Monday, July 9, 2018

तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा - सतीश सक्सेना

ये रिश्ते जटिल हैं, समझना तो होगा !
तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा !

उठो त्याग आलस , झुकाओ न नजरें 
भले मन ही मन,पर सुधरना तो होगा ! 

अगर जीना है आओ हंसकर खुले में 
शुरुआत में कुछ ,टहलना तो होगा !

यही है समय ,छोड़ आसन सुखों का 
स्वयं स्वस्त्ययन काल रचना तो होगा !

असंभव कहाँ, मानवी कौम में कब ?
सनम दौड़ में,गिर संभलना तो होगा !

5 comments:

  1. वाह आशा जगाती रचना।

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  2. वाह ! कितना हसीन अनुरोध..वह भी उनके भले के लिये ही..

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  3. बहुत बढ़िया

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  4. सतीश जी बहुत अच्छी कविता. बहुत ही अच्छे विचार. निश्चय ही महिलाओं को अपनी क्षमता को समझ अपनी कमजोरियों को दूर कर आगे बढ़ स्वयं के सशक्तिकरण का परिचय देना ही चाहिए और देना ही पड़ेगा और दे भी रही है.

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  5. सतीश जी बहुत अच्छी कविता. बहुत ही अच्छे विचार. निश्चय ही महिलाओं को अपनी क्षमता को समझ अपनी कमजोरियों को दूर कर आगे बढ़ स्वयं के सशक्तिकरण का परिचय देना ही चाहिए और देना ही पड़ेगा और दे भी रही है.

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- सतीश सक्सेना

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