पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों (नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी, यह परम्पराएं होती देखीं हैं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी, सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...

और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची (आज की नव वधु) से, जो उस समय, घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं !
हमें अपने घर में विरोध करना आना चाहिए ....

और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची (आज की नव वधु) से, जो उस समय, घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं !
हमें अपने घर में विरोध करना आना चाहिए ....
आपसेे पूरी तरह सहमत, बहुओं को बेटी जैसा व्यवहार मिले सास से।
ReplyDeleteऔर अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
ReplyDeleteयह याद रहे तो हालात ही बदल जाएँ...
सत्य का बीज है इस रचना में लेकिन एक और छोर है इन संबंधों का जहां रेश ड्राइविंग है ,नंगा पन है,शब्दों में बर्ताव में पैरहन में .दुनिया रंग बिरंगी सब के अनुभव अलग अलग फिर भी मैं हिमायती सकारात्मक चिंतन और लेखन का हूँ इस मायने में इस पोस्ट का समर्थन करता हूँ .लेकिन कई रंग है पुत्र वधुओं के .जिन्हें हम तो पुत्र वधु मानते हैं वह कुछ भी नहीं मानतीं हैं संबंधों को. महज़ अपेंडिक्स से वहां पड़े रहतें हैं हम लोग एक और इसी मुगालते में मेरी पुत्रवधू ..
ReplyDeleteसहमत हूँ, समस्या के कई पक्ष हो सकते हैं। माँ बाप की परिपक्वता और बच्चों को निरपेक्ष शिक्षा इस नाते और भी ज़रूरी हो जाती है। सुन्दर भावना, सुन्दर पोस्ट!
Deleteआपकी टिप्पणी लगता है अधूरी रह गयी है वीरू भाई ...
Deleteबेटियों की परवरिश बदली है जाहिर है उनके साथ व्यवहार भी बदलना ही चाहिए.बहु भी आखिर किसी की बेटी होती है.
ReplyDeleteआपकी बेटियों पर लिखी हर पोस्ट बहुत सुकून देती है.
क्योंकि मैं अपने आपको बेटियों के अधिक नज़दीक पाता हूँ ....और शायद उन्हें पापा के प्यार की अधिक आवश्यकता होती है !
Deleteसच है या नहीं ...??
एक विवेक-युक्त आचार-विचार भरी पोस्ट!!
ReplyDeleteपर एक मात्र विरोध इस समस्या का इकलौता माध्यम नहीं है। यह घर है और प्रत्येक व्यक्ति की समझ, धैर्य, सहनशीलता और विवेक का अलग अलग स्तर होता है। सभी जानते है अच्छे व्यवहार का प्रतिदान अच्छे व्यवहार से मिलता है पर कभी कभी व्यक्ति प्रतिदान देने में समय व्यतीत कर देना है और संयोग से दूसरे में धैर्य नहीं होता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति प्रायः जल्दबाज़ी में निर्णय कर बैठाता है कि या तो भलाई दिखावा मात्र है या हमेशा भालाई का बदला भलाई नहीं मिलता।
सुख शान्ति और संतोष सभी को प्रिय है बस उसे समझने, आत्मसात करने और क्रियाशील करने में अन्तर पड जाता है। यही मुख्य समस्या है।
आपके सुन्दर विचारों का समर्थन।
शुक्रिया सुज्ञ जी ...
Deleteकाश ! समय रहते सब समझ जाते..
ReplyDeletemahtwapurn baat he...yah ho to jamana badal jaye
ReplyDeleteपरिवार के हर सदस्य को इन्सान जैसा व्यवहार मिलना चाहिए। चाहे वह बहू हो या सास, बेटा हो या दामाद। बेटी हो या पत्नी और माता पिता को भी।
ReplyDeleteअपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची(नव वधु) से, जो उस समय, घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं !
ReplyDeleteबहुओं को बेटी जैसा व्यवहार मिलना चाहिए.
bahu ko beti bana kar laiye, beti bana kar pyar aur dular se rakhiye,aap beti ko bhool jayenge.
ReplyDeletegr8 words
Deleteआप सच कहते हैं ...
Deleteकाश ये बात सबको समझ आती
ReplyDeleteबहु निश्चित रूप से बेटी होती है. इस विचार को गंभीरता से धारण करने की आवश्यकता है.
ReplyDeleteजब तक भरतीय परिवारों में यौतुक की भाषा व परिभाषा ,संवर्धित व परिवर्तित नहीं होती बेटी व बहु की संवेदना मात्र परिवेदना तक ही सिमित रहेगी ,और इसके लिए बहुसंख्य जन-मानस गंभीर नहीं दिखता ..अच्छा लगता है आपके अपने संस्मरणों को सुनकर ,पढ़कर ...काश सार्वभौम हो जाता /
ReplyDeleteशुक्रिया भाई जी ...
