल्पिक चिकित्साओं को नष्टप्राय कर दिया , मगर आज भी अफ़्रीका , चायना , कोरिया , मिडल ईस्ट और भारत में इनकी तलाश करें तो कोई भी असाध्य बीमारी का इलाज मिल जाएगा केवल सब्र और मेहनत चाहिये !
शुभकामनाएँ आप सबको !
Ref : https://newregenortho.com/6-reasons-to-avoid-knee-replacement-surgery/
https://centenoschultz.com/disadvantages-of-knee-replacement-surgery/
यह चौंकाने वाला तथ्य है , ऐसी खबरें विदेशों से कभी नहीं सुनी गयीं कि मस्ती भरे डांस के दौरान मौत हुई हो , यह हमारे देश में ही संभव है जहां लोग बिना शरीर को जाने एक दिन में शरीर तोड़ मेहनत करने का प्रयत्न करते हैं , और अपनी जान गँवा देते हैं !
मैं ऐसे तमाम मित्रों को जानता हूँ जो सालों साल किसी काम को हाथ नहीं लगाते , दिमाग़ का उपयोग हर विषय पर ज्ञान बाँटने को करते हैं , वे किसी दिन शादी विवाह या अन्य उत्सव में भीड़ के सम्मुख लंबे समय तक झूम झूम कर नाचते या जिम जॉइन करने पर हाथों को मसल्स बनाने के लिए स्ट्रॉंग एक्सरसाइज करते पाये जाते हैं और ख़ुद के शरीर को फिट बनाने का गुमान लिए फिरते हैं ! उनके ब्लॉक माइंड को यह समझ ही नहीं कि उनके सुस्त और ढीली मांसपेशियों को अचानक मिली यह हैवी स्ट्रेचिंग या हाई इंपैक्ट एक्सरसाइज कितना नुक़सान पहुँचायेगी ! गरबा में अधिकतर असामयिक मौत उन्हीं की हुई होगी जिन्होंने अपने शरीर की ७० प्रतिशत मांसपेशियों का कभी उपयोग ही नहीं किया तथा जिनके विभिन्न जोड़ों और गतिशील पुर्ज़ों में साल्ट जमा हो चुके हैं ! ऐसे लोग जिम या एक्सरसाइज का मौक़ा मिलते ही ख़ुद को बॉण्ड समझकर कूद पड़ते हैं और ख़ुद को एक भयानक ख़तरे में डाल देते हैं और हाल में यही गुमान लिए कितने वीआईपी अपनी जान खो चुके हैं !
याद रखिए जब भी आप फिजिकल स्ट्रेस या हाई इंपैक्ट एक्सरसाइज ( रनिंग , गरबा जैसे डांस , क्रिकेट , हॉकी, बैडमिंटन आदि ) खेलते हैं तब आपका पूरा शरीर और उसके नाज़ुक अवयवों की दशा में परिवर्तन होना शुरू होता है और उस वक्त वे विभिन्न तरीक़ों से बर्ताव करते हैं , आपकी साँसें भारी , तेज पल्स महसूस करते हैं, उस समय ह्रदय और फेफड़ों को मसल्स और मस्तिष्क को ऑक्सीजन मिला खून पहुँचाने के लिए बहुत तेज़ी से काम करना होता है , उस समय आप अपने ह्रदय का धौंकना महसूस कर सकते हैं ! इस वक्त आप ज़मीन पर प्रहार करते हर कदम पर, अपने शरीर के वजन से तीन गुना इंपैक्ट डालते हैं और बॉडी में एंड्रोफ़िन्स नामक हार्मोन्स का उत्सर्जन करते हैं जो इस स्ट्रेस फ़ुल कंडीशन में उत्पन्न दर्द का एहसास शरीर को नहीं होने देता बल्कि एक आनंद अनुभूति देता है जिसमें वह इंसान, और तन्मयता से ख़ुद को उसी कंडीशन में बनाये रखता है, फलस्वरूप अक्सर यह आनंद दायक पल उसे आकस्मिक मौत तक ले जाते हैं !
जब हम बैठे होते हैं तब हार्ट लगभग ५ क्वार्ट्स पर मिनट पर खून पंप करता है और दौड़ते या आउटडोर स्पोर्ट्स के समय यही २५-३० क्वार्ट्स पर पहुँच जाता है , यह स्थिति थोड़ी बहुत देर तक चल सकती है मगर इसका मतलब यह नहीं कि इसे घंटों तक इसी अवस्था में रखा जाए , अगर लगातार यह स्थिति लंबे समय तक रखी गई तब यह ह्रदय के नाज़ुक मसल्स फ़ाइबर को, ज़ख़्मी कर उसे ख़तरनाक स्थिति में पहुँचाने के लिए पर्याप्त हैं , लगभग ३० प्रतिशत मैराथन ( ४२ km ) धावक दौड़ की समाप्ति होते होते अपना ट्रॉपोनिन लेवल आवश्यकता से अधिक बढ़ा लेते हैं जो कि उनके हार्ट डैमेज होने का परिचायक है !
मेहनत करते शरीर को, बढ़े हुए आनंददायक हार्मोन एंड्रोफ़िन के कारण , दर्द रूपी, आसन्न मृत्यु का एलार्म महसूस ही नहीं होता और उसके ज़मीन पर गिरते ही लोग समझते हैं कि कुछ गड़बड़ हुआ है ! हाल के वर्षों में जबसे लोगों में फ़िटनेस चेतना जगी है , ऐसी असामयिक मौतों की जैसे झड़ी लग गई है , अफ़सोस अख़बारों में ऐसी खबरें तभी छपती हैं जब कोई महत्वपूर्ण घटना , समय या महत्वपूर्ण मशहूर लोगों की जान गई हो अन्यथा जाने कितने नासमझ जोशीले धावक अपनी क़ीमती जान हर वर्ष गँवा देते हैं !
