यह लेख मेरे और एक महिला हिन्दी ब्लॉगर के मध्य हुए पत्राचार का हिस्सा है जो यहाँ प्रदर्शित करना आवश्यक समझता हूँ चूंकि सुझाव बेहद सटीक हैं अतः यहाँ देना मेरे विचार से उचित है , शायद समाज के कुछ कार्य
आए ! सम्मानित महिला ब्लागर ने मेरे
लिखे एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) पर एक आपत्ति प्रकट करते हुए कहा था, कि हर पिता पुत्री को ही शिक्षा क्यों देता है ?
----- Original Message -----
From:
सतीश सक्सेना
To:
रचना सिंह
Sent: Tuesday, September 02, 2008 10:32 AM
Subject :
हिन्दी ब्लाग और पुरूष मानसिकता !
On 9/1/08, Rachna Singh wrote:
" its high time we educated our man folk satish "
पुरूष मानसिकता के बदलने के सवाल पर आप ठीक हैं रचना जी ! भारतीय समाज के पारंपरिक रूप में पुरूष का अस्तित्व विश्व समाज के समक्ष टिक नही पायेगा ! पुरूष मानसिकता, (जिसमें अहम्, पुरुषत्व,शक्ति तथा कमजोर को सुरक्षा देना जैसे तत्व प्रधान हैं,) से यह हटा पाना कि " यह मेरी है " बेहद मुश्किल कार्य है, शिक्षित और समझदार की मानसिकता बदल सकती है मगर अधिकतर भारतीय परिवार इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षित हैं ही नहीं, न स्कूल से और न सामजिक परिवेश से !
"सतीश बहुत जरुरत है कि केवल बेटी को शालीनता की शिक्षा ना दी जाये"
अगर आप मेरे गीत में लिखी मेरी रचना " एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) " के सन्दर्भ में कह रही हैं तो यह कविता एक ऐसे पिता का चिंता वर्णित कर रही है जो पारंपरिक रूप से भारतीय समाज और उसी पुरूष समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है इसमे अपनी जान से भी प्यारी पुत्री को पारस्परिक समझ और सामंजस्य के बारे में समझाता है, कि बेटी २४-२५ वर्ष की कच्ची उम्र में नए लोगों के साथ रहकर उनका दिल कैसे जीत पायेगी !
"अगर हम सब बेटो को भी वही पाठ पढाये जो बेटी को तो भारतीयता को बदनाम करने बाले लोग लोग धीरे धीरे समझदार होंगे "
आप इस बात का समर्थन करेंगी कि विवाह के समय, वर पक्ष का, नयी वधू के प्रति जितना उत्साह होता है उतना ही वधू पक्ष अपनी पुत्री के प्रति चिंतित होता है ! अगर ऐसे में पुत्री शंकित मन से न जाकर , नए उत्साह से अपने नए परिवार को अंगीकार के, और दोनों घरों से शंका तथा चिंता का माहौल हटा कर नया उत्साह भरे तो काफ़ी कष्ट प्रद मौकों से छुटकारा मिल सकता है ! इस पूरी कविता में पुत्री को उसकी ताक़त का अहसास दिलाते हुए प्यार से अपने बड़ों का दिल जीतने की बात कही गयी है ! हाँ इसमे, एक और सच्चाई, जिसको बहुत कम नारी लेखिकाओं ने लिखा होगा, को भी स्थान दिया गया है, नवविवाहित पति की मनोदशा को समझना परिवार के सबसे बड़े सुख के अवसर पर, पति सबसे अधिक तनाव ग्रस्त रहता है और उसकी इस मनोदशा को नववधू और उसके अपने परिवार के लोग समझना भी नही चाहते ! पुरूष के इस पक्ष को नारी वादी आन्दोलन के प्रणेता बिल्कुल महत्व नही देते जहाँ नारी के कष्टों पर खूब हाय तौबा रहती है वहीं नवविवाहित लड़के के बारे में कोई सोचता तक नहीं !
"आप की कविता पर भी मेने यही कहा
था मै पुरूष जाति के ख़िलाफ़ नहीं लिखती
मै लिखती हूँ उस मानसिकता के ख़िलाफ़ जहाँ स्त्री को शालीन रह कर सब गंदगी सहने की शिक्षा दी जाती हैं "
आज के समय में, स्त्री को शक्तिशाली बनने की आवश्यकता, समय की पुकार है ! इसके अभाव में देश तो पिछ्डेगा ही, अगली पीढियां भी कुछ सीख नहीं पाएंगी ! भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति, कमोवेश पिछडी जनजातियों की भांति ही है, जो अपनी स्थिति को नियति मान कर खुश हैं ! स्त्री दशा में सूधार हेतु, बदनामी के भय से , शिक्षा देने बहुत कम महिलायें आगे आ पाती है समाज की गालियाँ, "बहुत तेज" होने, तथा गंदे आरोप जिससे वह समाज में खड़ी भी न हो पाये, थोपना आम बात है ! और यह सब, सबके समक्ष करते हुए लोग गर्वित होते हैं, तथा ब्लॉग जगत के मशहूर लोग या तो भाग खड़े होते है या इस पर मौन व्रत धारण कर मन ही मन प्रायश्चित्त करते है ! यह और कुछ नहीं सिर्फ़ हमारी कायरता है !
आप का कार्य सराहनीय है, इस हिम्मत के लिए मै आपका अभिनन्दन करता हूँ !