Thursday, July 22, 2010

पता नहीं मां सावन में,यह ऑंखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई, मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते ! जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....
इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पता नहीं किस दिन, उसका अपना घर, मायके में बदल जाता है !  
और "अपने घर" में रहते, पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !
राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा, उसको, उसके घर पर याद किया जा रहा होगा !

उंगली पकड़ के पापा की
जब चलना मैंने सीखा था !
पास लेटकर उनके मैंने
चंदा मामा जाना था !

बड़े दिनों के बाद याद
पापा की गोदी आती है !
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा
मन , रोने को करता है !
बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज,
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको
इकलापन मेरे जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ लड़की बनके,
बड़े सवेरे आज द्वार पर 
कौआ बैठा देखा था !
न जाने क्यों बार बार ही, आँखे झर झर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ ,
मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या
इस मंदिर को, घर मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ
उस घर की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी के संग, तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,
खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की
चंचल यादें ,आती हैं !
तेरी राजकुमारी को, परियों की यादें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए मुझको 
पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?
बचपन बीता जिस घर में 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग, बिसरे घर की यादें आती है !

55 comments:

  1. मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
    माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

    WAH SATISH BHAI.... BAHUT KHUB.

    ReplyDelete
  2. क्यों लगता अम्मा मुझको
    इकलापन सा इस जीवन में
    क्यों लगता मां , जैसे कोई
    गलती की, लड़की बन के !
    बड़े दिनों के बाद आज यादें उस घर की आयीं हैं !
    पता नहीं मां सावन में,यह ऑंखें क्यों भर आती हैं

    हृदय स्पर्शी कविता
    सच है लेकिन ऐसा क्यों होता है कि हमेशा नारी को ही अपने परिवार से छूटने का दुख झेलना पड़ता है ,इस रीत को बनाने वाले की शायद अपनी बेटियां नहीं होंगी बस केवल यही कामना है कि बेटियां हों या बेटे जहां भी हों ख़ुश रहें

    ReplyDelete
  3. सक्सेना जी,
    आज तो कतई इमोशनल कर गये आप।

    ReplyDelete
  4. जिस घर मेरा बचपन बीता वो घर भूल न पाती हूं....
    बाट जोहता है भैया मेरा-ये मैं जान जाती हूँ....
    इसीलिए माँ -हर सावन में राखी के बहाने आती हूँ....
    झूला देख मुझको--माँ पापा की बांहें याद आती है ...
    इसीलिए शायद सावन मेंमेरी आँखें भर आती है ....

    ReplyDelete
  5. बहुत भावुक करने वाले भाव हैं रचना में ।

    ReplyDelete
  6. किस घर को अपना बोलूं माँ
    किस दर को , अपना मानूं !
    भाग्यविधाता ने क्यों मुझको
    जन्म दिया है , नारी का,
    बड़े दिनों के बाद, आज भैया की याद सताती है
    पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है !bahut hi gahre khyaal

    ReplyDelete
  7. निःशब्द कर दिया आपने!!बेटी का बाप हूँ मैं समझ सकता हूँ!! एक दिन मुझे भी इन सवालों के जवाब देने होंगे...

    ReplyDelete
  8. भावुकता से ओत प्रोत सुन्दर रचना. आभार.

    ReplyDelete
  9. भावनाप्रधान रचना .. सावन में भला मायके की याद न आए !!

    ReplyDelete
  10. bahut emotional kar diya ise rachana ne...........
    pyare bhav liye sunder abhivykti .........

    ReplyDelete
  11. शैलेंद्र का याद दिला दिए आप गुरुदेव... अबके बरस भेज भैया को बाबुल...

    ReplyDelete
  12. ब्लॉग ने अपने नाम को अब पुनः सार्थक किया है.माँ पर लिखी जा रही कविताओं में उल्लेखनीय. बेहद मर्मस्पर्शी !

