Monday, May 16, 2011

साँसे हैं कितनी पास, हमें खुद पता नहीं - सतीश सक्सेना


दिन आखिरी तो यार, किसी को पता नहीं ! 
सब रोयेंगे मेरे लिए, वह दिन ? पता नहीं !

क्यों नफरतें हैं पालते 
हम   लोग   प्यार  से ! 
साँसे हैं, कितनी पास  
हमें खुद , पता नहीं ?
जीवन में कई मोड़ , बड़े खतरनाक है !
रास्ता कहाँ जायेगा,हमें खुद पता नहीं !

आँखों में , पट्टी बाँध 
कर, गाड़ी चला रहे   !
टकरायेंगे , कहाँ पर ?
हमें खुद पता   नहीं !
जब तक जियेंगे, हम भी जलाये रहें दिया !
कब आसमान रो पड़े ?हमको पता नहीं   !

चोटों को भुलाकर तेरे  
हम , साथ चल दिए  !
इस बार क्या करोगे ?
हमें ही , पता नहीं   !
इक जिंदगी काफी नहीं , यह  आग  बुझ सके  !
सौ बार जनम लेंगे  ?  यह  हमको,  पता  नहीं  !

हम  हैं ,तुम्हारे साथ 
कि  आराम दे सकें  !  
हर बार जनम लेंगे ,
अभी ,मन भरा नहीं !
उत्साह अभी भी यही, तुमको ही समझ लें
कितना लहू बाकी है , हमें खुद पता नहीं  !

ताकत अभी बाकी है
इस बांके शरीर में  !
अब कितने घाव लग 
चुके,हमको पता नहीं !
मासूमियत पर लोग तरस खा रहे यहाँ
कैसे चला यह तीर ?तुम्हे ही पता नहीं !

हम रोज नए जोश में 
मगरूर थे , बहुत   !
यह समय कब गया   
हमें खुद ही पता नहीं 
चुपचाप आती, मौत में , आवाज  तक नहीं   !
उस तीर और समय का, हमें कुछ पता नहीं !

लोगों का क्या है रस्म 
निभाकर निकल पड़े !
मौत आएगी मिलन
को,हमें ही पता नहीं !
कब जायेंगे घर छोड़ कर, सोंचा नहीं सनम ,
मरने का समय तय है, पर हमको पता नहीं !

71 comments:

  1. चोटों को भुलाकर तेरे
    हम , साथ चल दिए !
    इस बार क्या करोगे
    हमें ही , पता नहीं !
    इक जिंदगी काफी नहीं , यह आग बुझ सके !
    सौ बार जनम लेंगे ? यह हमको पता नहीं !
    waah , kya baat hai

    ReplyDelete
  2. लोगों का क्या है रस्म
    निभाकर निकल पड़े
    मौत आएगी मिलन
    को, हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम !
    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं !

    ReplyDelete
  3. क्यों नफरतें हैं पालते
    हम लोग प्यार से !
    साँसे हैं कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ?
    जीवन में कई मोड़ , बड़े खतरनाक है !

    रस्ता कहाँ जाता है,हमें खुद पता नहीं !

    सतीश जी
    कमाल की रचना लिखी है आज्………ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा गढ दिया…………हर पंक्ति दिल को छू गयी।

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  4. लोगों का क्या है रस्म
    निभाकर निकल पड़े
    मौत आएगी मिलन
    को, हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम !
    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं !

    जीवन के अनिश्चय से भरे रास्तों का सफर बहुत ही दुरूह है. जिंदगी के दर्शन को बहुत मासूमियत से पेश किया है, सुंदर कविता के माध्यम से. बधाई और शुभकामनायें.

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  5. jab tak hai aash tab tak hai sans....

    apki sundar rachna ke liye sukriyakya............

    dhoondh rahe ho antas me....
    is jagat ka bimb liye...........
    ye duniya to hai kasht bhara....
    o' duniya bahut madhurtam hai...

    pranam.

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  6. सांसे हैं कितने पास, हमें खुद पता नही, सचमुच जीवन आज है कल नहीं रहेगा, इस बहुमूल्य जीवन को सदा बहार गीतों को लिखते-पढते हुए गुजार सकें और जितना हो सके जगत को खुशियाँ दे सकें यही प्रार्थना है, शुभकामनायें !

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  7. जो थे आशावादी, जीवट से भरे हुए।
    अब साँसो की गिनती? हमें पता नहीं!!

