Sunday, August 21, 2016

जाने कितने बरसों से यह बात सालती जाती है - सतीश सक्सेना

जैसे कल की बात रही 
हम कंचे खेला करते थे !
गेहूं चुरा के घर से लड्डू 
बर्फी,  खाया करते थे !
बड़े सवेरे दौड़ बाग़ में 
आम ढूंढते  रहते थे ! 
कहाँ गए वे संगी साथी 
बचपन जाने कहाँ गया  !
कस के मुट्ठी बाँधी फिर भी, रेत फिसलती जाती है !
इतनी जल्दी क्या सूरज को ? 
रोज शाम गहराती है !

बचपन ही भोलाभाला था
सब अपने जैसे लगते थे !
जिस घर जाते हँसते हँसते
सारे बलिहारी होते थे !
जब से बड़े हुए बस्ती में
हमने भी चालाकी सीखी
औरों के मोहक वैभव को
देख कसक उठ जाती है !
धीरे धीरे रंजिश की, कुछ गांठे खुलती जाती हैं !
बचपन की निर्मल मन धारा
गन्दी होती जाती है !

अपने चन्दा से, अभाव में 
सपने कुछ पाले थे उसने !
और पिता के जाने पर भी 
आंसू बाँध रखे थे अपने !
अब न जाने सन्नाटे में,
अम्मा कैसे रहतीं होंगी !   
अपनी बीमारी से लड़ते,
कदम कदम पर गिरती होंगीं !
जाने कितने बरसों से, यह बात सालती जाती है !
धीरे धीरे साहस की भी परतें 
खुलती जाती हैं !

Thursday, August 11, 2016

इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ - सतीश सक्सेना

बरसाती कवियों के युग में
नवगीतों के, सूखेपन में ,

कुछ शब्दों के हेरफेर से 
चौर्य कलाओं के छपने से
शागिर्दों के समर युद्ध में
संवेदन मन की ह्त्या से ,
खूब पुरस्कृत सेवक होते
ढेरों नवकवियों के युग में
गीतों की बंजर धरती पर, करने इक प्रयास आया हूँ !

मानवता को अर्ध्य चढाने,निश्छल 
जलधारा लाया हूँ !

सरस्वती की धार, न जाने
कबसे धरती छोड़ गयी थी !

माँ शारदा, ऋचाएं देकर 
कब से,रिश्ते तोड़ गयी थीं !
ध्यान,ज्ञान,गुरु मर्यादा का
शिष्यों ने रिश्ता ही तोड़ा !
कलियुग सर पे नाच नाच के

तोड़ रहा,हर युग का जोड़ा !
कविता के संक्रमण काल में , चेतन ध्रुवतारा लाया हूँ !
जनमानस को झंकृत करने अभिनव 
इकतारा लाया हूँ !

हिंदी जर्जर, भूखी प्यासी
निर्बल गर्दन में फंदा है !
कोई नहीं पालता इसको
कचरा खा खाकर ज़िंदा है !
कर्णधार हिंदी के,कब से
मदिरा की मस्ती में भूले !
साक़ी औ स्कॉच संग ले 

शुभ्र सुभाषित माँ को भूले
इन डगमग चरणों के सम्मुख, विद्रोही नारा लाया हूँ !
भूखी प्यासी सिसक रही,अभिव्यक्ति 
को चारा लाया हूँ !

राजनीति के पैर दबाकर
बड़े बड़े पदभार मिल गए !
गा विरुदावलि महाबली की
हिंदी के ,अध्यक्ष बन गए !
लालकिले से भांड गवैय्ये
भी भाषा की शान बन गए
श्रीफल, अंगवस्त्र, धन से
सम्मान विदेशों में करवाते,
धूर्त शिष्य, मक्कार गुरू के द्वारे, नक्कारा लाया हूँ !
दम तोड़ते काव्य सागर में, जल 
सहस्त्र धारा लाया हूँ !

जाते जाते, काव्यजगत में
कुछ तो रस बरसा जाऊंगा
संवेदना ,प्रीति से भरकर
निर्मल मधुघट,दे जाऊंगा !

कविता झरती रहे निरन्तर 
चेतन,मानवयुग कहलाये
कला ,संस्कृति, त्याग धूर्तता 
मानव मन, श्रृंगार बनाएं !
सुप्त ह्रदय स्पंदित करने, काव्यसुधा प्याला लाया हूँ !
पीकर नफरत त्याग , हँसे मन , वह 
अमृतधारा लाया हूँ !

मुझे पता है शक्की युग में
चोरों का सरदार कहोगे !
ज्ञात मुझे है,चढ़े मुखौटों
में, इक तीरंदाज़ कहोगे !
बेईमानों की दुनिया में हम
बदकिस्मत जन्म लिए हैं !
इसीलिए कर्तव्य मानकर
मरते दम तक शपथ लिए हैं

हिंदी की दयनीय दशा का,मातम दिखलाने आया हूँ !
जिसको तुम संभाल न पाए,अक्षयजल 
खारा लाया हूँ !

Tuesday, August 2, 2016

मालिक ये हाथ रखें नीचे,हम हाथ उठाना सीख गए - सतीश सक्सेना

डमरू तबला कसते कसते,हम धनक उठाना सीख गये,
तेरा गंद उठाकर सदियों से, तेरा आबोदाना सीख गये !


हमसे ही अस्मिता भारत की, परिहास बनाना बंद करें
सदियों से पिटते पिटते ही,तलवार चलाना सीख गए !

मालिक गुस्ताखी माफ़ करें,घरबार हिफाज़त से रखना
बस्ती के बाहर भी रहकर,हम आग जलाना सीख गये !

बेपर्दा घर, जूता, गाली, मजदूरी कर हम  बड़े हुए !
जाने कब, ऊंचे महलों की दीवार गिराना सीख गए ! 

तेरे जैसा ही जीवन पाकर,पशुओं जैसा बर्ताव मिला,
मालिक ये हाथ रखें नीचे,हम हाथ उठाना सीख गए !
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