Sunday, July 27, 2008

पता नहीं मां ! सावन में यह आँखें क्यों भर आती हैं - सतीश सक्सेना

जिस दिन एक बेटी अपने घर से, अपने परिवार से, अपने भाई,मां तथा पिता से जुदा होकर अपनी ससुराल को जाने के लिए अपने घर से विदाई लेती है, उस समय उस किशोरमन की त्रासदी, वर्णन करने के लिए कवि को भी शब्द नही मिलते !
जिस पिता की ऊँगली पकड़ कर वह बड़ी हुई, उन्हें छोड़ने का कष्ट, जिस भाई के साथ सुख और दुःख भरी यादें और प्यार बांटा, और वह अपना घर जिसमे बचपन की सब यादें बसी थी.....इस तकलीफ का वर्णन किसी के लिए भी असंभव जैसा ही है !और उसके बाद रह जातीं हैं सिर्फ़ बचपन की यादें, ताउम्र बेटी अपने पिता का घर नही भूल पाती ! पूरे जीवन वह अपने भाई और पिता की ओर देखती रहती है !

राखी और सावन में तीज, ये दो त्यौहार, पुत्रियों को समर्पित हैं, इन दिनों का इंतज़ार रहता है बेटियों को कि मुझे बाबुल का या भइया का बुलावा आएगा ! अपने ही घर को  वह अपना नहीं कह पाती वह मायके में बदल जाता है ! !
नारी के इस दर्द का वर्णन बेहद दुखद है  .........

याद है उंगली पापा की 
जब चलना मैंने सीखा था ! 
पास लेटकर उनके मैंने 
चंदा मामा  जाना था !
बड़े दिनों के बाद याद 
पापा की गोदी आती है  
पता नहीं माँ सावन में, यह ऑंखें क्यों भर आती हैं !

पता नहीं जाने क्यों मेरा 
मन , रोने को करता है !

बार बार क्यों आज मुझे
सब सूना सूना लगता है !
बड़े दिनों के बाद आज, 
पापा सपने में आए थे !
आज सुबह से बार बार बचपन की यादें आतीं हैं !

क्यों लगता अम्मा मुझको

इकलापन सा इस जीवन में,
क्यों लगता जैसे कोई 
गलती की माँ, लड़की बनके,
न जाने क्यों तड़प उठी ये 
आँखे झर झर आती हैं !
अक्सर ही हर सावन में माँ, ऑंखें क्यों भर आती हैं !

एक बात बतलाओ माँ , 

मैं किस घर को अपना मानूँ 
जिसे मायका बना दिया या 
इस घर को अपना मानूं !
कितनी बार तड़प कर माँ 
गुड़िया की यादें आतीं हैं !
पायल,झुमका,बिंदी संग , माँ तेरी यादें आती हैं !

आज बाग़ में बच्चों को
जब मैंने देखा, झूले में ,

खुलके हंसना याद आया है,
जो मैं भुला चुकी कब से
नानी,मामा औ मौसी की 
चंचल यादें ,आती हैं !
सोते वक्त तेरे संग, छत की याद वे रातें आती हैं !

तुम सब भले भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ 
तुम सब भूल गए भैय्या

पर मैं वे दिन कैसे भूलूँ ?

छीना सबने आज मुझे 
उस घर की यादें आती हैं,
बाजे गाजे के संग, बिसरे घर की यादें आती है !

26 comments:

  1. सतीश सक्सेना जी आप की कविता ने बहुत भावुक कर दिया.
    बड़े दिनों के बाद आज , उस घर की यादें आती हैं !
    पता नहीं क्यों आज मुझे मां तेरी यादें आती हैं !
    धन्यावाद

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  2. This is one of ur best poem,this poem wil touch every girl's heart..very beautifully written by you.
    thank you

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  3. यह विषय ही भावुक कर देने वाला है जी। हमारे समाज की संरचना में यह इनहेरेण्ट (inherent) है।

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  4. Satish !
    A Very touchy, expressive, feelings of a girl who really misses her nanihal especially during a festival time. She is midst of both families and never show her hidden wishes either to her mayka or in her sasural.
    Satish tumhare sawan ki geet ne mujhe rula diya !

    किस घर को अपना बोलूं ?
    मां किस दर को अपना मानूं
    भाग्यविधाता ने क्यों मुझको
    जन्म दिया है , नारी का,
    बड़े दिनों के बाद आज भैया की याद सताती है
    पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है !

    आज बाग़ में बच्चों को
    जब मैंने देखा झूले में ,
    अपना बचपन याद आ गया
    जो मैं भुला चुकी, कब से
    बड़े दिनों के बाद आज क्यों बिसरी यादें आती हैं !
    पता नही क्यों याद मुझे, पापा की पप्पी आती है !

