Sunday, May 27, 2018

अरसे के बाद मिले जाना,इतने निशब्द,नहीं मिलते -सतीश सक्सेना

जाने कितने ही बार हमें, मौके पर शब्द नहीं मिलते !
अहसाओं के आवेगों में जिह्वा को शब्द नहीं मिलते !

तेरे बिन कैसे रह पाए ,कहने को लफ्ज़ नहीं मिलते !
अरसे के बाद मिले जाना,इतने निशब्द,नहीं मिलते !

उस दिन घंटों की बातें भी मिनटों में कैसे निपट गयीं  
मिलने के क्षण में जाने क्यों,मनचाहे शब्द नहीं मिलते 

तुमसे ही कहना सुनना था, पर यादें  जाने कहाँ रहीं 
दुनियां के व्यस्त बाज़ारों में,इतने अशब्द नहीं मिलते !

हर बार मिलन में आँखों की भाषा में ही प्रतिवाद किये 
कैसे  भी अभागे  हों जाना, ऐसे प्रतिबद्ध नहीं मिलते !

5 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर निशब्द।

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  2. मन शांत हो और अपने अनुकूल हो तो शब्द सहज और यदि इसकी विपरीत हो तो शब्दों का अकाल पड़ना लाजमी है
    बहुत सुन्दर मनोभाव

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  3. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २८ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  4. वाह बहुत सुन्दर।
    शब्द नही मिलते।

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  5. बहुत सुंदर छन्द हैं ... बहुत बधाई ...

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- सतीश सक्सेना

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