Wednesday, May 17, 2017

जकड़े घुटने पकड़ के रोये , ढूंढ रहा उपचार आदमी -सतीश सक्सेना

अकर्मण्यता की आदत से, है कितना लाचार आदमी !
जकड़े घुटने पकड़ के बैठा , ढूंढ रहा उपचार आदमी !

बिना चलाये, घुटने रोयें, समय नहीं पैदल चलने को !
नोट न भूला, चलना भूला , करता योगाचार आदमी  

हाथ पैर को बिना हिलाये, जब से वह धनवान बना,
रोक पसीना, शीतल घर में, भूला ग्रामाचार आदमी !

शक्ति गंवायी  बैठे रह कर , रोगों से बच पाने को ,
खा ढेरों गोलियां बदन से , करता अत्याचार आदमी !

बिना हिलाये जोड़, कमर, घुटनों, पैरों के ,जकड़ गए !
पत्थर जैसा बदन गँवा कर करता शल्योपचार आदमी !

11 comments:

  1. दवा आदत सी हो गयी जिंदगी के लिए
    सटीक विचारणीय और प्रेरक रचना

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  2. शानदार गीत। आप बिलकुल अलग सोच रखते हैं और उसी अनुसार अभिव्यक्त भी करते हैं। शुभकामनाएं।

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व दूरसंचार दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. बहुत ही सुन्दर ,प्रेरक ,....
    लाजवाब प्रस्तुति...

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  5. अपनी सेहत अपने ही हाथ में है..सुंदर संदेश देती कविता..

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/05/20.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  7. बहुत महत्त्वपूर्ण संदेश है इस कविता में । विज्ञान ने इतना सुख सुविधापूर्ण बना दिया है कुछ इंसानों का जीवन कि श्रमसाध्य कामों की आदत ही नहीं रहती उन्हें... आभार आदरणीय !

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  8. खुद उठाना है इंसान को और खुद ही पार पाना है इस लाचारी, बिमारी परेशानी से ...
    सुन्दर अर्ह्पूर्ण रचना ...

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  9. हाथ पैर को बिना हिलाये, कुटिल बुद्धि धनवान हुई
    रोक पसीना, शीतल घर में , भूला ग्रामाचार आदमी !
    वाह ! बहुत खूब पंक्तियाँ आदरणीय आभार। "एकलव्य"

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  10. आधुनिक जीवन का सत्य दर्शाती रचना बेहतरीन

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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