Wednesday, February 27, 2013

एक चिड़िया ही तो थी,घायल हुई -सतीश सक्सेना

कभी कभी हम अपने ही जोश में चहचहाती एक मासूम सी चिड़िया, की गुस्ताखी पर गोली चला देते हैं ...उसका दिल हम छलनी कर देते हैं , बिना यह जाने हुए कि बिना भूल, उसका क्या हाल कर दिया  !

एक चिड़िया चहकती,घायल  हुई !
एक निश्छल सी हँसी, आहत हुई ! 

जीभ से निकलीं  हुईं , वे गोलियां ,

किस कदर पेवस्त वे,दिल में हुईं !

खेल में,  भेजी गयीं, वे  चिट्ठियाँ, 

क्या तुम्हें मालूम है ,घातक  हुईं !

घर के दरवाजे पर, गुमसुम भीड़ है , 
आज घर पर,बिन मेरे महफ़िल हुई ! 

तुम तो कहतीं थीं,  कि मैं ना रोउंगी !
आखिरी दिन तुम भी तो शामिल हुईं !

तुम तो घर को छोड़कर ही, चल दिए,
ऎसी हमसे क्या सनम , रंजिश हुई !

Friday, February 22, 2013

मैं अब खुश हूँ ... - सतीश सक्सेना

आश्रय देने यहाँ न आना, मैंने जीना सीख लिया !
धीरे धीरे  बिना सहारे , हमने रहना सीख लिया !


मैं अब खुश हूँ तेरी दुनियां,मुझको नहीं बुलाती है ! 
हँसी चुराकर तस्वीरों से, हमने हंसना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ हाथ पकड़ने वाला कोई पास नहीं 
धीरे धीरे घुटनों के बल, हमने चलना सीख लिया ! 

मैं अब खुश हूँ, तेरे  सिक्के, नहीं चले, बाजारों में !

भूखे रहकर धीरे धीरे, कमा के खाना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ, मुझे ठण्ड में,याद न तेरी आती है !

हाथ जले,पर जैसे तैसे आग जलाना सीख लिया ! 

Saturday, February 16, 2013

देख के इन कवियों की भाषा , आँख चुराएं मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कलम उठा अपने हाथों में 
ज्ञानमूर्ति , कहलाते हैं !
दुष्ट प्रकृति के स्वामी अपना 
नाम व्यास बतलाते हैं !
शारद को अपमानित करते ,
लिखते बड़े रसीले गीत !
देख के इन कवियों की भाषा ,आँख चुराएं मेरे गीत !

कौन धूप में,जल को लाकर
सूखे मन को तृप्त कराये ?
प्यासे को आचमन कराने 
गंगा , कौन ढूंढ के लाये ?
नंगे पैरों, गुरु दर्शन को ,
आये थे, मन में ले प्रीत !
सच्चा गुरु ही राह दिखाए , खूब जानते मेरे गीत !

धवलवस्त्र, मंत्रोच्चारण ,
से मुख पर भारी तेज दिखे 
टीवी से हर घर में आये
इन संतों से , दूर रहें !
रात्रि जागरण में बैठे हैं ,
लक्ष्मीपूजा करते गीत !
श्रद्धा के व्यापारी गाते , तन्मय हो जहरीले गीत !

कष्टनिवारक से लगते हैं, 
वस्त्र पहन, सन्यासी के !
राम नाम का ओढ़ दुशाला
बुरे करम, अधिवासी के !
मन में लालच ,नज़र में धोखा,
मुंह से बोलें , मीठे गीत !
श्रद्धा बेंचें,घर घर जाकर, रात में मस्त निशाचर गीत !


शिक्षण की दीक्षा देते हैं ,
गुरुशिष्टता मर्म, न जाने
शिष्यों से रिश्ता बदला है,
जीवन के सुख को पहचाने
आरुणि ठिठुर ठिठुर मर जाएँ,
आश्रम में धन लाएं खींच !
आज कहाँ से ढूँढें ऋषिवर, बड़े दुखी हैं, मेरे गीत !



Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 

घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए, करें प्रभावित मेरे गीत !

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !
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