ज्ञानमूर्ति , कहलाते हैं !!
दुष्ट प्रकृति के स्वामी ,
कैसे नाम व्यास बतलाते हैं !
शारद को अपमानित करते , लिखते बड़े रसीले गीत !
देख के इन कवियों की भाषा , आँख चुराएं मेरे गीत !
कौन धूप में,जल को लाकर
सूखे होंठो, तृप्त कराये ?
प्यासे को आचमन कराने
गंगा, कौन ढूंढ के लाये ?
नंगे पैरों, गुरु दर्शन को ,आये थे, मन में ले प्रीत !
सच्चा गुरु ही राह दिखाए , खूब जानते मेरे गीत !
धवलवस्त्र, मंत्रोच्चारण ,
से मुख पर भारी तेज रहे,
टीवी से हर घर में आये
इन संतों से , दूर रहें !
रात्रि जागरण में बैठे हैं ,लक्ष्मीपूजा करते गीत !
श्रद्धा के व्यापारी गाते,तन्मय हो जहरीले गीत !
धनविरक्ति की राह दिखाएँ
वस्त्र पहन, सन्यासी के !
राम नाम का ओढ़ दुशाला
बुरे करम, गिरि वासी के !
मन में लालच ,नज़र में धोखा, हाथ में ले रामायण गीत !
निष्ठा बेंचें,घर घर जाकर, रात में मस्त निशाचर गीत !
शिक्षण की शिक्षा देते हैं ,
गुरुशिष्टता मर्म, न जाने
शिष्यों से रिश्ता बदला है,
जीवन के सुख को पहचाने
आरुणि ठिठुर ठिठुर मर जाएँ,आश्रम में धन लाएं खींच !
आज कहाँ से ढूँढें ऋषिवर, बड़े दुखी हैं, मेरे गीत !