Deleteइस बात को लोग समझकर भी समझना नहीं चाहते .... अपने ज़माने की लीक पर अड़े रहते हैं .
ReplyDeleteसमाज मे आनेवाले महत्वपूर्ण बदलाव के लिये बेटी और बहू के बीच के अंतर को दूर करना आवश्यक है.......
ReplyDeleteआपकी यह पंक्तियाँ याद आ गई...............
ReplyDeleteआँखों में , पट्टी बाँध
कर, गाड़ी चला रहे !
टकरायेंगे , कहाँ पर ?
हमें खुद पता नहीं !
कोशिश हम सब करेंगे इन बेरहीयों को तोरने की
सास भी कभी बहू थी ...
ReplyDeleteबहू बेटी एक सामान
यह पंक्तियाँ याद आ गई
ReplyDeleteआँखों में , पट्टी बाँध कर, गाड़ी चला रहे !
टकरायेंगे , कहाँ पर ? हमें खुद पता नहीं !
कोशिश हम सब करेंगे इन बेरियो को तोरने की
और धीरे धीरे हम सब बदल रहे हैं. समय तो लगेगा ही
प्यार भरा सलाम
बढ़िया प्रस्तुति ।
ReplyDeleteआभार ।।
शुक्रिया भाई जी ....
Deleteपहले इस नंदन कानन में
ReplyDeleteएक राजकुमारी रहती थी
घर राजमहल सा लगता था
हर रोज दिवाली होती थी !
पर अब बेटी की शादी के बाद लगता है
बेटी WHITE हाउस में रहती है
और वहां EASTER मनाती है
मुबारक हो ...
Deleteअब आप हिंदी में कमेन्ट देने तेजी से सीख रहे हो !
शुभकामनायें !
ऐसी अवांछित परम्परा को ढोते रहना पिछड़ेपन की निशानी नहीं तो और क्या है ?
ReplyDeleteवधू किसी की बेटी भी है।
यह भी याद रखनी चाहिए कि अपनी बेटी किसी की बहू भी है।
अब लग रहा है कि आपकी वापसी हुई है.. बहुत लंबी चुप्पी साध ली थी आपने!! एक बहु की भी तो यही ख्वाहिश होती है कि
ReplyDeleteननदी में देखी है बहना की सूरत,
सासू जी मेरी हैं ममता की मूरत
पिता जैसा ससुर जी का भेस!!
फलता-फूलता रहे आपका घर.
ReplyDeleteबहुत सही कह रहे हैं आप.अब स्थितियाँ बदल रही हैं.हाँ पुरानी परंपरायें ढोनेवाले अभी ज़रा कम समझे हैं .समय उन्हें भी समझा देगा !
ReplyDeleteज़माना बदल गया......................रीति-रिवाज़ भी काफी बदल गए..................ना बदलीं तो ये सासें(बहुओं की )......................जमाई की सास तो बड़ी मीठी होती है...
ReplyDeleteमैं ज़रूर एक अच्छी सास बनने की कोशिश करूंगी.....जैसे बेटे की दोस्त हूँ वैसे ही बहु की भी बनना चाहूंगी....
:-)
सादर.
शुभकामनायें आपको !!
Deleteभावी सास ससुर के लिए सही नसीहत ।
ReplyDeleteसाधुवाद ।
सुंदर चिंतन ...सहमत हूँ.....
ReplyDeleteये बात याद रखे कि बेटियाँ ही बहू बनती है,...बेहतरीन प्रस्तुति,
ReplyDeleteRECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....
RECENT POST...फुहार....: रूप तुम्हारा...
सतीश भाई,
ReplyDeleteआपकी नसीहत पर हर घर चले तो स्वर्ग सा सुंदर न हो जाए...
दिक्कत बस यही है कि थ्योरिटिकल करेक्ट बातों को प्रैक्टीकली इंपलीमेंट करने के लिए हम मेहनत नहीं करते...
जय हिंद...
सतीश भाई,
ReplyDeleteआपकी नसीहत पर हर घर चले तो स्वर्ग सा सुंदर न हो जाए...
दिक्कत बस यही है कि थ्योरिटिकल करेक्ट बातों को प्रैक्टीकली इंपलीमेंट करने के लिए हम मेहनत नहीं करते...
जय हिंद...
जी, सही कहा। चैरिटी बिगिंस एट होम! वैसे भी नये घर में जाने के अपने स्ट्रैस-पॉइंट होते हैं जिनको संज्ञान में लेना चाहिये।
ReplyDeleteससुर और जेठ बेचारे तो घर में ज्यादा दखलंदाजी करते नहीं...देवर भाभी को खुश करने में ही लगे रहते हैं...सास, भाभी, देवरानी और ननद के समझने योग्य बात...महिलाओं को महिलाओं का ही ज्यादा सहयोग चाहिए...
ReplyDeleteसच्चाई यही है भाई जी ....
