Monday, April 15, 2019

कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना -सतीश सक्सेना

इस हिन्दुस्तान में रहते,अलग पहचान सा लिखना !
कहीं गंगा किनारे बैठ कर , रसखान सा लिखना !

दिखें यदि घाव धरती के,वहां ऋणदान सा लिखना
घरों में बंद,मां बहनों पे,कुछ आसान सा लिखना !

किसी के शब्द शैली को चुरा के मंच कवियों औ ,
जुगाडू गवैयों,के बीच कुछ प्रतिमान सा लिखना !

तेरी भोगी हुई अभिव्यक्ति ,जब चीत्कार कर बैठे
बिना परवा किये तलवार की,सुलतान सा लिखना !


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- सतीश सक्सेना

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