    ReplyDelete
  13. आँखें भर भर आईं हैं
    यादें जो उफनाईं हैं

    ReplyDelete
  14. बड़े ही भावनात्मक विषय को सहेज कर प्रस्तुत कर दिया।

    ReplyDelete
  15. क्या बोलू?
    क्या कहूँ?
    हाँ एक औरत होने के नाते ये जानती हूं जिस घर में प्ले बढे वो घर छूट कर भी कभी नही छूटता हमसे. जीवन भर चिपका रहता है,पर.....अब तो कोई भी नही उस घर में जो....
    इंतज़ार करने और बेटी का रास्ता देखने वाली आँखें बंद हो चुकी है कभी की....
    एक गाना है ना 'अबके बरस भेज भैया का बाबुल सावन में लीजो बुलाय रे' पर...किस से कहूँ?
    कितना भावुक कर दिया सतीश आपने मालूम है?आप क्या जाने जिनका ससुराल और पीहर में जब कोई इंतज़ार करने वाला नही रहता तब...?????
    हा हा हा
    हा हा हा
    खुश हूं फिर भी.

    ReplyDelete
  16. क्या कहूँ सतीश जी .....?

    इस कदर स्त्री मन को पहचानने के लिए शुक्रिया ........!

    कौन कहेगा की इसे एक पुरुष ने लिखा है ......
    ये हर स्त्री की व्यथा है .....न वह पिता के घर को भुला पाती है .....न ससुराल में रम पाती है ...
    शायद ही कोई भाग्यशाली स्त्री होगी जिसे ससुराल में पिता से ज्यादा प्यार मिला हो.....
    आपने एक एक शब्द में दर्द पिरो दिया है .....
    आज फिर ज़ख्म हरे हो गए .......

    ReplyDelete
  17. बहुत सुन्दर और संवेदनशील!

    ReplyDelete
  18. बहुत सुन्दर, हृदय-स्पर्शी रचना है सतीश जी. इस रचना ने भी कुछ उसी तरह उद्वेलित किया है, जैसे मुझे आशा जी का गाया बन्दिनी फ़िल्म का गीत " अब के बरस भेज भैया को बाबुल...." करता है. बहुत सुन्दर. आभार.

    ReplyDelete
  19. बहुत संवेदनशील रचना..हर लडकी अपने मायके को पूरी ज़िंदगी नहीं भूल पाती.....सुन्दर अभिव्यक्ति..

    ReplyDelete
  20. भावुक करती रचना, सतीशा भाई..बहुत उम्दा!

    ReplyDelete
  21. स्त्री मन की कोमलतम भावना को पुरुष की कलम से पढना बहुत ही सुखद है ...!

    ReplyDelete
  22. .
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति । एक स्त्री के मन को मथने वाले भावों की सुन्दर प्रस्तुति । काश आप जैसा भाई, दोस्त, पिता सबको मिले।
    .

    ReplyDelete
  23. dil ko chhoone vala geet hai yah.badhai satish bhai, vilamb se aane k liye.

    ReplyDelete
  24. सतीश भाई, आपकी भावप्रधान इस पोस्ट ने सहसा मुझे भी अहसास कराया कि मैं भी अपनी नन्ही लाडली का बाबुल हूं...

    साडा चिड़िया द चंबा वे बाबुल असा टूर जाना,
    साडी लंबी फुडारी वे असां हाथ नहीं आना...

    (हमारा चिड़ियों का घोंसला है, बाबुल हमने एक दिन चले जाना है,
    हमारी लंबी उड़ान है, हमने हाथ नहीं आना)

    जय दिन...

    ReplyDelete
  25. सतीश भाई, मेरे भावुक होने का इसी से पता चलता है कि ऊपर जय हिंद की जगह जय दिन लिख गया...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  26. इन आँखों में भी सावन भर आया ...और क्या कहूँ .

    ReplyDelete
  27. सतीश जी
    वाकई बड़ी खूबसूरती से आपने स्त्री मन को छू दिया.... जिस घर में बरसों रहे हों उसे छोड़ना किसी लड़की के लिए निश्चित ही बहुत भरी लगता होगा......! मार्मिक रचना के लिए धन्यवाद

    ReplyDelete
  28. सतीश जी बहुत ही संवेदनशील कविता है। लेकिन आज कल ये व्यथा कितनी सच है? आज कल टेकनोलोजी और आर्थिक स्वतंत्रता के युग में लड़कियों को ये व्यथा कम ही सहनी पड़ती है है । इन्दू जी भी सही कह रही हैं, व्यथा ये नहीं कि घर न जा सके, घर तो कभी भी उठ कर चले जायेगें, व्यथा ये है कि अब बाट जोहने वाला वहां कोई नहीं।वैसे कब है राखी?…॥:)

    ReplyDelete
  29. बहुत ही संवेदनशील रचना. अति भावुक....निशब्द हुं. शुभकामनाएं.

    रामराम.