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  8. हम रोज नए जोश में
    मगरूर थे , बहुत !
    यह समय कब बीता
    हमें खुद ही पता नहीं
    चुपचाप आती मौत में , आवाज भी नहीं !
    उस तीर और समय का हमें कुछ पता नहीं

    एक एक शब्द से दिल पर गहरी चोट की है आपने सतीश भाई.
    एक पुराना गाना याद आ रहा है
    'जिंदगी का सफर ,है ये कैसा सफर
    कोई समझा नहीं,कोई जाना नहीं '

    अति उत्तम भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

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  9. kaash stish bhai ki bat sbhi jaan len or sbhi man len to duniya me hi svrg kaa vatavaran bn jaye .....akhtar khan akela kota rajsthan

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  10. ताकत अभी बाकी है

    इस बांके शरीर में !

    अब कितने घाव लग

    चुके, हमको पता नहीं !

    .........................सुन्दर भाव....सुन्दर गीत

    ReplyDelete
  11. बहुत ही सटीक, जिंदगी को दर्शाता गीत.

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  12. सतीश भाई, प्यार ही तो जीवन है।

    ReplyDelete
  13. चोटों को भुलाकर तेरे
    हम , साथ चल दिए !
    इस बार क्या करोगे
    हमें ही , पता नहीं !
    इक जिंदगी काफी नहीं , यह आग बुझ सके !
    सौ बार जनम लेंगे ? यह हमको पता नहीं !

    एक -एक शब्द जेसे दर्द में लिपता हुआ ..सतिश जी !बहुत खूब ...

    "क्या खबर थी की कभी तेरी तमन्ना ऐ दोस्त!
    अश्क बन कर मेरी पलको पर उतर आएगी !! "

    ReplyDelete
  14. बहुत सुन्दर कविता ... जीवन मरण के इस्खेल के बारे में किसीको कुछ पता नहीं !

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  15. लोगों का क्या है रस्म
    निभाकर निकल पड़े
    मौत आएगी मिलन
    को, हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम !
    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं !

    बहुत सुंदर, बस यही एक शाश्वत सत्य है, कौन आएगा और रुकेगा नहीं जानते लेकिन मौत जरूर आएगी और लेकर ही जायेगी.

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  16. कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम !
    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं !

    -एक संपूर्ण दर्शन.


    बहुत बेहतरीन भावाव्यक्ति.

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  17. क्यों नफरतें हैं पालते
    हम लोग प्यार से !
    साँसे हैं कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ...

    सच कहा है सतीश जी ... इसलिए तो कहते हैं ...प्यार बाँटते चलो .... दो पल का जीवन है ये ....

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  18. गीत बेशक अच्छा है
    ताला है क्यों पता नहीं
    टिप्पणी जो देने आये थे
    अब क्या दें पता नहीं

    :)

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  19. सत्यवचन।

    सब तय है, लेकिन पता नहीं है कब, कैसे और कहाँ।

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  20. हम रोज नए जोश में
    मगरूर थे , बहुत !
    यह समय कब बीता
    हमें खुद ही पता नहीं
    चुपचाप आती मौत में , आवाज भी नहीं !
    उस तीर और समय का हमें कुछ पता नहीं !
    भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार....

    ReplyDelete
  21. चुपचाप आती मौत में,आवाज भी नहीं!
    उस तीर और समय का हमें कुछ पता नहीं!
    लोगों का क्या है रस्म निभाकर निकल पड़े
    मौत आएगी मिलन को,हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम!
    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं!

    संपूर्ण रचना में कलात्मक अभिव्यक्ति मगर उपरलिखित ने मन ही मोह लिया है.

    पति द्वारा क्रूरता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझावअपने अनुभवों से तैयार पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में दंड संबंधी भा.दं.संहिता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव विधि आयोग में भेज रहा हूँ.जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के दुरुपयोग और उसे रोके जाने और प्रभावी बनाए जाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए गए हैं. अगर आपने भी अपने आस-पास देखा हो या आप या आपने अपने किसी रिश्तेदार को महिलाओं के हितों में बनाये कानूनों के दुरूपयोग पर परेशान देखकर कोई मन में इन कानून लेकर बदलाव हेतु कोई सुझाव आया हो तब आप भी बताये.

