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Thursday, October 13, 2016

सिर्फ दिखावे के उत्सव , सद्भाव ख़त्म हो जाते हैं - सतीश सक्सेना

जहाँ पूजा का हो अपमान
वहां बन जाते कालिदास
जहाँ प्रीति का हो उपहास
वहीं पैदा हों तुलसी दास
इतने गहरे तीर , मृदुल 
आवेग ख़त्म कर जाते हैं !
चुभते तीखे शब्दों से, अनुराग ख़त्म हो जाते हैं !

जहाँ परिवार मनाये शोक 
जन्मते ही कन्या को देख 
बुढ़ापे में बन जाते बोझ 
पुत्र पर,कैसे जीवनलेख
इन रिश्तों में वर्चस्व हेतु , 
संपर्क ख़त्म हो जाते हैं !
अपना अपना हिस्सा ले,सम्बन्ध ख़त्म हो जाते हैं !

जहाँ सन्यास कमाए नोट 
देश में  बेशर्मी के साथ ! 
जहाँ संस्कार बिके बाजार
नोट ले बड़ी ख़ुशी के साथ
रात्रि जागरण में कितने, 
विश्वास  ख़त्म हो जाते हैं !  
सिर्फ दिखावे के उत्सव , सद्भाव ख़त्म हो जाते हैं !

साधू सन्यासी करते होड़
देश में व्यापारी के साथ 
अनपढ़ों नासमझों के देश 
भव्य अवतारी बनते रोज, 
धन के लालच में पड़कर  
ईमान ख़तम हो जाते हैं !
धर्माचार के साये में , विश्वास  ख़त्म हो जाते हैं !

Thursday, May 24, 2012

एक गुड़िया मार कहते हो कि, हम इंसान हैं ! -सतीश सक्सेना

अब हंसीं, मुस्कान  भी , 
विश्वास के लायक़ नहीं
क्या कहेंगे, क्या करेंगे
कुछ यकीं, इनका नहीं
नज़र चेहरे पर लगी है, 
ध्यान केवल  जेब पर
और कहते हैं कि  डरते क्यों ?भले इंसान हैं !

काम गंदे सोच घटिया
कृत्य सब शैतान  के ,
क्या बनाया ,सोच के 
इंसान को भगवान ने 
इनके चेहरे पर कभी , 
आती नहीं शर्मिंदगी  !
फिर भी अपने आपको कहते कि वे इंसान हैं !

बाप के चेहरे को देखो
सींग दो दिखते वहाँ !
कौन पुत्री जन्म लेगी
कंस के ,प्रासाद में !
अपनी माँ के पेट में ,
दम तोड़ देतीं बेटियां !
पूतना अब माँ बनी हैं, फिर भी ये इंसान हैं !

खिलखिलाती बच्चियों से
ही, धरा रमणीय रहती !
प्रणय और आसक्ति बिन
सृष्टि कहाँ सम्पन्न होती !
अपने बाबुल हाथ ,
मारी जा रही हैं, बच्चियां !
एक कन्या मार कर, कहते हो हम इंसान हैं !

भ्रूण हत्या से घिनौना ,
पाप क्या कर पाओगे !
नन्ही बच्ची क़त्ल करके ,
क्या ख़ुशी ले पाओगे !
जब हंसोगे, कान में गूंजेंगी 
उसकी सिसकियाँ !
एक गुड़िया मार कहते हो कि, हम इंसान हैं !
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