    I am relly happy that you had putforth the true feelings of a woman.

    Bahut khoob !

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  5. बहुत भावुक प्रस्तुति!! मन भर आया पढ़कर.

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  6. बहुत मार्मिक रचना है।बहुत सुन्दर लिखा है।

    बड़े दिनों के बाद आज , उस घर की यादें आती हैं !
    पता नहीं क्यों आज मुझे मां तेरी यादें आती हैं !

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  7. अच्छा लिखा है आपने. पर यह तो जीवन यात्रा है, कोई तो अपने घर से दूसरे घर जायेगा.

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  8. पता नहीं जाने क्यों मेरा
    मन रोने को करता है ,
    बार बार क्यों आज मुझे
    यादें उस घर की आती हैं
    बड़े दिनों के बाद आज , पापा सपने में आए थे !
    पता नहीं मां क्यों मन को,मैं आज न समझा पाई हूँ
    "ankhen sach mey nm hogyee hain"
    Regards

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  9. सच कहा आपने माँ तो माँ ही है। उसकी जगह और कोई नहिं ले सकता।

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  10. बहुत ही भावुक रचना है बिल्‍कुल दिल से बहुत ही अच्‍छी है बधाई हो और धन्‍यवाद आज हमें भी मां और पिताजी की काफी याद आ गई लगता है आज तो फोन करना ही पडेगा बहुत अच्‍छी रचना

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  11. अत्यंत भावःविह्वल कर दिया आपने.
    सबसे बड़ी बात ये है यहाँ कि कविता में स्म्रतियाँ मात्र बेटी कि नहीं हैं पिता भी यहाँ उपस्थित है
    और माँ बिना बेटी का रुदन तो अधूरा होगा ही सो बेटी के भी शक्ल में माँ अपनी सम्पूर्णता में है .

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  12. बड़े दिनों के बाद आज , उस घर की यादें आती हैं !
    पता नहीं क्यों आज मुझे मां तेरी यादें आती हैं !

    बेटी को विदा करने के बाद जो शुन्य पैदा
    हवा है वो आज तक नही भर पाया !
    दिल को छु गई आपकी ये रचना ! पिछली
    जितनी ही ह्रदय स्पर्शी ! धन्यवाद !

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  13. आज बाग़ में बच्चों को
    जब मैंने देखा झूले में ,
    अपना बचपन याद आ गया
    जो मैं भुला चुकी, कब से
    बड़े दिनों के बाद आज क्यों बिसरी यादें आती हैं !
    पता नही क्यों याद मुझे, पापा की पप्पी आती है !
    bahut achchhe geet hai sateesh ji aapake, nirantar padhvate rahiyega.
    http://.rashtrapremi.com

    ReplyDelete
  14. बहुत मार्मिक प्रस्तुति.......

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  15. पता नहीं जाने क्यों मेरा
    मन रोने को करता है ,
    बार बार क्यों आज मुझे
    यादें उस घर की आती हैं
    बड़े दिनों के बाद आज , पापा सपने में आए थे !
    पता नहीं मां क्यों मन को,मैं आज न समझा पाई हूँ
    सतीश जी आपने तो सच में रुला दिया
    कविता पढ़कर बहनों कि याद तो आयी ही बीवी का ख्याल भी आ गया कि उसे भी अपने घर गये हुए काफी दिन हो गये

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  16. bhut bhavuk kar gayi hai rachana. bhut sundar.

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  17. kya baat bhut bhavuk note hai. ati uttam. jari rhe.

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  18. बेहद संवेदनशील. उम्दा.

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  19. 'किस घर को अपना बोलूं? मां किस दर को अपना मानूं'- भारतीय नारी के जीवन की शाश्वत विडम्बना
    का मार्मिक चित्रण।

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  20. बहुत सच और मार्मिक है आपका लेखन ।कई बार ई-मेल पता ढूँढने की कोशिश की थी नहीं मिला ।
    -प्रतिभा सक्सेना.

    १३

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  21. बहुत सच और मार्मिक है आपका लेखन ।कई बार ई-मेल पता ढूँढने की कोशिश की थी नहीं मिला ।
    -प्रतिभा सक्सेना.

    १३

    ReplyDelete
  22. बहुत बढ़िया और भावुक कर देने वाला लिखा है सर ।

    सादर

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  23. एक बेटी के दर्द को बखूबी उकेरा है।

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  24. भावमय करते शब्‍दों के साथ बेहतरीन रचना

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  25. भावनाओं ले भरी रचना....
    सच में यही होता है...

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  26. बेटी के मन के भावों को बहुत खूबसूरती से लिखा है .. हर बेटी ऐसे ही माँ को याद करती है ..

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- सतीश सक्सेना

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