    ReplyDelete
  22. ताकत अभी बाकी है
    इस बांके शरीर में !
    अब कितने घाव लग चुके,
    हमको पता नहीं !

    समूची रचना बेमिसाल...

    ReplyDelete
  23. लिखते रहे कहते रहे
    अपने हृदय की बात.
    रो रहा गोदी शिशु
    पर, कारण पता नहीं.
    मरने की चिंता भूल नव जीवन का स्वागत कर.
    गुड़िया है कितनी पास, तुम्हें खुद पता नहीं.

    [... फोटो देखकर सूझा]

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  24. मौत आएगी तो एक पल की ना मोहलत देगी,
    सांस लेने की भी कमबख्त न फुर्सत देगी,
    जीते जी किसलिए फिर आपको नाशाद करें
    ज़िंदगी एक भी पल क्यूं तेरा बर्बाद करें.

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  25. एक और बेहतरीन गीत लेकर आए हैं सतीश जी । प्रथम चंद पंक्तियाँ ही कोई समझ ले तो जिंदगी बड़ी आसान हो जाए । बधाई इस सुन्दर गीत के लिए ।

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  26. किसी एक पंक्ति को भी छोड़ नहीं सकती
    हर पंक्ति दिल को छू गई !
    बहुत सुंदर रचना है !

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  27. क्यों नफरतें हैं पालते
    हम लोग प्यार से !
    साँसे हैं कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ?
    जीवन में कई मोड़ , बड़े खतरनाक है !
    रस्ता कहाँ जाता है,हमें खुद पता नहीं !

    बहुत सुंदर..... जीवन का यही फलसफा तो समझना है हम सबको.....

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  28. जीवन की क्षण भंगुरता याद आयी

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  29. वाह दार्शनिक अंदाज़...
    बढ़िया लगा.

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  30. दर्शन बाँचती पक्तियाँ, भा गयीं।

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  31. वाह एक और सुंदर नवगीत

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  32. satish ji Pranaam ! You have powerful writing in your pen. Simple lines & power packed meanings . Each line has its own strengths , which goes deep into the heart. I searched the dictionary for words to comment, but i had to cut a sorry figure, for not finding an apt one. A Touchy delicate post !

    ReplyDelete
  33. zindagi ka falsafa hai ye geet
    bahut sundar

    ReplyDelete
  34. zindagi ka falsafa hai ye geet
    bahut sundar

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  35. अगर सांसों की गिनती होती तो आदमी के पास नफरत के लिए समय ही कहां होता ॥

    ReplyDelete
  36. भाई सतीश जी, एक शेर अर्ज़ है...बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार...लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे...यदि सब पता चल गया तो इस स्टोरी का सुस्पेंस ख़तम हो जायेगा...इस लिए...हर पल यहाँ...जी भर जियो...जो है समां...कल हो ना हो...

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  37. प्यार और साथ ना जाने कब छुट जाये
    फिर नफरत का क्या करेगे
    जब कोई साथ ही नहीं होगा
    एक जिन्दगी कम है इस प्यार के लिए
    नफरत कहाँ से पाले ...

    ReplyDelete
  38. कब जायेंगे घर छोड़कर ,सोंचा नहीं सनम !

    मरने का समय तय था पर हमको पता नहीं !
    वाह
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    ReplyDelete
  39. अति सुंदर रचना, सती्श जी कुर्ते मे तो आप पुरे हीरो लगते हे, भारतिया फ़िल्मो मे एक कलाकार योगेंदर आते थे, दाडी ओर मुंछो मे ओर आप वो ही लग रहे हे, ऒर खुब जंचे थे अपने रोल मे ओर एक्टिंग भी कमाल की थी

    ReplyDelete
  40. मौत का जहर है फिजाओं में ..........लेकिन जीवन का सौन्दर्य कहीं न कहीं मौत के इस प्रत्यक्षीकरण से ही शुरू होता है!

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  41. आँखों पे पट्टी बाँध के गाडी चला रहे ,
    टकरायेंगे कहाँ पर हमें खुद पता नहीं ।
    क्यों नफरतें हैं पालते हम लोग प्यार से ,
    साँसे हैं कितनी पास हमें खुद पता नहीं ।
    बेहद सोते सी फूटती आवेग पूर्ण गेय रचना -

    ReplyDelete
  42. साँसे हैं कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ?

    ine prashno ke uttar kisee ke paas nahee.......
    ashay hai insaan prakruti ke samne koi maane ya na maane .

    anahsthiti ka darpan hai ye rachana.

