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Thursday, April 9, 2015

जात मानवी करम नराधम, कैसे हैं ये लोग - सतीश सक्सेना

मानव ने ही 
धर्म  बनाया,
बुरे वक्त, 
ताकत पाने को !
अंध आस्था  
मुंह फैलाये ,
मानवता को 
ही खाने को !
कितने घृणित 
काम ये करते 
बस्ती में ही आग उगलते ! 
बच्चों की लाशों 
पर चढ़कर हँसते हैं ये लोग !
अधरम का भय दिखा, नराधम बन जाते सिरमौर !
कहाँ से आये हैं 
ये लोग ?

रामू काका, 
रहमत चच्चा ,
हर मुश्किल में साथ रहे थे !
ज़ीनत खाला ,
और निवाले,
इक दूजे का हाथ गहे थे ! 
होली ईद हमारे सबसे,
मनचाहे त्यौहार रहे थे,
अब गलियों में 
शोर मचा है ,
जाने कैसा धुआं उठा है,  
पीठ पे नाम लिखा औरों का 
आये हैं कुछ लोग !
जाने किसका  हुक्म बजाने, घर से निकले लोग !
किस तरह जहर 
उगलते लोग ?

सीधे साधे बच्चे 
अपने,खेल कूदते 
बड़े हुए थे !
धर्म जाति बंधन
न जाने, 
इन गलियों से  
खड़े हुए थे !
किसने इनको भय 
सिखलाया,
कौन क्रोध का पाठ 
पढ़ाया ,
मानवता को तार तार कर 
बने जानवर लोग !
धरती पकडे कोख को रोये, कैसे हैं ये लोग ?
रंजिशे घर में  
लाते लोग ?

मूर्खों को 
बलवान बनाके, 
हाथ में 
कलाश्निकोव थमा के, 
धर्म की परिभाषाएं 
बदलीं !
गुरु, कुतर्की 
आलिम नकली !
किसने घटिया  
मार्ग दिखाया, 
किसने सबको मूर्ख बनाया,
झाग उगलते घर से निकले 
बदला लेते लोग !
जात मानवी,करम नराधम, नफरत बोयें लोग ?
अपने घर में आग लगाएं 
कैसे हैं ये लोग ?


Thursday, December 18, 2014

इस्लाम की छाती पे , ये निशान रहेंगे - सतीश सक्सेना

लाशों पे नाचते तुम्हें,  यमजात कहेंगे !
शायर और गीतकार भी बदजात कहेंगे !

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
इस्लाम  की छाती पे, इन्हें  दाग़ कहेंगे !

इन्सान के बच्चों का खून,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे,हम आघात कहेंगे !

दुनियां का धर्म पर से, भरोसा ही जाएगा !
हम दूध मुंहों के रक्त से,खिलवाड़ कहेंगे !

महसूद, ओसामा  के नाम, अमिट हो गए 
हर  ज़ुल्म ए तालिबान,  ज़हरबाद कहेंगे !

जब भी निशान ऐ खून,हमें याद आएंगे 
इंसानियत के नाम , एक गुनाह कहेंगे !

Ref : https://www.theguardian.com/world/2014/dec/16/taliban-attack-army-public-school-pakistan-peshawar

Saturday, September 14, 2013

वह कौन सी फिरदौस थी,जिसने हमें चाहा नहीं ! -सतीश सक्सेना

कुछ घर सरीखे हैं यहाँ, जिनमें कोई चूल्हा नहीं, 
इंसान ही कहते इन्हें , रोने को भी कन्धा नहीं ! 

देखा जिसे भी प्यार से, इकरार ही हमको मिला !
वह कौन सी फिरदौस थी, जिसने हमें चाहा नहीं !
  

हमने जीवन में कभी, कुछ भी, कहीं माँगा नहीं !
वह कौन साझी दार था, जिसने हमें समझा नहीं !

कुछ दिन गुज़ारे थे यहीं , नरभक्षियों के गाँव में

शायद ही कोई था बचा जिसने हमें खाया नहीं !

इक दरिंदे ने आंत खींची थी, तड़पते ख्वाब की 
ये कौन सा इंसान था, जिसने ज़िबह देखा नहीं !

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