Friday, November 21, 2014

तुमने उसके अपने घर को, घर अपना बतलाया होगा - सतीश सक्सेना

कितनी बार सबेरे माँ ने , दरवाजा खटकाया होगा !
और झुकी नज़रों से उसने दामन भी फैलाया होगा !

वे भी दिन थे जब अम्मा की नज़र से सहमा करते थे
आज डांटकर तुमने उनको कैसे चुप करवाया होगा !

यह लड़की थी,जो भाई के लिए,हमेशा लडती थी !
तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !

वे  खुद सबके बीच बैठकर,  बेटे के गुण गाते रहते    
अब उनको परिवारजनों में, शर्मिंदा करवाया होगा !

वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी,
ताकतवर आसन्न बुढ़ापे से ही, उन्हें डराया होगा !

20 comments:

  1. वे भी दिन थे जब अम्मा की,नज़र से सहमा करते थे
    सबके बीच डांट के कैसे उनको चुप करवाया होगा !

    यही बहिन थी,जो भाई के लिए,सभी से लडती थी !
    तुमने उसको,फूट फूट कर,सारी रात रुलाया होगा !...HE SUNDER ABHIVYKTI .YU LGA JESE KUCH APNI HE BAAT HO

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    1. लेखन सफल हुआ , आपका आभार !!

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 22 नवम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. आपका आभार यशोदा जी !!

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  3. एक बार नहीं होता है कई बार होता है
    कहते रहिये जनाब अब बार बार होता है
    समय बदल रहा है बहुत कुछ बदलना भी होता है
    अपने रोने धोने की कहने की बात भी है
    समय की कौन कहे वो भी जार जार रोता है

    आपकी रचनाऐं मजबूर कर देती हैं कुछ ना कुछ कह देने के लिये :)

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    1. आपके शब्द मेरे लिए हमेशा बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं , आपके स्नेह का आभारी हूँ, डॉ जोशी !!

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  4. वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
    ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा !
    ..वक़्त की मार सब पर एक न एक दिन पड़ती ही है .. एक जैसा कभी नहीं रहता ..
    बहुत बढ़िया

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  5. वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
    ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा !
    ..वक़्त की मार सब पर एक न एक दिन पड़ती ही है .. एक जैसा कभी नहीं रहता ..
    बहुत बढ़िया

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  6. समय के साथ दीमक के सुपुर्द होते रिश्तों की मार्मिक दास्तान!!

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    1. हाँ , मगर हमें लड़ना होगा भाई !!

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  7. वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
    ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा---कितनी सार्थक अभिव्यक्ति--बदलते वक़्त को आपने खूबसूरत शब्द दिए हैं।

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  8. सुन्दर और सटीक रचना |

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  9. सार्थक,लाजवाब अभिव्यक्ति !
    आईना !

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  10. यही है दिनों का फेर - सामर्थ्य क्षीण होते ही सब-कुछ कैसा बदल जाता है - बहुत मार्मिक चित्रण किया है आपने .

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  11. वे भी दिन थे उनके चलते, धरती कांपा करती थी
    ताकतवर आसन्न बुढ़ापे ने ही, उन्हें डराया होगा !

    पिता तुम्हारे अक्सर अपने, बेटे के गुण गाते रहते,
    उनको भी परिवारजनों ने, शर्मिंदा करवाया होगा !

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  12. सुंदर प्रस्तुति।

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  13. हमीशा की तरह सटीक रचना !

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  14. वाह सतीश जी सुंदर.

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  15. वक़्त की लाठी। बहुत सुंदर रचना!

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- सतीश सक्सेना

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