    ReplyDelete
  43. सुज्ञ जी,
    आप नाराज ना हों.... ऐसा कुछ नहीं है जो आप चिंतित हों :-)
    जीवन के उतार चढ़ावों में, समय समय पर, मानसिक स्थिति में तरह तरह के बदलाव आते रहते हैं जो अक्सर क्षणिक होते हैं !
    यह रचना उसी सोंच का परिणाम है !
    सादर

    ReplyDelete
  44. @ प्रतुल वशिष्ठ ,
    वाकई मरने की चिंता न करके नव निर्माण में लगना चाहिए, इस कविता में जीवन दर्शन है जो हमें याद रखना चाहिए !

    @ राज भाटिया,
    शुक्रिया भाई जी , मगर एक्टिंग में बुरी तरह फेल हूँ , किसी से क्लास लेनी पड़ेगी :-(

    ReplyDelete
  45. मौत का इक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रातभर नहीं आती (ग़ालिब)- बहुत ही दार्शनिक कविता। पूरा जीवन जी लें तब भी गुत्थी नहीं सुलझती है। ऊहा पोह ता ज़िंदगी बनी रहती है।
    बधाई।

    ReplyDelete
  46. ज़िंदगी तो बेवफ़ा है,
    एक दिन ठुकराएगी,
    मौत महबूबा है,
    जो साथ लेकर जाएगी,
    मरके जीने की अदा,
    जो दुनिया को सिखलाएगा,
    वो मुकद्दर का सिकंदर,
    वो मुकद्दर का सिकंदर,
    जानेमन कहलाएगा....

    आज देशनामा पर न जाने कौन सा मंत्र हुआ है कि औरों को दिख रहा है, बस मेरे लैपटॉप पर ही नहीं खुल रहा...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  47. Jitni chabi bhari ram ne,
    Utana chale khilauna....

    Sadiyon ka samana aur pal ki khabar nahi.

    Bahut gahri bat kahi satish bhai.

    ReplyDelete
  48. चोटों को भुलाकर तेरे
    हम , साथ चल दिए !
    इस बार क्या करोगे
    हमें ही , पता नहीं !
    badi achchi baat kahi aapne.....

    ReplyDelete
  49. .
    .
    .
    पढ़ लिया है मैंने
    एक एक लाइन को
    अब कहा क्या जाये
    यह मुझको पता नहीं !



    ...

    ReplyDelete
  50. क्यों नफरतें हैं पालते
    हम लोग प्यार से !
    साँसे हैं, कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ?
    जीवन में कई मोड़ , बड़े खतरनाक है !
    रास्ता कहाँ जाता है, हमें खुद पता नहीं !

    सांसों का क्या ठिकाना, कब इसकी गिनती की लय टूट जाए।
    चिंतन के लिए बाध्य करती सशक्त रचना।
    शुभकामनाएं, सतीश जी।

    ReplyDelete
  51. आपके गीत और चित्र में नन्हीं सी मुस्काती परी..दोनों ही बहुत कुछ कहते हुए...

    ReplyDelete
  52. लोगों का क्या है रस्म
    निभाकर निकल पड़े
    मौत आएगी मिलन
    को , हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़ कर, सोंचा नहीं सनम ,मरने का समय तय है, पर हमको पता नहीं !

    भावपूर्ण प्रस्तुति,सुन्दर गीत सतिश जी

    ReplyDelete
  53. जब तक जियेंगे, हम भी जलाये रहें दिया !
    कब आसमान रो पड़े ?हमको पता नहीं !
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! कमाल का रचना लिखा है आपने जिसके बारे में जितना भी कहा जाए कम है! शानदार प्रस्तुती!

    ReplyDelete
  54. 'कब जायेंगे घर छोड़ कर, सोचा नहीं सनम ,

    मरने का समय तय है, पर हमको पता नहीं !'

    लापरवाह शब्द, आवारा पंक्तियाँ और एक दीवानी सी कविता जिसे सबकुछ पता होकर भी जो सबकुछ से अनजान मस्ती में चली जा रही है...बेहतरीन..

