Monday, July 9, 2018

तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा - सतीश सक्सेना

ये रिश्ते जटिल हैं, समझना तो होगा !
तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा !

उठो त्याग आलस , झुकाओ न नजरें 
भले मन ही मन,पर सुधरना तो होगा ! 

अगर जीना है आओ हंसकर खुले में 
शुरुआत में कुछ ,टहलना तो होगा !

यही है समय ,छोड़ आसन सुखों का 
स्वयं स्वस्त्ययन काल रचना तो होगा !

असंभव कहाँ, मानवी कौम में कब ?
सनम दौड़ में,गिर संभलना तो होगा !

2 comments:

  1. वाह आशा जगाती रचना।

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  2. वाह ! कितना हसीन अनुरोध..वह भी उनके भले के लिये ही..

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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