एक रिसर्च के अनुसार बेहद मेहनत करने का नतीजा ह्रदय में ख़तरनाक परिवर्तन लाना है , ३०-४० किमी प्रति सप्ताह लगातार लंबे समय तक दौड़ने वालों को, ह्रदय आघात का उतना ही ख़तरा रहता है जितना एक सोफ़े पर बढ़कर टीवी देखने वाले आलसी मोटे व्यक्ति को सो जोश में आकस्मिक अधिक मेहनत से ख़ुद को बचा कर धीरे धीरे शरीर को मेहनत करने का आदी बनाइये , यह ही लाभदायक होगा एवं कुछ वर्षों की लगन के बाद शरीर से सारी बीमारियों ग़ायब होते नज़र आयेंगी चाहें उनका नाम कुछ भी क्यों न हो ! इसे ही लागू करते हुए ७० वर्ष की उम्र के बाद बिना एक भी गोली खाये अपनी बुढ़ापे की तमाम बीमारियों से निजात पाने में सफलता प्राप्त हुई है आप यक़ीन करें या न करें मगर ,मैं शारीरिक तौर पर ४० वर्ष के जवान जैसे सब हरकतें आसानी से करता हूँ , इनमें पेंड पर चढ़ना , हाथ से घर की पेंटिंग करना , भारी वजन उठाकर चलना , तैरना आदि सब शामिल है !
सो एक्सरसाइज करें यह शरीर के लिए लाभदायक है मगर अपने शरीर की सीमा को भी याद रखें , मैं ६० वर्ष की उम्र से दौड़ना शुरू कर पिछले दस वर्षों में १०००० km दौड़ चुका हूँ , और इस मध्य ६० हाफ मैराथन ( २१ Km ) दौड़ते हुए इस स्थिति में हूँ कि जब चाहूँ मैराथन ( ४२ km) दौड़ सकता हूँ , मगर पिछले दस वर्षों में आज तक एक बार भी यह प्रयास नहीं किया , कारण मुझे लगातार ढाई घंटे ( २१ km ) दौड़ने के लिए ही समय नहीं निकाल पाता , और विभिन्न रेस में इसलिए नहीं दौड़ता कि रेस स्ट्रेस लेकर दौड़ना अधिक उम्र में अपने ह्रदय को कमजोर करना होगा और इस अब तक इस मूर्खता से ख़ुद को बचाये रखा है !
सो मेहरबानी करके एक्सरसाइज और हाई इंपैक्ट एक्सरसाइज क्या है इस पर मनन करने का समय निकालें , तत्पश्चात् ही एक्सरसाइज करें और शरीर को हाई इंपैक्ट एक्सरसाइज का अभ्यस्त बनाने से पहले बॉण्ड बनने की चेष्टा न करें अन्यथा जिम आपकी बिना दर्द महसूस कराये ,जान लेने में समर्थ है , इसे याद रखें !
ये दो पंक्तियाँ जीवन के दो महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं। पहली पंक्ति कहती है कि हमें हँसते हुए जीना चाहिए और दूसरों को हँसाना चाहिए। जीवन छोटा है, इसलिए इसे पूरी तरह से जीना चाहिए। दूसरी पंक्ति कहती है कि हमें बदलाव स्वीकार करना चाहिए और समय के साथ चलना चाहिए। जीवन में हमेशा बदलाव होता रहता है, इसलिए हमें इन बदलावों के साथ तालमेल बिठाना चाहिए।
इन पंक्तियों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है:
ये दो सबक हमारे जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। वे हमें खुश और संतोषी जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।
यहां कुछ अतिरिक्त विचार दिए गए हैं जो इन पंक्तियों से जुड़े हो सकते हैं:
इन पंक्तियों को अपने जीवन में लागू करके, हम एक बेहतर इंसान बन सकते हैं और दूसरों को खुश करने में मदद कर सकते हैं।
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घर में कुर्सी पर बैठ कर लैपटॉप पर या कम्बल में टीवी , बाहर निकलो गाड़ी से ऑफिस में , लिफ्ट से ऑफिस में अपनी कुर्सी तक ,शाम को गाड़ी से घर वापसी , घर के अंदर सोफा तैयार , डाइनिंग कुर्सी पर बैठकर डिनर , और बाद में गर्म बिस्तर
सोचता हूँ कि पैरों का काम ही क्या है , घर में खड़े होकर कार तक पैदल जाना पड़ता है , हाई क्वालिटी रोबो व्हील चेयर बनवा लेता हूँ उसमें सामने लैपटॉप स्क्रीन लगी हो , सेंसर सड़क पर किसी से टकराने भी नहीं देंगे ! घुटनों की जरूरत भी सिर्फ उठते समय पड़ेगी जब सोने जाना होगा , यह कुर्सी लगभग एक लाख की आएगी , खरीदने की सोच रहा हूँ , आराम के लिए पैसा उपयोग न किया तो फिर किस काम आएगा !
घर में पूरे दिन बैठे रहकर टीवी देखते समय मेरी स्पोर्ट्स वाच रिमाइंडर देती रहती है कि अब कम से कम खड़े ही हो जाओ भैया ? इसे फेंक ही दूँगा किसी दिन गुस्से में !