Deleteसटीक और सार्थक सोच
ReplyDeleteजरुर बहू को बेटी समझा जाए , बहू भी अपने माता पिता की तरह ही व्यवहार करे ...
ReplyDeleteज्यादा जिम्मेदारी ससुराल पक्ष की होती है मगर बात दोनों ओर से ही निभती है !!
यह एक बहु आयामी मामला है मगर आपकी सोच बहुत अच्छी है !
ReplyDeleteबहुत कोशिश की पर समझ में नहीं आया कि प्रणाम का चित्र कैसे लगाऊं !
Deleteसहमत है ... काश ये बात हर कोई समझ पता !
ReplyDeleteऔर अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
ReplyDeleteबिलकुल सहमत हूँ आपसे,
अच्छी लगी पोस्ट !
बहू को बेटी समझा जाए ...
ReplyDeleteसार्थक सोच...सार्थक चिंतन...
बहुत सुन्दर सोच है आपकी .....अगर ऐसा हो जाये तो रिश्तों की परिभाषाएं बदल जायें फिर 'नन्द ' बहन और 'सास ' माँ कहलाये......बहुत कुछ बदल जाये .....और सिर्फ हम ही यह कर सकते हैं ...अगर आज अभी से इसकी पहल करें .....
ReplyDeleteसही सोच ... इसी सकारात्मक सोच से परिवार की नीव मजबूत होती है ...
ReplyDeleteसिक्के के दोनों पहलू हैं। आज लोग आपकी तरह ही पुत्रवधु को पूरा प्यार देते हैं लेकिन पुत्रवधुएं फिर भी उनका अपमान करने में बाज नहीं आती। इसलिए खुशियां दोनों तरफ से ही आती हैं।
ReplyDeleteकाश हम वैसे ही अंदर से हों,जैसे दिखते हों !
ReplyDelete....एकसमान व्यहार तभी संभव है !
उम्दा विचारों से सजा हुआ आलेख |
ReplyDeleteइस विचार शैली को आगे बढ़ाने के लिये शुक्रिया.
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति!!!
ReplyDeleteकुछ लिखने का मन है अन्यथा ना लें।
़़़़
आपने तो लिखा है ब्लाग पर अपने
किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष की
आलोचना को महत्व नहीं दिया जायेगा
पर मुझे पता नहीं था कि आप जैसा
व्यक्ति सास को ही मोहरा बनायेगा ।
आपका स्वागत है सुशील भाई ..
Deleteऐसी सासें सबको मिलें :-))
.
ReplyDeleteसुंदर सोच !
सार्थक सोच !
सकारात्मक सोच !
आपकी सोच बहुत अच्छी है !
नासावा जी की बात से सहमत हूँ . सकारात्मक सोच से परिवार की नीव मजबूत होती है
ReplyDeleteजी, आपकी बातों से मैं क्या कोई भी असहमत नहीं हो सकता।
ReplyDeleteकुछ बातें ऐसी होती हैं जिसे दूर तक ले जाना चाहिए, खासतौर पर उस समाज तक तो जरूर जहां ये बुराई आज भी मौजूद है।
सार्थक सोच, इससे हमें भी कुछ सीखने के लिए मिला हैं !
ReplyDeleteAdarneeya Satish Ji ! Pranaam !
ReplyDeleteA Very good & educative post. I agree that these days Girls are most educated & hold high positions in their Jobs. Even they need to travel overseas. We as parents & as in laws are proud of their intelligence , smartness & their responsibility.When a Girl gets married, her resposibility mutiplies. She is again the most competent daughter /daughter in law to shoulder the responsibility as a wife, as a daughter in law, & as a mother too.
I personally feel if she is willingly ready to share the household task , a helping hand to in- laws, there her designation or her major education does not arise.
I too have my daughter in law & my daughter too. Both of them are employed & holding a responsible position making frequent visit to overseas.
They are doing all the chores in home & in office too.After all it the mind & the individual thinking.
Regards
A well wisher & your Follower.
man ko bahut khushi hoti hai jab kabhi es tarah ka mahaul kisi ghar mein dikhta hai ...kash aapki tarah hi sabki soch hoti!
ReplyDeletebahut badiya sarthak prastuti hetu aabhar!
बहुत अच्छे विचार हैं आपके , इस ज़माने के लिए बेहद ज़रूरी।
ReplyDeleteagree with you...pat sikke ke do pahlu hai kahin saas ko to kahin bahu ko samajne ki jarurat hai.
ReplyDeletebahut prerak post.....
ReplyDeleteबहुत बढ़िया....
ReplyDeleteagreed..... :)
सतीश सक्सेना
ReplyDeleteआपके विचारों से में पूरी तरह सहमत हूँ. बहू को इतना प्यार दो की वो बेटी बन जाये और आपको माता पिता समान आदर दे.
आपके विचारों से में पूरी तरह सहमत हूँ. बहू को इतना प्यार दो की वो बेटी बन जाये और आपको माता पिता समान आदर दे.
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