    ReplyDelete
  55. शिवमंगल सिंह जी की कविता है न सांसों का हिसाब दो।
    वो तो टकरायेंगे ही सामने वाले को भी टक्कर मार देगे।
    इक जिन्दगी काफी नहीं है गालिब साहेब भी कहते थे बहुत निकले मगर कम निकले।
    कितने घाव लग गये हमे भी पता नहीं और किसी दूसरे को पता चलने नहीं देते।
    तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था
    कोई न जान सका रख रखाव ऐसा था ।
    मौत का एक दिन निश्चित है सही बात ।मगर सतीश जी कुछ लोग ऐसे भी है कि ’’मौत जब आयेगी तब आयेगी उनकी खातिर, मौत से पहले बहुत पहले ही मर जाते है। उत्तम रचना

    ReplyDelete
  56. क्यों नफरतें हैं पालते हम लोग प्यार से ! साँसे हैं, कितनी पास हमें खुद पता नहीं
    अति सुंदर रचना
    सच कहा है सतीश जी भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

    ReplyDelete
  57. क्यों नफरतें हैं पालते
    हम लोग प्यार से !
    साँसे हैं कितनी पास
    हमें खुद पता नहीं ?
    जीवन में कई मोड़ , बड़े खतरनाक है !!

    सच इंसान बेवजह किसी से भी नफरत कर लेता हैं जबकि प्यार बेवजह नहीं करता ...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    ReplyDelete
  58. satesh bhai ji
    aapki kavita ki jitni bhi tarrif karun shayad shabd hi kam pad jayen .
    koi ek pankti nahi balki puri ki puri
    kavita ke shabd kkhud -b khud apne aapko charitarth kar rahen hain.
    koi bhi pankti aisi nahijo dil ko na chue.kiski kiski tarrif karun------

    हम रोज नए जोश में
    मगरूर थे , बहुत !
    यह समय कब गया
    हमें खुद ही पता नहीं
    चुपचाप आती मौत में , आवाज तक नहीं !
    उस तीर और समय का, हमें कुछ पता नहीं
    bahut bahut hi jyada pasand aai
    hardik naman
    poonam

    ReplyDelete
  59. चोटों को भुलाकर तेरे
    हम , साथ चल दिए !
    इस बार क्या करोगे
    हमें ही , पता नहीं !
    इक जिंदगी काफी नहीं , यह आग बुझ सके !
    सौ बार जनम लेंगे ? यह हमको पता नहीं !
    सतीश जी
    कमाल की रचना लिखी है आज् ………ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा गढ दिया…………हर पंक्ति दिल को छू गयी।

    ReplyDelete
  60. सतीश जी
    कमाल की रचना लिखी है आज्………ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा गढ दिया…………हर पंक्ति दिल को छू गयी।

    ReplyDelete
  61. सब कुछ समझते हुए हम सब नफरत पालते है जानते हुए .... आपकी रचना अच्छी लगी

    ReplyDelete
  62. हर बार जनम लेंगे ,
    अभी ,मन भरा नहीं !......बहुत सुंदर बात कहे है |

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  63. कमाल की रचना है..बेहतरीन भावाव्यक्ति

    ReplyDelete
  64. जिंदगी प्यार का गीत है...

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  65. यही सबसे बड़ा आश्चर्य है कि हमें सब कुछ पता है फिर भी हम दंभ को छोड़ नहीं पाते चाहे भले इससे हमारे मानवीय और आत्मीय रिश्ते कुर्बान हो जाएँ !

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  66. मौत आएगी मिलन
    को , हमें ही पता नहीं
    कब जायेंगे घर छोड़ कर, सोंचा नहीं सनम ,
    मरने का समय तय है, पर हमको पता नहीं !
    बहुत सुंदर......... एक शाश्वत सत्य है

    ReplyDelete
  67. सच्ची बात, न जीवन का भरोसा, न हमराहियों का।
    चित्र में यह नन्ही गुड़िया कौन है?

    ReplyDelete
  68. यह टिनी है....
    परिवार की एक प्यारी सी सदस्य
    :-)

    ReplyDelete
  69. कृष्ण कुमार13 September, 2012 00:10

    वाह.........

    ReplyDelete
  70. रहस्य के आवरण में लिपटी जिंदगी अबूझ पहेली ही तो है। कोई गर सुलझा ले तो बैचनी-बेकली से ही तो भरा रहेगा। मौत तो पैदा होते साँसों के साथ चलती है,कब गले लगायेगी क्या पता। आशा और जीने की जिजीविषा ही मनुष्य की राह प्रशस्त करती है --सभी भावों को समेटे सार्थक और सुन्दर आपके गीत।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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