    ReplyDelete
  30. चाचा जी पूरा पढ़ने के बाद शायद ही कोई शक्स होगा जिसकी आँखों में आँसू ना आ जाए बेहद मार्मिक और संवेदना से भरी प्रस्तुति..यह भी एक अनोखी रीति है बचपन से उस परिवार की एक खास सदस्य होने वाली बेटी एक पल में पराई है जाती है ..और कभी कभी तो उस घर से रिश्ता जुड़ता है जिसके बारे में पहले से कुछ पता नही होता फिर भी सहर्ष स्वीकार कर लेना अपना धर्म समझती है...

    मार्मिक गीत...प्रस्तुति के लिए धन्यवाद चाचा जी

    ReplyDelete
  31. बहुत भावुक करने वाले भाव हैं रचना में ।

    ReplyDelete
  32. आँखों को भिगो गयी ये रचना और मुझे मेरे पापा की याद दिला गयी.

    ReplyDelete
  33. अपने घर का मायके में बदल जाना बेटी के लिए एक नया और त्रासद अनुभव होता है. इस भावप्रधान कविता के लिए साधुवाद. आज यद्यपि परिस्थितियाँ बदली भी हैं. बेटियाँ नित्य ही घंटों अपने माँ- बाप, भाई बहनों से फ़ोन या इंटरनेट के जरिये संपर्क में रहती हैं और सास- बहू और ससुर-बहू की केमिस्ट्री भी बदल रही है, तथापि अपने बचपन के घर का बिछुड़ना वह नहीं भुला पाती.

    ReplyDelete
  34. आँखें नाम हो गयी इस रचना को पढ़ कर ... ग़ज़ब है सतीश जी ये रचना ... हिला देने की ताक़त रखती है ....

    ReplyDelete
  35. Behad bhaw prawan rachna beti ka hriday undel kar rakh diya aapne kawita men aur aakhri wala to rula hee gaya.

    ReplyDelete
  36. मर्मस्पर्शी रचना .

    ReplyDelete
  37. aap kanha vyast hai aajkal ........?

    anupastithee darj kara dee hai...........

    :)

    ReplyDelete
  38. बहुत ही मार्मिक और दिल को झकझोरने वाली रचना। रुला कर रख दिया इसने।

    ReplyDelete
  39. बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले... गीत देख-सुनकर किसी भी बेटी के पिता की आँखें भर आती हैं।

    कविता बहुत ही उम्दा और दिल को छू लेने वाली है।

    ReplyDelete
  40. Hey Bhagwan!

    Bhaut umda aur dil ko choo lene wali Kavita hai...

    Padh kar lagta hai ki aap rishoon ko bharpoor jeete hain.

    Abhar!

    ReplyDelete
  41. khoob padhaaya tumne mujhko,
    khada kiya apne pairo pe mujhko,
    phir kyun papa duur kar rahe
    apne hi ghar se mujhko..
    jab itna kuchh badla hai
    toh ye prathaa q nahi badalti
    q ladki ko hi paraaye dhan ki upaadhi hai milti??

    q papa meri kamaai, aap nahi rakhte,
    q bhaiya mei aur mujhme ye farak ho karte?
    jab padhaaya ek jaisa, ek jaisa pyar karte,
    toh papa q bas mujhe hi vidaa karte??

    aaj ki peedhi ki ladki ke chand sawaal iss samaaj se !

    ReplyDelete
  42. बेहद भावपूर्ण रचना है ...

    ReplyDelete
  43. स्त्री दो घर की मर्यादाओ का सम्मान रखती है।
    बेटियां तथा पुत्र वधु स्त्री-स्वरूपा है, पूजनीय होती है।
    जहाँ स्त्रियां सम्मानित है,वह घर स्वर्ग तुल्य है।
    स्त्री के प्रति भावपूर्ण कविता

    ReplyDelete
  44. सच में आँख भर आई

    ReplyDelete
  45. कहाँ से इतने मार्मिक भाव शब्द ले आत हैं सतीश जी भावुक हो गई ये गीत पढ़ के बहुत बहुत बधाई आपको सावन की शुभकामनाये

    ReplyDelete
  46. दिल को छू लेनेवाली रचना

    ReplyDelete
  47. कितनी आँखें तो बारहों महीने बरसात ही बनी रहती है --दिल को छू गई आपकी ये रचना।

    ReplyDelete
  48. Daughters and sisters are very precious, we always keep them close to hearts. Their emotions have great value. Very good.

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,